Saturday, October 27, 2007

बबूल बोइएगा, तो अलफांसो नहीं होंगे संजय बेंगाणी

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत गणराज्य पर एक टिप्पणी मेरे ब्लॉगर दोस्त संजय बेंगाणी की है. अजगर सोचता है गुजरात पर विमर्श का असली वक्त़ अभी ही है. उसे टालने या आंखें चुरा लेने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. क्योंकि ये समय निर्णायक है और लोग जनादेश देने जाने वाले हैं, तो ये समय मंथन का भी है, जिससे अमृत भी निकलेगा और जहर भी. ताकि लोग सच के सारे पहलू जान कर एक सशक्त फैसला करें. इसमें गलत क्या है.
संजय बेंगाणी
said...
इस कथित स्टींग ऑपरेशन से झटका जरूर लगा, क्योंकि पत्रकारों से ऐसी बेवकुफी की आशा नहीं थी. बाकि बहुत से सवाल आपने छोड़ दिये है, उन पर फिर कभी.

फिर कभी कुछ नहीं है. संजय इसमें कथित क्या है. और न ही पत्रकार की कोई बेवकूफी मुझे और इस देश के बहुत सारे नागरिकों को दिखलाई देती है. अगर बेवकूफी होती तो सबसे पहले भाजपा के लौहपुरुष अपना जंग खाया मौनव्रत तोड़कर अपने लाड़ले नमो के पक्ष में कुछ कहते. इस वक्त़ वे और उनके स्पिनर्स अपना अगला बयान बनाने की समस्यापूर्ति में लगे होंगे. अगर कथित और बेवकूफी है, तो फिर केबल ऑपरेटरों से प्रसारण क्यों रुकवाए जा रहे हैं. हिंसा के पुजारी जब अशांति की आशंका का हवाला देने लगते हैं, तो वह एक ऐसा चुटकुला है, जिसपर किसी को हंसी नहीं आती. अब कहना कि टाइमिंग का फाउल हुआ है, तो ये गोधरा के बारे में कहा जा सकता है और जर्मनी में रेक स्टैग के जलने को लेकर भी, जिसका आरोप विरोधियों पर लगाकर अडॉल्फ हिटलर सत्ता पर आ बैठे थे.

इन्हीं पत्रकारों की बेवकूफी (आपके शब्द) से रथयात्रा हिट हुई थी, अयोध्या हुआ था, सैंडल पहनने वाली साध्वियां घर घर नफरत का प्रसाद बांट रही थी. मीडिया खुद कुछ नहीं करता है. जो होता है, वही दिखता है. और सियासी लोग जब बबूल के बीज बोएंगे तो वहां अलफांसो नहीं होंगे, ये समझने के लिए बॉटनी पढ़ने की जरूरत नहीं है. और ये मीडिया, कम्यूनिकेशन, पब्लिक रिलेशंस, मैनेजमेंट का मामला नहीं है, ये जिंदगी और मौत का मामले हैं.
हां सवाल पूछिये. फिर कभी कहकर देर मत करिये. एक निर्णायक वक्त़ पर पूछे गये सवाल ज्यादा मौजूं होते हैं. बाद में तो सभी विश्लेषक लकीर पीटते रहते हैं.

दिल्लीः लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे

दिल्ली का ये वक्त़ अजगर को सबसे ज्यादा पसंद है. ठंड आने को होती है.शाम कुछ जल्दी ढलने लगती है. कुछ प्रदूषण भी है. पर इन शामों को लंबी सैर पर जाइए. लुटियन्स की दिल्ली में ये वक्त़ लंबी चहलकदमियों के लिए है. उन बूलेवर्द में अगर आप अकेले होते हैं तो बहुत अकेले होते हैं. निपट सर्द अकेले. और साथ होते हैं, तो बहुत गर्माहट के साथ. अजगर ने जो आठ साल दिल्ली में गुजारे हैं, उनमें ये मौसम हमेशा बाकियों से बेहतर लगता है. एक तो इसलिए कि इस वक्त़ पसीना कम बहता है. दूसरा ये दिल्ली में लोग सबसे ज्यादा प्यार शायद इसी दौर में करते हैं. दरअसल कुछ भी ठीक से महसूस करने का वक्त़ और मौका इन्हीं दिनों में मिलता है. उदास और अकेले होने का भी. गर्मी और उमस भरी बारिश के दिनों में शायद कितना तकलीफदेह है प्यार. या दुखी होना भी. ये समय है संगीत सुनने का, सूफी कव्वालियों का, ब्लडी मैरी या बेहतरीन शराबों का, हंसी औऱ ठठ्ठे का. मंडी हाउस से इंडिया गेट और फिर खान मारकेट से लोधी गार्डन की तरफ जाना एक अच्छा अनुभव है. अकेले भी. साथ भी. खाने का मजा है. पीने का भी. जीने का भी. दिल्ली एक गुस्सैल माशूका की तरह लगती है. जो बड़ी वफा से हमारी थोड़ी सी बेवफाई को निभा रही है. दिल्ली को इस वक्त़ अजगर अपने बगल से गुजरते देखता है. उसकी छाया अजगर को छूती है. उदास सफरनामों का जिक्र किये बगैर. एक कसक की तरह. चाहे वह स्मृति से हो या फिर किसी अघटित से. अब फिर कुहासा आएगा. और फिर एक दिन चटख धूप भी. मुस्कुराती हुई. सात बार उजड़ी दिल्ली आठवीं बार इन सर्दियों में फिर बसने निकलती है.

Friday, October 26, 2007

नरेंद्र दामोदरदास मोदीः प्रधानमंत्री, भारत गणराज्य

क्या अपने बच्चे को इस आदमी की गोद में आप देंगे, उसे जिसे बहुत सारे लोग लगातार पीएम मैटेरियल कहते हैं। अजगर सीडो सिक्योलरिस्ट है और वह इस आशंका के बारे में सोच नहीं सकता. एक गर्भवती औरत का पेट चीर कर क़त्ल करने के बाद गर्व से सरकार को बताना पता नहीं किस हिंदू गौरव का प्रतीक है. अजगर ने अपने बच्चों को अल्ट्रसाउंड में देखा है और जब से कल टीवी पर ये बात सुनी है, उसे अपने बच्चे याद आ रहे हैं. तैरते हुए. हाथ हिलाते हुए. जिंदगी की संभावना से लबरेज. एक जन्म यानी प्रकृति का हम पर फिर से एक ईश्वरीय यकीन. फिर एक पूर्व बूढ़े सांसद के हाथ पांव काटे जाते हैं, पेट्रोल छिड़का जाता है, दियासलाई फेकी जाती है. जब आप कश्मीर या तालीबान का बदला कहीं और लेते हैं, तो नफरत और फैल जाती है एक सैलाब की तरह. एक हिंदू बताता है एक भारतीय पुलिस सेवा अफसर को कि पांच मुस्लिमों को मारने का वचन दो और फिर इसके लिए स्पॉट पर ले जाता है. शिकार के पिकनिक स्पॉट. पर वे लोग जिनकी अपनी आंख और कान हैं. वे अपनी नाक से पेट्रोल मे जल रही लाशों और एक गर्भवती औरत को चीरते हुए हिंदू पराक्रम की गंध महसूस कर सकते हैं. जिस वक्त़ पूरा हिंदुस्तान देख रहा था कि कैसे गुजरात के मुसलमानों पर एक सुनियोजित नरसंहार को अंजाम दिया जा रहा था, गुजरात के केबल ऑपरेटर इस तहलका के डंक (स्टिंग) को दिखाने वाले चैनल का प्रसारण ही बंद कर दिया था. अहमदाबाद के इंडियन एक्सप्रैस में जस्टिस नानावटी कहते हैं कि मैं देख नहीं पाया क्या दिखाया आज तक पर. नानावटी आयोग गोधरा कांड और उसके बाद उभरे दंगों की जांच कर रहा है. ऐसा पहले भी हो चुका है कि जो सच सुविधाजनक नहीं होते दिखलाए नहीं जाते. कल देर रात तक अहमदाबाद बात कर रहा था कि क्या इस स्टिंग का मोदी के चुनावी भाग्य पर कोई असर पड़ेगा. और ज्यादातर सयाने लोग सोचते हैं कि बहुत नहीं पड़ेगा. पर अहमदाबाद गुजरात नहीं है. गुजरात के कई इलाके ऐसे हैं जहां इसका असर पड़ेगा. लोगों को चुप कराने का मतलब उन्हें जीतना नहीं होता है. सच को रोकने की, उसपर लीपा पोती करने की , उसमें लाग लपेट करने की जितनी भी कोशिश भगवा ब्रिगेड ने की है, वह उतना ही रिस कर बाहर आया है, अपनी पूरी सडांध के साथ. बहरहाल इस स्टिंग की टाइमिंग के अलावा और भी कई सवाल हैं, जो अजगर के लोगों के साथ बात करते हुए महसूस किया-
  • क्या इस सुनियोजित भयावह नरसंहार का अध्याय डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया की भूमिका पर प्रकाश डालने की कोई जरूरत नहीं थी. इस पूरे प्रकरण में उनका जिक्र ही नहीं हुआ.

  • जिन लोगों से इसमें बात की गई है, वे सभी अब मोदी से दूर होते बताए जाते हैं. अब ये असंतुष्ट कांग्रेस में आसानी से प्रवेश नहीं पा सकेंगे.

  • नरेंद्र मोदी को ये गांधीनगर में रोकने की कोशिश है जो पार्टी के लोग ही करवा रहे हैं कि कल को मोदी दिल्ली की तरफ न आएं.

  • एक साहब ने कहा कि मोदी को अगर नहीं जिताएंगे तो मुसलमान बहुसंख्य हिंदुओं से ज्यादतियों का बदला लेंगे.

  • भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद भी आज मोदी को बचाने की नाकाम कोशिशें करते नजर आए. पता नहीं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गांधीनगर के सांसद लालकृष्ण आडवानी कुछ क्यों नहीं कह रहे हैं. वे कभी भी मोदी की प्रशंसा करते अघाए नहीं. तब भी जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उन्हें राजधर्म का निर्वाह न करने के कारण बरखास्तगी पर विचार कर रहे थे.

    सवाल ये है कि क्या ये सब सिर्फ इसीलिए. चुनाव जीतने के लिए. पीएम मैटेरियल बनने के लिए. 2000 लोग.

ब्लॉग से प्यार(नफरत) करो ब्लॉगर से नहीं

आस्तीन का अजगर कौन है? कुछ को शायद पता है. कुछ अंदाजा लगा रहे हैं. अजगर को हालांकि इस अटेंशन का मजा आ रहा है, पर वह मजा इस उदास मुगदर को घुमाने का मूल उद्देश्य नहीं था. अगर अजगर अपनी असलियत बता दे तो शायद उसके ब्लॉग को उसके नाम, जात, इलाके, पद, पेशे, पूर्वाग्रहों के फिल्टर्स लगा कर देखेंगे. जैसा कि इंडियन एक्सप्रैस के राजकमल झा ने अपने बहुत ही अच्छे कॉलम अबाउट 800 वर्ड्स (काफी दिनों से वह बंद हो चुका है.) के फीडबैक के बारे में लिखा था- मेरे कॉलम की प्रशंसा में दो तरह के फोन आते हैं. एक तो वे जो कहते हैं कि वे पत्रकार हैं और मेरे कॉलम के बहुत मुरीद हैं. फिर वे घूम फिर के मतलब की बात करते हैं- राजकमल कोई नौकरी है क्या.. दूसरे वे जो कहते हैं - बहुत बढ़िया चल रहा है कॉलम आपका. हम भी मैथिल ब्राहमण हैं, बहुत गर्व होता है आपका कालम देखकर. मैं राजकमल जितना बड़ा न तो पत्रकार हूं और न ही लेखक, पर मेरी दुविधाएं भी कुछ इस तरह की है. अजगर के लिखे हुए ब्लॉग्स में से एक में आज एक कमेंट इस बात को लेकर था, कि अजगर का असली नाम क्या है -
भई (यहां एक नाम लिखा था) आपको अपने नाम का त्याग करने की क्या जरुरत थी.
आप अपने नाम से लिखते तो ज्यादा बेहतर होता.

