Sunday, September 30, 2007

पहले नरेंद्र मोदी हारेंगे या उनके विचार

जब सुनीता विलियम्स अहमदाबाद में थी, तब मैं भी अपने काम से वहां गया हुआ था. कई दिनों से मेरे पास परजानिया फिल्म की वीसीडी पड़ी हुई थी, एक तन्हा रात मैंने वह फिल्म देखी. इसी बीच मैं अपने एक हमपेशा - रॉबिन डेविड की किताब सिटी ऑफ फियर भी पढ़ रहा था, जो उसने यहूदी होकर एक ऐसे मुहल्ले के बारे में लिखी है, जो हिंदू औऱ मुस्लिम आबादियों को काटती एक सड़क पर बना है. परजानिया और ये किताब शायद इसलिए उल्लेखनीय हैं कि ये किसी हिंदू या मुस्लिम के सच न होने के कारण अहमदाबाद के दंगों की शक्ल में हुए नरसंहार का थर्ड पार्टी अकाउंट है. दोनों ही गज़ब के काम हैं. जो बताते हैं कि किस तरह राज्य की सरकार और पुलिस इस नरसंहार में भागीदार थी.
राबिन की तरह मेरी भी मां है, और परजानिया के नसीरूद्दीन शाह की तरह मेरा अपना परिवार भी, एक बेटा और एक बेटी भी. मुझे लगता है यहूदी या पारसी होने की बजाय नरसंहार की दरिंदगी को समझने के लिए एक गृहस्थ होना ज्यादा जरूरी है. मनुष्य होने के लिए भी. और जब आपका अपना परिवार होगा, और जिन बच्चों के लिए आप अपनी पृथ्वी, देश, शहर, मुहल्ला छो़ड़कर जाएंगे, तो शायद यही सोचकर वहां वे शांति से रहें, सुखी रहे, आनंद में रहें, समृद्धि में रहें. अगर सभी लोग रॉबिन की तरह हों और परजानिया के हीरो की तरह भी, तो शायद दंगे औऱ नरसंहार हो ही न. कम से कम भूकम्प के दो साल के भीतर तो नहीं ही हों. सिटी ऑफ फियर मैं अभी पूरी नहीं कर पाया हूं. इसी बीच आज एनडीटीवी इंडिया में नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू देखने को मिला. इंटरव्यू में जैसा कि नरेंद्र मोदी की आदत हो चुकी है, और ज्यादातर संघी नेता लोगों के बीच फैशन है, वे जुबान से ज्यादा शब्दों को जबड़ों से चबा कर बोलते हैं. वे चाल, चलन, चोला, चरित्र और च अक्षर के अन्य शब्दों का अनुप्रास प्रयोग देश को ठीक करने और चुनाव जीतने के लिए करते हैं. (पता नहीं किस मीडिया प्लानर की सलाह पर). वह गुजरात के दंगों को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हमलों से जोड़कर देख रहे थे. वे कह रहे थे कि जैसे देश के दूसरे दंगा पीड़ितों के साथ हुआ है (1984 के दिल्ली दंगों का नाम लिया नमो ने), गुजरात के दंगा पीड़ितो के प्रति सौतेले बरताव का आरोप उन्होंने केंद्र सरकार पर लगाया. उन्होंने कहा मेरी सरकार ने जो भी चुनावी वायदे किये थे, पूरे किये. औऱ गुजराती जनता मुझे दुबारा चुनेगी क्योंकि मैं उनकी कसौटी पर खरा उतरा हूं. अल्पसंख्यक मामलों पर सरकार की भूमिका के बारे में लगभग सिटपिटाते हुए विजय त्रिवेदी ने सवाल पूछा तो कैंमरा उस मौन पर मंडराता रहा, जो नरेंद्र मोदी ने मेकअप की तरह अपनी चेहरे पर पहन रखा था. त्रिवेदी ने अगला सवाल पूछा तो नमो ने कहा कि आपकी जानकारी ग़लत है. और फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बड़ी बातें कहनी शुरू कर दी.

क्वैं क्वैं क्वैं क्वैं क्वैं क्वैं क्वैं क्वैं .....

वे ये सब कह सकते हैं. आखिर गुजरात की जनता ने उन्हें चुना है. इसतरह से वे संविधान की आत्मा को प्रतिष्ठित कर पा रहे हों न कर पा रहे हों, पर गुजरात के लोगों ने उन्हें कमाया है. एक ऐसे लोकतंत्र ने जो अपने उस हिस्से को बेदखल करता है, खाने लगता है अपने नाखूनों और रक्तरंजित जबड़ों से, जो हाशिये पर है, जिसे शायद उतनी कुटिल पॉलिटिक्स नहीं आती, जो पढ़े लिखे नहीं हैं और जो बड़े धंधे नहीं करते.

नमो इसलिए भी ऐसा कह सकते हैं क्योंकि उनको और उनकी राजनीति को चुनौती देने वाला एक भी शख्स सामने नहीं आया. जो गुजरात में शांति की बात गंभीरता से करता. जो उनकी दलीलों की कलई खोलता. जो उनकी आतंक की स्थापना पर सवाल खड़े करता. जो गुजरात का मांओं-बहनों और परजानिया के गुमे बच्चों को सवाल की तरह सामने ला खड़ा करता. जो पूछता कि नफरत की आग अवाम औऱ जम्हूरियत को कहां लेकर जाएगी.

नमो ये सब हंसते हुए इसलिए भी कह सकते हैं, कि कांग्रेस और गांधीवादियों ने उनके खिलाफ ठीक से चूं तक नहीं की. वह उसूलों पर लड़ कर नहीं निहत्थे लोगों को मार कर और मरता देखकर विजेता बना है. गुजरात में चुनाव करीब हैं और नंमो लगभग हर चैनल पर अपनी उपलब्धियों का डंका पीटते दिखलाई देंगे. गुजरात की जनता और भाजपा के पटेल लोग भी ये बता देंगे कि नमो उनकी कसौटी पर कितने खरे या खोटे उतरे हैं.

