Monday, September 29, 2008

LOVE STORY 497: पराये मुल्क में कोई ऐसा शब्द था, उसके नाम से मिलता हुआ


वहां वह किसी को नहीं जानता था. वह एक पराया मुल्क था. परायी जुबान aur चेहरे. एअरपोर्ट से निकल कर वह रेलवे स्टेशन में बहुत देर तक भटकता रहा उस स्टेशन की ट्रेन पकड़ने के लिए जो उसे उसके होटल तक ले जाती. सुबह दफ्तर जाने का वक़्त था इसलिए कभी भीड़ भड़क्का और गहमा गहमी का माहौल. वह ढूंढता रहा बहुत देर तक कोई ऐसा शख्स जो अंग्रेज़ी जानता हो, ताकि ८ घंटे की उड़ान के बाद के बाद इस तरह उसका भटकना ख़त्म हो. जिन दो एक लोगों ने उसकी मदद करने की कोशिश की, वे अंग्रेज़ी नहीं जानते थे. स्टेशन काफ़ी बड़ा था.तभी उसे लगा किसी ने उसका नाम लिया है. पर यहाँ कैसे ये मुमकिन था? यहाँ वह किसी हो नहीं जानता था. और उसके नाम को जो उस तरह से लेता था, वह सालों पहले दुनिया से जा चुका था. पूरे स्टेशन पर शोर एकबारगी थम गया. जैसे पूरा स्टेशन खाली हो गया हो. अगले ही पल शोर वापस भर गया.वह फिर मदद के लिए किसी अंग्रेज़ी जानने वाले को ढूँढने लगा.

3 comments:

Pratyaksha said...

इसी एक दुनिया में दूसरी दुनिया भी बसती है ...
for a fraction of a second .. sometimes ..the various worlds in the process of meshing together ..slip and you can see a fleeting face before the curtain falls in place ..दुनिया फिर अपनी धुरी पर कायम होती है ..

seema gupta said...

All storys presented by you are mind blowing , emotional, and very thoughtful.

Regards

shama said...

"Paraye mulk..." aap bohot achha likte hain...aagebhee padhnekee ummeed bandhee rahegi.
shubhkamnoayonsahit swagat hai!
Mere blogpe aaneka aamantranbhee!