अजगर कौन है? क्या वह एक आदमी है? क्या वह कई आदमी हैं? क्या वह एक आदमी और एक औरत है? क्या वह प्रधानमंत्री है किसी देश का या अख़बार के दफ्तर में दरबान है या फिर किसी एरियेटेड ड्रिंक्स बनाने वाली कंपनी का सेल्समैन, या इस मुल्क़ में रहने वाले बहुत से अकेले और मामूली सीडो सिक्यूलरों में से एक? क्या वह एक संगठन है जिसे विदेश से पैसा मिल रहा है? क्या फर्क पड़ता है वह कौन है? फर्क वाली बात ये है कि वह जो लिख रहा है क्या वह किसी काम का है? क्या वह आत्मा की आवाज़ है? क्या वह किसी अनीश्वर से की गई प्रार्थना है? क्या वह एक एकालाप है एक इंसान का एक मुश्किल से होते समय में गुस्से में और करुणा में? क्या वह विमर्श का एक बिंदू दे पाया है? क्या वह सोचने के लिए कुछ स्पंदन पा और दे सका है?
इस ब्लॉग पर कोई भी कमेंट लिख सकता था. ये सोच कर कि सुधी पाठक उसके ब्लॉग को उसके मेरिट्स पर तौलेंगे, सच और तर्क की कसौटी पर कसेंगे और फिर अच्छा लगेगा तो अच्छा कहेंगे और बुरा लगेगा तो बुरा कहेंगे. जो साहब अजगर को अपने असली नाम के साथ ब्लॉग लिखने की बिन मांगी सलाह दे रहे थे, वे खुद एनोनिमस बने रहे. वे अपनी टांगों के बीच दुम दबा कर बैठे हो सकते हैं, पर अजगर का उद्देश्य न तो सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है, न ही अपना कोई स्वार्थ सिद्ध करना. अजगर का न तो कोई ने़टवर्क है और न ही वह किसी ओट में शिकार खेल रहा है. वह जो अपने भीतर के अरण्य और बाहर के जंगल में घटता महसूस करता है, वह लिख रहा है. अजगर के ब्लॉग्स को जो अभी प्रतिक्रिया मिल रही हैं, वह लेखक को नहीं है, वह लिखे को है. अजगर का मानना है कि विमर्श के लिए अजगर का लिखा ही उपलब्ध है. अजगर नहीं.
दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे ब्लॉग्स के साथ होता है, वैसे ही ब्लॉगर के साथ टैग लगे हो सकते हैं. नहीं भी लगे हो सकते हैं. अजगर जिन सचों के बारे में लिखने की मंशा रखता है, वे थोड़े संशलिष्ट हैं और इसलिए अपने दुनियादार टैग्स के साथ अजगर वह सब लिखने में कोफ्त और दुविधाएं महसूस कर सकता है. वह इमानदार होने के लिए अजनबी होना चाहता है. ताकि सच आसानी से कहा जा सके. अजगर ने अपने नाम का त्याग नहीं किया है. पर देखिए इस ब्लॉग का नाम कितना सुंदर है और ब्लॉगर का भी. ये सहज सौंदर्यबोध शायद कुछ लोगों को मंजूर नहीं.
तीसरी बात ये कि इसमें दिक्कत हो सकती थी, जब अजगर किसी को इस ब्लॉग के माध्यम से बिलो द बेल्ट हिट कर रहा होता या फिर कोई ऐसी बात कह रहा होता, जिससे समाज में नफरत और हिंसा फैल रही हो. पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ. आगे होने की उम्मीद भी नहीं दिखाई देती.
अजगर को अफसोस है कि उसे अब कमेंट मॉडरेट करने पड़ेंगे. वह अपने दोस्तों और इस ब्लॉग को पसंद- नापसंद करने वालों को होने वाली तकलीफ के लिए मुआफी मांगना चाहता है. ऐसा इरादा उसका था नहीं.

Monday, October 22, 2007

हिंदी कमेंटरी की शोकसभा में सुशील दोषी की शिरकत भी, अजगर की तरह

जैसे ही आस्तीन के अजगर ने हिंदी कमेंटरी पर अपना उदास मुगदर घुमाया, अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस के पहने पन्ने की खबर बन गया. अजगर ने जो कहा उससे सुशील दोषी न सिर्फ सहमत हैं, बल्कि एक जिम्मेदार और अच्छे कमेंटेटर की तरह वे हिंदी कमेंटरी के लिए, उसकी बदली जरूरतों के लिए नई भाषा गढ़ने की ईमानदार कोशिश भी कर रहे हैं. खेलों की कमेंटरी सबसे तेज पत्रकारिता की मिसाल कायम करता है।अगर सैक्स और सैंसैक्स के बाद क्रिकेट को लेकर हिंदुस्तान सबसे ज्यादा उत्तेजित और संवेदनशील है, तो कमेंटरी उस उत्तेजना की जान है। मैं दूसरी बार देख रहा हूं कि किस तरह से इंडियन एक्सप्रेस उन विषयों को ज्यादा अच्छे से उठाता है, जो मूलतः हिंदी के डोमेन हैं। और इसलिए मैं इस अंगरेजी अख़बार की सराहना करता हूं। पिछली बार तब नोटिस किया था, जब देर शाम कमलेश्वर का निधन हुआ था और अगली सुबह उनके दो महत्वपूर्ण साथी- गुलजार और राजेंद्र यादव सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में ही थे। बहरहाल क्या लिखा है इंडियन एक्सप्रेस में-

Veteran tweaks his delivery for a brand new version of cricket
Sushil Doshi is now trying to find new words and phrases to describe Twenty20, the latest avatar of a game he defined and described to millions.
BY SANDEEP DWIVEDI
Mumbai, October 20: Sushil Doshi isn’t used to going to work so late in the day. But ironically cricket’s shortest version, marketed as the working class cricket fan’s after-office entertainment, means the 58-year-old Hindi commentator now has a three and-a-half hour evening shift.
From the 9-to-5 Test schedule to the graveyard shift of day-night one-dayers, Doshi — after 160 ODIs, 60 Tests and nearly 40 years in the box — is now busy digging out new words and new drive for his Twenty20 debut at Brabourne Stadium, one of the game’s oldest venues, here today.
“If one-dayers was pyjama cricket, chaddi cricket is the name I can think of for Twenty20,” he says, while taking a stock of some of his pet phrases that have become part of Indian cricketing folklore.
That highly charged and energetic “aur yeh chaar run” has survived the turn of the century since the early ’70s when Doshi first described a boundary on the cricket field. But while this still fits perfectly in the longer version, Doshi says some of those ‘Doshiisms’ now have to be tweaked.
The Indore-based motormouth veteran gets nostalgic when you say that “Apne aapko gaind ke line se alag kiya, stroke ke liye jagah banaya aur square cut kar diya hai char run ke liye” might not have a place in the commentary box during the India-Australia game.
“In this version, there is no need to be back out from the line of the ball and make space to hit a boundary. Batsmen now back out before the ball is delivered as off-side balls are hit to the leg. There are less drives, more deflections,” says the man who has described 25 of Sunil Gavaskar’s 34 Test centuries.
Another Doshi trademark - “Accha hua unke bat ka bahari kinara nahi laga, anyatha teen slip aur do gully ball ka intezar kar rahe the” — might also be redundant as fielders are mostly confined to the edge of the 30-yard circle while the rest patrol the fence.
But all this doesn’t mean that Doshi will be in the “shanka ka galyara” — his creative translation of the ‘corridor of uncertainty’. “I have come up with some new ones. Robin Uthappa apne shots se game mein uthal-puthal macha dete hain,” he says.
According to Doshi, Hindi cricket commentary has seen a big spike financially but has touched a new low grammatically. “‘Kirkit kheli jayegi’, they say. It’s ‘cricket khela jayega’. It really pains me to listen to such comments. If one says in English ‘I is going’ the flaw is noticed but not when Hindi grammar goes wrong,” says Doshi, who started at Rs 20 per day in the late 1960s but now commands Rs 25,000 for the same.
Today, he relishes the prospect of describing the charged-up atmosphere of a Twenty20 game but is wary of the commercialisation that rules the game. “I can foresee a day when girls in bikinis will come for the toss. They have already reached the boundary line,” he says, referring to the cheergirls in South Africa during the Twenty20 World Cup last month.
“I have no problems with the change in format but the spirit of the game should be retained.”

Sunday, October 21, 2007

हिंदी कमेंटरीः एक पोस्ट मार्टम रिपोर्ट

दुनिया कहां से कहां आ गई. पायजामा क्रिकेट अब बरमूडा या कच्छा क्रिकेट में तबदील हो गया. टीवी आ गया. टीवी रंगीन हो गया. रिमोट कंट्रोल आ गया. सब्र कम हो गया. विज्ञापन बढ़ गये. मैच में स्पीड आ गई. केबल जाने लगा. डिश टीवी आने लगा. टी20 मैचों में अगर कुछ खास है तो वह रफ्तार है. और रफ्तार ही आज के समय का सबसे निर्णायक पहलू है.
पर अपने हिंदी कमेंटेटर अभी भी उसी पुरानपंथ अधकचरेपन से बाहर नहीं निकले. वे अभी भी अंधे धृतराष्ट्र को महाभारत का आंखों देखा हाल सुना रहे है. उन्हें अभी भी लग रहा है कि लोग नसबंदी करवा कर फ्री रेडियो लेकर उनकी आवाज का जादू बिखेरे जाने की बेसब्र प्रतीक्षा में हैं. उन्हें अभी भी लग रहा है कि लोगों के पास जाने के लिए कोई भी और जगह नहीं है. वे अभी भी राष्ट्रभाषा का अलाउंस से खैनी खाते हुए देश की सेवा करने का गुरूर पाले हुए हैं. वे हिंदी की सेवा कर रहे हैं. वे देश की सेवा कर रहे हैं. वे प्रसार भारती की सेवा कर रहे हैं. वे हिंदी में स्नातकोत्तर, एम. फिल या पीएचडी हैं और उनके पास कोई ईश्वरीय पट्टा है जिसके तहत वे जैसे मन में आए देश के कानों में आंखों देखे क्रिकेट की धूल झोंक सकते हैं. हिंदी कमेंटरी पर सबसे बड़ा कमेंट उसी के कमेंटेटर हैं.
वे विलंबित खयाल में पढ़े गये धीमी गति के समाचार है. वे बैलगाड़ी पर बैठकर एक स्पीडवे का हालाते हाजरा कर रहे हैं क्योंकि राजभाषा का दर्जा होने के कारण उनके पास लाइसेंस है हिंदी और क्रिकेट का बारह बजाने का. वे सरकारी इमारतों की पीकरंगी दीवारों की तरह बदरंग, उनकी टेबल की तरह टूटे, उनकी कुर्सियों की तरह पुरानी और उनकी फाइलों की तरह धूल खाई बातें कर रहे हैं. वे बूढ़े हो चले हैं. आपको पिछली बार ऐसा कब लगा जब हिंदी कमेंटरी में समय रहते कोई काम की, सूझबूझ की, दिलचस्पी भरी, प्रजेंस ऑफ माइंड का सुबूत दिया ? अजगर को याद नहीं पड़ता. वे भयावह तरह से नाखुश लोग हैं और साफ लगता है कि उनका यकीन डार्विन के विकासवाद पर नहीं. विचारों, कल्पना, सूझबूझ के अकाल और सूखे से ग्रस्त. वे मनुष्यता के ख़िलाफ अपराध हैं.
हिंदी कमेंटरी में न तो कोई कल्पना शीलता है और न ही ये समझ पाने की कोई कोशिश कि लोगों को वह बताया जाए जो उन्हें नहीं पता. वे वही सब कुछ बता रहे हैं, जो 10 साल के बच्चे ने भी देखकर समझ लिया है. बच्चा रवि शास्त्री या नवजोत सिद्धू या सुनील गावस्कर को सुनना चाहता है, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे अंग्रेजी बोलते हैं, बल्कि इसलिए वे जो कहते हैं, उसका मायने होता है, उससे बच्चे की जानकारी बढ़ती है, जो वह कहते हैं वह दिलचस्प है. कई बार बहुत मजाकिया भी. इसलिए जब दूसरी पंक्ति के क्रिकेटरों को हिंदी कमेंटरी बॉक्स में बुलाया जाता है, तो वे भी मुख्य कमेंटेटरों को देखकर मनहूसियत फैलाने लगते है. उन्हें लगता है इधर यही रिवाज है. अजगर की तरह क्या आपको भी ऐसा लगता है कि अगर मनिंदर सिंह पर ड्रग्स लेने के आरोप सही हैं, तो कहीं हिंदी कमेंटरी के कारण तो नहीं.
ऐसा नहीं है कि वे ऐसा नहीं कर सकते थे. अरे जावेद जाफरी को सुनिये ताकेशीज कैसल में भयानक दिलचस्प बकवास करते हुए. अजगर उसे उस बकवास के कारण ही देखता है. उसमें तेजी है, कल्पना शीलता है, दर्शकों से राब्ता जोड़ने की कोशिश है, मजा है, प्रजेंस ऑफ माइंड है, अच्छी कॉपी है. हिंदी कमेंटरी पुनर्जीवन कमीशन बनाकर जावेद जाफरी को उसका हैड बना देना चाहिए. आप देखें तो नवजोत सिद्धू, रणवीर और विनय ये तीनों हिंदी का सॉफ्टवेयर अंग्रेजी में बेच रहे हैं. नवजोत को ही देखो तो कहां से कहां पंहुच गया. जितना उसका बैट नहीं चला, उससे ज्यादा जुबान चली. उसने पटियाला के देसी बिंबों को अंग्रेजी में ढाल कर पहले पैसा कमाया, फिर सांसदी, फिर एमएसएन पर सिद्धुइज्म पर पेज, फिर लॉफ्टर शो में मंहगा फरनीचर बनने का मौका, और फिर एमटीवी में अपनी नकल करवाने का सम्मान. बातन हाथी पाइए.
और अपना हिंदी का कमेंटेटर भयानक लद्धड़ तरीके से पूरे देश के सामने हिंदी और कमेंटरी की आर्ट का बेसुरा मर्सिया गा रहे हैं. उनके पास अभी भी जो आदर्श हैं- सुशील दोषी और जसदेव सिंह- दोनों आकाशवाणी के दिनों के हैं. मुझे तो उनके नाम भी नहीं पता, क्योंकि वे सारे भर्ती का माल हैं. और वे इसके लिए जिम्मेदार नहीं है. हिंदी की कमेंटरी के प्रतिमान ही ऐसे स्थापित हो गये हैं, कि वे इस मंच पर सिर्फ मुरदा होने की एक्टिंग कर सकते हैं. और प्रसार भारती के लाख ऑटोनामस होने, करोड़ों का सरकारी और टैक्स पेयर का रुपया लेने के बाद भी वे उसका स्वाहा करने में तन मन पूरा लगा देते हैं. वे रोमांच के दारुण रोड़े हैं. बेतरतीब स्पीडब्रेकर. वे अजीब विद्रूपता के आइटम नंबर हैं. म्यूजिक आगे जा रहे है, लद्धड़ नचनिये पीछे पीछे हांफते हांफते दौड़ रहे हैं. टेलीग्राम की तरह अप्रासंगिक और गैरजरूरी. वे अतीत की आत्माएं हैं जो वर्तमान में भटक आई हैं. और गलत योनि में प्रवेश करने की कोशिश कर रही है. उधर से अंदर आना मना है.