मैं नरेंद्र मोदी व्यक्ति के बारे में सोच रहा था. वह कैसे सोता है. क्या नींद की गोलियां लेनी पड़ती हैं. क्या रामदेव टाइप कोई महाराज की जड़ी बूटी योग प्राणायाम की मदद ली जाती है. जैसे मनोविज्ञानी बोलते हैं कि नींद नहीं आ रही तो सोचो कि बकरियों के बाड़े को एक के बाद बकरी पार कर रही है. उन्हें गिनो. नमो क्या गिनते हैं जब उन्हें नींद नहीं आती. उसके कौन सगे संबंधी हैं. क्या उसके बाल बच्चे होते तो क्या गुजरात में परजानिया जैसे हजारों किस्से होते. क्या नरेंद्र मोदी को अपनी जिंदगी में किसी औरत का प्यार मिल सकता. नमो का बचपन कैसा रहा. उसके साथ क्या कुछ कभी बुरा हुआ जिसके कारण उसके मुख्यमंत्रित्वकाल में वह सब हुआ जिसके बारे में पूर्व गृह मंत्री औऱ जंग खाए लौहपुरुष मुरीद हैं और मेरी 51 कविताएं के लेखक क्षुब्ध. क्या ऐसा संभव है कि गृहस्थ हुए बगैर आप राजधर्म का निर्वहन कर सकते हैं. खास तौर पर अगर आप पुरूष हों.

वे कह रहे हैं कि राज्य में आज पूरी तरह से शांति है और विकास का भारी माहौल है. दंगों में उजड़े लोगों ने ऐसा कोई हलफनामा दिया हो तो उसकी कोई खबर नहीं. जिस गोधरा को लेकर नमो की साबरमती एक्सप्रेस गांधीनगर पंहुची थी, वही अभी तक संदिग्ध है कि डिब्बे में आग भीतर से लगी थी या बाहर से. सोहराबुद्दीन मामले में भी साफ हुआ है कि गुजरात में पुलिस, सच, और अच्छे प्रशासन के बीच के संबंध कोई बहुत मधुर नहीं है.

नरेंद्र मोदी जिस रामनाम पर गुजरात में वोट मांग रहे हैं इसबार यूपी के चुनाव में अयोध्या की जिला भाजपा ने उनके वहां चुनाव प्रचार करने के लिए पधारने से मना करवा दिया था. नमो तीसरा टर्म भी जीत सकते हैं. लोकतंत्र बहुमत से चलता है. क्योंकि उनका कोई विरोध नहीं है, इसलिए उनकी जीत आसान है. पर अगर वे हार भी जाए, तो गुजरात में कुछ बदलने वाला नहीं. हो सकता है पार्टी के भितरघाती ही मोदी को हरवा दें. हालांकि ये भी आसान नहीं.

क्या ये दिलचस्प है कि नफरत के वोटबैंक पर गुजरात के साथ पाकिस्तान और अमेरिका भी जल्द ही चुनाव देखेंगे. जिस मियां मुश को लेकर नमो पिछली बार चुनाव में उतरे थे, इसबार उनकी हालत भी कुछ पतली है. और उधर जॉर्ज डबल्यू बुश की रिपब्लिकन पार्टी भी... जिसने नमो को गुजरात में हुए नरसंहार के कारण वीजा देने से मना कर दिया था. हर जगह मनुष्य होने की, एक ग़लत नेता के लिए शहीद होने की, एक ग़लत नेता के कारण शिकार होने की, एक ग़लत नेता चुनने के खामियाजों की हजारों गाथाएं हैं. वे भी जो परजानिया की तरह पारसी और रॉबिन की तरह यहूदी नहीं है. पर उनके और बाकी हिंदू- मुसलिमों की तरह इंसान हैं.

मोदी को हराने का तरीका धोखा नहीं. धोखे से फिर जो सत्ता में आएगा, वैसा ही हो जाएगा. उसका तरीका उन सवालों को ललकार कर, उन बातों को ग़लत साबित कर, उन धारणाओं को चुनौती देना है, ताकि नमो हारे न हारे, वे विचार जरूर बेलगाम न हों, जो लोकतंत्र और सत्ता के बीच अवैध संबंधों के कारण जन्म लेते हैं.

वे सवाल अपने लिए ख़ूनी जबड़ों के खिलाफ इंसानी जुबान तलाश कर रहे है.

अनिल रघुराज की अजगर पर राय

एक हिंदुस्तानी की डायरी ब्लॉग पर पुराने ब्लॉगर अनिल रघुराज की टिप्पणी आस्तीन के अजगर के लिए न सिर्फ प्रोत्साहन से बल्कि भारी आश्वस्तिबोध से भी भरी हुई है. आस्तीन का अजगर इस दरियादिली के लिए रघुराज जी का बहुत आभारी है और साथ ही उस इजाज़त के लिए भी जो उन्होंने अखाड़े के उदास मुगदर पर इस पोस्ट को एक तमगे की तरहे पहनाने के लिए दे दी. अनिल रघुराज जी के अलावा और टिप्पणियां करने वाले बंधुओं को मेरा हृदय से आभार. उन सबसे मेरी जिदंगी औऱ खूबसूरत हुई है.


