Sunday, December 23, 2007

LOVE STORY # 542: आख़िर ऐसा कब तक चल सकता था

आख़िर ऐसा कब तक चल सकता था? एक दिन मवेशियों के लिए चारा काटते वक़्त उसका हाथ कट गया और दर्द से बेहाल उसे कटे हाथ के साथ एक बडे शहर के अस्पताल ले जाया गया। वहाँ उस वक़्त एक अच्छे सर्जन ने उसे देखा और पाया कि कटा हुआ हाथ वापस नहीं जोडा जा सकता है। पर उस पर एक्सीडेंट में मारे गए एक शख्स के हाथ को ट्रांसप्लांट करने में वे सफल हो गए। काफी रिसर्च, मेहनत, सब्र और खर्च के बाद। हाथ वापस मिलने की ख़ुशी हर किसी को थी। वह गाँव लौट आया और झटके के बाद कि ज़िंदगी को वापस ढर्रे पर लाने कि कोशिश करने लगा। उसकी बीवी और वह दुआ करने लगे कि अब सब जल्दी से ठीक हो जाये। वे अब डरने लगे थे कि कहीं अब कुछ और अनिष्ट न हो जाये। अगले माह, अगले हफ्ते, अगले दिन, अगले पल। वे एक दूसरे को ढाढस बंधाते कि भगवान पर भरोसा रखो, कुछ नहीं होगा। ये तनाव उन्हें और करीब लाने लगा।
जब वह उसे छूता तो दोनो को पता होता कि छूने के पीछे मंशा आश्वस्त करने की है। पर जल्द ही उन्हें अपने बीच कुछ असहज लगने लगा। उनके बीच कोई तीसरा था। कई दिन बाद वह उसी शहर वापस लौटा, उसी अस्पताल और सर्जन से कहा, ये हाथ वापस करना है।

Wednesday, December 5, 2007

LOVE STORY # 543: लंबे समय से इतना अच्छा था कि असामान्य लगने लगा था

उस गांव में वे सालों से साथ थे. उन्होंने साल गिनने बंद कर दिये थे. वह अपना मायका भूलने लगी थी और मायका उसे. उनके बड़े होते बच्चे थे. वे इतने सालों से साथ थे, कि दोनों का बोलना, चालना, चलना, हाथ हिलाना, चुप रहना, दुख की लकीरें और खुशी की चमक भी एक जैसी हो चुकी थीं. उनकी शक्लें भी मिलने लगी थीं. आपको शक़ हो सकता था कि कहीं वे भाई बहन तो नहीं. सब कुछ इतने दिनों से इतना ठीक चल रहा था, कि लग रहा था कि कुछ असामान्य है. टीवी तब आया नहीं था और इसलिए उनकी जिंदगी में कुछ भी नाटकीय नहीं था. आखिर ऐसा कब तक चल सकता था ?