खुशी का ब्रांड इतना पंजाबी क्यों है

मैं अपने दस हजार कदम की सैर कर रहा हूं. अहमदाबाद में इस वक़्त आधी रात होने वाली है. और नवरात्रि अपने पूरे शबाब से ढल रही है. मैं गरबे में नहीं हूं पर हर तरफ से डांडिया का संगीत बज रहा है और कई धुनें तो बहुत ही गज़ब की हैं. तीन घंटे से ज्यादा वक़्त हो गया और लोग नाचते नाचते थकने लगे हैं. शनिवार की रात गरबे की आखिरी रात है. फिर दशहरा.
तभी भीड़ को फिर से जोश आ जाता है. और गाना गुजराती नहीं. पंजाबी धुन है और गाना नॉर्थ का है. अब आज की महफिल सिमटने वाली है. ये उसकी आखिरी पेशकश है. वही गाना जो यूपी, दिल्ली और पंजाब में बाराती टल्ली होने, सड़क पर लेटकर रुमालों से बीन बजाते नागिन डांस करने के बाद बारात के दरवाजे पर पंहुचने से जरा ही पहले करते हैं. व्हिस्की पीली जी. थोड़ी और पियो जी. इब थोड़ा भंगड़ा कर लो जी. फिर लड़के के बाप को घसीट लाया जाता है, वह भी दो ठुमके लगा लेता है. पैसे फेंके जाते हैं. गाना दुबारा बजाया जाता है. पेट्रोमैक्स लेकर गरीब मजदूर किनारे चलता है. बैंड वाला पसीना पोंछ रहा होता है. व्हिस्की के भभके के साथ कोई कहता है- गाना फिर से बजा बे. लड़की का बाप घड़ी देख रहा होता है. दिखा रहा होता है. गाना तिबारा बजता है.
ये देश है वीर जवानों का.. अलबेलों का मस्तानों का...
पंजाब हमारा मैक्डोनाल्ड है. फास्ट फूड, फास्ट म्यूजिक, फास्ट डांस और फास्ट लाइफ. ऐसा क्यों है कि ढाई घंटे में खत्म होने वाली हैप्पी एंडिंग लव स्टोरी अमूमन पंजाब की पृष्टभूमि लिये होती हैं. बाजार में निकलो तो खाना, पार्टियों का खाना पंजाबी ही है. चिकन जब भी शहीद होता है तो या तो तंदूर में या बटर में. मसाला हमेशा एमडीएच का ही होता है. चैन्नई तो छोड़िए पर तमिलनाडू के भीतरी कस्बों में भी कामकाजी औरते सलवार कमीज पहनी दिखलाई देती हैं. विदेश भी जाइए तो इंडियन फूड के क्रेजी फिरंगी बात करते हैं बटर चिकन की ही, जिसका आविष्कार मेरे ख्याल से पार्टीशन के दौरान दिल्ली आए एक रिफ्यूजी ने किया था. चिकन चैट्टीनाड को 10 में से 9 लोग नहीं जानते होंगे. बनारस के रहने वाले पंकज मिश्रा जब हिंदुस्तान के उभरते शहरों पर किताब लिखते हैं तो उसका नाम रखते हैं- बटन चिकन इन लुधियाना.
दावतें भी सब जगह एक सी हैं. किसी भी यूजुअल बफे में आंख मूंद कर जाइए वही चीजें मिलेंगी. उड़द राजमा, गोभी मसाला, तंदूरी रोटी, बटर चिकन, छोले. किसी भी रेस्त्रां में. स्नैक बार में. अमृतसर से लेकर हैदराबाद के आगे तक सड़कों के किनारे आपको ढाबे मिल जाएंगे जहां मंजी बिछाकर आप तुरतफुरत पंजाबी खाना खाइए और थोड़ा फैलकर कमर भी सीधी कर लीजिए. इतना सस्ता, फास्ट और लेटने का बंदोबस्त वाला खाना कहां मिलता है.
पंजाब में ऐसा क्या है, कि उसने खान पान रहन सहन पर एक तरह से कब्जा कर लिया है. एक तो ये वह लगातार भागता हुआ समुदाय था, जो काफी संघर्ष में रहा. इसलिए उसके रोटी, कपड़ा और उत्सव बिना ज्यादा लागलपेट की थी. मतलब देखिये कि दक्षिण में कथकली के नर्तक को तैयार होने में जो तीन घंटे लगते हैं, उतने में तो एक ढोल वाला तीन बारातों को निकलवा दे. एक थ्योरी ये है कि जो लोग संघर्ष करते हैं, वे साधना नहीं कर पाते. दक्षिण में बहुत संघर्ष नहीं हुआ इसलिए वहां शास्त्रीय विधाएं अच्छे से विकसित हो सकीं.
दूसरा पार्टीशन के कारण वे हर जगह पंहुच गये और उन्होंने धंधा जमाया.
तीसरा उनकी एंडिंग हैप्पी है जी. लोग और क्या चाहते हैं. तान के काम करो और ऐश से जिओ. कमसकम सपनों में, पार्टियों में, फिल्मों में. वह रोता हुआ जाता है, पर मरने की ख़बर नहीं लाता. वह अपनी जिंदादिली को आगे रखता है, लस्सी के ग्लास में, भंगड़ें में, हंसी ठठ्ठे में.
आत्महत्या कर रहे कर्जदार किसानों के बीच में आज भी रिपब्लिक डे परेड को आंख बंद याद करें तो अजगर को ग्रीन रिवॉल्यूशन के हीरो बनकर भंगड़ा करते सरदार ही याद आते हैं. बाकी हिंदुस्तान की परेड एक तरफ.
अजगर पंजाबी नहीं है और पंजाब के इस तरह हर जगह छा जाने की बात उसे अखरती भी है. पर फैक्ट तो फैक्ट है जी. अजगर को लगता है पंजाबीकरण ने हमारे बहुत से जज्बातों को कहीं पीछे छोड़ दिया है. हमारे अलग अलग जगहों के खाने के वैविध्य को उसने खत्म कर दिया है. वरना कश्मीर, बंगाल, बिहार, अवध, राजस्थान, मारवाड़, हैदराबाद जैसे इलाकों का खाना किस कदर गज़ब का है कि आप उंगलियां चाटते रह जाएं. पर बाज़ार में ग्राहक जल्दी में है और उसके लिए ज्यादा पैसे भी नहीं देना चाहता. इसलिए बाकी सब उतनी आसानी और तेजी से मुमकिन नहीं है जितना की साडा पंजाब है जी. इसलिए आप पाएंगे कि जब एक छत्तीसगढ़ी या डूंगरपुरिया जब ढाबा खोलता है, तो मैन्यू पंजाबी खाने का ही होता है. अजगर का एक प्रोफेसर दोस्त कहता है कि दिल्ली के उत्तर के लोगों में एक अजीब सा हाई टैस्टोस्टेरोन लेवल है, जो उन्हें लाउड और चटख बनाता है. पर पंजाब और पंजाबीपन के शॉर्टकट्स ने हमारी जिंदगियों की सांस्कृतिक और दूसरे वैविध्य को क्या खत्म कर दिया है. पंजाब के बाहर का जो वैविध्य है, उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है. उससे सिर्फ उडिपि रेस्त्रां ही लड़ पा रहे हैं. पर उसके अलावा भी रसोइयां हैं.
अजगर छत्तीसगढ़ में बड़ा हुआ जहां के स्थानीय लोक और आदिवासी संगीत और नाच अभी भी उसकी आंखों में चमक ले आता है. उसे याद है पास के उड़िया मजदूरों की बस्तियों में बजता रोंगोबोती नाम का गाना, जो गजब का मस्ती भरा और थाप वाला गाना था. अजगर को पसंद है गैर पंजाबी खाना. वह भोपाल में एक बिहारी मुसलमान के यहां गया तो वहां सरसों के तेल में पका गोश्त खाया. जब दिल्ली में अजगर संघर्ष कर रहा था तो नोयडा के अट्टा पीर पर एक उपरेती का ढाबा है, जहां वह इसलिए जाता था कि वह सस्ता तो था ही, साथ ही फुलके भी देता था. बाद में जब दिन थोड़े बेहतर हुए तो उसे आसफ अली रोड के चोर बिजार में कश्मीरी वाज़वान और जामा मसजिद के पीछे करीम होटल (1913) में मुगलई खाते देखा गया और तारदेव, मुम्बई के ओ! कैलकटा में लाजवाब बंगाली वैज खाना खाते हुए केले के फूल की सब्जी के साथ. पर उन सबके साथ दो समस्याएं है. या तो वे बेहद डाउन मारकेट और स्ट्रीट स्टॉल हैं या फिर उन पर प्रीमियम हैं. वे मध्यवर्ग की जेब, समय और सुविधा का ख्याल नहीं रखती. कम से कम उतनी निपुणता से नहीं जैसे पंजाबी रख लेते है.
भारत की उत्सवधर्मिता अब पंजाबी हो चुकी है. पार्टी, खाना, डांस, म्यूजिक, गाने, टैंट वाला, ढोल, ड्डीजे, फिल्में, म्यूजिक वीडियो. दुनिया में पंजाब अब ग्लोबल इंडियन की आइडेंटिटी है. कितनी सारी फिल्में (खोंसला का घोंसला, मानसून वैडिंग, डीडीएलजे) अगर पंजाबी बैकड्रॉप में न होती तो न उनमें इतना ह्यूमर होता न वे इतनी खुशनुमा होती. इसमें उनका भौंडापन भी शामिल मानिये. अगर वे आपके अलावा किसी और से कर रहे हों तो फिर उनका फुकरापन भी बहुत दिलचस्प होता है.
ऐसा नहीं है कि भोजपुरी संगीत या संस्कृति का बाजार नहीं है, या बंगाली, उड़िया, पहाड़ का संगीत और खानपान अपनी जगह औऱ सम्मान नहीं रखता पर उनमें से किसी की भी मौजूदगी हिंदुस्तान में हर कहीं एक स्वीकार्य सच की तरह नहीं है.
तीन घंटे की फिल्म को जल्द खत्म होना होता है ज्यादातर हैप्पी एंडिंग के साथ. शायद इसलिए वे पंजाबी फास्ट डिस्पेंसेशन का हिस्सा हैं. पर ये बताइये ये जो टीवी सीरियल्स में पसरा हुआ अंतहीन तनाव और क्लेष, बैडरूम पॉलिटिक्स, साजिशें, बेवफाई और चमत्कार हैं, ये इतने गुजराती परिवारों को लेकर क्यो हैं. दंगे नहीं है, बाकी सब कुछ है. नरेंद्र मोदी के खिलाफ जब दिल्ली के चैनल खबरें दिखाते हैं, तो केबल वालों से कह दिया जाता है कि वह चैनल दिखाना बंद करें. क्या ऐसा ही एंटरटेनमेंट चैनल्स के साथ नहीं होना चाहिए. दुख केवल गुजरात के मत्थे ही क्यों मढ़ा जा रहा है.