मैंने देखी आस्तीन के अजगर की मणि, कल ही
आस्तीन के सांप के बारे में आपने ही नहीं, मैंने भी खूब सुना है। आस्तीन के सांपों से मुझे भी आप जैसी ही नफरत है। लेकिन कल मैंने आस्तीन का अजगर देखा और यकीन मानिए, दंग रह गया। मैंने उसकी मणि को छूकर-परखकर देखा और पाया कि आस्तीन के इस अजगर में छिपा हुआ है एक उभरता हुआ प्रतिभाशाली लेखक।माफ कीजिएगा। इस नए ब्लॉगर से आपका परिचय कराने के लिए इस पोस्ट में चौकानेवाला शीर्षक लगाकर मैं आपको यहां तक खींच कर लाया हूं। क्या करता मैं? इस ब्लॉगर ने अपना नाम ही आस्तीन का अजगर रखा है और इसके बारे में मैं और कुछ जानता ही नहीं। इसके प्रोफाइल से पता ही नहीं लगता कि इसका असली नाम क्या है, इसकी उम्र क्या है, रहता कहां है। और इसने अपने नए-नवेले ब्लॉग का नाम भी रखा है – अखाड़े का उदास मुगदर। मैंने धड़ाधड़ इस ब्लॉग की सभी पोस्ट पढ़ डाली और तभी पता चला कि इनके लेखन में कितना दम है, इनकी सोच में कितनी ताज़गी है। कुछ बानगी पेश है।पहले जिये का कोई अगला पल नहीं होता की कुछ लाइनें देख लीजिए।"कभी गौतम बुद्ध ने पीछे मुड़कर अपने दुनियादार अतीत को देखा होगा भी तो शायद किसी दृष्टांत के साथ ही. जो गैरजरूरी था, अस्वीकार्य था वह छोड़ दिया गया है, अब उसके लिए परेशान होने की क्या जरूरत है. जो सामने है उसे देखो और अगर तुम जी रहे हो उसे जो हाथ में है, तो फिर परेशान होने की क्या बात है. मेरा सोच ये है कि दुख हो या सुख अगर असली है तो इतना घना होगा कि आप सोच विचार करने लायक ही नहीं होंगे....अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं."अब दूसरी पोस्ट लौटने की कोई जगह नहीं होती की एक झलक देखिए..."कुछ खास लोगों के साथ आप अपने जिंदगी के सबसे अच्छे पल, सूर्यास्त, सबसे अच्छी शराब बांटना चाहते हैं. आप पहले तो ये साबित करना चाहते हैं कि वे आपके लिए खास हैं और दूसरा ये कि आप ऐसे किसी खास मुकाम तक पंहुच चुके हैं जो लोगों को जताना बताना जरूरी है. वरना उस चीज की कीमत ही वसूल नहीं होती, जो आपने हासिल की हो."इस ब्लॉग की ताज़ातरीन पोस्ट है अमहिया के एक जीनियस दोस्त को चिट्ठी। इसे आप खुद पढ़े। इससे पहले की कल 26 सितंबर वाली पोस्ट में सुनीता विलियम्स के गुजरात आने और नरेंद्र मोदी से मिलने-जुलने का रोचक विश्लेषण किया गया है। मुझे चारों पोस्टों को पढ़कर यह पता चला है कि आस्तीन का अजगर साइंस का विद्यार्थी रहा है। शायद वह भोपाल के किसी मीडिया संस्थान में काम करता है। बस, इसके अलावा उसका ब्लॉग कुछ नहीं बताता। हां, पूत के पांव पालने में ही दिख गए हैं। आस्तीन के अजगर ने अपनी मणि की झलक दिखला दी है। शायद आपको भी इसके ब्लॉग पर जाकर मेरे जैसा ही कुछ लगे। खैर, जो भी हो। इस नए अपरिचित ब्लॉगर का तहेदिल से स्वागत और उसके दमदार लेखन की शुभकामनाएं।
Posted by अनिल रघुराज at 6:53 AM 6 comments Links to this post

Thursday, September 27, 2007

एक गुमशुदा दोस्त का पता मिलने पर

तुम्हारा इस तरह आदतन बीच बीच में गुमशुदा हो जाना मुझे जासूस में बदल देता है. सिगरेट की पन्नी से लेकर मंहगी स्टेशनरी की पर्चियों में मैं सुराग दर्ज करता चलता हूं. बीच बीच में तुम्हारे सुराग और मेरी जासूसी एक खुफिया ताबूत में मसालों, तलवार, शाराब के गिलास और मेकअप किट के बीच प्रतीक्षारत होते हैं. दो सांसों के बीच सदियों का सफर काट रही महारानी नेफरतीती की तरह जो इस वक़्त इजीप्शियन ममी बनकर गहरी नींद में सो रही है. किसी और वक़्त में जागने के लिए तैयार, सहेजी और संभाल कर रखी हुई.
नेफरतीती की ही तरह सुरागों और जासूस को उम्मीद और इंतजार है कि एक दिन अचानक उनके साथ भी कुछ रोमांचक घट जाएगा, शाप मुक्ति की तरह चमत्कारिक और निर्णायक, अवतार के आने की खब़र की तरह राहत भरा. बीच के रेगिस्तान औऱ धूल उड़ाती पागल हवाओं में चलना उम्मीद आसान बनाती है. तब तक नेफरतीती सपनीली आंधियों में करवटें बदल रही है. और सुराग भी. दराज में रखे सुराग इस बीच जासूस पर नज़र गड़ाए हुए हैं, जबकि जासूस का ध्यान सुरागों पर नहीं है. जिंदगी, सांसारिकता, ऐंद्रिकता पर है. जो एक अलग फिल्म है. एक अलग विषयांतर.

विषयांतर में संघर्ष है, साजिशें हैं, दुरभिसंधियां हैं, ऐंद्रिक कुटिलताएं हैं, हफ्ते में दो बार सहवास, बिजली का बिल, वोटर कार्ड का फॉर्म, इत्र की शीशियां, गर्म दोपहरों में जमीन पर पानी का छिड़काव, रिश्तेदारियां, पड़ोसन के लिविंग रूम में रखे टीवी के सीरियल से निकलकर खबरों के चांदनी चौक में दांव हारती एक जड़मति औरत है.

हकीक़त यादों, सपनों और नियति में गड्डमड्ड है. यादों का प्यार सपनों की अनिद्रा में बलात्कार करता है. दराज में रखे सुराग सब देखते हैं- जासूस को शहर, मकान, नौकरानियां, चेहरे, रिश्ते, कहानियां, झूठ, बयान, दृश्य, मंच और प्रकाश व्यवस्था बदलते हुए. सुराग उस आदिम अनकहे के साथ उस शब्द के इंतजार में हैं जो बस्तर के एक गांव के तालाब की बगल में उगे केवड़े के अहसास के साथ पैदा हुआ और कालांतर में ओखला से कल्याणपुरी जा रही बस नंबर 364 में लाजपत नगर से सवार हुआ और गुमशुदा हो गया. उससे पहले जासूस को बारिश, झींगुरों के अविरल संगीत और पंख फड़फड़ा रहे चमगादड़ों के बीच कोयला खदान से लगे नौरोजाबाद रेलवे स्टेशन के लालटेन अंधेरे में देखा गया. नेफरतीती की तरह सुरागों को भी उम्मीद है एक पल उनका किस्सा पिर शुरू होगा...गतांक से आगे से और खत्म होगा - शेष अगले अंक में आश्वासन के साथ.

