वह एक रिपोर्टर थी. और उसके लिए वह एक ख़बर बन कर आया था. काम के हर दिन उसे किसी न किसी का इंटरव्यू करना होता था. एक नए शख्स से मुलाक़ात, एक नए दिमाग में झाँकने की कोशिश. वह ख़ुद से बचने के लिए कहीं दूसरों की ज़िन्दगी में, उनके मन में, दिमाग में झांकती. उसने इसकी हद यहीं तक खींच रखी थी. रिपोर्टर की नौकरी के जरिये ये काम आसान था, कि बिना निजी हुए, बिना दोस्त बने और सिर्फ़ दोस्ताना रहकर आप बहुत सारे लोगों के बारे में वह सब जान समझ सकते हैं, जो किसी और तरह से मुमकिन नहीं. उसे ये पसंद था इसलिए भी कि उसका दायरा बढ़ता था और उसकी आज़ादी बरक़रार रहती थी. उस दिन उसे जिनका इंटरव्यू करना था वे ईरान से आए हुए संगीतकार थे. एक म्यूजिक ग्रुप. उसने ख़ुद से कहा आयातोल्लाह खोमेनी के मुल्क के गाना गाते लोग.. कैसे होंगे?वे लोग भले थे. सभी पढ़े लिखे, प्रोफेशनल (इंजिनियर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर) जो शौकिया अपने मुल्क के शास्त्रीय संगीत को सीख भी रहे थे और उसका प्रचार भी कर रहे थे. हिन्दुस्तानी क्लासिकल के बरक्स उनके यहाँ ये ज्यादातर ग्रुप में होता था. वह उस ग्रुप के वाद्य बजाने वालों से बात करती रही एंड थोडी देर बाद ही उसे ऐसा लगने लगा कि उनमें से एक शख्स ऐसा है, जो इंटरव्यू जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता. वह बातों को खींच रहा था, चाह रहा था कि उसके साथी उसे उसके साथ अकेला छोड़ दें, उसने ऐसे इशारे करते उसे देखा. उसे अजीब तो लगा पर उसने ऐतराज़ नहीं जताया. अखबार का फोटोग्राफर तभी आ गया और फोटो खिंचवाने के बाद भी वह कोशिश करता रहा कि वह बात करती रहे.
जब फोटोग्राफर उसकी तस्वीरें ले रहा था, तब उसका ध्यान उस शख्स पर गया. वह एक हैण्डसम आदमी था, लंबे घुंघराले बालों वाला, लगभग ईशवर की तरह, और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के फ्रेम में जंचता- फबता हुआ. वह पेशे से डॉक्टर था, जिसकी डिग्री उसने अमेरिका से ली थी. वह संगीत का दीवाना था और इस बात से काफ़ी प्रभावित कि वह संगीत के बारे में कितना कुछ जानती है. वह इंटरव्यू देने की बजे लेने लगा- ज़िन्दगी के बारे में, पढ़ाई, परिवार और कल्चर के बारे में. वह उसकी सराहना करता रहा. उसकी विद्वता की. उसकी खूबसूरती की. पहली बार इतनी छोटी सी मुलाक़ात में उसने किसी को इतना खुल कर साफगो होते देखा. पर वह वहां काम पर आई थी और उसने कहा कि उसे देर हो रही है अगले काम पर पहुँचने की.
वह जिद कर रहा था कि वह शाम को उसका प्रोग्राम देखने जरूर आए.
वह गई, थकी होने के बावजूद.
उसने उसे मंच से देखा. और जब सारे कलाकार बैठ चुके थे, वह उठकर उसके पास प्रेस गैलरी तक आया. शुक्रिया कहा और कहा अपना विजिटिंग कार्ड दो. उसने अपना कार्ड भी उसे दिया.