Saturday, October 20, 2007

किसने घंटी बजा दी नरेंद्र मोदी की

टाइम्स ऑफ इंडिया के अहमदाबाद संस्करण में एक तस्वीर है, जिसमें एक रिटायर्ड पुलिस अफसर घंटी बजा रहा है. फोटो कैप्शन में इशारा ये है कि जो घंटी बज रही है, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की है. इस रिटायर्ड पुलिस अफसर का नाम रमण पिल्लइ भास्करन नायर श्रीकुमार है. आरबी श्रीकुमार गुजरात में एडीशनल डीजीपी पद से रिटायर हुए और उन्हें बृहस्पतिवार को मोदी सरकार के खिलाफ एक कोर्टकेस में जीत हासिल हुई जिसमें उनके प्रमोशन के मामले वाली फाइल को सरकार ने सीलबंद कर दिया था. किसी भी आईपीएस के मन में एक स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती होगी कि वह तरक्की के शीर्ष तक पंहुचकर रिटायर हो अगर वह कर्तव्यपरायण और ईमानदार हो तो.

श्रीकुमार के साथ ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से कह दिया था कि तुम्हारे हाथ बेगुनाहों के खून से रंगे हैं. श्रीकुमार गुजरात कैडर के 150 आईपीएस अफसरों में से अकेले थे जिन्होंने सच कहने का साहस किया और कहा कि भारतीय जनता पार्टी के नेता लोग दंगों के दौरान हालात को काबू करने से अफसरों को रोक रहे थे. श्रीकुमार उस वक्त़ इंटेलिजेंस के प्रमुख थे और उनका तबादला वहां से कर दिया गया. श्रीकुमार ने दंगों की जांच करने वाले नानावटी कमीशन के सामने पेश अपनी डायरी में से ये कहा कि मोदी सरकार के मुख्य सचिव ने उनसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की हिदायत दी थी. श्रीकुमार ने नानावटी कमीशन के सामने चार हलफनामे दायर किये और चारों को पढ़ने के बाद ये साफ हो जाता है कि गोधरा कांड के बाद किस तरह नरेंद्र मोदी, उनके चाटूकार नेता, चिलमची नौकरशाह और चम्मच लोग दंगों के नाम पर सुनियोजित नरसंहार की साजिश को वहशियाना अंजाम दे रहे थे. श्रीकुमार इन सारे लोगों में अकेला खुद्दार आदमी है. उनके मुताबिक राज्य सरकारअसंवैधानिक निर्देश जारी कर रही थी. श्रीकुमार ने कहा उन्हें जो निर्देश दिये गये उनमें पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला का फोन टेप करना, संघ परिवार के लोगों पर निगाह रखने से मना किया जाना, मोदी सरकार के ही मंत्री हरेन पंड्या (सुनीता विलियम्स के चचेरे भाई, जिसकी बाद में हत्या हो गई) के मोबाइल फोन को ट्रैक करना और उस नंबर से हुई बातचीत के नंबरों की हिस्ट्री निकलवाना, और केद्रीय चुनाव आयोग के सामने गुजरात की सांप्रदायिक स्थिति के बारे में सही आकलन न पेश करना जैसी बातें शामिल थीं. श्रीकुमार के मुताबिक उनसे गुजरात सरकार के अफसरों ने कहा था कि वे नानावटी कमीशन के सामने तथ्यों को छिपाएं और गोधरा कांड की कॉंसपिरेसी थ्योरी को मान लें और साथ ही ऐसी कोई बात न कहें जिससे ये पता चल जाए कि सरकारी एजेंसियों ने अपना काम ठीक से नहीं किया.

श्रीकुमार ने अपने चौथे हलफनामे में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का वक्तव्य उद्धृत करते हैं - मैं (मोदी) चाहता हूं कि गोधरा कांड के बाद हिंदू अपने गुस्से का इजहार करें.

सच कहने का साहस करने के एवज में मोदी सरकार ने वही किया जो एक डरे हुए नौकरशाह की क्लासिक प्रतिक्रया होती है. चुप कराने की कोशिश. पहले तबादला किया और फिर 1987 के किसी निचले कोर्ट में दायर क्रिमिनल केस का हवाला देते हुए श्रीकुमार को सुपरसीड कर दिया गया और उन्हें डीजीपी नहीं बनने दिया गया. अदालती मामले में श्रीकुमार को तब तक उलझा कर रखा गया जब तक उनका रिटायरमेंट नहीं हो गया. अब जब कोर्ट का सरकार के खिलाफ और श्रीकुमार के पक्ष में फैसला आया है श्रीकुमार को रिटायर हुए आठ महीने हो गये हैं. उन्होंने इस लड़ाई के लिए कानून की डिग्री ली, अपनी कार बेच दी और एक एक करके अपनी ही प्रजा का शिकार करने वाले तंत्र के खिलाफ हलफिया सुबूत दिये.

गांधीनगर में अपने मकान शुक्रवार को अकेले बैठे श्रीकुमार से एक गुजराती अखबार ने बात की तो पता चला कि उन्हें एक को छोड़कर किसी भी पुलिस अफसर का फोन नहीं आया. वे डरे हुए हैं कि कहीं सरकार को पता न चल जाए. उन्हें अपने फोन टेप होने का डर है. जिस अफसर का फोन आया है वह भी शायद इसलिए कि वह खुद मेरी ही तरह एक मामले में फंसाया गया है.

श्रीकुमार एक आस्तिक हिंदू हैं. नरेंद्र मोदी और उनकी तरह के नेताओं से ज्यादा और निष्ठावान हिंदू. फर्क सिर्फ ये है कि श्रीकुमार का मानना है कि धर्म के केंद्र में मानवता है. हिंसा और नफरत नहीं.

Wednesday, October 17, 2007

लोग कहीं के भी गुनहगार नहीं होते, गुजरात के भी नहीं

गुजरात की जनता शायद इसी लायक है कि मोदी जैसे लोग उनका नेतृत्व करें। लेकिन जनता को संवेदनशील और जागरुक बनाने के दायित्व में मीडिया और बौद्धिक समुदाय की विफलता भी इसके लिए कम उत्तरदायी नहीं है। - सृजन शिल्पी

सृजन शिल्पी की ये प्रतिक्रिया मुझे अपने पिछले पोस्ट पर मिली, जो किसी भी लोकतंत्र की वैधता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर उसे उनके हालात पर छोड़ देती है. गुजरात या कहीं की भी जनता जब वोट देने जाती है तो यही सोच कर जाती है कि उसका वोट उसका सबसे ज्यादा भला करेगा. क्या गुजरात की जनता सचमुच इसी के लायक है. यहां के हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई, आदिवासी, हरिजन, पिछड़े कि नरेंद्र मोदी जैसे लोग उन पर राज करते रहें. अगर लोग उन्हें चुन रहे हैं, तो उस पर सवाल नहीं किये जा सकते, क्योंकि फिर तो सब कुछ संदिग्ध है. चाहे कश्मीर में जनमत संग्रह की बात हो या फिर बंगाल में कम्यूनिस्टों का लगातार जीतते रहना.

ये वाक्य इसलिए खलता है कि ये लोकतंत्र पर लानत भेजता है. और विकल्प में क्या है जिससे कुछ सकारात्मक, रचनात्मक हो सके. हालांकि सृजन शिल्पी या कोई भी व्यक्ति ऐसी बात खीझ में ही ऐसा कह सकता है. जैसे अब कोई संभावना ही न हो. पर गुजरात जैसा कि बाकी मुल्क़ है संभावनाओं से भरा हुआ है.

सृजन शिल्पी की दूसरी बात से मैं बहुत ज्यादा सहमत हूं. मोदी इसलिए कुर्सी पर नहीं हैं कि गुजरात की जनता इसी लायक है. पर ऐसा इसलिए है कि किसी ने इस बात को ठीक से उठाने, चुनौती देने और एक जंग लड़ने की तकलीफ नहीं उठाई. होना तो ये चाहिए था कि कांग्रेस को ये बीड़ा उठाकर मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए था, पर वे हाथ में हाथ धरें, टांगों के बीच दुम दबाकर बैठे रहे. वे एक लीडर भी अपना मैदान में न उतार सके, जो समाज को सांप्रदायिक तौर पर बंटने से रोक पाता और जो विकास और दूसरे सामाजिक – आर्थिक मुद्दों को एजेंडे पर लेकर आता, जिससे गुजरात की अकूत दौलत लोगों की समृद्धि में बदल पाती. वे इस वक्त़ की नजाकत को पकड़ न सके और न ही उसके मुताबिक अपने प्रयासों को आकार दे सके.

उन्होंने मोदी से टकराने का काम भी पूर्व संघी नेता और बूढ़े असंतुष्ट भाजपा नेताओं के जिम्मे कर दिया है. यह सियासी आउटसोर्सिंग का काम कांग्रेस ने खुद को पता नहीं कितना होशियार समझ कर किया हो, पर इस प्रयास में उसकी अपनी कुटिलता के अलावा और कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है. और जरूरी नहीं है कि मोदी से लेकर पार्टी का भीतरी असंतोष कांग्रेस के लिए सत्ता पर बैठने का न्यौता छपवा कर ले ही आए.

कांग्रेस पिछले छह सालों में क्या कर सकती थी-

  • विकास को विमर्श का विषय बना सकती थी
  • गांधी को वापस गुजरात पंहुचाने की कोशिश कर सकती थी
  • लोगों के पास जाकर उनके वास्तविक मुद्दों को लेकर जुड़ना शुरू कर सकती थी
  • अपनी पार्टी में नया ख़ून ला सकती थी, खुद को जोड़ सकती थी
  • नये गठबंधन और समीकरण बनाने की कोशिश कर सकती थी
पर इनमें से ज्यादातर बातों पर कांग्रेस का प्रदर्शन औसत भी नहीं है. उन्हें पता नहीं किस तांत्रिक ने बताया है कि कांग्रेस निठल्ली बैठी रहे तभी नरेंद्र मोदी की सरकार गिरेगी.