सोचो वह पल कैसा होगा. सहस्त्राब्दियों से ताड़ में बैठी और तैयार नेफरतीती और सुराग उस पल को हाथ से फिसलने नहीं देंगे. बेन जॉनसन से भी तेज और बोरिस बेकर की तरह उड़कर वे एक फ्लैश में हमारी मुस्कानों में बदल जाएंगे. उस पल के लिये नेफरतीती और सुरागों ने समय की झील में कांटे लटका रखे हैं. वह पल एक दिन उस कांटें में फंस जाएगा. उन्हें सौभाग्य के बारे में फैलती अफवाहों पर यकीन है. इंतजार को उम्मीद और इन अफवाहों का दिलासा है. उम्मीद को इंतजार तीन ताल में संगत देता है. तब तक उनकी किस्मत में नींद, सपनों में अनिद्रा और स्मृतियों में करवटें हैं. सुराग और नेफरतीती सपनो और स्मृतियों के बीच करवटें बदलते हैं. बोझ के लिए कंधे बदलते हैं. कंधे के लिए बोझ बदलते हैं. एक से दूसरी असुविधा में पलायन करते हैं. एक से दूसरे अंधेरे में. एक से दूसरे अपरिचय में. एक लापता चेहरे से एक गुमशुदा पहचान में.

नींद में कई बार नेफरतीती कुनमुनाकर उठती है और रेवलॉन की एंटी रिंकल क्रीम बगल में रकी देख फिर तसल्ली से सो जाती है. ब्रह्मपुत्र नदी में ययाति उस कंडोम को बहा आया है, जो उसके प्यार की आखिरी और अजन्मी निशानी था. शापमुक्त देवता में बदलने के लिए एक मगरमच्छ उसे निगल जाएगा.

जीने के लिए अस्तित्व काफी नहीं है. उसका आश्वस्तिबोध ज्यादा जरूरी है, पर वह भी कहां है. उसका आभास है. इत्र की खाली शीशियों में बची रह गई खुशबुओं की तरह- जो हवा को सांस और सांस को जिंदगी देते हैं. ये आभास नेफरतीती और सुरागों का पुराना परिचित है. कुंए, लैटरबॉक्स और चौकीदारों की तरह. जासूस सुराग इकट्ठे करता है, पर अपने सुराग नहीं छोड़ता. अपने पांवों के निशान मिटाता चलता है. ये तय कर पाना हालांकि मुश्किल है कि उसका पीछा कोई नहीं कर रहा. वह मिटाता चलता है- कुर्ते से लिपस्टिक के दाग, सपनों पर से स्मृतियों के निशान और हक़ीकत पर से काल के. पर दाग पूरे कहां जाते हैं.

रेडियो पर गाने हैं. धूप का चकत्ता गुरूदत्त की फिल्म में आंगन पार करता है. गलियों में बूढ़े लोग चलते हुए बचना सीख रहे हैं. जिंदगी में पहली बार. बचना हर बार पहली बार होता है. उस अकस्मात से जो हमारे स्याह, लापरवाह और अकेले पल में हमें दबोच लेगा. वह पल सुराग और नेफरतीती की ताक में नहीं है. जासूस की ताक में हैं. जासूस वहां भी गुमशुदा है, जहां से चिट्ठियां नहीं लौटती.

हमारे बीच, आसपास, भीतर जो आदिम है, वह हर बार पहली बार है. और हर बार हमेशा के लिए. बच्चे के दो पांवों पर खड़े होने और पहला डग भरने की तरह. आदिम, पहली बार, हमेशा के लिए. पृथ्वी पर आये आदिमतम मनुष्य की तरह डोंगी बनाएंगे और आदिमतम भोलेपन के साथ पानी में फिसलती मछली का शिकार करेंगे. शिकार बनते ही मछली अपने आदिम तरह से छटपटाएगी. तब हमारे गले से कुछ आवाजें निकलेंगी. कुछ शब्द बन जाएंगी. कुछ संगीत. उस वक्त़ पौधे क्लोरोफिल और नदियां सभ्यताओं से प्रयोग कर रही होंगी. धर्मग्रंथ लिखे जाने से बहुत पहले पुरूष और स्त्री बिना एक दूसरे की तरफ देखते हुए सहवास करते थे.

वक़्त रेगिस्तान से गुज़र रहा है. तारे रास्ते दिखलाते हैं. जासूस बीच बीच में अपने निशान मिटाता चलता है. क्या उसके पीछे भी कुछ लगा हुआ है- शक और वहम की तरह आदिम, जो अकेले अंधेरे में मूतते वक़्त कंपकंपी की तरह छूटता है.

आभास के साथ छायाएं बदलती हैं.

अमहिया के एक जीनियस दोस्त को चिट्ठी

दांव खेलने की एक उम्र होती है. फिर हम चुक, थक, बोरिंग और रूटीन हो जाते हैं. दांव कोई भी हो सकता है. जज़्बात का दांव, अरमान का दांव, पैसों का दांव, यकीन का दांव, खतरों का दांव, सब्जी खरीदने का दांव, करियर का दांव, मुहब्बत का दांव, फ्लर्ट का दांव और दुश्मनी का दांव. जिंदगी की हर वो सांस हर वो पल जो हमारे मनुष्य होने का ऐलान करती है, एक दांव है, जो हमने खेला है.

जैसे हम दांव खेलते हैं, वैसे हम पर भी दांव खेले जाते हैं. और मेरे खेले गये दांवों के लिए ये बात बहुत मायने रखती है कि मुझ पर कैसे दांव खेले गये. फिर हम सिकुड़ने लगते हैं. मर्दानगी में, खतरों को लेकर, रोमांच को लेकर. हमें सुरक्षा चाहिए, भले ही हमारे मनुष्य होने का ऐलान थोड़ा मद्धम पड़ जाए. भले ही हम कुछ समझौते कर लें.

मुझ पर बड़े दांव खेले जाते तो मैं काम भी कुछ बड़े करता. पर मुझ पर दांव खेलने वाले दुनियादार लोग मुझसे ज्यादा डरपोक और कमजोर थे. उनके पास न दांव लगाने का गुर्दा था, न बड़े दायरे, न कोई बड़े इरादे. बकौल श्रीकांत वर्मा- मैं ग़लत बीवी का नेपोलियन था, मैं ग़लत जनता का शहीद था. उन्हें मुझसे ज्यादा खतरा ईश्वर और उससे कुपित होने का था, जिस पर उन्होंने बड़े दाव खेले थे, जिस पर उन्हें ज्यादा यकीन था. वहां अपदस्थ होने से भयभीत डोलते सिंहासन पर कांपते हुए बैठे मायावी, कुटिल और अभिशप्त ईश्वर के पास अपनी लकीर लंबी करने के लिए कुछ नहीं था. यकीन का ग़लत इस्तेमाल और अंधेरे का फायदा उठाकर चोरी से उसने मेरी लकीर छोटी करने की कोशिश की. जिसका चश्मदीद गवाह बनने को कोई तैयार नहीं. अंधेरे और कुहासे में हम सिर्फ गला खंखार कर पूछते रहे- कौन है. ईश्वर ने यहां भी जवाब नहीं दिया. ठीक प्रार्थनाओं की तरह.

