
वह सलीब लेकर चल रहा था. उसने उसे सलीब से उतारा. वह लहूलुहान वहीं बैठ गया. उसने उसे पानी दिया. कहा तुम्हें थोड़ा आराम करना चाहिए. वह घुटने में सर देकर बैठा रहा. उसने उससे कहा- ज्यादा मत सोचो. और देखो जो हुआ सो हुआ, अब आगे देखो और सोचो कि बिना सलीब का इंसानी जीवन कितना बेहतर होगा. तभी उसे उसकी निगाहें उसके पावों पर गई, जहाँ से खून बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. उसका एक पांव बेडी से बंधा था और जो सलीब से जुड़ी हुयी थी. घुटने में सर देकर वह वहीं बैठा रहा. जिसने उसे सलीब से उतारा था, वह भी थका था, वह सो गया. नींद में एक सपना था. सपने में सलीबों का एक पार्क था. बहुत सरे लोग वहां सलीब- सलीब खेल रहे थे.




4 comments:
ठीक से व्याख्या नहीं कर पा रही हूं इसकी। पर बहुत अच्छी कहानी है।
" oh, very painful story"
Regards
अजगर साहब, क्या आपका वास्तविक नाम हिंदी के `क' अक्षर से शुरू होता है?
hey, this is amazing, so original and so apt!
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