Tuesday, September 25, 2007

जिये का कोई अगला पल नहीं होता

तुम फिर सफर पर हो. अब आने के. पहले जाने का था. संक्रमण कितना गहरा और बड़ा हो जाता है, जब आप संवेदनशील होते हैं और सफर आपको इलास्टिक की तरह खींच कर रख देता है. उस रात मुझे ऐसा लगा था, जब यात्राएं हमारे रास्तों में गुंथ कर अपनी नियतियों की तरफ जा रही थी. हम बह रहे थे, जिसका कोई अगला पल नहीं था. जिसका कोई सिरा नहीं था, सिर्फ एक प्रवाहित राग का आरोह- अवरोह था, जो न गाये में भी प्रवाहित था और गाये में तो था ही. वह एक जिंदगी थी, दुनियादार व्यावहारिकताओं से बेपरवाह, बेहद सघन और गहरी. अभी इस वक़्त तुम उस पल के उस तरफ और मैं इस तरफ हूं. बीच में शीशे की दीवार थी, जहां से हम उन पलों को देख तो सकते थे, पर छू नहीं. छुअन हमारी उंगलियों की स्मृति में थी.
शीशे से इस पार हम जिंदगी के बारे में सोच रहे हैं और सोचना मैंने गहराई से विचार करने के बाद पाया है कि खुद को परेशान करने का एक कृत्य है. ज्यादा सोचो मत. इस वक़्त को अपने को दो, अपनों को दो. हंस लो, रो लो, जी लो, लड़ लो, शिकवे कह लो, रहस्य बांट लो. जिए का कोई अगला पल नहीं होता, कल तुम्हारे भेजे स्पैम में ही लिखा था. कल को ये न लगे कि अरे यार ये या वो रह गया कहे या करे जाने से. जो जिया गया, वही मोक्ष था, जो नहीं जिया वही संस्कार, वही पाप, पुण्य, प्रायश्चित, अतृप्ति.

सोचने के परेशानी के बाहर सब वैसा ही है, जैसा हम छोड़ कर जाते हैं. मकान. क्रियेटिविटी.परिंदे. कामकाज. कॉफी. नये जूते में पुराने रास्तो पर सैर. अकेलापन. पर जिया गया. पूरापन. छलकता हुआ. और बहुत सारी सार्थकता. प्यार. हरी चाय.
जो जिया गया वह उस पल से बिल्कुल अलग था, जो नहीं जिया गया. जो नहीं जिया गया, उसके अपने संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, विश्लेषण, अतीत, आकलन, भविष्य हैं. जो जिया गया, उसके साथ ऐसा कोई भी बोझ नहीं है. और जिंदगी जितनी भी लंबी हो, ऐसे पल कितने होते हैं या आ पाते हैं ?
कभी गौतम बुद्ध ने पीछे मुड़कर अपने दुनियादार अतीत को देखा होगा भी तो शायद किसी दृष्टांतकेसाथ ही. जो गैरजरूरी था, अस्वीकार्यथा वह छोड़ दिया गया है, अब उसके लिए परेशान होने की क्या जरूरत है. जो सामने है उसे देखो और अगर तुम जी रहे हो उसे जो हाथ में है, तो फिर परेशान होने की क्या बात है. मेरा सोच ये है कि दुख हो या सुख अगर असली है तो इतना घना होगा कि आप सोच विचार करने लायक ही नहीं होंगे. (बहुत बड़ा वाला चिरकुट यहां आकर बैठ गया है, मैं उसे कह नहीं पा रहा हूं कि मैं किस गहराई में जाकर ये लिख रहा हूं और वह दफा क्यों नहीं हो जाता).
और अब आगेः
इसलिए जिंदगी को लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है. क्योंकि ये जो परेशानी है वह अपने लिेए पैदा कर रहे हो, वह नहीं जो जिंदगी लेकर आएगी. और जो जिंदगी लेकर आएगी, वह तुम्हारे होशियार दिमाग से परे की होगी, इसलिए उसके बारे में सोचकर तुम कुछ ज्यादा कुछ खास नहीं कर सकते. उसकी जो संभावना या प्रायिकता (प्रोबेबिलिटी- मेरे साइंस कॉलेज का शब्द) है वह सभी के लिए वैसी है जैसी तुम्हारे लिए. इसके बाद भी अगर कुछ खास होता है, तो इसलिए क्योंकि तुमने अपने पसंद की जिंदगी को चुनना पसंद किया है बजाय किसी और की शर्तोंपर जीने की. उसकी कीमत है. जैसे जो जिंदगी मेरी है उसकी अपनी कीमत है. जो मुझे और तुम्हें अपने अपने स्तर पर चुकाएंगे. तुम जो जिंदगी जीते हो, उस पर तुम्हें, मुझे और वे सारे लोग जो तुम्हें बेइंतहा चाहते हैं, सब को बहुत फख़्र है इसलिेए अगर तुम्हें मजा आ रहा तो ठीक है, पर परेशान होने की कोई वजह नहीं है.

