
मैं अपने दस हजार कदम की सैर कर रहा हूं. अहमदाबाद में इस वक़्त आधी रात होने वाली है. और नवरात्रि अपने पूरे शबाब से ढल रही है. मैं गरबे में नहीं हूं पर हर तरफ से डांडिया का संगीत बज रहा है और कई धुनें तो बहुत ही गज़ब की हैं. तीन घंटे से ज्यादा वक़्त हो गया और लोग नाचते नाचते थकने लगे हैं. शनिवार की रात गरबे की आखिरी रात है. फिर दशहरा.
तभी भीड़ को फिर से जोश आ जाता है. और गाना गुजराती नहीं. पंजाबी धुन है और गाना नॉर्थ का है. अब आज की महफिल सिमटने वाली है. ये उसकी आखिरी पेशकश है. वही गाना जो यूपी, दिल्ली और पंजाब में बाराती टल्ली होने, सड़क पर लेटकर रुमालों से बीन बजाते नागिन डांस करने के बाद बारात के दरवाजे पर पंहुचने से जरा ही पहले करते हैं. व्हिस्की पीली जी. थोड़ी और पियो जी. इब थोड़ा भंगड़ा कर लो जी. फिर लड़के के बाप को घसीट लाया जाता है, वह भी दो ठुमके लगा लेता है. पैसे फेंके जाते हैं. गाना दुबारा बजाया जाता है. पेट्रोमैक्स लेकर गरीब मजदूर किनारे चलता है. बैंड वाला पसीना पोंछ रहा होता है. व्हिस्की के भभके के साथ कोई कहता है- गाना फिर से बजा बे. लड़की का बाप घड़ी देख रहा होता है. दिखा रहा होता है. गाना तिबारा बजता है.
ये देश है वीर जवानों का.. अलबेलों का मस्तानों का... पंजाब हमारा मैक्डोनाल्ड है. फास्ट फूड, फास्ट म्यूजिक, फास्ट डांस और फास्ट लाइफ. ऐसा क्यों है कि ढाई घंटे में खत्म होने वाली हैप्पी एंडिंग लव स्टोरी अमूमन पंजाब की पृष्टभूमि लिये होती हैं. बाजार में निकलो तो खाना, पार्टियों का खाना पंजाबी ही है. चिकन जब भी शहीद होता है तो या तो तंदूर में या बटर में. मसाला हमेशा एमडीएच का ही होता है. चैन्नई तो छोड़िए पर तमिलनाडू के भीतरी कस्बों में भी कामकाजी औरते सलवार कमीज पहनी दिखलाई देती हैं. विदेश भी जाइए तो इंडियन फूड के क्रेजी फिरंगी बात करते हैं बटर चिकन की ही, जिसका आविष्कार मेरे ख्याल से पार्टीशन के दौरान दिल्ली आए एक रिफ्यूजी ने किया था. चिकन चैट्टीनाड को 10 में से 9 लोग नहीं जानते होंगे. बनारस के रहने वाले पंकज मिश्रा जब हिंदुस्तान के उभरते शहरों पर किताब लिखते हैं तो उसका नाम रखते हैं- बटन चिकन इन लुधियाना.
दावतें भी सब जगह एक सी हैं. किसी भी यूजुअल बफे में आंख मूंद कर जाइए वही चीजें मिलेंगी. उड़द राजमा, गोभी मसाला, तंदूरी रोटी, बटर चिकन, छोले. किसी भी रेस्त्रां में. स्नैक बार में. अमृतसर से लेकर हैदराबाद के आगे तक सड़कों के किनारे आपको ढाबे मिल जाएंगे जहां मंजी बिछाकर आप तुरतफुरत पंजाबी खाना खाइए और थोड़ा फैलकर कमर भी सीधी कर लीजिए. इतना सस्ता, फास्ट और लेटने का बंदोबस्त वाला खाना कहां मिलता है.
पंजाब में ऐसा क्या है, कि उसने खान पान रहन सहन पर एक तरह से कब्जा कर लिया है. एक तो ये वह लगातार भागता हुआ समुदाय था, जो काफी संघर्ष में रहा. इसलिए उसके रोटी, कपड़ा और उत्सव बिना ज्यादा लागलपेट की थी. मतलब देखिये कि दक्षिण में कथकली के नर्तक को तैयार होने में जो तीन घंटे लगते हैं, उतने में तो एक ढोल वाला तीन बारातों को निकलवा दे. एक थ्योरी ये है कि जो लोग संघर्ष करते हैं, वे साधना नहीं कर पाते. दक्षिण में बहुत संघर्ष नहीं हुआ इसलिए वहां शास्त्रीय विधाएं अच्छे से विकसित हो सकीं.
दूसरा पार्टीशन के कारण वे हर जगह पंहुच गये और उन्होंने धंधा जमाया.
तीसरा उनकी एंडिंग हैप्पी है जी. लोग और क्या चाहते हैं. तान के काम करो और ऐश से जिओ. कमसकम सपनों में, पार्टियों में, फिल्मों में. वह रोता हुआ जाता है, पर मरने की ख़बर नहीं लाता. वह अपनी जिंदादिली को आगे रखता है, लस्सी के ग्लास में, भंगड़ें में, हंसी ठठ्ठे में.
आत्महत्या कर रहे कर्जदार किसानों के बीच में आज भी रिपब्लिक डे परेड को आंख बंद याद करें तो अजगर को ग्रीन रिवॉल्यूशन के हीरो बनकर भंगड़ा करते सरदार ही याद आते हैं. बाकी हिंदुस्तान की परेड एक तरफ.
