
वह निर्वासित है.
नियति से.
भाग्य से.
सामान्य से.
साधारण से.
चीथड़ा सुख और टुच्ची सुविधा से.
कुनबा परस्ती से.
दुनियादारी से.
अदालत में न्याय से.
भीड़ के कोहराम से.
धनुष की तरह तने हुए राग से निर्वासित अस्थमा की सांस में.
वह निर्वासित है अपनी मनुष्यता में.
वह निर्वासित है कविताओं में.
किताब में.
दो प्याले चाय के आसपास पसरी हुई गहरी चुप्पी के आरपार झांकती गहरी नज़रों में.
शक़ के डगमग से यकीन की छलांग में.
निर्वासित.
वह निर्वासित है पानी से छिटककर दीवार पर नाचते सूर्य के चकत्ते में.
अपनी गुमशुदगी से लौट आये बिल्ली के बच्चे को फिर से देखने की खुशी में.
शोपेन के संगीत में.
कतरा कतरा खुशी और कतरा कतरा आंसू में.
शहरी होने से बची रह गई पृथ्वी की प्रकृति में.
अपने हरे में उगते ही आते सफेद फूलों में.
वह निर्वासित है अपने आईने पर लिपस्टिक के लिखे में.
वह ईश्वर से निर्वासित है प्रार्थना में.
वह सब कुछ तय और सब कुछ सही होने के बंदोबस्त से निर्वासित है यहां और अभी के कौतुक स्वयंस्फूर्त में.
वह हरसिंगार के गिरे हुए फूलों की उठती हुई गंध में निर्वासित है.
अपने एकांत के अनंत में निर्वासित है.
खुशी के एक पल,
प्यार के एक छिन और प्रार्थना के प्राचीनतम में.
वह पृथ्वी की तरह निर्वासित है. वह शहर की तरह निर्वासित नहीं. photo: garden of exile, jewish museum berlin by pug
3 comments:
इतनी जगहों से ? और जहाँ बच गईं ..उनका क्या ? जहाँ सीमाओं की भी सीमा नहीं ..
कमेंट करते-करते सोचा क्या कमेंट करूं। लगा कि इसे पढ़कर जो गूंज पैदा हो रही है उसे लिखकर उसका गला घोंटना होगा। इसलिए कमेंट भी रह गया और इस तरह गूंज भी जिंदा बची रह गई...
Hum sab nirvasit hain aur umeed hai ki prathvi bhi hamyen nirvasit karegi,nirvasit anant main.
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