कोई बात नहीं है अगर कुछ दिन बिल्कुल सामान्य हों. पर उनका महान न होना और सामान्य होना तुम्हें जीने से नहीं रोक सकता. अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं. वे हमारे भीतर के नये मायनों को खोलते हैं. एक ऐसे ही दिन तुम मुझे मिले. मुझे वह तारीख याद नहीं. पर देखो तुमने मेरा क्या हाल कर दिया.

9 comments:

अनिल रघुराज said...

- जो जिया गया, वही मोक्ष था, जो नहीं जिया वही संस्कार, वही पाप, पुण्य, प्रायश्चित, अतृप्ति।
- अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं...
क्या लिखते हैं जनाब और क्या images हैं...

आस्तीन का अजगर said...

जी बहुत शुक्रिया जनाब.. आप दयालु हैं

Debashish said...

रघुराज की तारीफ के बाद यहाँ पहुँचा पर बातें सारी भेजे में उतरी नहीं। अपना दिमाग भी भोपाली है पर लगता है अंदर से बिल्कुल खाली है। पर पढ़ता रहुंगा और किसी दिन समझ कर टिपियाउंगा भी।

Raviratlami said...

ठीक कहा देबूभाई, ये जावास्क्रिप्ट कोड नहीं है कि दन्न से बगी लाइन समझ में आ जाए...

मैं भी कहीं से घूमता घामता पहुँचा, खासकर अजगर नाम देखकर - कि ये हिंदी ब्लॉग जगत् में मेरे अलावा दूसरा अजगर कहाँ से आ गया... तो पता चला कि रघुराज जी पहले ही इनकी तारीफ़ें कर चुके हैं.

वैसे, इनका लिखा बहुत कुछ मुझे भी समझ में नहीं आया...., पर हाँ, ये भी कुछ अजदकी लेखन शैली है - भीड़ से अलग-थलग जिसे आप नजर अंदाज नहीं कर पाएंगे...

bonolota said...

looks like human tendencies in dire circumstances look into the familiarity of thought processes, making it feel like your own self speaking out the words to pacify the self and the innermost clutches of the worldly existance.....

Pratyaksha said...

किस गहराई में जाकर लिख रहे हैं ? मुझे तो तोरू ओकाडा के कूँए की याद आ रही है ।

aparajit said...

साधुवाद ;हिंदी में ‍इतना भी होता रहे तो तरने की संभावना दिखती है ।

Beji said...

कुछ जो याद रखूँगी

"जब आप संवेदनशील होते हैं और सफर आपको इलास्टिक की तरह खींच कर रख देता है."
"छुअन हमारी उंगलियों की स्मृति में थी."
"मेरा सोच ये है कि दुख हो या सुख अगर असली है तो इतना घना होगा कि आप सोच विचार करने लायक ही नहीं होंगे."

heard somewhere recently....live your life the way you want to;nobody ever came out of it alive anyways....

swapandarshi said...

very interesting, and very unique in hindi blog, kahanaa padegaa ki anooTha hai,
So many thoughts remind me of Agyeyji, jean Paul Sartr, Albert Kamus, Ayn Rand, and yet its very original.