थोडी दूर में पन चक्की है पहाड़ी पर। कुछ हिलता नहीं है। अंधेरे में कोई रेडियो बंद करना भूल गया है और उसका अनाउन्सर घर जा चुका है चार लड़कियों के बाद लड़का पैदा करने के लिए अमावस से चौथी रात सहवास करने। यादें यकायक इकठ्ठा होती हैं। उन्हें पता नहीं क्यों जल्दी है अपनी गुमशुदगी से बाहर आकर इस रजिस्टर में दर्ज हो जाने की। पहाड़ी में पनचक्की अब चलती नहीं है। जशपुर में रौशनी अब ६० वाट के बल्ब बिजली से करते हैं। गरियाबंद में मिथिलेश साहू हमारे बरामदे में छत्तीसगढी गाने सुनाते हैं। किशोर तिग्गा अपनी कापी के आखिरी पन्ने पर हमेशा पुलिस और पिस्तौल बनाता है, क्योंकि वह पुलिस लाइन में रहता है। किशोर तिग्गा ३० साल बाद जेहन में लौटता है अपनी कॉपी के आखिरी पन्ने के साथ। मिडिल स्कूल के हेड मास्टर चौबे जी मुहर्रम के दिन कोयले पर चलते हैं। उनके दफ्तर की दीवार के हर सुराख में अगर बत्तियां ठुन्सी हुयी हैं। दूर कहीं भजन हैं। भजन में बनारस के घाट हैं। सुबह बजते भजन में बनारस के घाट जैसी कुछ बात है। हवा में भी। रीवा में एक फ़िल्म के टिकट के लिए धक्का मुक्की है, वहां राम सिंह किसी के कंधे पर चढ़कर खिड़की तक पहुँच गया है। सिस्टर मत्रोना स्टाफ रूम की खिड़की से लंच के बाद हाथ धोते हुए मुझे देखती हैं, मुस्कुराती हैं। हम एक कुवे में नहाने जाते हैं। वहाँ पर सांप है। हम घर बता कर नही आते। क्या कोई हमारे यहाँ आएगा? क्या हम कहीं जायेंगे? ये क्या है जो याद के दहाने तक जाने की कोशिश करता है। धक्कामुक्की में। इनमे वो सब नहीं है जो सच हुए सपनों और पूरी हुयी ख्वाईशों में था। इसमे वह है जो हाशिये पर कही था, न दाखिल न दर्ज।
कोई है जो मर रहा है।
मुझे पता है उसके मरने का।
मैं उसके पास बैठा हूँ। शब्दों के झूठ से दिलासा की चुप्पी अच्छी है।
उसका हाथ मुझे छूता है।
मैं तेजी से पलट कर उसे देखता हूँ।
डर गए ? एक सवाल। आंखो में पहचान। चमक। मुस्कराहट।
नहीं तो, मैं थूक गटकता हूँ।