उससे बहुत फर्क तो नहीं पड़ा पर मुझ पर दांव लगाने वालों की हिम्मत जवाब दे गई और मुझे कई बार गंभीरता से लगा कि घोड़े की प्रतिभा रखने के बाद भी जिंदगी भर गधा पचीसी करनी पड़ेगी. इस ख्याल के कौंधते ही हम कमजोर हो गये, हमारे सपने बौने, हमारे हासिल धूल, हमारी औकात दो कौड़ी की..

हमारी चिंगारियां फॉसिल्स में बदल गईं. हमने लोगों से बात करनी बंद कर दी. हम अपने आपसे और उन लोगों से नज़रे चुराने लगे औऱ बेपरवाह हो गये. अपनों से. अपने आप से. जहां हमें अपने अस्तित्व चुनने का रास्ता शुरू करना था, वहां हम बचे रहने का (सर्वाइवर) मौका तलाशने लगे. सफर, जिंदगी, इरादों का फोकस ही बदल गया.


जिन पर लोगों ने यकीन किया, वे दांव आगे बढ़ते रहे. हमें लगा कि वे शायद मनुष्य होने का बेहतर ऐलान कर पाएंगे. पर ये अंदाजा भी ग़लत था. जब तक वे उस मुकाम तक पंहुचे वे स्टॉक मार्केट में लिस्ट हो चुके दांव में बदल चुके थे- अपने रेड हरिंग प्रॉस्पेक्टस और डिस्क्लेमर के साथ. गोकि ऐलान मनुष्य होने का करना था- कमसेकम सोचा तो यही गया था- और झूठ बोलने पर पकड़े जाने का डर था इसलिए ऐलान मुलतवी कर दिया गया. शायद याददाश्त या प्रासंगिकता के धूमिल होने तक के लिए. और जारी प्रेसनोट में कहा ये गया कि ऐसा सोचा जरूर गया था, पर तय नहीं किया गया था.

इस सबके बावजूद जो हममें था, वह रहा. भले ही सोता हुआ, भले ही हाशिये पर, भले ही दर्द और भूख से बिलबिलाता हुआ, हमारा मूल तत्व हममें जिंदा रहे. मुझमें भी, तुममें भी. मैं अगर किसी मुकाम तक आ पंहुचा तो शायद इसलिए कि मुझे अपनी नाकाबलियत पर पूरा यकीन था. तुम कहीं फंस गये तो शायद इसलिए की तुम्हें ये आश्वस्त करने वाला कोई न था, कि तुम सही जा रहे हो, थोड़े और बड़े सपने देखो, थोड़ी हिम्मत और करो. मुझे याद हैं बड़े भाई साब की आंखे, जब उन्होंने रोशनपुरा के गांधीधाम होटल में मुझे देखकर कहा कि तुम राजीव को दिल्ली में छोड़कर भोपाल आ गये.. शायद मैंने उन्हें काफी शर्मसार किया.

शायद सच में. मुझे तुम्हारे साथ रहना था. उस दांव की खातिर जो मेरा यकीन तुम्हें एक सार्थक विचारक और विज्ञानी में बदल देता.

मैं फिर तुम्हारे पास लौटा हूं. शायद मैं भी इस पूरे वक्त़ में गुमशुदा था. लौटा हूं इस आश्वस्तिबोध के साथ कि तुम शायद फिर कोशिश करो कि तुम्हारे साथ न्याय करवा पाने की. मैंने हमेशा तुम्हें फुटबॉल के मैदान में सबको चकित करते हुए फ्लैंक्स से गोल की तरफ कुलांचे भरते देखा है. मुझे हमेशा लगा कि तुम बहुत गहरे इंसान हो और तुम पार जाने से ज्यादा डूब कर हासिल करने में यकीन करते हो. तुम्हारा क्वेस्ट स्मार्ट होने का नहीं, वाइज होने का है. मुझे लगता है यह आंच कहीं धीमी पड़ रही है. जिंदगी की धार को दुनिया कुंद बना रही है. मुझे नहीं पता इसकी असल और वास्तव में वजह क्या हैं. मुझे ये पता है कि दो एक हादसों से न तो हम जीना छोड़ सकते हैं और न ही जिंदगी को गिरवी रख सकते हैं. तुम ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ रहे थे, जो तुम्हारे लिए नहीं थे. फिर तुम उनमें फंस गये.

हां ठीक है मुश्किलें थोड़ी ज्यादा है. उम्रभी बढ़ रही है. अगर तुम फिर फ्लैंक्स से बॉल लेकर दौड़ोगे, तो यकीन करो मैं तुम पर ही दांव खेलूंगा. पर मेरा यकीन करो कि तुम उस सब के लिए नहीं बने हो, जो तुम कर रहे हो या करना चाहते हो. मुझे ये भी लगता है कि तुम्हें एक बार और ईमानदार कोशिश करनी चाहिए, तुम जर्मनी या पता नहीं कहीं और जाकर इनर्जी, इमारतों और लोगों के रहनसहन में ऐसा कुछ कर दो, जो अब तक किसी ने नहीं किया है.

जो तुम्हें ही करना था. सिर्फ देर हो रही है.