कंसर्ट काफ़ी अच्छा रहा और अली बयानी पूरी शाम सेतार बजाता रहा एकटक उसकी तरफ़ देख. बीच बीच में वह मुस्कुराता और फिर डूब जाता अपने संगीत में. उस संगीत में कई सौ साल पहले की रौ थी, प्राचीन कामनाओं से भरा हुआ, रेगिस्तान शाम की हूक की तरह, वह संगीत किसी और वक़्त, किसी और जगह, किसी और जनम का था। लगता था जैसे कोई बचा हुआ हिसाब पूरा होने आया हो, जैसे कोई खोई हुई याद दस्तक दे रही हो दिलो दिमाग पर हल्के से. मनुष्य होने की निशानी देता, मनुष्य होने की निशानी मांगता संगीत. डूबता, तैरता, गहराता, उतराता.
उसे लगा कि कहीं वह प्रोग्राम के बाद उसके पीछे न लग जाए, इसलिए ख़त्म होने से पहले ही वह चली गई. भीड़ से भी बचना था.
उसने फ़ोन किया. मिन्नत की कि वह मिले उससे. अगले दिन उसे दिल्ली जाना था, क्या वह सुबह ब्रेकफास्ट पर उससे मिल सकती है. वह उससे एक बार बस एक बार मिलना चाहता था, इससे पहले कि सरहदें और सभ्यताएं उसे वापस उस जगह ले जाती, जहाँ का वह रहने वाला था.
वह समझ नहीं पा रही थी उसकी आवाज़ के मर्म को. आखिर वह ऐसा क्यों कर रहा था.
एक इंटरव्यू ही तो था.
अगली सुबह जब वह उठी तो इसी पसोपेश में. जाए. कि न जाए. हैमलेट नाटक की तरह वह शंकाओं से घिरी हुयी थी.
उसने उससे न मिलने की वजहें तलाशनी शुरू की. वह उससे मिलने नहीं गई.
दिल को तसल्ली दी कि वह मुसलमान है. वह भी ईरान का. आखिर क्या फायदा. (साफ साफ तो कुछ भी नहीं था अकेली औरत की दुनियादार व्यावहारिकता में, और जब दिल पर दस्तक आई तो दिमाग कान्यकुब्ज ब्राह्मण हो गया).
जाने से पहले उसका फ़ोन आया- ' मैंने आपका इंतज़ार किया. मेरे दोस्तों ने कहा था आप नहीं आएँगी, पर मैं शर्त लगाने को तैयार था कि आप जरूर आयेंगी. मैं बस एक और बार आपसे मिलना चाहता था. क्या हम किसी और जगह किसी और वक्त मिलेंगे?
उसके पास कोई जवाब नहीं था.
उसने कहा कि एक पैकेट उसके लिए वह छोड़े जा रहा है, क्या वह होटल के रिसेप्शन से ले लेंगी.
और हाँ, अख़बार में जो उसने उनके बारे में लिखा है, वह उसकी कतरन लिए जा रहा है- 'किसी ने मेरे बारे में इतनी गहराई से नहीं लिखा!'
वह सोचती रही कि क्या वाकई उसे संगीत की इतनी समझ है?
photo: music room, ifshahan/ laura and fulivio/ flickr
जब फोटोग्राफर उसकी तस्वीरें ले रहा था, तब उसका ध्यान उस शख्स पर गया. वह एक हैण्डसम आदमी था, लंबे घुंघराले बालों वाला, लगभग ईशवर की तरह, और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के फ्रेम में जंचता- फबता हुआ. वह पेशे से डॉक्टर था, जिसकी डिग्री उसने अमेरिका से ली थी. वह संगीत का दीवाना था और इस बात से काफ़ी प्रभावित कि वह संगीत के बारे में कितना कुछ जानती है. वह इंटरव्यू देने की बजे लेने लगा- ज़िन्दगी के बारे में, पढ़ाई, परिवार और कल्चर के बारे में. वह उसकी सराहना करता रहा. उसकी विद्वता की. उसकी खूबसूरती की. पहली बार इतनी छोटी सी मुलाक़ात में उसने किसी को इतना खुल कर साफगो होते देखा. पर वह वहां काम पर आई थी और उसने कहा कि उसे देर हो रही है अगले काम पर पहुँचने की.
वह जिद कर रहा था कि वह शाम को उसका प्रोग्राम देखने जरूर आए.
