Tuesday, November 27, 2007

LOVE STORY # 544:खूंटी पर टंगी गिटार का दर्द वायलिन हो गया था

देहरादून का वह दूसरा शख्स था जिसने कहा कि उसने गिटार सीखने की कोशिश की थी. जवान होते लड़के शायद ऐसा सोचते हैं कि जिस लड़की को वे पसंद करते हैं, शायद उनकी बात गिटार के जरिये समझ लेंगी. पर उनका ध्यान गिटार पर कम होता है, लड़की पर ज्यादा. और इसलिए गिटार के जरिये कही जाने वाली बात उस लड़की तक अक्सर आसानी से नहीं पंहुच पाती. एक क्योंकि वह संगीत की भाषा है. दो वह संगीत ऐसा है, जो अभी सीखा जा रहा है. तीन लड़की के कान ऐसे पारखी नहीं है कि गिटार के शोर में से दिल की बात को छान कर अलग कर लें और लड़के की बात समझ लें. जब लड़की अरेंज्ड मैरिज कर लेती है, तो फिर वह भी गिटार क्लास छोड़कर दुनियादार होने के उपक्रम में शामिल हो जाता है. खूंटी पर सालों से टंगी गिटार ढलती हुई शाम में अपनी आत्मा को वॉयलिन होता महसूस करती है.

LOVE STORY # 545: जब तक यार, प्यार और कम्यूनिस्ट रहेंगे, कॉफी हाउस का जिंदाबाद रहेगा

इंडियन कॉफी हाउस अभी भी हैं और चल रहे हैं. अब वहां लोहिया टाइप के चश्मे या खद्दर पहने बैठे लोग कम दिखलाई पड़ते हैं. सिगरेट पीने की इजाज़त अब वहां नहीं है और इसलिए जो क्रांति श्रांति की बात की जाती थी, वह विमर्श के दायरे से बाहर हो गई है. इंडियन कॉफी हाउस में अभी भी नेहरू और दक्षिण की फिल्मी हिरोइनों की पूर्वज रागिनी के पोस्टर दीवारों की शोभा बढ़ा रहे हैं. नेहरू का गुलाब स्याह पड़ गया है और रागिनी के चेहरे का रंग उड़ चुका है. कॉफी हाउस अब बुद्धिजीवियों से ज्यादा बेढब टाई पहने सेल्स या मेडिकल रिप्रजेंटेटिव्स और प्रेमी जोड़ों का अड्डा हो चुका है. बाकी ज्यादातर लोग या तो सरकारी काम से आये मुलाजिम या फर्स्ट रेट लूजर्स.

इंडियन कॉफी हाउस का उत्तर और हिंदी भारत के लिए सबसे बड़ा योगदान ये है कि उसने कांटे छुरी की मदद से दोसा खाने की कोशिश करना सिखवा दिया. इस बदले हुए ग्लोबलाइज्ड संसार में ये योगदान किसी भी तरह से लार्ड मैकॉले से कम कर के नहीं आंका जा सकता. यह समझना मुश्किल है कि कांटे छुरी से खाना जाने बिना भारत आईटी जैसे क्षेत्रों में तरक्की कैसे कर पाता. और क्या यह महज संयोग है कि इंडियन कॉफी हाउस जिस बंगलौर से शुरू हुए, वर्ल्ड का फ्लैट होना भी वहींच से शुरू हुआ. फर्क सिर्फ इतना है कि ये योगदान खालिस स्वदेसी है भले ही आर्यों और द्रविड़ों को अलग देखने वाले नफरत के पुजारियों के फूले हुए नथुने इसमें भी कोई साजिश की बू महसूस करें. आज भी वह बाहर कुछ खाने पीने, पेट भरने का सबसे सस्ता, अच्छा और टिकाऊ ठीका है. इसलिए कॉलेज के लड़के लड़कियों, हारे हुए नेता और पेशे से परेशान पत्रकार अक्सर इंडियन कॉफी हाउस की टेबलों पर मंडराते दिखेंगे. अगर कॉफी हाउस न होते तो पता नहीं वे क्या कुछ कर बैठते. वे हमारी स्मृति में रेडियो, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों, भाप के इंजन, केतलियों की तरह प्राचीन और आशवस्तिबोध से भरे हुए हैं.
इंडियन कॉफी हाउस अभी भी एक बड़ा कॉपरेटिव है और अजगर सबसे ज्यादा मुरीद वहां काम कर रहे लोगों के सेवाभाव का है. बुर्राक सफेद कलफ लगी वर्दी अब तो फौजियों में भी देखने के नहीं मिलती और उनकी कलगी लगी पगड़ियां. इंडियन कॉफी हाउस को भारत में शुरू हुए इस अगस्त में पचास साल हो गये. इनके असर के मिसाल ये है कि चंडीगढ़ के सैक्टर 17 सिटी सेंटर में जब कॉफी हाउस के पास बरिस्ता खुला तो उसे अपनी दुकान बढ़ानी पड़ी. 1964 में खुले इस आईसीएच का भी स्टाफ दक्षिण का है और दोसे के साथ केचप देने के बारे में पूछ लेता है. जो पंजाबी लोग माइंड नहीं करते. इन पचास सालों में आईसीएच की हर टेबल के पास अपनी कहानियां होंगी बताने को. प्यार की, बगावत की, क्रांति की, तख्तापलट, धोखे, और उदासी की. हर बार टेबल एक नये दृश्य, एक नई नाटकीयता, एक नये प्रस्ताव, समझौते, बातचीत, संभावना के लिए तैयार होती हुई. कॉफी हाउस की एक टेबल के पास अजगर से कई गुना ज्यादा प्रेम कहानियां होंगी. गनीमत ये कि वे ब्लॉग नहीं करतीं. :-) :-) :-) कई जगह वे मूक और निरीह गवाह बदली जा रही हैं माधुरी दीक्षित के बदन की तरह मोल्डेड प्लास्टिक मेज- कुर्सियों से. कई जगह बेयरों की वर्दी उतनी उजली नहीं है. पर कॉफी हाउस हैं और जब तक दुनिया में प्यार, यार और कम्यूनिस्ट रहेंगे, कॉफी हाउस का जिंदाबाद रहेगा.
क्यों?