Wednesday, September 26, 2007

एक एस्ट्रोनॉट की घर वापसी

सुनीता विलियम्स अहमदाबाद शहर में है. उसके पिता कई दिनों से अहमदाबाद आए हुए हैं. वह उस हरीन पंड्या की चचेरी बहिन है, जो पहले भाजपा का विधायक था और जिसका मोदी के राज में सुबह सुबह शहर के मुख्य पार्क लॉ (यहां लो कहते हैं) गॉर्डन के सामने गोलियों से भून दिया गया था. इलजाम नमो (नरेंद्रमोदी) पर आया था, और उनके दामन पर जितने भी खून के दाग है, हरीन पंड्या का उनमें से एक है. ये बात सबसे ज्यादा हरीन के पिता विट्ठल कहते हैं. हरीन पंड्या एलिसब्रिज से धारासभ्य (विधायक) थे और एक जमाने में राज्य के गृहमंत्री भी. फिर उन पर शहर में मुसलमानों के खिलाफ दंगे करने और मस्जिद तोड़ने का आरोप है. उनके पिता वि़ट्ठल भाई पुराने संघी हैं और हरीन की हत्या के बाद वे न सिर्फ मोदी के बल्कि भाजपा के भी खिलाफ हो गये. जब एनडीए सरकार के गृहमंत्री लालकृष्ण आ़डवाणी ये कहते न अघाये कि नमो देश के सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्री हैं, भले ही अटल बिहारी वाजपेयी के मुताबिक वे अपने राजधर्म का पालन करने में असफल रहे, विट्ठल भाई ने एक पसीजे हुए बाप की तरह चुनाव भी लड़ा जिसमें वे हार गये. हालांकि बाद में मालूम चला कि हरीन की विधवा ने विट्ठल भाई से अपना नाता तोड़ लिया और कहा जाता है कि नमो ने उनसे संधि कर ली.

सुनीता साबरमती आश्रम में गांधी को श्रद्धांजलिदेने गईं और वहां उन्होंने स्कूली बच्चों से बड़ी दिलचस्प बातें कहीं. उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष से पृथ्वी के विभाजन नहीं दिखलाई देते. सिर्फ उसका सुंदर भूगोल दिखाई देता है, समुद्र, पहाड़, नदियां. उन्होंने कहा गांधी ने बिना अंतरिक्ष गये इन बांटती रेखाओं की अस्तित्वहीनता को पहचान लिया था, इसलिए वे गांधी का बहुत सम्मान करती हैं.
आने के पहले ही दिन जब सुनीता अपने लाड़ले चचेरे हरीन पंड्या को श्रद्धांजलदेने पंहुची तो वहां उन्हें भारी भीड़ और धक्कामुक्की के बीच वापस लौटना पड़ा. बाद में भीड़ छंटने के बाद वे लगभग दबे पांव अपनी श्रद्धांजलिहरीन को देने गईं. तब से वे लगातार लोगों से मिल रही हैं और अपने पूर्वजों के गांव भी गई. सुनीता के पिता ही गुजराती हैं, पर वे अपने पिता की जमीन से जुड़ी लगती है. नासा की सदस्या होने के कारण उन्हें छुट्टी में व्यक्तिगतकार्य निष्पादन से कौन रोक सकता है, पर उस नमो सरकार की मेहमाननवाजी सुनीता ने ठुकरा दी है, जिस नमो को दंगों में नरसंहार करवाने की तोहमत के कारण अमेरिका ने वीजा देने से इंकार कर दिया था. और उस नमो की पेशकश भी जिसके दामन पर हरीन पंड्या की जघन्य हत्या के दाग अभी धुले नहीं हैं. मारे जाने के बाद हरीन शहर का हीरो हो गया. उसके पिता को सांत्वना देने आए जूहापुरा के मुसलिमों ने फोटो भी खिंचवा कर ये साबित करने की कोशिश की कि जब किसी का जवान बेटा मरता है तो बाप की बेबसी की की कोई जात धर्म नहीं होती. फोटो इसलिए भी खिंचवाया गया शायद कि नमो दोनों का दुश्मन था. हालांकि दुख और क्षतिकी इस गलबहियां से नमो का कुछ बिगड़ नहीं सका.

हालांकि बाद में गुजरात यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में सुनीता और नमो ने न सिर्फ मंच पर एक साथ शिरकत की, बल्कि हाथ मिलाते हुए फोटो भी खिंचवाये. नमो जिंदगी और दुनिया में खुद को कुंवारा बताते हैं, और लोग कहते हैं कि वे कहते हैं कि जिसका परिवार नहीं होता, वह इंसान भ्रष्ट नहीं हो सकता. इशारा ये परिवार वाला हर व्यक्ति भ्रष्टाचार के मामले में संदिग्ध हो सकता है. बहरहाल नमो ने इस मंच और आयोजन का इस्तेमाल ये जताने और बताने में लगाया कि वे हरीन के कितने अजीज यार थे और किस तरह बहुत पहले उसने अमेरिका से आई दो बहनों से मिलवाया था, सत्तर के दशक में. जिनमें से एक सुनीता थी. उस नन्हीं सी बच्ची को एक अंतरिक्षयात्री के रूप में देख नमो भारी खुश हैं, और सुनीता गुजरात की गौरव हैं, उन्होंने ऐसा कहा. अगले दिन सुनीता के एक अंग्रेजी अखबार के मार्फत दुनिया को बता दिया कि पता नहीं नमो किस मुलाकात की बात कर रहे हैं, क्योंकि जिस साल की बात नमो ने की उसके आसपास के सालों भी वे गुजरात नहीं आईं थी. नासा में काम करने के कारण सुनीता शायद नमो को कुछ कह न सकें खुलकर पर वे ऐसा तो दिखा ही रही हैं कि गुजराती होने के बाद भी उन्हें यहां की लोकतांत्रिकसरकार से न कोई लेना है, न देना.

अमेरिका का दौरा कर रहे मेरे एक दोस्त ने कहा कि जॉर्ज बुश के सामने भी वही सवाल लागू होते हैं, जो नमो के सामने हैं. दोनों ने सिर्फ धारणाओं को पुष्ट करने के लिए लोकतांत्रिक जरिये से मिली सत्ताका इस्तेमाल लोगों को मारने और मरवाने में किया और जिससे उन्हें खुद निजी तौर पर नुकसान हुआ हो न हो, समाज और कम्यूनिटीज का तो भारी नुक्सान हुआ ही. कैसे अपने नमो को मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप में वीजा ठुकराने वाले अमेरिकी हाथ खुद ख़ून से रंगे हुए हैं. मुसलिम के खिलाफ हमले बोलने वाले अमेरिका को क्यों ढोंग करना चाहिए कि नमो एक बुरा आदमी है. जब एक थर्ड वर्ल्ड कंट्री में नमो ऐसा करता है, तो वह नरसंहार करने वाला तानाशाह के रूप में देखा जाता है, तो जॉर्ज डबल्यू बुश एक विश्व नेता के तौर पर अपने कुत्तों और कोंडालीजा राइस के साथ फोटो खिंचवाते हैं. ये क्या माजरा है.
जाहिर है सुनीता डबल्यू के वैज्ञानिक दिमाग में ये लॉजिकल सवाल कौंधते तो होंगे, पर वे इनका जवाब शायद नहीं देंगी. नासा ने मना किया होगा. उसे जॉर्ज डबल्यू बुश जो चलाता है. इसलिए भी कि सुनीता के पिता की जमीन पर आने का इवेंट विट्ठल भाई ने मैनेज किया है.