वह गई, थकी होने के बावजूद.
उसने उसे मंच से देखा. और जब सारे कलाकार बैठ चुके थे, वह उठकर उसके पास प्रेस गैलरी तक आया. शुक्रिया कहा और कहा अपना विजिटिंग कार्ड दो. उसने अपना कार्ड भी उसे दिया.
कंसर्ट काफ़ी अच्छा रहा और अली बयानी पूरी शाम सेतार बजाता रहा एकटक उसकी तरफ़ देख. बीच बीच में वह मुस्कुराता और फिर डूब जाता अपने संगीत में. उस संगीत में कई सौ साल पहले की रौ थी, प्राचीन कामनाओं से भरा हुआ, रेगिस्तान शाम की हूक की तरह, वह संगीत किसी और वक़्त, किसी और जगह, किसी और जनम का था। लगता था जैसे कोई बचा हुआ हिसाब पूरा होने आया हो, जैसे कोई खोई हुई याद दस्तक दे रही हो दिलो दिमाग पर हल्के से. मनुष्य होने की निशानी देता, मनुष्य होने की निशानी मांगता संगीत. डूबता, तैरता, गहराता, उतराता.
उसे लगा कि कहीं वह प्रोग्राम के बाद उसके पीछे न लग जाए, इसलिए ख़त्म होने से पहले ही वह चली गई. भीड़ से भी बचना था.
उसने फ़ोन किया. मिन्नत की कि वह मिले उससे. अगले दिन उसे दिल्ली जाना था, क्या वह सुबह ब्रेकफास्ट पर उससे मिल सकती है. वह उससे एक बार बस एक बार मिलना चाहता था, इससे पहले कि सरहदें और सभ्यताएं उसे वापस उस जगह ले जाती, जहाँ का वह रहने वाला था.
वह समझ नहीं पा रही थी उसकी आवाज़ के मर्म को. आखिर वह ऐसा क्यों कर रहा था.
एक इंटरव्यू ही तो था.
अगली सुबह जब वह उठी तो इसी पसोपेश में. जाए. कि न जाए. हैमलेट नाटक की तरह वह शंकाओं से घिरी हुयी थी.
उसने उससे न मिलने की वजहें तलाशनी शुरू की. वह उससे मिलने नहीं गई.
दिल को तसल्ली दी कि वह मुसलमान है. वह भी ईरान का. आखिर क्या फायदा. (साफ साफ तो कुछ भी नहीं था अकेली औरत की दुनियादार व्यावहारिकता में, और जब दिल पर दस्तक आई तो दिमाग कान्यकुब्ज ब्राह्मण हो गया).
जाने से पहले उसका फ़ोन आया- ' मैंने आपका इंतज़ार किया. मेरे दोस्तों ने कहा था आप नहीं आएँगी, पर मैं शर्त लगाने को तैयार था कि आप जरूर आयेंगी. मैं बस एक और बार आपसे मिलना चाहता था. क्या हम किसी और जगह किसी और वक्त मिलेंगे?
उसके पास कोई जवाब नहीं था.
उसने कहा कि एक पैकेट उसके लिए वह छोड़े जा रहा है, क्या वह होटल के रिसेप्शन से ले लेंगी.
और हाँ, अख़बार में जो उसने उनके बारे में लिखा है, वह उसकी कतरन लिए जा रहा है- 'किसी ने मेरे बारे में इतनी गहराई से नहीं लिखा!'
वह सोचती रही कि क्या वाकई उसे संगीत की इतनी समझ है?
photo: music room, ifshahan/ laura and fulivio/ flickr




5 comments:
बहुत खूब जनाब।
bahut acchhey!!!
इस स्टोरी की सारी ट्रेजेडी आपने बड़े आसानों शब्द में कह दी "उसने उससे न मिलने की वजहें तलाशनी शुरू की"। दुनियाभर की तमाम कहानियों का यह दुर्भाग्य है। अच्छा लगे या बुरा, पर सच यही है।
- आनंद
kya kahe! gajab
कमाल का ताना बाना बुना है...बेहतरीन कहानी
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