LOVE STORY # 546: हाथ पकड़ लिया, कहीं गुम जातीं तो कहां ढूंढते कैसे पहचानते

वे पूर्वज थे. चार पीढ़ी पहले के. तब मेरठ ही ज़िला था. उनकी शादी हुई तो उन्होंने एक दूसरे को पहले कभी नहीं देखा था. दिन में जब रौशनी होती, तो उनके मुंह पर घूंघट होता, घर के भीतर चहलपहल और सामूहिक परिवार का लिहाज. वह ज्यादातर खेत, आहते या बैठक में जहां औरतें झांक सकती थी, पर आ नहीं. शाम को जब वे साथ होते तो लैम्प की स्याह रौशनी होती. उनकी पहचान अंधेरे की ज्यादा थी रोशनी की कम. एक बार किसी काम से दोनों दिल्ली गये.चांदनी चौक में. वहां भीड़ थी. अजनबियत थी. उन्होंने कहा यहां घूंघट मत करो. वह धीरे से मान गईं. इक्के से उतरते हुए उन्होंने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया. कहीं गुम जातीं तो कैसे खोजते उन्हें, पहचानते कैसे. उनके अंधेरे की पहचान वहां कैसे काम आती. उनकी छोटी सी उंगलियों पर शर्म का पसीना था, उनके हाथों में जिम्मेदारी की पकड़. उन्होंने एक दूसरे की आंखों में देखा. लगभग पहली बार. वह मुस्कुराई. पहली बार इन आंखों में उनका मुस्कुराना दर्ज हुआ. चांदनी चौक से खरीदी चूड़ियों और माटी के इत्र की तरह ये निशानियां नई पहचान थी एक दूसरे से. एक लम्बी उम्र तक. परछाइयों की तरह हम तक.

Monday, November 26, 2007

LOVE STORY # 547:इच्छा का पिलपिला सेब और दुनिया के आखिरी आदम-हव्वा

तेरह साल हो गये उन्हें मिले. फिर जाकर उन्होंने शादी का फैसला किया. इस बीच दोनों की जिंदगियों में कई लोग आये, कई रिश्ते बनते बनते रह गये, कई छोटे रिश्ते बने जो टूट गये. कई बार घर वालों ने अरेंज्ड मैरिज की बात चलाई. वे सामने वाले शख्स को, रिश्ते को, नियति को, जन्मकुंडलियों को, दिल के अरमानों और दिमाग के तर्कों को अपनी कसौटियों पर कसते रहें. इस बीच बीच नदियों में पानी बहता रहा, ग्लेशियर पिघलते रहे, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती रही, बच्चे पैदा होते रहे, कैफे कॉफी डे नये नुक्कड़ों पर अपनी शाखाएं खोलते रहे. वे ऐसे ही सीसीडे पर एक दिन मिले. और बातों बातों में उन्हें पता चला कि दोनों ने अपने सारे परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन लगाकर देख लिये हैं. उनके सारे संभावित साथी या तो ब्याह रचा कर घर बसा चुके हैं या फिर ऐसी बीमारियों के शिकार हैं ( जैसे कैंसर या अकेलेपन या देवत्व) कि नियति के एटीएम पर शादी वाला बटन उन्होंने दबाना ही जरूरी नहीं समझा. इच्छा वाला सेब जो तेरह साल पहले उनके जहन में प्यार बनकर कौंधा था, अब थोड़ा पिलपिला होने तो लगा था, पर अगले किसी भी पल वह पूरी तरह से सड़ सकता था. उस पल से पहले तक उनके पास मौका था. उन्होंने एक दूसरे को कुबूल कर लिया. और सुनामी लहरों, एटमी धमाकों, गृह युद्धों, नरेंद्र मोदी और जॉर्ज डबल्यू बुश की नफरत के बाद की बची हुई दुनिया के वे आखिरी आदम और हव्वा थे.

Saturday, November 24, 2007

LOVE STORY # 548: नेरूदा की किताब देकर वह अमेरिका चली गई जिसमें वह कविता थी- टुनाइट आई राइट माई सैडेस्ट लाइन्स

वे जेएनयू में साथ थे. वह बंगाल का था. वह दिल्ली की पंजाबी. वह मस्तमौला थी. वह काफी चुप, गहरा और संवेदनशील. वह जिंदगी को अब और यहां में जीती थी. वह थ्योरीज बनाता था और सियासी तौर पर सही होने और रहने की कोशिश करता था. दोनों अकेले थे. पहले दोनों का अकेलापन मिला. फिर दोनों. साथ हो गया तो कुछ ही दिनों में साथ अकेलापन ढूंढने लगा. उसने उसे एक दिन पाब्लो नेरूदा की कविताओं का पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित पेपरबैक संग्रह सलेक्टेड पोयम्स बतौर तोहफा दिया जिसमें उसने लिखा- टू माई डियरेस्ट डी, विथ द लव ऑफ माई लाइफ, फ्रॉम टी. फिर कुछ ही दिनों बाद वह अमेरिका चली गई. कुछ और पढ़ने को बाकी रह गया था. कुछ और गढ़ने को भी. वह जेनयू में बहुत दिन अकेला रहा. वह अमेरिका में कुछ दिन अकेले रही. उसके अकेलेपन ने फिर उसके लिए साथ ढूंढ लिया था. उसने नेरूदा वाली वह किताब अपने एक दोस्त को दे दी. नेरूदा की उस किताब में नेरूदा के जीवनकाल की बहुत सारी कविताएं हैं. पर उनकी बेशकीमती प्यार वाली वे कविताएं बहुत कम, जो भीतर के रूमी को फ़ना होने के लिए जगाती हैं. उनमें अलग होने के बाद की एक कविता (टुनाइट आई राइट माई सैडेस्ट लाइन्स) है, जो दुनिया भर के प्रेमी लोग सबसे ज्यादा पढ़ते हैं. कविताओं की एक बेहतरीन साइट्स प्लेजियरिस्ट पर आप देख सकते हैं, कि सर्वाधिक लोकप्रिय कविताओं में इस लेटिन कविता के दो प्रारूप सातवें और छब्बीसवे नंबर पर हैं. और दोनों को जोड़कर वे सबसे लोकप्रिय कविताओं में संभवतः टॉप पर हों. पेंगुइन बुक्स की तरफ से जिसने भी इसमें कविताओं को छांटा है, वह कोई बहुत ही उसूल पसंद व्यक्ति जान पड़ता या फिर एकेडमिक, जिसने शायद अपने जिंदगी में भी अकेलापन ज्यादा भोगा था और साथ का सुख कम. उनमें क्रांति थी, सियासत थी, दुख था, पसीने, शराब, धुएं की मिलीजुली पब वाली गंध थी. उसमें धोखा था. ताज्जुब की बात ये थी कि नेरूदा की सुंदरतम प्रेम कविताएं 1973 में उस संग्रह में से लगभग गायब थी. संकलनकर्ता के चश्मे से गुजरकर जो कविताएं इस पैपरबैक ने विशेष भारतीय संस्करण में पंहुचाई थी, वह शायद जेएनयू के इस लड़के को ध्यान में रखकर छांटी गई थी. शायद अमेरिका जाने के बाद जब उसने नेरूदा की प्रेम कविताएं पढ़ी होंगी, तो उसे अपने तोहफे की वजह से उस जज्बात का अपराधबोध और हुआ होगा, जिसके कुहासे में उनका अकेलापन साथ हुआ था. वह उसे वे शब्द देकर गई थी जो उसके चले जाने पर वह कहना चाह सकता था. प्यार के बाद के अकेलेपन की वह महानतम रचना थी. है.