अभी रविवार दोपहर ही मैं एक प्रमुख अंग्रेजी अख़बार के युवा संपादक के साथ कैफे कॉफी डे पर बिना चीनी वाली एस्प्रैसो अमेरिकाना पी रहा था, कि उसने मुझे एक दिलचस्प बात कही. उसने कहा कि लोग ये पूछ रहे हैं कि उनका क्या भला हुआ है मोदी के राज में. लोग मतलब धोबी, पेपर बांटने वाला, कार का ड्राइवर, कामवाली.. वे लोग जो वोट डालने जाते हैं. वे लोग जो दंगाइयों से मरते हैं. वे लोग जिन्हें पुलिस मारती है. वे लोग जिनके लिए लोकतंत्र में वोट मतलब रखता है. वे लोग देखते हैं कि मोदी की सोहबत अम्बानी और रुइया और दूसरे अमीरों से ज्यादा है, गुजरात के गरीबों से कम. मोदी के कपड़े कैसे जहीन हो गये हैं, और चश्मा, दाढ़ी किस कदर डिजाइनर, वे देखते हैं. अगर विकास के मुद्दे पर मोदी चुनाव में जाते हैं, जैसे कि वे बातें कर रहे हैं , तो लोग पूछेंगे कि भई हमारा क्या विकास हुआ.

अभी वे ऐसा पूछ रहे हैं. पर कल को वोट भी इसी बात पर डालेंगे अगर. अगर उन्हें सांप्रदायिक लाइनों पर नहीं बांटा गया. सांप्रदायिक लाइनों पर बांटना तब बहुत आसान हो जाता है जब कोई गोधरा जैसा हादसा हो जाए. फिर बहुत सारे लोग अपनी प्राथमिकताओं का सरलीकरण कर लेते हैं.

अगर उन्होंने ये मन बना भी लिया है कि मोदी से उनका मन भर चुका है, वे किसे वोट दें. उस निराकार को जिसका न चेहरा है, न कोई कार्यक्रम, न आश्वासन. वे मोदी को जानते हैं और बहुत से लोग उस अनजाने को लेकर आश्वस्त नहीं दिखते जो हरदनहल्ली डोड्डेगौडा की तरह धरती पुत्र होने का स्वांग भले ही करले, पर होगा नियति की अवैध संतान ही.

ये राहुल गांधी की बपतिस्मा यहां गुजरात में क्यों नहीं हो सकता था. वे मोदी से लोहा लेते. अगर जीतते तो एक बाहुबलि की तरह दिल्ली लौटते और हारते तो भी एक ऐसे कारण के लिए जो इस देश और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सरदर्द साबित हो रहा है.

वे आते और आर्टीकुलेट करते. अगर मोदी यहां बने हुए हैं, तो उसकी वजह यह वॉक ओवर भी है, जो एक पनीले विपक्ष ने दिया है. गुजरात या लोगों पर लानत भेजना सबसे आसान है, पर लोकतंत्र विकल्पों का होता है. और जब विकल्प न हो, तो चुनने की आजादी भी नहीं होती. जहां वह आजादी मिली है, गुजरात की जनता ने अपने वोट को अभिव्यक्ति बहुत स्मार्ट तरीके से की है. जैसे पिछले लोकसभा चुनाव. जहां उसने ज्यादातर सीटों पर भाजपा को हरा दिया. पर इस वक़्त वे न तो सांप्रदायिक राक्षस से लड़ते दिखाई दे रहे हैं, न विकास के मोर्चे पर, न ही कोई नया वोट बैंक बना पा रहे हैं.

मोदी के अभ्युदय का श्रेय उन गांधीवादियों पर भी जाता है, जो इस पूरे दौरान चुप रहे और कुछ नहीं बोले

उस समझदार, सयाने, विकास को एजेंडे पर रखने वाले, -सांप्रदायिक वोटर के लिए वह चेहरा कहां
है
, जिस पर ठप्पा मारकर वह और अमन जीत जाए. अभी वह संभावना अमीबा है. अगर मोदी को हराएगी, तो वहां की जनता ही. और जो जीतेगा, वो सिकंदर नहीं होगा. वह एक नया हादसा होगा. पर ये एक दिलचस्प वक़्त है क्योंकि इतिहास में हमेशा इस तरह के दौर में नई सियासत, नये चेहरे, और नई संभावनाएं उभरती है. जिसके सूत्रधार लोग होते हैं.

Tuesday, October 16, 2007

तो नाथूराम गोड़से गौतम बुद्ध से प्रेरित थे


बिड़ला जी के अखबार ने खुशी खुशी ये छाप भी दिया. बाकियों ने भी छापा. वही बिड़ला जी जो आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ (देखें फोटो) थे. नरेंद्र दामोदरदास मोदी के लिए इससे ज्यादा क्रेडिटेबल बात क्या हो सकती थी. वे गांधी के आदर्शों और उनकी रामराज्य की थ्योरी पर यकीन करते हैं. मोदी ने ऐसा कहा. और दिल्ली सुनती रही. मीडिया इसकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता रहा. टीवी चैनलों के कैमरे रिकॉर्ड करते रहे. कोई सवाल नहीं. कोई शक की उंगली नहीं. कोई असहमति नहीं. बिड़ला जी के अखबार का आयोजन था. किसी ने साफ सवाल नहीं किये. ये नहीं पूछा कि भाईसाहब जब सरकार खुद लोगों को मारने में लगी रही, तो मुख्यमंत्री गांधी वादी कैसे हो सकता है. उधर गांधी दंगे रोकने के लिए सरकार से बाहर रहने के बाद भी अनशन पर बैठ जाते थे. बॉस नेल्सन मंडेला ये बात कहे तो समझ में आता है. दलाई लामा ये बात कहे तो जमता है. पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी.

याद है एटेनबरो की फिल्म में उपवास कर रहे बेन किंग्सले के सामने रोटी फेंकने वाला मुसलमान ओम पुरी. कट टू नरेंद्र दामोदरदास मोदी. सवाल नहीं कर सके, तो हंसई देते दिल्ली वाले. वे अहमदाबाद की दंगा अदालतों की तरह एक झूठ को हलफनामे में बदलता देख रहे थे. चुप रहकर वे इस जुर्म में शामिल थे. सबसे ख़ौफनाक नरक क्या उन लोगों के लिए आरक्षित नहीं जिन्होंने निर्णायक पलों में कोई स्टैंड नहीं लिया. उनके सामने एक आदमी इश्टाइल के साथ टुच्ची पटकता रहा, भाई लोग सुनते रहे. सहते रहे राष्ट्रपिता की गरिमा से खिलवाड़. इससे अच्छी तो वह लंदन की प्रेस कान्फ्रेंस थी जहां एक रिपोर्टर ने इराक युद्ध के खिलाफ हो रहे जबरदस्त जनप्रदर्शन के बीच जॉर्ज बुश से किया था. "मिस्टर प्रेजीडेंट, व्हाई डू पीपल हेट यू सो मच ?" बुश का ख़ामोश चेहरा ही इस सवाल का जवाब था.

और ये वही महात्मा गांधी हैं जिनके बारे में नोबेल शांति पुरस्कार देने वालों ने आखिरकार अफसोस जताया कि गांधी जी हकदार तो थे, पर समिति ही उन्हें न समझ पाई. और ये वही नरेंद्र मोदी हैं जिन्होंने कितनी गहराई से महात्मा के महात्म्य को समझ लिया। दोनों के जीवन में रेलगाड़ी की बड़ी भूमिका है. एक जो दक्षिण अफ्रीका में गुजर रही थी, एक जो गोधरा से. सिवा इसके दोनों के बीच कोई एक सिरा मिलता हो, तो अजगर को आश्चर्य होगा. प्रेस का काम भई रिपोर्टिंग करना है. बलात्कार होगा तो वह चेहरा ब्लर करके रिपोर्टिंग करता रहेगा. हस्तेक्षप करना उसका काम नहीं है. किसी को आश्चर्य नहीं होगा कि कल को ऐसी डायरी मिले जिसमें नाथूराम गोड़से गौतम बुद्ध से प्रेरणा लेकर ध्यान क्लासेस ज्वाइन करने का सजीव ब्यौरा हो. अंगरेजों के खिलाफ होने के बाद भी गांधी को लेकर वहां के लोगों और मीडिया का रवैया बहुत ही सकारात्मक था (चार्ली चैपलिन की आत्मकथा से लेकर वहां के अखबारों के कवरेज तक), पर मोदी को एक तरफ हिंसा के बड़े भैय्या अमेरिका ने अपने यहां घुसने नहीं दिया और ब्रिटेन के अखबारों खास तौर पर गार्डियन ने तो पूरा पेज छापकर सरकार से पूछा कि नरसंहार के दूसरे आरोपियों ने क्या गलत किया था, जो उन्हें ब्रिटेन में या तो घुसने नहीं दिया गया, या फिर गिरफ्तार कर लिया. ब्रिटिश सरकार सफाई देती रही.
बिड़ला जी के जिस अखबार के आयोजन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ये बता रहे थे
, उसी अखबार में 22 जून, 2002 को एक गुलाम नून साहब का लेख भी छापा था. गुलाम नून गुजराती मूल के बड़े उद्योगपति हैं और लंदन चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रेसीडेंट भी. नून का कहना है, मोदी भारत के मिलोसोविच है. मिलोसोविच ने भी एथनिक क्लींसिंग ( एक वर्गविशेष को नेस्तनाबूद करने की कोशिश) की थी. बहरहाल हेग के अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में मानवता के प्रति अपराध करने के जुर्म में चप्पलें चटकाते हुए मिलोसोविच की जान चली गई थी. बिड़ला जी के अखबार ने तब उसे भी इसी निष्पक्षता से छापा था.
नाथूराम गोड़से के हाथों जब महात्मा गांधी का क़त्ल हुआ था
, तब वे बिड़ला भवन में ही रुके थे. यहां पर पढ़िये गांधी की हत्या की एफआईआर. . नाथूराम गोड़से ने जिंदा गांधी को मार डाला था. नरेंद्र मोदी अब मृतात्माओं के साथ हिंसा कर रहे हैं. ये नई तरह की हिंसा है. जिंदा होते तो भी गांधी शायद कुछ न कहते. शायद मुस्कुराते. शायद अपनी वकालत का कोट डालकर उन लोगों की तरफ से जिरह करने आते, जिन्हे स्वराज दिलाने के लिए उन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी. गांधी इस वक़्त कतार के आखिरी व्यक्ति को देखते और उसकी तरफदारी के लिए खड़े होते.
अच्छा ये भी कोई तरीका है
, भारतीय जनता पार्टी ने आज़ादी और उसके बाद के हर उस कांग्रेसी आइकन को सगा बताने की कोशिश की है, जो नेहरू परिवार से नहीं है. चाहे वह पटेल हों और अब गांधी. अभी तक लालकृष्ण आडवाणी खुद को लौहपुरूष बताने का कोई मौका नहीं चुक रहे थे, और नमो खुद को छोटा पटेल. एक तरफ ये वर्ग है जिसे जहां मौका मिलता है, नाथूराम गोड़से की प्रशंसा करने में लग जाता है, ऐसे ईमेल भिजवाता है, जिसमें नाथूराम गोड़से देश का सबसे बड़ा हीरो है. दूसरी तरफ वही लोग गांधी को अपना मसीहा कहने में हिचकिचाते नहीं. जिनके राज में मुसलमान खुद को सलामत नहीं महसूस करते, जिनके सरकारी अफसर एक्सटॉर्शन, एनकाउंटर और बलात्कार के आरोप में सींखचों के पीछे हैं, जिनके यहां मनुष्यता के बाद सच एक बड़ी कैजुअल्टी है, वह शख्स आज गांधी की दुहाई दे रहा है. जिसने अपने सबसे लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी के मुताबिक राजधर्म का पालन नहीं किया और जो मोदी को एक वक़्त मुख्यमंत्री पद से हटाने पर समझा जाता है गंभीरता से विचार करने का उपक्रम कर रहे थे. नरेंद्र मोदी को ये ईमानदारी से छाती ठोंककर बताना चाहिए था कि आखिर किसकी प्रेरणा से वे राजधर्म छोड़ने के लिए मजबूर हो गये थे.
जब दो हजार लोगों के मरने का पाप नहीं लगा
, तो ये बोलने से कौन सी जुबान कट जाएगी. किसी को फर्क नहीं पड़ता शायद. उन्हें भी नहीं जिन्हें शायद सवाल करने चाहिए.

जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुजरता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है
मनुष्य क्यों मरता है
? (श्रीकांत वर्मा- मगध)

सन 1988 में जूडी फॉस्टर को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए बैस्ट एक्ट्रेस का ऑस्कर और गोल्डन ग्लोब दोनों अवार्ड मिले थे. फिल्म थी दि एक्यूज्ड . फिल्म की कहानी ये है कि जूडी से एक शराबखाने में बलात्कार होता है. एक वकील जूडी की तरफ से लड़ने आता है. जूडी कहती है कि बलात्कारी ने जो किया वो किया, उन बार में मौजूद उन लोगों को भी सजा मिलनी चाहिए, जो तालियां और सीटियां बजाकर उस शख्स का हौसला बढ़ाते रहे.

Monday, October 15, 2007

थोड़ा ख़ून बढ़ा है, थोड़ा सीना चौड़ा है

आज बदन में ख़ून कुछ बढ़ गया. सीना कुछ चौड़ा हो गया है. तीनों वजहें बड़ी हैं. पहला अविनाश के ध्यान में आना, जिनका मोहल्ला हिंदी का सबसे सक्रिय ब्लॉग है, दूसरा जनसत्ता में छपना- उस जनसत्ता में जिसे पढ़कर अजगर ने लिखने की तमीज और सोचने के तेवर हासिल किये और तीसरा हिंदी ब्लॉगिंग के पुरोधा अजदक के साथ अजगर का भी जिक्र छिड़ा.

अखाड़े का उदास मुगदर आज रविवार को मुस्कुराया, जिससे आस्तीन के अजगर को हार्दिक प्रसन्नता हुई. इसलिए भी हुई कि साहित्य में थोड़े बुजुर्ग और गहरे जान पड़ने वाले अजदक के साथ अजगर का जिक्र भी छिड़ा. मुझे उम्मीद है ये जिक्र सिर्फ अ अक्षर और अज के शुरूआत करने वाले ब्लॉगर्स के बारे में नहीं है. फिर ये जनसत्ता में छपा है. उस जनसत्ता में जिसे पढ़कर अजगर बड़ा हुआ और लिखने की तमीज सीखी और सोचने के तेवर भी. अविनाश आपका बहुत शुक्रिया जो आपकी नजर अखाड़े के उदास मुगदर पर पड़ी.

पहले लखनऊ और फिर दिल्ली से यारों का फोन आया अविनाश के जनसत्ता में छपे लेख के बारे में. मैं क्योंकि उस इलाके में एक संक्रमण से गुजर रहा हूं, जहां जनसत्ता नहीं आता, इसलिए एक यार ने फिर स्कैन करके भिजवा दिया मेल पर. अजगर अपने ब्लॉग पर ये लेख जेपीजी फाइल की शक्ल में चस्पा कर रहा है.

हिंदी ब्लागिंग का सबसे बड़ा और दिलचस्प हासिल ये है कि इसने हिंदी के उस वर्ग को फिर से एक आकाश दिया है और जमीन भी, जो संवेदनशील, पढ़ा-लिखा, सोचने-समझने-पढ़ने-लिखने वाला, तरक्कीपसंद था और नवसाक्षरों के बाजार को मीडिया की केटरिंग के कारण कहीं बहुत तेजी से गौण, दरकिनार, उपेक्षित और अल्पसंख्य हो गया था. क्या ये महज संयोग था कि जिस वक्त हिंदी की ज्यादातर ठीक ठाक पत्रिकाएं बंद हो रही थी औऱ हिंदी किताबों का बाजार लाइब्रेरियों के राष्ट्रभाषा फंड के भरोसे होने लगा था, ठीक उसी वक्त़ हिंदुस्तान से और हिंदुस्तान में लिखी गई अंग्रेजी किताबें दुनिया में अपना लोहा मनवाने लगी थीं. अजगर को लगता है कि कोंसल में जो विचारों की कमी हो गई थी, लालची मास मीडिया के कारण वह ब्लाग्स बचा सकते हैं. वे फिर से एक जमीन जोत सकते हैं विचारों और अभिव्यक्तियों की, उस मुश्किल से वक्त़ में जहां विमर्श के बिंदू ये हीं है कि एक लेखक ने फलां मंच पर उस पत्रकार या इस आलोचक को ऐसे निपटाया. उदय प्रकाश के ब्लाग पर जाकर शाकिर अली की बस्तर पर कविताएं पढ़िये इसलिए कि वे बेहद नायाब और बला का असर रखती हैं. इसलिए भी कि ब्लाग्स न होते तो वे हम तक शायद पंहुच भी न पातीं. अजगर को बहुत उम्मीदें हैं ब्लॉग्स से और आप से. ताकि शाकिर और उसकी कविताएं मुमकिन होती रहें.

Sunday, October 14, 2007

गुजरात चुनावों के साथ दंगा फ्री ?

ये सवाल अहमदाबाद के ही नहीं, बल्कि देश भर में बहुतेरे लोगोंके जहन में घूम रहा है , जहां नरेंद्र दामोदरदास मोदी तीसरी बार अपनी हिंदू वोट बैंक राजनीति के चलते जनादेश लेने जा रहे हैं. नरेंद्र मोदी अगर तीसरी बार चुने जाते हैं तो वे शायद ज्योति बसु के बाद भारत में दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत मुख्यमंत्री की गद्दी पर तशरीफ रखने का मौका मिलेगा.

दंगे नहीं होंगे अगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी का पक्ष मजबूत होगा, ये तर्क है गुजरात में उन लोगों का जो मोदी को जीतते हुए देखना चाहते हैं. वे कहते हैं कि कोई भी और पार्टी या व्यक्ति सत्ता में आता है, तो आतंकवाद, इस्लामी जेहादी, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा जैसे मुद्दों पर गुजरात की पकड़ फिर ढीली हो जाएगी. वे कहते हैं कि बाकी सारे पहलुओं पर तो नमो ने वैसे ही अच्छा काम किया है, जिससे लोगों का भला हुआ है, अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है, इन्वेस्टमेंट बढ़ा है. नमो हर वह काम ठीक कर रहे हैं जो टोटेलिटेरियन रजीम्स में होता है. भले ही कुछ लोग हैं जो ठीक से एक आज़ाद मुल्क में सांस नहीं ले पा रहे हैं, पर उनका क्या.. वे नजरअंदाज किये जा सकते हैं. हां सिविल लिबर्टीज का सवाल है, पर ऐसी क्या जल्दी है.

इधर सरकारी मशीनरी एक्सटोर्शन, बलात्कार और एन्काउंटर के आरोपों से जूझ रही है, उधर नरेंद्र मोदी हिंदुस्तान टाइम्स के लीडरशिप सम्मिट में लोगों को ये यकीन दिलवाना चाह रहे हैं कि वे महात्मा गांधी से न सिर्फ प्रभावित हैं, बल्कि उनसे प्रेरणा भी लेते हैं. हिंसा का ये नया तरीका ढूंढ निकाला है मोदी ने. अभी तक वह जिंदा लोगों के लिए थी, अब स्वर्गीय हो चुके नेताओं के साथ भी. जब उसमें कुछ नहीं हुआ तो इसमें भी क्या होगा. वे उसी महात्मा गांधी की बात कर रहे थे, जिनके साबरमती आश्रम में मोदी राज के दौरान उन्हीं के भाजपा विधायक की अगुवाई में एक गरिमापूर्ण औरत और जिम्मेदार नागरिक के साथ बदसलूकी और झूमाझटकी की गई. उन्होंने ये भी कहा कि वे गुजरात के विकास के लिए पागल हैं.

मोदी के पक्ष में बोलने वाला एक भी मुसलमान नहीं मिलता. गुजरात की आबादी का 9 फीसदी हिस्सा वे भी हैं. पर ऐसे हिंदू लोग काफी हैं जो कहते हैं कि नमो ने गुजरात के गौरव को वापस प्रतिष्ठित किया है. ये गौरव कहां प्रतिष्ठित हुआ है, ये तो वे नहीं बताते, पर ये जरूर बताते हैं कि उन्हें सीना तान कर चलने में डर नहीं लगता. आज नमो के सामने सवाल खड़े करना या उन्हें चुनौती देना गुजराती को गाली देना है. गुजराती यानी हिंदू गुजराती. हिंदु पुरूष गुजराती. और ये एक तरह का डैडलॉक है विपक्ष के लिए. कुछ भी बोलेंगे तो गुजरात के आत्मसम्मान को ठेस लगेगी, 6 करोड़ गुजरातियों का आत्मसम्मान मोदी के पास रेहन रखा है.

मोदी के आने के बाद से मुसलमान खुद को भले ही गुजराती मानते हों, पर गुजरात, वहां का मुख्यमंत्री, वहां की सरकार उन्हें कितना सगा और कितना अपना मानती है, ये बताने की जरूरत नहीं है. कई अख़बारों को लिखना पड़ा तब जा कर कहीं सरकार के कान पर जूं रेंगी और उन्होंने इरफान पठान और युसुफ के लिए 20ट्वेंटी वर्ल्ड कप में अच्छे प्रदर्शन के लिए इनाम की घोषणा की.

दंगों से हिंदू - मुस्लिम वोट पोलराइज हो जाते हैं जिसका फायदा हिंदू वोट बैंक वाली पार्टी को मिलता है, ऐसे खूंरेज प्रयोग गुजरात में हो चुके हैं, जब गोधरा एक्सप्रेस ने नरेंद्र दामोदरदास मोदी का फर्स्ट एसी में गांधीनगर का टिकट कन्फर्म कर दिया था. अभी तक ये पता नहीं चल सका है कि गोधरा से गुजर रही कारसेवकों से भरी साबरमती एक्सप्रेस में आग किसने लगाई थी, पर एक हादसे और बहुत सारे खून खराबे के बाद नमो तीसरी बार गद्दीनशीं हो सकते हैं.

हालांकि ऐसा कहने वाले लोग भी कम नहीं कि इस वक़्त सांप्रदायिक भावनाएं भड़काना नमो के लिए मंहगा भी साबित हो सकता है क्योंकि चुनाव आयोग और दिल्ली दरबार दोनों जगह नमो की पूछ इधर कुछ कम ही है. तीसरी पारी के लड़ रहे नमो के लिए सब कुछ आसान नहीं भी है. एक तो ये भले ही कांग्रेस कोई बड़ी चुनौती नहीं है, पर भाजपा के कई पुराने दिग्गजों ने म्यान से खंजर निकाल लिये हैं और उनकी साजिशों की लंबी चर्चाएं उस अंधेरी रात के इंतजार में हैं, जब वे या तो नमो को लंगड़ी मार दें (जिसकी संभावना कम हैं) या फिर पार्टी को जयरामजीकी कर दें. ये भी सही है कि केशूभाई पटेल, सुरेश मेहता, काशीराम राणा ज्यादातर बूढ़े, अप्रभावी, जातिवादी और डरपोक किस्म के नेता हैं. पर अगर शंकर सिंह वाघेला की शह पर वे भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आ़डवाणी को ठेंगा दिखाते हुए पार्टी से बाहर चले जाते हैं, तो नमो का आधार कम होगा. दूसरा सीनेरियो ये भी है कि मायावती इस बार गुजरात की हर सीट लड़ना चाहती हैं. अगर वह कांग्रेस से साथ मिल जाती है, तो भी नमो को नुक्सान हो सकता है. अगर वे अकेली भी चुनाव लड़ती हैं तो भी दलित वोटों का जो 1.9 फीसदी उन्हें पिछली बार मिला था, इस बार बढ़ेगा.