Tuesday, September 25, 2007

जिये का कोई अगला पल नहीं होता

तुम फिर सफर पर हो. अब आने के. पहले जाने का था. संक्रमण कितना गहरा और बड़ा हो जाता है, जब आप संवेदनशील होते हैं और सफर आपको इलास्टिक की तरह खींच कर रख देता है. उस रात मुझे ऐसा लगा था, जब यात्राएं हमारे रास्तों में गुंथ कर अपनी नियतियों की तरफ जा रही थी. हम बह रहे थे, जिसका कोई अगला पल नहीं था. जिसका कोई सिरा नहीं था, सिर्फ एक प्रवाहित राग का आरोह- अवरोह था, जो न गाये में भी प्रवाहित था और गाये में तो था ही. वह एक जिंदगी थी, दुनियादार व्यावहारिकताओं से बेपरवाह, बेहद सघन और गहरी. अभी इस वक़्त तुम उस पल के उस तरफ और मैं इस तरफ हूं. बीच में शीशे की दीवार थी, जहां से हम उन पलों को देख तो सकते थे, पर छू नहीं. छुअन हमारी उंगलियों की स्मृति में थी.
शीशे से इस पार हम जिंदगी के बारे में सोच रहे हैं और सोचना मैंने गहराई से विचार करने के बाद पाया है कि खुद को परेशान करने का एक कृत्य है. ज्यादा सोचो मत. इस वक़्त को अपने को दो, अपनों को दो. हंस लो, रो लो, जी लो, लड़ लो, शिकवे कह लो, रहस्य बांट लो. जिए का कोई अगला पल नहीं होता, कल तुम्हारे भेजे स्पैम में ही लिखा था. कल को ये न लगे कि अरे यार ये या वो रह गया कहे या करे जाने से. जो जिया गया, वही मोक्ष था, जो नहीं जिया वही संस्कार, वही पाप, पुण्य, प्रायश्चित, अतृप्ति.

सोचने के परेशानी के बाहर सब वैसा ही है, जैसा हम छोड़ कर जाते हैं. मकान. क्रियेटिविटी.परिंदे. कामकाज. कॉफी. नये जूते में पुराने रास्तो पर सैर. अकेलापन. पर जिया गया. पूरापन. छलकता हुआ. और बहुत सारी सार्थकता. प्यार. हरी चाय.
जो जिया गया वह उस पल से बिल्कुल अलग था, जो नहीं जिया गया. जो नहीं जिया गया, उसके अपने संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, विश्लेषण, अतीत, आकलन, भविष्य हैं. जो जिया गया, उसके साथ ऐसा कोई भी बोझ नहीं है. और जिंदगी जितनी भी लंबी हो, ऐसे पल कितने होते हैं या आ पाते हैं ?
कभी गौतम बुद्ध ने पीछे मुड़कर अपने दुनियादार अतीत को देखा होगा भी तो शायद किसी दृष्टांतकेसाथ ही. जो गैरजरूरी था, अस्वीकार्यथा वह छोड़ दिया गया है, अब उसके लिए परेशान होने की क्या जरूरत है. जो सामने है उसे देखो और अगर तुम जी रहे हो उसे जो हाथ में है, तो फिर परेशान होने की क्या बात है. मेरा सोच ये है कि दुख हो या सुख अगर असली है तो इतना घना होगा कि आप सोच विचार करने लायक ही नहीं होंगे. (बहुत बड़ा वाला चिरकुट यहां आकर बैठ गया है, मैं उसे कह नहीं पा रहा हूं कि मैं किस गहराई में जाकर ये लिख रहा हूं और वह दफा क्यों नहीं हो जाता).
और अब आगेः
इसलिए जिंदगी को लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है. क्योंकि ये जो परेशानी है वह अपने लिेए पैदा कर रहे हो, वह नहीं जो जिंदगी लेकर आएगी. और जो जिंदगी लेकर आएगी, वह तुम्हारे होशियार दिमाग से परे की होगी, इसलिए उसके बारे में सोचकर तुम कुछ ज्यादा कुछ खास नहीं कर सकते. उसकी जो संभावना या प्रायिकता (प्रोबेबिलिटी- मेरे साइंस कॉलेज का शब्द) है वह सभी के लिए वैसी है जैसी तुम्हारे लिए. इसके बाद भी अगर कुछ खास होता है, तो इसलिए क्योंकि तुमने अपने पसंद की जिंदगी को चुनना पसंद किया है बजाय किसी और की शर्तोंपर जीने की. उसकी कीमत है. जैसे जो जिंदगी मेरी है उसकी अपनी कीमत है. जो मुझे और तुम्हें अपने अपने स्तर पर चुकाएंगे. तुम जो जिंदगी जीते हो, उस पर तुम्हें, मुझे और वे सारे लोग जो तुम्हें बेइंतहा चाहते हैं, सब को बहुत फख़्र है इसलिेए अगर तुम्हें मजा आ रहा तो ठीक है, पर परेशान होने की कोई वजह नहीं है.

कोई बात नहीं है अगर कुछ दिन बिल्कुल सामान्य हों. पर उनका महान न होना और सामान्य होना तुम्हें जीने से नहीं रोक सकता. अक्सर वही दिन होते हैं, जब हमें सिर झुकाए सूरजमुखी और टूटे पर वाले परिंदे दिखलाई पड़ते हैं. वे हमारे भीतर के नये मायनों को खोलते हैं. एक ऐसे ही दिन तुम मुझे मिले. मुझे वह तारीख याद नहीं. पर देखो तुमने मेरा क्या हाल कर दिया.

लौटने की कोई जगह नहीं होती

बाहर झड़ी लगी है. भोपाल में ये मौसम उन बादलों की तरह होता है, जो टिशु पेपर की तरह आपका मुंह पोंछ कर चले जाते हैं. मैं इस झड़ी में चलता हूं. मैं कॉफी हाउस जाकर परिचितों से मिलता हूं. दफ्तर में अपने साहब से मिलता हूं. दोनों जगह कॉफी पीता हूं.

