Thursday, July 10, 2008

LOVE STORY # 532: पहले संगीत तैरता था फिर सिसकियाँ

वे पड़ोस में नए थे. बड़े खुशनुमा से लोग. कभी भीतर तो नहीं गए उनके मकान में, पर फिर भी लगता था कि उनके ड्राइंग रूम में किताबों का रैक होगा और उनके बिस्तर के सिरहाने भी दो एक किताबें होती होंगी. ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि उनके किवाड़ और खिड़कियों से तैरता हुआ संगीत भला भला सा था. पश्चिम का शास्त्रीय संगीत. चैकोवोसकी का स्वैन सॉंग या फिर शोपेन की सिम्फोनी. देर शाम को मेरे किवाड़ की झिरी से बहुत मद्धम सा वह संगीत तैरता था तो लगता था कि ये लोग गहरे हैं और अच्छे शौक वाले भी. पर ऐसा हमेशा नहीं था. कई बार संगीत रुक जाता था. तो किसी की तेज सिसकियों की आवाज़ आती थी. और कई बार सिगरेट की गंध भी.

6 comments:

vimal verma said...

आप बिम्बों का अच्छा इस्तेमाल करते हैं,कुछ शब्दों में इतनी सारी बात समाई रहती है कि क्या कहें? बहुत खूब.......

ये सूरत बदलनी चाहिये... said...

कई सारे प्रश्न हैं. क्या मर्द सिसकियाँ नहीं ले सकता? या औरतें सिगरेट नहीं फूकतीं?आपको शराब की बू क्यूँ नहीं आई?मारने -पीटने, चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें? अच्छा खासा मसाला हो जाता नारी मुक्ति वालों के लिये...
सच मानिये मियाँ अजगर, आप पहले जैसा नहीं लिख पा रहे आजकल.

Anonymous said...

itna sab itni der se likhte hain aap ki lay hi tooti hui jaan padti hai lagta hai aap gahri nirasha se gujar rahen hai sangeet beete samay kaa sunte rahen

ravindra vyas said...

आपके लिखे पर कुछ लिखा है। उसकी लिंक दे रहा हूं। दूसरे भी शायद पढ़ना चाहें। ये रही लिंक।
http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0805/23/1080523008_2.htm
इतने दिन कहां गायब रहे।
रवींद्र व्यास, इंदौर

आशीष said...

dil ke karib

Anonymous said...

......and then silence.....so loud you could drown in it....so loud it could shatter.......