Friday, November 23, 2007

LOVE STORY # 549: मरलिन मनरो की कविताएं

मरलिन से प्यार करने वालों की कमी नहीं. बहुत कम मर्द लोग ऐसे होंगे जिन्हें मरलिन से, उसकी तस्वीरों से, उसकी अदाओं से कभी न कभी प्यार न हुआ होगा. बहुत कम औरतें होंगी जिनके अंदर एक मरलिन मनरो नहीं छिपी होगी. उससे बचना कितना मुश्किल है. और उसकी जिंदगी में प्यार के अलावा कितना कुछ था, दौलत, शोहरत, आर्थर मिलर, जॉन एफ, डिप्रेशन और आत्महत्या. इंटरनेट पर पढ़ी गई ये कविताएं पता नहीं मरलिन ने खुद लिखी या नहीं, पर जिसने भी लिखी हैं, शायद खुद को मरलिन समझ कर ही लिखी हैं. शायद खुद मरलिन ने ही. पता नहीं ये साहित्यिक विमर्श का हिस्सा बनने लायक हैं या नहीं, पर यहां आप पढ़ सकते हैं कि आयन रैंड ने क्या लिखा था मरलिन के मरने पर .
I
कभी मैं तुम्हें प्यार कर सकती थी
और कह भी देती
पर तुम चले गये
और फिर देर हो गई
फिर मुहब्बत एक भुला दिया गया लफ्ज़ हो गया
तुम्हें याद तो है न

II
ऐ वक़्त दया करो
इस थके हुए इंसान को वह सब
भुला देने में मदद करो
जो तकलीफदेह है
मेरा मांस खाते हुए
थोड़ा कम कर दो मेरे अकेलेपन को
थोड़ा ढीला छोड़ दो मेरे मन को


III
है कोई मदद करने वाला
मदद चाहिए कि मैं महसूस करती हूं
उस वक़्त जिंदगी को अपने करीब़ आते
जब मैं चाहती हूं

बस मर जाना

Thursday, November 22, 2007

LOVE STORY # 550: गृहस्थी का रेडियो, नौकरी का एसी

बहुत दिनों तक कोई नौकरी नहीं थी. उसने अपना रेज्यूमे कई जगह भेजा था, जिसमें उसकी अकादमिक उपाधियों का जिक्र था. साथ ही कम्प्यूटर में डबल स्पेस टाइप की गये हर कागज में उसका उद्देश्य भी था कि मौका मिला तो वह अपना सर्वश्रेष्ठ कर गुजरने को किस कदर बेताब है, किस कदर वह मरा जा रहा अपने भीतर की सकारात्मक ताकतों के उलाहने से चुनौतियों के सामने खड़ा होने और उनसे निपटने के लिए. नौकरी के लिए वह रोज भगवान से दुआ करता, मेल चैक करता, हफ्ते में दो दिन उपवास करता, और दूर कस्बे में रह रहे अपने मां बाप को ख़त लिखा करता कि संभावनाएं किस कदर उजली हैं. कुछ ही दिनों की बात है देखना, लिखता वह अपनी पत्नी को, जो अपने मायके में रह रही है, जब से वह बरकतुल्ला यूनिवर्सिटी भोपाल से नृतत्वशास्त्र यानी एंथ्रोपलॉजी में एम ए कर रहा था. बुंदेलखंड में अपने दिन काट रही रोज वह अपने उस पति के वायदे को अपनी याददाश्त से निकालकर झाड़ पोंछ कर वापस सजा देती थी. उसने कहा था कि वह उसके बिना नहीं रह सकता और नौकरी पाते ही उसे भोपाल शहर ले आएगा. कुछ ही दिनों की बात है, देखना तुम.

वह जब ये सब कर रहा था, तब वह दौर आ चुका था कि रोजगार ब्यूरो ने नौकरी दिलवाने का काम करना बंद कर दिया था. सिवा उनके जो रोजगार ब्यूरो के दफ्तर में ही काम करते थे. ये वह वक़्त था, जब नौकरियां उन सारी जगहों पर कम होने लगी थी, जहां रोजगार ब्यूरो की पंहुच हो सकती थी. सरकारी क्षेत्र, सार्वजनिक उपक्रम, नेहरू जी का समाजवादी अर्थव्यवस्था, ट्रेड यूनियन और खुद एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज नौकरियों के मामले में अपनी आप्रासंगिकता के चरम पर थे. मुश्किल वक़्त था. पर देखिये किस्मत किसे कहते हैं. अजगर से भी ज्यादा आलसी, मरे हुए की मुट्ठी से भी खाली, और भयानक अकर्मक खामोश ठंडे एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज ने उसे दरअसल एक चिट्ठी भेजी. जिसमें दरअसल और वाकई और सचमुच उसके लिए एक नौकरी थी.
मरहूम नवाबों के शहर भोपाल में जहरीली गैस फैलाने के मुआवजे के बतौर अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड से मिले पैसे से बने भोपाल गैस रिलीफ हॉस्पिटल में वह एक तारीख से मौरच्यूरी का नाइट शिफ्ट इंचार्ज था
. पिछले इंचार्ज को ड्यूटी पर नशे पर रहने और एक नर्स से बदतमीजी करने के आरोप में निकाल दिया गया था. तनख्वाह ज्यादा नहीं थी, पर उसके पास अब अपनी नौकरी थी. उसकी मुंहमांगी मुराद यही थी. और फिर ये सेमी गवर्नमेंट नौकरी थी. लगभग परमानेंट.
तो उसके पास खुश होने की एक वजह थी. उसने अपने घर चिट्ठी लिखी नौकरी मिलने की खुशखबरी - ख़त को तार और थोड़े का बहुत समझाने वाली चिट्ठी. बहुत साफ से नहीं बताया कि काम क्या है. पत्नी को लिखा कि वह जल्द से जल्द पुराने भोपाल में एक कमरा- किचन- शेयर्ड टॉयलेट वाली गृहस्थी संभाले. उसे आने में एक हफ्ता लगा, पर स्टेशन पर वह मुस्कुराई उसे देख कर. उसकी आंखों ने उसे बताया कि वह कितना फख्र करती है उस पर. ओह कितनी मुद्दत बाद. आखिरकार.
कई बार उसे दुख होता गैस त्रासदी के बारे में
. सुबह जब वह ड्यूटी खत्म कर घर जा होता तो ओपीडी में बुरका पहनी औरतों और खांसते बूढ़ों को देख. जब एक छोटी सी कमजोर लड़की को उस शाम मोरच्यूरी में लाया गया तो अपने आंसू रोक न सका और कहीं और देखने लगा. फिर एक औरत पेट से थी, जिसे ऑपरेशन थियेटर के रास्ते स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ चुकी थी.
उसके कमरे में बैठने के लिए कुर्सी, लिखने और रजिस्टर रखने के लिए एक मेज, पानी का जग और गिलास रखने के लिए एक साइड स्टूल, एक ढाई सौ वोल्ट का बल्ब और सीलिंग फैन था, जो हवा कम करता था और शोर ज्यादा. उस कमरे की छत ऊंची थी, पर वह हवादार नहीं था. और उस कंक्रीट की इमारत में वहां काफी गर्मी हुआ करती थी.
कई रातों में वह मोरच्यूरी के भीतर चला जाता था
. वहां पर तीन टन के दो अमेरीकी एसी लगे थे, जो बने मलयेशिया में थे. एक वहां कि ठंड से उसे काफी राहत मिलती. अमेरिकी पैसों से बनी इमारत और एसी की बयार से हिंदुस्तानी गर्मी से निकलता पसीना गायब हो जाता. वह ताजातर हो जाता. बदबू और पसीने से आज़ाद. वह सोचता उसे किसी और नौकरी की जरूरत नहीं है. वह खुद को किस्मत वाला समझता. वह मुस्कुराता. बाहर गलियों में अभी भी गर्म हवाएं घूम रही थीं, जमीन अभी भी तप रही थी. और कंक्रीट के फर्श और छतों से अभी भी भभका निकल रहे हैं.
अस्पताल के बाहर शहर पॉवर कट्स से जूझ रहा था
. दोपहर शुष्क, गर्म, पसीने से भरी होती थी, जब वह घर पर होता था. उस छोटे से कमरे में साथ खाना खाने के बाद, वह इकलौती चारपाई पर अपनी पत्नी की बगल में लेट जाता. वे बारी बारी से प्लास्टिक का हाथ वाला पंखा करते. वे एयर कंडीशनर की बात करते. उसकी बयारनुमा ठंडक वाले अहसास के बारे में. वे मोरच्यूरी के बारे में बात नहीं करते. न ही उस लड़की या उस औरत के बारे में जो पेट से थी. वह उससे कहता किसी दिन उसे दिखाने ले जाएगा. उस पॉवर कट में बैटरी से चलने वाला सरकारी रेडियो दो दशक पहले के फिल्मी गाने बजाता.

