Wednesday, September 24, 2008

दैनिक हिंदुस्तान में अखाड़े के उदास मुगदर पर रवीश की कमेंट्री

ब्लॉग वार्ताः नेट कथा की दुनिया में प्रेम

प्रेम पर कुछ भी बोलने-लिखने या दिखाने का ठेका अब सिर्फ सिनेमा और सीरियल के पास रह गया है। साहित्य भी रोमांस की आपाधापी को छोड़ रोजमर्रा की आपाधापी को पकड़ने में लगा है। हिंदी में वैसे भी संकोच से लिखी जाती रही हैं प्रेम कथाएं।

कमेंट्रीः रवीश कुमार


आज के समय में कोई बड़ा लेखक इस एक पहचान के साथ मौजूद नहीं है कि वह सिर्फ प्रेम कथाओं का कलमकार है । प्रेम रहित इस उदास दुनिया में एक ब्लॉग ऐसा है जो कहता है खुद को अखाड़े का उदास मुगदर लेकिन रचना है प्रेम की उदासियां, सिसकियां, बेकारियां और दिल्लगियां।

यहां अजब गजब प्रेम के वे क्षण हैं जो हमारे भीतर अक्सर किसी अनजान टकराहट से पैदा होते रहते हैं । कभी नोएडा के निरूला में सामने वाली से मिलती नज़र तो कभी किसी लड़की का अचानक हाथ थाम लेना।

गुंडों से बचने के लिए थोड़ी दूर चलने की गुजरिश बहुत लंबे समय तक दिल में उतरती रही। ये प्रेम कथाएं हैं जो शुरू होने से पहले की हैं । जो बीच में कहीं नहीं पहुंचती हैं , यहीं खत्म होती हैं । यह बस हर किसी के भीतर छूट जाती है ।

www.kataksh.blogspot.com प्रेम कथाओं का पार्क है । पढ़ने वाले ब्लॉग के भीतर का प्रेमी बिना किसी इजाजत के इस पार्क में टहलने लगता है । कितना अजीब है । हम सार्वजनिक जीवन में प्रेम प्रसंगों पर रचे न जाने कितने गाने सुनते रहते हैं । कार में हो या सिनेमा हॉल में।

प्रेमी के भीतर खुदा तो खुदा से प्रेमी मांगते ऐसे तमाम गाने शोर बनकर आते हैं , सुनाते हैं और चले भी जते हैं । धूम धड़ाम की संगीत पर थिरकते ये इश्किया गाने रोमांस नहीं पैदा करते। थोड़ी देर के लिए रोमांचित कर देते हैं ।

कहां यह संस्मरण है और कहां हम सबकी जिंदगी की एक महागाथा पकड़ना मुश्किल हो जाता है ।

ऐसी ही एक कहानी है जो स्कूल के दिनों में अपनी एक खूबसूरत टीचर को याद करके लिखी गई है । कहानी आखिर तक पहुंच कर कुछ यूं कहती है- संगीता सिंह हर साल जवान होते सैकड़ों लड़कों की निजी फैन्टेसीज का हिस्सा थीं। सभी के सपनों, ख्यालों में संगीता सिंह अलग थीं। असली संगीता सिंह से भी अलग। जिन्हें शायद ये तो अंदाज था कि लड़के उन्हें घूर कर बड़े हो रहे हैं पर ये नहीं कि वे घूरने का क्या क रते हैं । किस तरह से स्कू ल की एक पीढ़ी उन्हें देखकर बड़ी हुई है । उनमें से ज्यादातर का वे पहला प्यार हैं । जैविक प्रक्रिया का एक रागात्मक पक्ष। जवानी की दहलीज पर कदम रखती वे सैकड़ों प्रेम कहानियां पूरी तरह काल्पनिक थीं। अगर कहीं सच था, तो वह संयोगवश था। संगीता सिंह वह संयोग थीं।

इस प्रेम कथा के दर्शक , पाठक और किरदार न जाने कि तने लोग होंगे। अखाड़े का उदास मुदगर उन सबको इस क हानी का हिस्सा बना रहा है

प्रेम कथाएं लघु कथाएं ही होती हैं । इस छोटी सी कहानी में टीवी के आने से पहले की एक कथा है - उस गांव में वे सालों से साथ थे, उन्होंने साल गिनने बंद कर दिए थे। वह अपना मायका भूलने लगी थी और मायका उसे। उनके बड़े होते बच्चे थे। वे इतने साल से साथ थे, कि दोनों का बोलना, चालना, चलना, हाथ हिलाना, चुप रहना, दुख की लकीरें और खुशी की चमक भी एक जैसी हो चुकी थीं। उनकी शक्लें भी मिलने लगी थीं।

आपको शक हो सकता था कि कहीं वे भाई -बहन तो नहीं। सब कुछ इतने दिनों से इतना ठीक चल रहा था, कि लग रहा था कि कुछ असामान्य है । टीवी तब आया नहीं था और इसलिए उनकी जिंदगी में कुछ भी नाटकीय नहीं था। आखिर ऐसा कब तक चल सकता था?

इस ब्लॉग पर एक लेख है जिसे पढ़ने में आपको मजा आएगा। खुशी का ब्रांड इतना पंजाबी क्यों है ? आगे लिखते हैं पंजाब हमारा मैक्डोनाल्ड है । फास्ट फूड, फास्ट म्यूजिक , फास्ट डांस और फास्ट लाइफ ।

ऐसा क्यों है कि ढाई घंटे में खत्म होने वाली है प्पी एंडिंग लव स्टोरी अमूमन पंजाब की पृष्ठभूमि लिए होती हैं ।

बाजर में निकलो तो खाना, पार्टियों का खाना पंजाबी ही है । चिकन जब भी शहीद होता है तो या तो तंदूर में या बटर में।

सैकड़ों प्रेम कथाएं। एक शख्स है जो रचना किए जा रहा है । पत्रकारिता में रहते हुए भी अपने नाम को जहिर नहीं करना चाहता। प्रेम में यही तो होता है । आप सारा कुछ जहिर नहीं करना चाहते। रोमांस का अड्डा है अखाड़े का उदास मुगदर।

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं और उनका ब्लॉग है www.naisadak.blogspot.com )



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