वोट बैंक की सियासत तो लोगों को बांट कर चलती है. ये बंटवारा जब वर्टिकल यानी सांप्रदायिक होता है, तो ज्यादा ख़ून खराबा होता है, और जब होरिजोंटल यानी जातीय आधार पर होता है तो कम. उनका असर भी वैसे ही होता है. वोटिंग पर.

नमो का जीतना सिर्फ नमो के लिए ही नहीं बल्कि लालकृष्ण आडवाणी के लिए भी महत्वपूर्ण है उस दिन के लिए जब प्रधानमंत्री बनने का मौका आएगा. न जीतना सोनिया और राहुल गांधी के लिए जो यूपीए पर अपनी एकछत्रता और दिल्ली पर कब्जा बनाए रखना चाहेंगे.

नमो के समर्थक लोगों के मौन को शांति बता रहे हैं. ये कितनी दिलचस्प बात है कि जब हिंदुत्व का वोट पूरे देश से सिमट रहा है, गुजरात में ये अभी भी करंसी में है. करंसी में हैं इसीलिए ये सवाल भी कि क्या चुनाव से पहले गुजरात में दंगे होंगे ? क्या सत्ता के लिए हिंदुत्व फिर कुछ निहत्थे और उन औरत-बच्चे-बूढ़ों- लोगों की बलि लेगा, जिनके बारे में तय नहीं है कि वे ओसामा बिन लादेन और अल-जवाहिरी से वास्ता रखते ही हैं. कल रात को मैं अहमदाबाद के उस मुहल्ले में था, जिसे चारवाट कहते हैं. वह मुस्लिमों का मुहल्ला है जहां देर रात तक खाने पीने का बाजार चलता है. जब बाकी शहर में नवरात्रि और गरबे की धमक थी, पर यहां ऐसा कुछ नहीं था. भुरा फ्राय सेंटर में बैठकर कुछ लजीज भुना गोश्त खाते वक्त़ साथ खा रहे लोगों से बात की कि तो वे चुनाव से ज्यादा ईद को लेकर बातें कर रहे थे.

अजगर के साथी ने कहा दंगा नहीं होगा. इस साल यहां अच्छी बारिश हुई है. और इन लोगों को देखिए, कितने खुश हैं. चारवाट ईद की खुशनुमा गहमागहमी में व्यस्त था, जैसे शहर के दूसरे हिस्से दुनिया की सबसे बड़ी डांस पार्टी में.

दूरी एक नये तरह की नजदीकी है


मैं इन दिनों अपने आप से दूर हूं. और जब मैं अपने आपसे दूर हूं तो एक नई तरह से खुद को देखता हूं. खुद को ठीक से देखने के लिए जरूरी है थोड़ा दूर हो कर देख लेना ताकि फोकस ठीक रहे. जब हम खुद को ठीक से देख पाते हैं, तो क्या ये क्रिया (भले ही दूर से की गई हो) हमें अपने और क़रीब ले जाती है या दूर. तो क्या दूर हो जाना इतना बुरा है. कई ऐसा नहीं सोचते. दूर हो जाने का मतलब कहीं उस दुनिया से बाहर जाना है जिसपर आपका नियंत्रण नहीं है. दूर जाने का मतलब एक ऐसी दुनिया में जाना है, जिसके लिए अपने संस्कार खोने का खतरा है. समुद्र पार करने पर जात बाहर होने का भी. हम अपनी दुनिया को अपने शरीर की पंहुच से महसूस करते हैं. उसके परे जो भी है दूर है.


मूल सवाल ये है कि क्या दूर रहकर करीब हुआ जा सकता है. क्या दूरी एक नई नजदीकी है. जहां दूर जाने पर सारे खतरे हैं... बुरे ख्यालों के सच होने के, वहीं ये संभावना भी है कि आप अपने फोकस को फिर से एडजस्ट कर कई नये सत्यों को ठीक से देख सकते हैं. जैसे बहुत दिनों तक एक कंदरा में छुपे रहने के बाद जब मैं उस पहाड़ के सबसे ऊंची चट्टान पर गया तो मैंने जमीन से ज्यादा पृथ्वी देखी, तारों से ज्यादा आसमान देखा और देखा कि उस पृथ्वी और आकाश में वह हिस्से कितने अच्छे हैं जहां पर जीवन है. और खास तौर पर जीवन के वे हिस्से जो हमने जिये हैं.


अब जब नाखुश होकर जिंदगी को काटना हाई ब्लड प्रेशर और थॉयरायड की तरह आम और फैशनेबल हो चुका है, मुझे लगता है कि जिंदगी को जीने का एक ही मापदंड है. ये गिनना कि आपकी जिंदगी में कितने ऐसे पल आये, जो आपने सचमुच जिये, जो आपको जिंदा कर गये.


अव्वल तो ऐसे पल काफी मुश्किल से ढूंढ पाएंगे, क्योंकि जिए गये पल कोई निशान नहीं छोड़ते, पर फिर भी जोर डालिये याददाश्त पर, दिमाग पर. वे पल जिन्होंने आपको सबसे अधिक सघनता से जिंदा कर दिया हो. सुख में या दुख में. प्यार में, पैदा होने में, मृत्यु में, मिलने में, बिछड़ने में, वासना में, साहित्य में, ऐंद्रिकता में, ध्यान में. वे सारे पल जब आप ठहाके लगाकर हंस पड़े हों या फफक कर रो पड़े हों. वे सारे पल जो आपने सोखे हों. वे पल जो शिनाख्त़ हों आपके जिये की.


उनमें एक बात बहुत आम होगी. एक तो ये कि वे आयोजित पल नहीं होंगे. वे अनायास ही आए होंगे. वे सपने या यादों में नहीं वर्तमान में सघनता के साथ घटित हो रहे होंगे. (कभी सोचा है साहित्य और फिल्मों में सैक्स का चित्रण कभी भी वास्तविक जितना दिलचस्प नहीं हो सकता. वह चित्रण एक तरह का पलायन होता है, उस अहसास का जो हम भोग तो सकते हैं, जी भी सकते हैं, पर वहां पर खुद के अलावा किसी और को नहीं देख सकते और हम उसकी व्याख्या नहीं कर सकते. वह फर्स्ट पर्सन में ही महसूस किया जा सकता है. ऑरगैस्म की तरह जिये गये ज्यादातर पल व्याख्या के परे हैं. उनकी व्याख्या करने की कोशिश जिए को छोड़ना है, समझौता करना है एक जिंदा पल के जरिए मिली नेमत से) .


जब हम जिंदा पल गिनते हैं, तो एक आश्वस्तिबोध से भर जाते हैं. हमें जीवन में तरह तरह के आश्वस्तिबोध चाहिए होते हैं. नियंत्रण के. जरूरत के वक्त पर इंतजाम के. जब चाहे तब मिल जाने के. तयशुदा हो जाने के. जब तक नजदीक रहो ये आसान रहता है.


पर जब दूर हो जाते हैं तो ऐसा नहीं रहता. आशंकाएं घर लेती हैं. जिस अहसास से हम अपने आपके नजदीक हुए थे, वह अहसास बेकार जाने लगता है. ये अलग बात है कि वह अहसास पैदा करने में हमारी अपनी भूमिका कितनी निर्विकार थी. पर जब वह मुमकिन हो गया तो फिर करीब बने रहने की शर्त क्या दूरियों से टूट जाएगी.


नहीं. वह नये सिरे से खुद को अभिव्यक्त करेगी. दुनिया का पहला ख़त लिखने वाले मनुष्य की तरह. पहली लॉंग डिस्टेंस कॉल की तरह. पहले टेलिग्राम की तरह. एक उपन्यास और कविता की तरह. मेघदूत की तरह. उन सब में लिखा होगा कि आप दूर भले ही चले गये हों करीब बने हुए हैं. उनमें उन जिंदा पलों के लिए हमेशा प्रार्थनाएं होंगी, जिनमें मंत्र की तरह पढ़े गये नाम होंगे. उनका असर भी होगा.


वह हमारी किताबों में, बक्सुए में, दराजों में, आत्मा में एक सूखे ही सही फूल की तरह खुलेगा और घुलेगा. हमारे अपने अंधेरे में वे जिंदा पल जुगनुओं की तरह टिमटिमाएंगे.


जैसे ये जरूरी नहीं कि दूर होकर आप करीब नहीं रहेंगे, वैसे ही ये भी जरूरी नहीं कि पास रहकर आप सचमुच नजदीक होंगे. नजदीकी अपनी तरह की दूरियां पैदा करती हैं. रेल के डब्बे में. सराय में. इंतजार के लिए बनाए गये कमरों में. होटलों में. लिफ्ट में. मकान में. पड़ोस में. बैडरूम में. शरणार्थी कैम्प्स में. इनमें से कई ऐसे हैं जिनके साथ आपको जगह मिल बांट कर जीनी पड़ती है. एक सुविधा मजबूरी में भी बदल सकती है और एक मजबूरी सुविधा में भी. दूरी एक नये तरह की नजदीकी है. देखा जाए तो.

Monday, October 8, 2007

चे और जवानी में गये वे सारे जिंदा लोग

जवानी मे जाने वाले हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं।अरनेस्तो चे गुएवेरा की हत्या को चालीस बरस हो गये. वे आज भी युवा हैं. न सिर्फ युवा बल्कि पूंजीवादी हो चली पृथ्वी पर इकलौते कम्यूनिस्ट ब्रांड. एक बोहेमियन चेहरे, सिर पर बंदाना और न शेव की हुई दाढ़ी में चे उतने ही ग्लोबल लगते हैं जितन लेवी की जींस या हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकल. अगर मेरे नारको एनालिसिस में मुझसे कम्युनिस्ट लोगों के बारे में पूछा जाए तो चे का नाम मैं साफ साफ बोल सकूंगा. ( मुझे आज तक पता नहीं चल सका कि एजेंल्स था या एंगेल्स). उनकी मोटरसाइकिल डायरीज आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं जितने बीटल्स या एलविस. ऐसा क्या होता है युवापे में जाने वाले लोगों के बारे में जो हमें एक तरह से खुशनुमा कर देते हैं. ये बात चे में बहुत जबरदस्त तरीके से सामने आती है. मोटरसाइकिल डायरीज में वे एक बेहद मानवीय डॉक्टर के रूप में सामने आते हैं. दुनिया कैसे चे को देखती है अलग अलग जगहों पर अलग अलग निगाहों से - देखिये गार्डियन के इस लिंक पर - http://www.guardian.co.uk/news/gallery/2007/oct/05/internationalnews1?picture=330898543


वे क्रांतिकारी कैसे होते हैं जो पूरी उम्र जीते हैं. जिन उसूलों के लिए वे अपनी जवानी झोंकते हैं, बाद में उनका बुढ़ापा उनके कई समझौते करवा देता है. क्या आपको याद है पेरिस में यासिर अराफात के मरते वक़्त की तस्वीर या फिर फिदेल कास्त्रो को अपने मरने के अफवाहों के बीच बुढ़ापा काटना और अपने जिंदा होने के हलफनामे अस्पताल से जारी करना. गर्म ख़ून पर हमें कितना यकीन रहता है. वह जैसे और जिंदा होता तो सब कुछ बदल जाता. आज मैं सोच रहा था ऐसे लोगो के बारे में जो जरा जल्दी चले गये इस पृथ्वी से, पर अपनी छाप छोड़े बिना नहीं. हो सकता है आपके पास अपनी लिस्ट या नाम हों, तो इसमें कृपया जोड़िये-


  • जॉन एफ कैनेडी

  • डायना स्पेंसर

  • मर्लिन मनरो

  • राजीव गांधी

  • सुभाष चंद्र बोस

  • गुरूदत्त

  • दुष्यंत कुमार

  • धूमिल

  • स्मिता पाटिल


उल्लू आंखों वाली औरत और उसका सुखी परिवार

सुखी परिवार का मतलब मेरे लिए एक पोस्टर है जो मैं बचपन से देख रहा हूं. लाल तिकोन के साथ चार गोब्दू चेहरों का एक पोस्टर जो हर सरकारी अस्पताल और सार्वजनिक महत्व की जगह – जहां आप लघुशंका से लेकर पान की पीक से ग्रैफिटी बनाने का अदम्य इच्छा का निवारण कर सकते हैं- शोभा बढ़ा रहा होता है. ये चित्र इस कदर सामान्य है कि कोई इसे गौर से नहीं देखता. पर ये मर्फी रेडियो के बच्चे की तरह हमारी जिंदगी का सबसे आदतन हिस्सों में से एक है. आपने भी शायद इसे गौर से नहीं देखा होगा.