Wednesday, November 21, 2007

LOVE STORY # 551: न हाथों में हाथ लिया, न नज़रें चुराईं

वह दोपहर की शिफ्ट में अख़बार में बैठा काम कर रहा था. यकायक उसे लगा उसकी कुर्सी को किसी ने धक्का दिया है. पर कोई नहीं था. मुड़कर देखा तो किसी ने कहा अर्थक्वेक. उनका दफ्तर पहली मंजिल पर था. सभी बाहर भागे. वह अंदर की तरफ. जहां वह बैठती थी. फिर वे दोनों बाहर निकले. बिना हाथ में हाथ लिए. पर बिना नजरें चुराए. सिर्फ एक झेंप के साथ कि कहीं कोई देख लेता तो लोग क्या कहते. जान बचाने की सभी को फिक्र थी. किसी ने नोटिस नहीं किया. उसके बाद वह उस पर थोड़ा ज्यादा मरने लगी. और उसके लिए वह थोड़ा और कीमती हो गई.

LOVE STORY # 552: अबार्शन का रिश्ता

बीस साल बाद एक अमेरिकी रेस्त्रां की टेबल पर. मर्द शादीशुदा है. औरत तलाकशुदा. 20 साल पहले हिंदुस्तान में अधूरे छूट गये अध्याय के वे पन्ने पलटते हैं. वह कहता है तुम्हें आ जाना चाहिए था तब. वह कहती है तब हिम्मत नहीं थी अपने घरवालों को नाखुश करने की. दोनों ने उनसे शादी कर ली जिन्हें वे पसंद नहीं करते थे. शादी से पहले वह उसके बच्चे की मां बनने वाली थी. फिर अबार्शन. अब उसके कोई बच्चा नहीं. रिश्ते के अबार्शन के बाद भी उनके बीच अबार्शन का रिश्ता है. आगे के पन्ने खाली हैं. टेबल पर कांच की बहुत सी किरचें हैं तड़कती हुई. वह कह रहा था कि इस तरह अब मिलने का कोई खुशनुमा मतलब नहीं था. वह सोचती है - पर नहीं आते तो दिल में कसक कितनी रह जाती. वे अपने खाली पन्नों की तरफ लौटते हैं. पहले के और अब के खाली पन्नों में थोड़ा फर्क है. अब वे पुराने तकाजों वाले सीपिया टोन के नहीं हैं. वे उम्मीद की तरह साफ, उजले और बुर्राक सफेद हैं. अपने नये अध्याय की तलाश या इंतजार में नहीं. पर खुले दरवाजे वाले हवादार कमरे में.

फोटोः फ्लिकर- जैब

Tuesday, November 20, 2007

LOVE STORY # 553: ब्लाइंड डेट

दिल्ली के मौलाना आजाद मैडिकल कॉलेज के एक जनरल वॉर्ड. वे दोनों देख नहीं सकते. वह दर्द से कराहती हुई बिस्तर पर पड़ी है. उसकी रीढ़ में कुछ हो गया है. डॉक्टर जब इंजेक्शन लगाते हैं तो उसका रो रो कर बुरा हाल हो जाता है. पूरा कॉरीडोर उसकी कातर पुकार सुनता है. फिर पेनकिलर. फिर नींद. वह दिन में स्कूल में पढ़ाता है. और रात भर अस्पताल में उसके सिरहाने रखे स्टूल पर काट देता है. जब पेनकिलर और नींद की गोलियों का असर कम हो जाता है, वे बातें करते हैं. पैसों के बारे में. बच्चों के खाने के बारे में. स्कूल में हुई बातों और घटनाओं के बारे में. वह पूछती है उसके बाद बच्चों का क्या होगा. वह उसे रोकता नहीं. कभी वह जोरों से रोने लगती है. वह उसकी हथेली पर अपनी रगड़ता है. उनके दो बच्चे हैं और वे देख सकते हैं. वे दिन में उससे मिलने आते हैं जब एक और साथी दिन में ड्यूटी देता है. उसकी आती हुई मौत को उस वार्ड में फिनाइल की गंध की तरह वे महसूस कर सकते हैं. एक सुबह वह अटैंडेंट से बैडपैन मांगने जाता है. वह अटैंडेंट से कहता है, परदा लगा दो. बेपरवाह अटैंडेंट झल्ला कर कहता है- तुम्हें क्यों चाहिए परदा. वह अटैंडेंट का गिरेहबान पकड़ लेता है. और गालियों के बीच देर तक नहीं छोड़ता. कहता है अंधी होने का मतलब ये नहीं कि वह औरत नहीं है.

