Friday, September 26, 2008

LOVE STORY # 499:सलीब से उतरने के बाद भी खून बहता रहा उसका

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वह सलीब लेकर चल रहा था. उसने उसे सलीब से उतारा. वह लहूलुहान वहीं बैठ गया. उसने उसे पानी दिया. कहा तुम्हें थोड़ा आराम करना चाहिए. वह घुटने में सर देकर बैठा रहा. उसने उससे कहा- ज्यादा मत सोचो. और देखो जो हुआ सो हुआ, अब आगे देखो और सोचो कि बिना सलीब का इंसानी जीवन कितना बेहतर होगा. तभी उसे उसकी निगाहें उसके पावों पर गई, जहाँ से खून बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. उसका एक पांव बेडी से बंधा था और जो सलीब से जुड़ी हुयी थी. घुटने में सर देकर वह वहीं बैठा रहा. जिसने उसे सलीब से उतारा था, वह भी थका था, वह सो गया. नींद में एक सपना था. सपने में सलीबों का एक पार्क था. बहुत सरे लोग वहां सलीब- सलीब खेल रहे थे.

4 comments:

वर्षा said...

ठीक से व्याख्या नहीं कर पा रही हूं इसकी। पर बहुत अच्छी कहानी है।

seema gupta said...

" oh, very painful story"

Regards

Anonymous said...

अजगर साहब, क्या आपका वास्तविक नाम हिंदी के `क' अक्षर से शुरू होता है?

Anonymous said...

hey, this is amazing, so original and so apt!