पर कल कोई सुखी परिवार की बात कर रहा था तो मुझे ये तस्वीर याद आई. गूगल इमेजेस पर ढूंढी तो ये तस्वीर ही मिली ब्लैक एंड व्हाइट किसी अमेरिकी यूनिवर्सिटी की प्रोजेक्ट रिपोर्ट से. आपके पास हो तो मुझे जरूर भेजिये. आभारी रहूंगा.


इस तस्वीर को गौर से देखिये. उस आदमी को याद करिये, जो शक्ल से बेवकूफ था, जिसका कोई कैरेक्टर नहीं था और आसपास से बेपरवाह. उसमें खुश होने की एक अजीब जिद थी. जिस नसबंदी के लिए उसे मॉडल बनाया गया था, उसके चेहरे से लगता था कि वह उससे भी बेपरवाह था. उसमें एक विलक्षण यकीन था कि सरकार सिर्फ उसके भले के अलावा और कुछ नहीं सोच रही. उसके मन में विश्वास था, कि सुखी परिवार के उद्देश्य से ज्यादा वह राष्ट्रीय हित और बीस सूत्रीय कार्यक्रम के लिए ऐसा कर रहा था. देश के लिए जिस तरह के बलिदान लिये या दिये जाते हैं, उसके मुकाबले ये कुछ नहीं था. उस तस्वीर को याद कर मैं सोचता हूं कि ये आदमी क्या काम करता होगा, तो कोई जवाब नहीं सूझता, पर बाद में वह इफको खाद के बोरों और विज्ञापन में फिर दिखलाई पड़ा. क्या वह कृषिप्रधान देश का किसान था, जिसे सब लोग विकास के नाम पर ठग रहे थे. आढ़तिया, पटवारी, अफसर, गुंडे, पुलिस, खाद-बीज के व्यापारी, मेले की छमिया, जमींदार के लठैत. अगर ऐसा था तो उसके चेहरे से इतनी खुशी कैसे टपक रही थी. उसके चेहरे को देखकर नहीं लगता कि उसे कुछ मतलब रहा होगा दुनियादारी, खुशी, ऐंद्रिकता, सैक्स, शराब, साहित्य और कविता से मतलब होगा. वह किसी भजन मंडली के उत्साही सदस्य की तरह दीखता है.


उसके साथ जो औरत थी, वह बहुत भैन जी टाइप की थी और उनके मूर्ख चेहरे की आंखें उल्लू जैसी थी. उसके चेहरे पर भी सरकार को लेकर भारी आस्था और यकीन पढ़ा जा सकता था. वे सोवियत जनता की तरह थी, जो जहालत के नरक में सड़ने और पकने के बावजूद व्लादिमिर इलिच और जोसेफ पर अटूट यकीन रखती थीं. वह एक प्री ब्यूटी पार्लर जमाने की कस्बाई औरत लगती थी, जिसने चेहरे पर एक मैकेनिकल मुस्कुराहट पहनी हुई है, और कानों में झुमके. जो मुसीबत के वक्त साहूकार के पास गिरवी रखने वाले जेवरात टाइप की है. पर वह परिवार छोटा है, इसलिए सुखी है और शायद ऐसी नौबत नहीं आएगी, ऐसा पोस्टर बनाने का फरमान करने वाली विकासशील देश की सरकार का मानना था. वह आज दोपहर में किटी पार्टी कर रही होगी और शाम को टीवी देख रही होगी. उसके हाथों ने देखा होगा गोबर थापने से लेकर ब्यूटी पार्लर में मैनीक्योर तक का सफर. पर नसबंदी के ऐवज में सरकार जो उन दिनों रेडियो बांट रही थी, उसमें इस औरत की दिलचस्पी जरूर रही होगी, ऐसा इसके डिजाइन को देखकर लगता है.


उनको देखकर लगता था, उनका कोई चरित्र नहीं हैं. मतलब ये नहीं वे चरित्रहीन हैं. चरित्ररिक्त. उनका जो व्यक्तित्व है, उसमें कोई चरित्र की गुंजाइश नहीं है. श्रीकांत वर्मा की एक कहानी में एक चरित्र बताता है कि मूर्ख औरतों के चेहरे बर्थडे केक की तरह होते हैं और मूर्ख मर्दों के मक्खन के लोंदे की तरह. ये दोनों शायद श्रीकांत की उपमा पर सटीक बैठते हैं.


उनके बच्चे भी हैं. वे सुबह जल्दी उठने वाले, बालों में तेल चुपड़ कर, समय पर होमवर्क, खड़े होकर राष्ट्रगान, कान में तिनका और नाक में उंगली न डालने वाले बच्चे हैं. वे जल्दी इसलिए सोते हैं, ताकि जल्दी उठ सकें ताकि सेहतमंद, अमीर और होशियार बन सकें. वे गंदी सोहबत में नहीं पड़ते. वे बचपन की गलतियों का खामियाजा जवानी में सैक्सोलॉजिस्ट्स के पास जाकर नहीं भुगतते. उन्हें अपने पहाड़े और प्रार्थनाएं और मैनर्स याद हैं. वे क्लास में सबसे आगे बैठते हैं, हर सवाल का जवाब देने के लिए अपने हाथ खड़े करते हैं, उनके कपड़े साफ हैं और नाखून कटे हुए. वे सुखी परिवार के बच्चे हैं.


ये एक निहायत ही घटिया डिजाइन है. जो संजय गांधी जैसे संविधानेतर सत्ता ने एक प्रकार की लोकतांत्रक तानाशाही के दौरान जनता को सुखी परिवार की परिकल्पना में था. सुखी वही जो संजय की समझ में आए. परिवार सुखी हो या न हो, पर सरकार ने तय कर दिया न, तुम सुखी हो. तो हो. जैसे गरीबी रेखा तय होती है. जैसे तय होता है कि कि तुम अपना चरित्र तुम्हें हीन ग्रंथियों से शिकार होने से नहीं रोक सकेगा, इसलिए सुखी होने का फॉरमूला चरित्र रिक्तता से होता है. न तो ये आदमी संजय गांधी है, न ये औरत मेनका और न ये बच्चा वरुण. क्या वह परिवार सुखी था.


क्या परिवार के छोटे होने पर सुखी होने की शर्त थोप दी गई ? क्या इस डिजाइन बनाने वाले ने बाद में आत्महत्या की ? क्या वह सुखी हो सका ? क्या उसे इफ्को में नौकरी मिली ? क्या बारिश की एक ठंडी रात उस किसान को अपनी हरित क्रांति के बीच अपनी पत्नी के सहवास करते वक्त ये लाल तिकोन याद रहा ? क्या संजय गांधी इन दोनों के बीच आ सका ? क्या वे रेडियो जो सरकार ने उस बार बांटे थे, आज भी खुश होकर सुखी परिवारों में बज रहे हैं ?


मुझे नहीं पता. आपको हो तो बताइएगा.



Sunday, October 7, 2007

जब जिंदा कौमें इंतजार करने लगती हैं तो स्वर्गीय कवि काम आते हैं..

(अनिल रघुराज के पोस्ट के जवाब में. पहले अनिल रघुराज का पोस्ट, फिर आस्तीन के अजगर का)


...तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है

अपने यहां कुछ लोग व्यक्ति को ही देश मान लेते हैं। कभी ‘इंदिरा इज इंडिया’ कहा गया था तो कुछ लोग आज भी मोदी जैसे अदने-से नेता के विरोध को राष्ट्र-विरोध बता डालते हैं। लेकिन देश और उसकी सुरक्षा के लिए ज़रूरी शर्त है कि उसमें रह रहे आम लोग मान-सम्मान, मानवीय गरिमा के साथ निश्चिंत होकर सुंदर जीवन के लिए संघर्ष कर सकें। आज ज्यादा कुछ कहने-लिखने की स्थिति नहीं है तो पाश की एक कविता पेश है ताकि हम देश की धारणा की ज्यादा मानवीय सोच पर पहुंच सकें।

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए
आंख की पुतली में ‘हां’ के सिवाय कोई भी शब्द अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझे थे कुर्बानी-सी वफा
लेकिन ‘गर देश आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों के फिसलते पत्थरों की तरह टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रही कीमतों की बेशर्म हंसी
कि अपने ही रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है
कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह धरती सींचेगी
मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है।।

Posted by अनिल रघुराज at 9:4

कोई छींकता तक नहीं मगध में

किसी मुश्किल वक्त़ में पंजाब पर लिखी कविता किसी दूसरे वक्त़ में गुजरात पर कितनी मौजूं है. सबसे अजीब और मुश्किल बात ये नहीं हैं कि गुजरात के गौरव के नाम पर एक शख्स जैसे चाहे वैसे लोकतंत्र के लाइसेंस का इस्तेमाल करता रहा है, मुश्किल बात ये भी है कि गांधी और सरदार पटेल का गुजरात चूं तक नहीं करता इस सबके खिलाफ. न बहस, न मोर्चाबंदी. क्या ये थोड़ी अजीब बात नहीं है कि ऐसे संगठन भी जिनके एक तिहाई से ज्यादा मैंबर मुस्लिम औरतें हो, और अहमदाबाद के दंगों की सीधी शिकार, और वे गांधीवादी मूल्यों पर इठलाते संगठन भी कुछ नहीं कहते. कांग्रेस के पास एक भी ऐसा तर्क या चुनौती नहीं, जो नमो जैसे व्यक्ति, विचार, धूर्तता, हत्या में नहीं तो हत्या की साजिश में शामिल सरकार के मुख्यमंत्री के विरोध में चुनौती दे सकें. अगर लोकतंत्र गुजरात में दम तोड़ रहा है तो इसलिए कि वह लोगों के पास विकल्प लेकर नहीं जा पा रहा. और विकल्प नहीं होंगे तो नमो तीसरी बार चुने जाएंगे. इस समझ के साथ कि लोगों ने उनके कामकाज पर अपनी मुहर लगाई है. जो लोग चुप है, जो शर्मिंदा है, जो आहत हैं, जिनके लोग मारे गये हैं, जिनके इज्जतें सरे आम नीलाम हुई है, उनकी आवाज कोई नहीं बन पा रहा. कोई बड़ी कोशिश भी नहीं कर रहा. पूरा गुजरात एक गज़ब किस्म की व्यवहारकुशलता दिखला रहा है. खास तौर पर अहमदाबाद.

एक श्रीकांत वर्मा की कविता है (हालांकि वे कांग्रेसी थे, पर उन्हें कहां पता था कि उनकी कविता नरेंद्र मोदी के गुजरात में फिट बैठेगी... और कवि शायद मनुष्य पहले होता है, पार्टी मैंबर बाद में)


हस्तक्षेप

कोई छींकता तक नहीं

इस डर से

कि मगध की शान्ति

भंग न हो जाए

मगध को बनाये रखना है, तो,

मगध में शांति रहनी ही चाहिए


मगध है तो शांति है


कोई चीखता तक नहीं

इस डर से

कि मगध की व्यवस्था में

दखल न पड़ जाए

मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए


मगध में न रही

तो कहां रहेगी ?


क्या कहेंगे लोग ?


लोगों का क्या ?

लोग तो यह भी कहते हैं

मगध अब कहने को मगध है

रहने को नहीं


कोई टोकता तक नहीं

इस डर से

कि मगध में टोकने का रिवाज न बन जाए


एक बार शुरू होने पर

कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप-


वैसे तो मगधवासियों

कितना भी कतराओ

तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से-


जब कोई नहीं करता

तब नगर के बीच से गुजरता हुआ

मुर्दा

यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है

मनुष्य क्यों मरता है ?