Sunday, November 18, 2007

LOVE STORY # 554: सिंगल होना जमाने का तकाजा था

पिछले साल बार्बी 57 की उम्र पार कर चुकी थी. असंभव फिगर रखने वाली बार्बी इन 57 सालों में अमेरिकी औरतों का एक तरह से दर्पण है. शुरु में वह अनपढ़ ब्लांड थी (ये फोटो 1959 का जेबरा स्ट्राइप्स वाली बिकनी पहन) , फिर थोड़ा पढ़ लिख गई. उसका जीवन अमेरिकी उपभोग विलास में डूबा रहा. उसका बेड रूम, किचन, मेक अप किट, वार्ड रोब.. (अगर आपकी बेटी होगी तो आप भी जानते होंगे कि बार्बी का पूरा विन्यास कितना पेचीदा और महंगा है). अमेरिकी औरतों की तरह ही वह एक दिन कामकाजी हो गई. वह टाइपिंग, ऑफिस असिस्टेंस क काम करने लगी. देखते देखते वह टीचर हो गई, और फिर डॉक्टर और कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिव. वह पूरी दुनिया में लड़कियों का स्टाइल स्टेटमेंट बन गई. उसके अवतार कई हो गये. देश काल के साथ उसका रंग, फिगर, कपड़े, तौर तरीके बदलते रहे. वह ब्लैक से लेकर जापानी और तमिल से लेकर पंजाबी में अवतरित हुई. जब मिडिल ईस्ट के एक देश ने बार्बी को अपने यहां ये कहकर बेचने से बंद कर दिया कि उसके रंग ढंग उनके यहां की भोली भाली लड़कियों पर बुरा प्रभाव छोड़ेंगे, तो उसने बुरका पहन लिया. उसका कारोबार बढ़ गया. उसकी लोकप्रियता भयानक बढ़ गयी. इतनी कि कहते हैं एक अब तो बुढ़ाने लगी सियासी साध्वी बिस्तर पर बार्बी के बिना नहीं जाती. एक्वा नाम के पॉप ग्रुप ने आई एम बार्बी डॉल ("You can brush my hair / Undress me everywhere") जैसे गाने लिखे, जिस पर लोगों को तो ज्यादा नहीं पर गुड़िया बनाने वाली कंपनी मैटल को काफी एतराज रहा. ख़ैर बार्बी की जिंदगी में एक मर्द का आना जाना लगा रहा. पिछले पांच दशकों से. उसका नाम केन है. अमेरिका में अब सिंगल औरतें शादीशुदा से ज्यादा हैं और लिव इन शादीशुदा जोड़ों से ज्यादा. 2004 में बार्बी ने भी केन को छोड़ सिंगल होने का फैसला किया. फरवरी 2006 में वे फिर साथ हो गये.

LOVE STORY # 555: कोर्ट नोटिस कपूरथला की अदालत में

श्री मोहन लाल, पीसीएस, मैरिज ऑफिसर कम एडिशनल डिप्यूटी कमिशनर, कपूरथला

सर्वसाधारण के लिए ऐलानिया सूचना

  1. माइकल रॉयस्टन शैंकलैंड पुत्र जॉन जेम्स फॉक्स शैंकलैंड निवासी एसएच 29, थैम एसवाल क्लोज, हाउंसलो टीडबल्यू3 4डीई यूके वर्तमान निवासी वीपीओ जैद ते भोलथ जिला कपूरथला, पंजाब , इंडिया उम्र तकरीबन 61 साल, रोजगार नौकरी ने अधोहस्ताक्षरी के समक्ष 18 अक्टूबर 2007 दरख्वास्त लगाई है कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत बलजिंदर कौर पुत्री श्री मुख्तियार सिंह पुत्र लाल सिंह निवासी वीपीओ जैद ते भोलथ जिला कपूरथला, पंजाब, इंडिया, उम्र करीब 23 साल रोजगार गृहिणी के साथ विवाह को मान्यता दें.

  2. सभी संबंधित की जानकारी के लिए मेरे दस्तखत और सील के साथ ये नोटिस जारी किया जा रहा है कि किसी शख़्स को ऊपर लिखे नामों वाले दूल्हा दुल्हन की कानून के तहत की जा रही शादी को लेकर अगर किसी तरह का एतराज है, तो इस अदालत के सामने निजी तौर पर या बजरिये वकील इस नोटिस के जारी होने के 30 दिन के भीतर पेश कर सकते हैं.

  3. मेरे दस्तखत और सील के साथ आज दिनांक 16 नवम्बर 2007 को जारी

सही/-

मैरिज अफसर कम एडीशनल डिप्टी कमिशनर, कपूरथला

(इंडियन एक्सप्रैस, चंडीगढ़ में 18 नवम्बर, 2007 को प्रकाशित)

LOVE STORY # 556: गले लगी सहम सहम भरे गले से बोलती वो तुम न थी तो कौन था

वह एक विचारक है. और यार लोग उसे बर्टी कहते हैं. एक कवि है जो इस विचारक से काफी प्रभावित है. लोग उसे टॉम कहते हैं. टॉम अमेरिका में अपने अमीर मां-बाप से बग़ावत कर इंगलैंड आ गया है. बर्टी उसे अपने बौद्धिक दायरे में लोगों से मिलवाता है. एरिस्टोक्रैटिक टॉम की भाषा, उसके तेवर, उसके छरहरे गबरूपन से दंग है. खास तौर पर विव- जो एक बड़े परिवार से आती है. बर्टी टॉम को हर तरह की मदद का आश्वासन देते हैं, क्योंकि जज़्बाती टॉम अभी आर्थिक तंगी का शिकार है. विव से एक दिन टॉम की शादी हो जाती है. बर्टी कहते हैं मेरा घर खाली पड़ा है, उस एक कमरे के मकान की बजाय तुम दोनों मेरे यहां क्यों नहीं रहते. बर्टी की बात आभारी टॉम और विव मान लेते हैं. जज्बाती टॉम अभी संघर्ष कर रहा है. इस बीच बर्टी विव को फुसला लेते हैं और उनके बीच अफेयर शुरू हो जाता है. साहित्य का नोबेल जीत चुके बर्टी की अपनी निजी जिंदगी इन दिनों उथलपुथल भरी है और उनकी पत्नी ज्यादातर वक्त़ उनसे दूर रहती हैं. बर्टी अकेले हैं. धीरे धीरे सबको इसका पता चलने लगता है. विव और टॉम दूर होने लगते हैं. इस बीच भावुक और जीनियस टॉम की पोएट्री और साहित्य की गहरी समझ उन्हें मशहूर प्रकाशक फेबर एंड फेबर का एडिटर बनवा देती है. वह अमेरिका लौटता है और अपने वकीलों से कहता है कि मुझे निजात दिलवाओ इस औरत से. इस बीच बर्टी और विव का अफेयर खत्म हो जाता है. विव अपने विलासी अकेलेपन में अपना मानसिक संतुलन खो रही है. टॉम को उसकी महान और विश्वयुद्ध के बाद की कविताओं के लिए नोबेल मिलता है. एक बार टॉम इंगलैंड आता है अपनी किसी किताब के विमोचन या साइनिंग के लिए. विव यकायक वहां आ जाती है. दोनों गले लगते है. विव थोड़ा दूर हटती है. और अपने कुत्ते को टॉम पर छोड़ देती है. ऐसा क्यों है कि टीएस इलियट (वेस्ट लैंड) को पसंद करने वाले लोगों को आम तौर पर बर्टेंड रसल (मैरिज एंड मॉरल्स) रास नहीं आते?