अजगर पंजाबी नहीं है और पंजाब के इस तरह हर जगह छा जाने की बात उसे अखरती भी है. पर फैक्ट तो फैक्ट है जी. अजगर को लगता है पंजाबीकरण ने हमारे बहुत से जज्बातों को कहीं पीछे छोड़ दिया है. हमारे अलग अलग जगहों के खाने के वैविध्य को उसने खत्म कर दिया है. वरना कश्मीर, बंगाल, बिहार, अवध, राजस्थान, मारवाड़,
हैदराबाद जैसे इलाकों का खाना किस कदर गज़ब का है कि आप उंगलियां चाटते रह जाएं. पर बाज़ार में ग्राहक जल्दी में है और उसके लिए ज्यादा पैसे भी नहीं देना चाहता. इसलिए बाकी सब उतनी आसानी और तेजी से मुमकिन नहीं है जितना की साडा पंजाब है जी. इसलिए आप पाएंगे कि जब एक छत्तीसगढ़ी या डूंगरपुरिया जब ढाबा खोलता है, तो मैन्यू पंजाबी खाने का ही होता है. अजगर का एक प्रोफेसर दोस्त कहता है कि दिल्ली के उत्तर के लोगों में एक अजीब सा हाई टैस्टोस्टेरोन लेवल है, जो उन्हें लाउड और चटख बनाता है. पर पंजाब और पंजाबीपन के शॉर्टकट्स ने हमारी जिंदगियों की सांस्कृतिक और दूसरे वैविध्य को क्या खत्म कर दिया है. पंजाब के बाहर का जो वैविध्य है, उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है. उससे सिर्फ उडिपि रेस्त्रां ही लड़ पा रहे हैं. पर उसके अलावा भी रसोइयां हैं.
अजगर छत्तीसगढ़ में बड़ा हुआ जहां के स्थानीय लोक और आदिवासी संगीत और नाच अभी भी उसकी आंखों में चमक ले आता है. उसे याद है पास के उड़िया मजदूरों की बस्तियों में बजता रोंगोबोती नाम का गाना, जो गजब का मस्ती भरा और थाप वाला गाना था. अजगर को पसंद है गैर पंजाबी खाना. वह भोपाल में एक बिहारी मुसलमान के यहां गया तो वहां सरसों के तेल में पका गोश्त खाया. जब दिल्ली में अजगर संघर्ष कर रहा था तो नोयडा के अट्टा पीर पर एक उपरेती का ढाबा है, जहां वह इसलिए जाता था कि वह सस्ता तो था ही, साथ ही फुलके भी देता था. बाद में जब दिन थोड़े बेहतर हुए तो उसे आसफ अली रोड के चोर बिजार में कश्मीरी वाज़वान और जामा मसजिद के पीछे करीम होटल (1913) में मुगलई खाते देखा गया और तारदेव, मुम्बई के ओ! कैलकटा में लाजवाब बंगाली वैज खाना खाते हुए केले के फूल की सब्जी के साथ. पर उन सबके साथ दो समस्याएं है. या तो वे बेहद डाउन मारकेट और स्ट्रीट स्टॉल हैं या फिर उन पर प्रीमियम हैं. वे मध्यवर्ग की जेब, समय और सुविधा का ख्याल नहीं रखती. कम से कम उतनी निपुणता से नहीं जैसे पंजाबी रख लेते है.
भारत की उत्सवधर्मिता अब पंजाबी हो चुकी है. पार्टी, खाना, डांस, म्यूजिक, गाने, टैंट वाला, ढोल, ड्डीजे, फिल्में, म्यूजिक वीडियो. दुनिया में पंजाब अब ग्लोबल इंडियन की आइडेंटिटी है. कितनी सारी फिल्में (खोंसला का घोंसला, मानसून वैडिंग, डीडीएलजे) अगर पंजाबी बैकड्रॉप में न होती तो न उनमें इतना ह्यूमर होता न वे इतनी खुशनुमा होती. इसमें उनका भौंडापन भी शामिल मानिये. अगर वे आपके अलावा किसी और से कर रहे हों तो फिर उनका फुकरापन भी बहुत दिलचस्प होता है.
ऐसा नहीं है कि भोजपुरी संगीत या संस्कृति का बाजार नहीं है, या बंगाली, उड़िया, पहाड़ का संगीत और खानपान अपनी जगह औऱ सम्मान नहीं रखता पर उनमें से किसी की भी मौजूदगी हिंदुस्तान में हर कहीं एक स्वीकार्य सच की तरह नहीं है.
तीन घंटे की फिल्म को जल्द खत्म होना होता है ज्यादातर हैप्पी एंडिंग के साथ. शायद इसलिए वे पंजाबी फास्ट डिस्पेंसेशन का हिस्सा हैं. पर ये बताइये ये जो टीवी सीरियल्स में पसरा हुआ अंतहीन तनाव और क्लेष, बैडरूम पॉलिटिक्स, साजिशें, बेवफाई और चमत्कार हैं, ये इतने गुजराती परिवारों को लेकर क्यो हैं. दंगे नहीं है, बाकी सब कुछ है. नरेंद्र मोदी के खिलाफ जब दिल्ली के चैनल खबरें दिखाते हैं, तो केबल वालों से कह दिया जाता है कि वह चैनल दिखाना बंद करें. क्या ऐसा ही एंटरटेनमेंट चैनल्स के साथ नहीं होना चाहिए. दुख केवल गुजरात के मत्थे ही क्यों मढ़ा जा रहा है.