Friday, October 31, 2008

LOVE STORY # 483: एक काम ऐसा था, जिससे बचने के लिए कहीं नहीं जाना था

वह भी एक वक़्त था. जब वह उसकी आंखों में झांक रहा था. एक ट्रेन छूटने वाली थी. एक बियर का मग खाली होने में खासी देर हो रही थी. जब वह उसकी आंखों में झांक रहा था, वह कहीं और देख रही थी. मेज पर रखे हाथ, सिगरेट, गिलास और उसकी उंगलियों में से कोई एक चीज़ ही छू सकते थे. उसने कहा ट्रेन छूट जाएगी. उसने कहा अगली ट्रेन से चली जाना. यानी एक घंटे बाद वाली ट्रेन. उनकी आंखों में प्यार अपना जाल बुन रहा था. अपने असंभव से में. फिर ट्रेन. जाना. लौटना. जाना. ट्रेन. गड्डमड्ड. जल्दी से बीत रहे पल का स्लो मो. फ्रेम दर फ्रेम. फेड इन. फेड आउट. उसने मेज के नीचे उसके एक पांव के ऊपर रखे हुए दूसरे को अपने जूते के ऊपर रखकर झुलाता रहा. एक वही ऐसा काम था, जो वह उम्मीद, संभावना, कसम, वादे के बाहर एक खेल की तरह मुमकिन था. जिससे बचने के लिए कहीं नहीं जाना था.

1 comments:

Anonymous said...

Trains ka kissa bhi ajeeb hai...kabhi aap saath ho kar bhi saath nahi hote...door ...apni apni berth pe sote hue...aur phir kabhi milte hi train ka waqt ho jata hai...khair...beer mug ke baahar jami boondon ka bhi apna hi swad hai..khaalis paani aur halka nashaa...