Saturday, November 17, 2007

LOVE STORY # 557: इतने भारी कदम, इतनी लम्बी पगडंडी

गोल मार्केट के बस स्टॉप पर पांच घंटे से वह बैठा है. उसने उससे दफ्तर में मिलने से मना कर दिया है. बाहर धूप है. और लू भी. बहुत देर तक वह बसें गिनता है. नीली और सफेद बसें. हरी डीटीसी बसें. आते जाते लोग. कभी रेले में. कभी छितरे हुए.
फिर वह आती है
.
'तुम गये नहीं
।'
'हां मुझे लगा तुमसे यहां बात हो सकती है।'
'ऐसी क्या बात है?'
'कुछ है जो तुम्हें भी पता है
, तुम्हारे दफ्तर में नहीं हो सकती थी'
'अच्छा बता भी दो'

'देखो मुझे तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए
. मुझे पता है तुम कहीं और इनवॉल्व्ड हो. पर मेरे दिल पर एक बोझ है जो शायद तुम्हें कह देने से हल्का हो जाएगा. और वह ये कि मुझे लगता है, मुझे तुमसे प्यार है. और इस वक्त़ तुमसे प्यार पाने की नहीं, बल्कि तुम्हें ये बताने के लिए मरा जा रहा था. अगले ठहरे हुए पल में बसें फिर भी आती रहीं. वह मुड़ा और चल पड़ा. सबसे भारी कदमों से, सबसे लंबे रास्ते पर. दिल्ली शाम में घुल रही थी.

Photo: flicr/spottedowlet

LOVE STORY 558: डायल अ गुड स्पर्म

'हलो दिस इज लिज फ्रॉम एडोनिस स्पर्म बैंक. आपकी क्या सेवा कर सकती हूं?'
'मैं आपके बैंक से स्पर्म खरीदना चाहती हूं. कोई ढंग का सा।''
क्या आप शादीशुदा हैं?'
'जी, पर हमने फैसला किया है कि हम एक ऐसा बच्चा नहीं पैदा करना चाहते, जिसकी परदादी दिल के दौरे से मरी थी और नाना डायबिटीज से। '
'आपके पति का स्वास्थ्य कैसा है?'
'अच्छा है. 35 की उम्र में वे चुस्तदुरुस्त हैं।'
'आपका वैवाहिक जीवन कैसा है?'
'अच्छा है. बहुत प्यार करते हैं मुझसे।''
माफ कीजिएगा थोड़ा प्राइवेट सवालों के लिए.... सैक्स लाइफ?'
'रॉकिंग!!'
'ओके थैंक्स.. आपको किस तरह का पिता चाहिए अपने बच्चे के लिए.. एथलीट, साइंटिस्ट, हॉलीवुड स्टार, अमीर इंडस्ट्रियलिस्ट..'
'और हां! मेरी एक दोस्त है, उसने शादी नहीं की है. आगे भी वह अकेला रहना चाहती है. क्या उसके लिए भी'

LOVE STORY # 559 : फिनिश्ड

बहुत समय पहले टेलीग्राम हुआ करते थे. एसएमएस और ईमेल से बहुत पहले. आदिम नगाड़ों के बहुत बाद. एक दिन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को एक तार मिला जिस पर लिखा था- फिनिश्ड. उससे पहले एक शादीशुदा औरत थी. उससे पहले ब्रह्मचर्य से लड़ता एक शादीशुदा महात्मा था. महात्मा सरला देवी को अपनी जिंदगी में देवी और महाशक्ति मानता था. उस तार से पहले आज़ादी के लिए इंतजार करता एक मुल्क था. उम्र थी. एक बीवी और चार बेटे थे. उनमें से एक बेटे ने अपनी पत्नी से एक रात कहा- तबाह होने से बच गया बूढ़ा.

Friday, November 16, 2007

LOVE STORY # 560 :शताब्दी में फोन पर- तुम साले मर्द

नहीं तुमने मुझे देर रात फोन क्यों किया. मेरे पैरेंट्स सुन लेते तो. और तुम मेरे दोस्त होना चाहते हो. क्यों मुझमें ऐसा क्या खास है. और दोस्ती के लिए अलग से मिलने की क्या जरूरत है. सबके साथ मिलो. तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है. सिर्फ दोस्ती नहीं हम्म्म दोस्ती से ज्यादा कुछ चाहते हो. पर कमिट नहीं करना चाहते. क्यों मैं कोई टाइम पास हूं. नहीं ऑफिस में फोन करने की जरूरत नहीं है. तो मैं फोन करूं. क्यों करूं. देखो मुझे नहीं पता तुम चाह क्या रहे हो. दोस्ती और उससे ज्यादा कुछ और. क्या ज्यादा कुछ और. तुम साले सारे मर्द होते ही ऐसे हो. सुनो मैं तुम्हें बाद में फोन करती हूं. अभी सिगनल वीक हैं.

LOVE STORY # 561 :तमन्ना अब तुम कहां हो


बड़ौदा यूनिवर्सिटी का बड़ा सा गुम्बद है. देश में दूसरे या तीसरे नंबर पर. कभी तमन्ना यहीं आया करती थी. 2004 में एक पंजाबी आर्किटैक्ट को उस गुम्बद के रीस्टोरेशन का ठेका मिला. आज वह उससे भी बुरी हालत में बताया जाता है जहां से रीस्टोरेशन की शुरूआत हुई थी. अब इसके भीतर जाना मना है, पर कैम्पस के नौजवान लड़के लड़कियां शायद यहीं मिला करते थे. तमन्ना उनमें से एक थी. किसी ने इस डोम के भीतर दीवार में उसका नाम कुरेदा था. साथ में साल भी लिखा था. 1949 ईस्वी. भारत के आजाद होने के दो साल बाद. भारत के गणतंत्र होने का साल. ५० साल से गुम्बद की भीतरी दीवार पर दर्ज तमन्ना का नाम भी एक तरह से पुरातात्विक महत्व का ही है. पर सरकार, उसके माहिर और ठेकेदार शायद ऐसा नहीं सोचते. पुरातत्व महत्व के इस गुम्बद को बचाने के लिए जो लीपापोती शुरू हुई उसमे तमन्ना का नाम और उस नाम लिखने के पीछे का अमरप्रेम भी आ गये. तमन्ना अब पता नहीं कहां हैं. पता नहीं उसकी शादी इस नाम उकेरने वाले से हुई या नहीं. उसके नाती पोते हुए या नहीं. अपने पोपले मुंह के लिए उसने नकली दांतों का ढंग का सेट बनवाया या नहीं. तमन्ना पता नहीं अब कहां है. पर खबर ये है कि चूने की फिलिंग ने 50 साल से उसका लिखा हुआ गुम्बद पर से नाम को लीप दिया है. साथ में दिल का वह निशान भी, जिसमें एक तीर घुप रहा था.