पर कुछ खास लोगों के साथ आप अपने जिंदगी के सबसे अच्छे पल, सूर्यास्त, सबसे अच्छी शराब बांटना चाहते हैं. आप पहले तो ये साबित करना चाहते हैं कि वे आपके लिए खास हैं और दूसरा ये कि आप ऐसे किसी खास मुकाम तक पंहुच चुके हैं जो लोगों को जताना बताना जरूरी है. वरना उस चीज की कीमत ही वसूल नहीं होती, जो आपने हासिल की हो. लंदन में मेरा एक दोस्त - जिसे यकीन है कि मरने से पहले उसे नाइटहुड मिल ही जाएगा मुझे अपना मकान दिखाने ले गया. मुझे दिखाने के बाद उस मकान की कुछ कीमत वसूल हो गई होगी, ऐसा मुझे तब लगा जब रात में लंदन की 1.40 की लास्ट लोकल छूट गई और मैं एक बंद शटर वाले सुपरमार्केट की झिरी से झांकता हुआ हिंदुस्तानी संगीत सुबह तीन बजे तक सुनता रहा. मेरे इस अहसान के बदले उसने बीयर पिलाई.

हाल ही में एक दोस्त को सिंगल माल्ट पिलाई, तो वह बर्फ-सोडा- पानी मांगने लगा. उसने कहा उससे नीट नहीं पी जाएगी. मैंने उसे कहा सिंगल माल्ट ऐसे ही पी जाती है. पर उसे इस बात की आदत नहीं. उसके लिए सिंगल माल्ट भी वैसी ही है, जैसे बाकी सस्ती शराब. मुझे लगा वह समझ ही नहीं पा रहा है कि मैं उसके लिए एक ऐसी चीज परोस रहा हूं, जो अमूमन हर ड्यूटी फ्री पर भी नहीं मिलती है और उस रिश्ते के सम्मान में जिसका मेरे लिए खास मायने है.

मुझे मिलान कुंदेरा की एक हाल की किताब याद आई जहां पेरिस में रहने वाली एक औरत प्राग लौटती है और अपने तमाम दोस्तों को पार्टी पर बुलाकर उनके लिए महंगी वाइन्स मंगवाती है. तमाम दोस्त आते हैं, उसके छोड़े गये वक्त़ के बारे में बातें करते हैं, उसे चूमते हैं. वाइन चखते हैं. ये औरत बताना चाहती है कि वह पेरिस में ठीक ठाक जमी है, और ऐसा करने के लिए उसने काफी संघर्ष किया है. वह बता सकती है कि किस वाइन में क्या खास है, खुशबू, जगह और उनके बनाने के तरीके... किस वाइन को कैसे पिया जाता है.. उनका महत्व और इतिहास क्या है. उसकी जिदंगी में कई दिलचस्प प्रसंग हैं और कई महान संघर्ष. और पेरिस की तो बात ही क्या.

उसके दोस्तों को न पेरिस के बारे में रुचि है, न उसकी वाइन में. वे थोड़ी देर में ही छिटक कर अपने अपने बारे में बातें करने लगती हैं. इस औरत का जिक्र स्मृति के उस बिंदू से गायब हो जाता है, जब वह मुल्क छोड़कर गैरकानूनी तरीके से भाग गई थी. वे पूछते हैं कि तुम वापस आने का तो नहीं सोच रही. फिर खुद ही कहते हैं कि यहां क्या रखा है. फिर ये भी कहते हैं कि अगर आ जाते तो अच्छा होता.

थोड़ी ही देर में एक दोस्त आकर कहती है, तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा अगर मैं वाइन की जगह बीयर पियूं तो... ये हंस कर कहती है नहीं क्यों बुरा लगेगा.

देखते देखते सारी वाइन एक तरफ रखी रहती है. सभी लोग बीयर पीने लगें हैं. सिर्फ इस औरत के हाथ में वाइन हैं. इस औरत के अलावा सभी बात कर रहे हैं अब जोर से.

फिर इसके पास एक एक करके सब धीरे से कहते हैं, अच्छा हुआ मिल लिए. फिर सब चले जाते हैं. सिर्फ एक के. जो इस औरत की नहीं उसके पिछले पति की दोस्त थी.


अकेला होना शायद ये होता है. जब आप किसी आशवस्तिबोध में लौटना चाहते हैं, और वह नहीं मिलता. जब आप ये किसी को अपनी तरह से महत्व देना चाहते हैं, और सामने वाले को तो कुछ और ही चाहिए होता है. क्या अपने मुल्क, अपने लोगों, अपने अतीत की तरफ लौटना वैसा ही है जैसा आपके मुल्क, आपके लोगों, आपके अतीत में लौटना. नहीं है. लौटने की कोई जगह नहीं होती. हर बार एक नया समय, एक नये हालात, एक नया सच वहां दबोचने के लिए घात लगाकर बैठा होता है. ज्यादा अकेला और ज्यादा इस्तेमाल किये जाने के अहसास के साथ. हम हर बार एक नई जगह जाते हैं. और हमारी उम्मीदें भले ही अतीत की झलक देखने को बेताब हों और जिन जगहों पर लौटने या अतीत की नियोन लाइट जल रही हो, वहां पर तय है कि हम किसी नई जगह पर पंहुच जाएंगे.

इस किताब में मजेदार बात है कि दो अजनबी एयरपोर्ट पर मिलते हैं. दोनों अलग अलग देशों में रहते हैं. दोनों अपने प्यारे चेकोस्लोवाकिया सालों बाद लौट रहे हैं. दोनों अपने अतीत के जिन चरित्रों से मिलते हैं, वे लोग वैसे नहीं जैसे सालों पहले थे. जब ये दोनो लोग अपने अतीत से उम्मीदें खो चुकते हैं, तो फिर एक दूसरे से मिलते हैं. और क्योंकि दोनों एक ही सदमा जी रहे होते हैं, इसलिए दोनों एक दूसरे को बड़ी आसानी से समझ लेते हैं. न सिर्फ समझते हैं बल्कि ये सदमा और समझ उन्हें और करीब ले आती है. बहुत करीब.


लौटने के नाम पर हम हमेशा नई जगह पंहुचते हैं. कई बार उन जगहों पर भी, जहां के लिए निकलना भी बेकार था. जिस जगह और जिन लोगों तक लौटने निकलते हैं, वे इस दरमियान कहीं और जा चुके होते हैं.