Thursday, November 15, 2007

LOVE STORY # 562 : शादी कर लो मुझसे

उसने कहा सब सवाल कर रहे हैं. घर में. दफ्तर में. मोहल्ले में. मां को पता चल गया है कहती हैं बिरादरी के बाहर जाकर नाक कटवाएगी क्या. हां मैं तुम्हें बहुत चाहती हूं. पर और इंतजार नहीं कर सकती. मुझे भगा कर ले जाओ. शादी कर लो मुझसे. पढ़ी लिखी हूं. नौकरी कर सकती हूं. जीना मुश्किल हो जाएगा ऐसे तो. अगली सुबह रायपुर की रिंग रोड पर सैर करने निकले बूढ़े बात कर रहे है एक खुद कुशी की. नाम उस लड़के का था. वह शायद डर गया था. और वह हार गई थी. अगली सुबह एक और खुदकुशी की खबर थी. शाम को जिस बिजली के खंबे के पास वे झुटपुट अंधेरे पर मिलते थे, वह अब रौशन हो चुका था.
फोटोः फ्लिकर, लीसी

LOVE STORY # 563 : कुंदेरा की किताब

तब वह 16 की थी. आज वह 31 की है. क्लास में एक किताब पर प्रोजेक्ट लिखने का काम मिला था. उसने लाइब्रेरी में देखा तो अचानक उसके हाथ लगी- अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बींग. उसने वही किताब इशू करवा ली. इसलिए नहीं कि वह मिलान कुंदेरा का नाम जानती थी. बल्कि इसलिए कि उससे पहले जिस लड़के ने वह किताब इशू करवाई थी, वह उस पर मरती थी. वह किताब उसने दो बार पढ़ी. किताब उसे पसंद आई. फिर वह लड़का और भी ज्यादा. दोनों की शादी हो गई. बाद में एक दिन उसने उस लड़के से पूछा तुम्हें कैसी लगी कुंदेरा की वह किताब. कौन सी किताब, लड़के ने पूछा. अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बींग, तुमने इशू करवाई थी न बुक प्रोजेक्ट के दौरान स्कूल में.
आह! वह ! हां इशू करवाई थी. पर पढ़ी नहीं.

Tuesday, November 13, 2007

मिलावटी लोकतंत्र की मसीहा बेनजीर भुट्टो

139 लोग मर गये. बदहवासी का आलम कुछ इस कदर फैला कि देखते देखते इमरजेंसी लग गई. एक हारते हुए जनरल और कुछ अकड़े हुए न्यायाधीशों के बीच हो रही इस अफरातफरी में पीपीपी की नेता बीबीबी (बेग़म बेनज़ीर भुट्टो) का मेकअप तक नहीं बिगड़ा. और अपनी जमीन पर आठ साल बाद इतनी धमाकेदार एंट्री नहीं हो सकती थी. कुछ ही घंटे हुए थे बीबी को पाकिस्तान पंहुचे हुए. कुछ ही मिनट हुए थे बख्तरबंद गाड़ी का ढक्कन बंद किये हुए. और अब इमरजेंसी के परदे में लोकतंत्र पाकिस्तान में वापस लाया जा रहा है, पिंजरे में आजादी की तरह. और जॉर्ज डबल्यू और कोंडी इस बारे में अपने बोर्ड ऑफिस चिंताओं से दुनिया को अवगत करा रहे हैं.

लंदन के टेलिग्राफ में एक तलाकशुदा जोड़े (इमरान और जेमिमा ख़ान) ने बेनजीर के बारे मे अपनी राय लिखी है, जिससे मुताबिक एक तानाशाह जनरल से सांठगांठ कर बीबी पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट को एक ऐसा मुखौटा उधार दे सकती हैं, जिसमें ऑक्सफोर्ड का लहजा, औरत का ब्यूटी पार्लर लावण्य, कट्टरपंथियों से परहेज और शासक वर्ग का दबका शामिल है. ये अमेरिका से लेकर पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट के नाम से मशहूर फौजी, जमींदारों और अमीरों के शासक वर्ग को सूट करता है. अदालतें कुछ अकड़ दिखला रही थी, उन्हें एक झटके में ठीक कर दिया गया. आखिर वह कौन होते हैं पाकिस्तान का भला चाहने वाले. मियां नवाज शरीफ पता नहीं दुबई या लंदन में हेयर ट्रांसप्लांट करवाने के बाद भी इसमें शायद किसी को मुआफिक नहीं गुजरते. क्या यह अमेरिकी इशारों पर हो रहा है, ये समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है. बेनजीर ने मुशर्रफ के साथ होकर खुद को एसेसिनेशन का निशाना बनाया है और उसकी दिक्कतें कम नहीं होने वालीं, ये कहना है इमरान खान का। कल जो नवाज शरीफ का तख्तापलट कर रहा था, आज अपना तख्ता बचाने के लिए बीबी के आगे दुहरा हुआ जा रहा है.

मतलब फरेब किस कदर है. सभी झूठ बोल रहे हैं. सभी का इस झूठ में हित है. लोकतंत्र की इस गा़ड़ी में सवार लोग अपने सामान के लिए खुद जिम्मेदार हैं. आज बेनजीर को रैली पर निकलने से पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया गया. फोन पर वह जिस तरह की चाशनी आवाज में इमरजेंसी और मुशर्रफ का जिक्र करती हैं, तो उनकी साउंड लैग्वेज (पाकिस्तान में औरतों की बॉडी लैंग्वेज के बारे में बात करना मना है, वैसे भी बेनजीर टीवी पर अपनी आवाज सुना रही थीं) से उनकी खुशी साफ झलक रही थी. इस खुशी की कितनी सारी वजहें हैं. एक तो वे अकेली मैदान में हैं इसिलए उनका जीतना आसान है. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप जो थे, अब वापस लिये जा रहे हैं. उनके पति आसफ अली जरदारी यानी मिस्टर टैन परसेंट को फिर से छूट होगी लूटने की. नवाज शरीफ शायद चुनाव के बाद भी पाकिस्तान से बाहर रहेंगे. नये जज और इस्टैबलिशमेंट बेनजीर के पक्ष में रहेंगे. अमेरिका और पश्चिम के देश भी. बेनजीर उनके हाथ में कठपुतली होंगी और वे बेनजीर के थोड़े मोड़े लालच की तरफ से पीठ कर लेंगे. और सब कुछ अवाम के नाम पर.

सिंध प्रांत के दूसरे कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी हैं जो हिंदुस्थान के प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं, ऐसा यकीन करने वालों की कमी नहीं. बेनजीर की तरह उनकी 'रथयात्रा' ने भी काफी तबाही मचाई थी. कल किसी ने नंदीग्राम को जैसे ही किसी बुद्धिजीवी टाइप ने गुजरात और बुद्धदेव को नरेंद्र मोदी बताया तो वे आज बंगाल पंहुच गये सुषमा स्वराज के साथ और कहने लगे राज्य सरकार ही लोगों को मरवा रही है. अब ये ममता या दूसरे लोग कहें तो समझ में आता है. पर नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े हिमायती बनने वाले और तहलका एक्सपोज के बाद से मुंह में दही जमा कर बैठे लालकृष्ण आडवाणी इस तरह की बात बोलने लगते हैं तो समझ लीजिए कि आडवाणी छाप हिंदुत्व के छद्म के पीछे मूल्यों और नैतिकता की किस कदर मिलावट है. क्या मिलावट दक्षिणपंथ और इन दो सिंधी नेताओं का मूल गुण है?


photo credit : poetrazi1/ flickr

Sunday, November 11, 2007

तुम्हें लगा यही अंत है

और तुम्हें लगा कि अब यही अंत है. और ये सच भी था. चाय के अधूरे गिलास में. धुंधुआती शाम में. गले में लिपटे मफलर और बालों में चुपड़े तेल में. तुम्हें लगा कि इंतजार बेकार है. तुम्हें लगा कि रिश्ता नियम, शर्तों, वादों की तरह एक आयाम रखता है और इन कसौटियों पर उतरने पर ही वह खरा है. नहीं तो सिक्कों की तरह खोटा. और दुनियादार घोषणापत्रों की तरह झूठा. और भाप के बहुत देर बाद चाय के गिलास की तरह अधूरा, ठंडा, बेबस. एक स्टिल लाइफ पल में तुम्हें लगा कि कुछ और जरूरी काम हैं जिंदगी के इसलिए उठ लेना चाहिए. या फिर ये कि भीतर की दुनिया में जो चल रहा था, उसके लिए बंद कमरों, खिंचे हुए परदों की जरूरत थी. ये नाकाबिले बरदाश्त था कि बाहर की दुनिया उसकी तमाशबीन बन जाए. शाम को जैसे सूरजमुखी झांकते हों बाहर के अंधेरे से खिड़कियों की भीतर रौशन कमरों को और ताड़ते हों कि इस वक्त़ शौपेन की कौन सी स्वरलहरी फिजा और जहन में तैर रही होगी. तुम्हें उस स्पॉट लाइट से एतराज था जो अब तुम्हारी तरफ घूम रही थी. तुम्हें खुशी थी जब तक तुम तमाशबीन की तरह ताली बजा सकते थे, दाद दे सकते थे, दूसरों के लिए खुश हो सकते थे. पर नजर और नजारे और नजरिये के बीच एक इंटरप्ले है, जो एक दूसरे से मंच, पात्र, रौशनी, फोकस बदलते हैं, ताकि एक गतिशील अनेकांत प्रतिष्ठित हो सके, उस रिश्ते के इर्द गिर्द- जिसकी अपनी जिंदगी है, अपनी नियति. अपनी जैविक यात्रा. जो जिंदगियों से अलग है, जिनके बीच वह बना है. तुम उठे और चल दिये. मैं देखता रहा थोड़ी देर तक चाय के उस पूरे न पिये गये ठंडे गिलास को. और मेज पर यकायक जम गई बहुत सी बर्फ को. तुम्हें लगा यही अंत है. इस अधूरेपन का. जिंदा दिल और दुनियादार दिमाग की लड़ाई का. तुम मौत से इस कदर ख़ौफ जदा हो गये कि तुमने जिंदगी पर दांव खेलना छोड़ दिया. बारी आई तो कह दिया - पास. तुमने जिंदा रहने की जुम्बिश को नींद की गोली और खुदकुशी के सपनों के बीच कहीं थपकी देकर सुला दिया. हो सकता है अब तुम इस दृश्य में न लौटो. पर ये दृश्य कितनी बार लौटेगा इस रिश्ते की स्मृति, सपने, तुम्हारी कविताओं और अगले उपन्यास में. और तुम्हारे न चाहने पर भी सीलन के धब्बों और खंडहर दीवार पर फर्न की तरह अपने जिंदा रहने और होने का एलान करता रहेगा.

Thursday, November 8, 2007

मोदी मियां मुशर्रफ

गुजरात और पाकिस्तान दोनों लोकतंत्र के रास्ते पर हैं. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ का नाम नफरत का मंत्र की तरह पढ़कर पिछले चुनावों में नरेंद्र मोदी ने गुजरात की सत्ता को साध लिया था. आज दोनों एक ही नाव पर सवार हैंदोनों मे जो समानताएं हैं वे काबिले गौर हैं-
  1. दोनों ही जम्हूरियत को अपनी सुविधा से तोड़मरोड़ते हैं.
  2. दोनों ही नफरत के पुजारी हैं.

  3. दोनों ही अमन का हवाला देते हैं.

  4. दोनों राजधर्म का पालन करने से बेइंतहा परहेज करते हैं.

  5. दोनों ही इस्लामी कट्टरपंथ के विरोधी बनते हैं,

  6. पर वही उनके अस्तित्व की बुनियादी जरूरत है.

  7. दोनों ही लोकतंत्र के चौथे पाए यानी मीडिया पर परदा डालने की कोशिश करते हैं ताकि कहीं सच सामने न आ पाए.

  8. दोनों ही विकास के बगुलाभगत बनते हैं, जबकि लोगों की राय ऐसी नहीं.

  9. दोनों ही शहरी मध्य वर्ग को अपना वफादार पाते हैं.

  10. दोनों कानून और अदालतों को धता बताने की कोई कसर नहीं छोड़ते.

  11. दोनों अफसरशाही का इस्तेमाल जब-जहां-जैसे-जी-में-आया वैसे कर देते हैं.

कुछ असमानताएं भी हैं-

  1. मुशर्रफ को अमेरिका में घुसने दिया जाता है.

  2. मुशर्रफ एक फौजी, कमांडो और जनरल भी है.

  3. मुशर्रफ मोदी से कहीं ज्यादा सिक्यूलर है.

  4. मीडिया पर रोकटोक लगाने से पहले मुशर्रफ देश पर इमरजंसी लगाता है.