Tuesday, October 21, 2008

LOVE STORY # 488: साँस के छुए को नाम से छुए से पकड़ना था

वे दूर थे, पर जुदा नहीं. जब भी अकेले होते साथ होते. बहुत दिनों तक जब वे करीब न हो पाते तो शब्दों से एक दूसरे को छूते. शब्द शरीर बन जाते. ऐन्द्रिक हो जाते. कई बार उनके बीच शब्द चुक जाते. पर साथ होने के लिए जरूरी था कुछ तो कहना.एक बार जब कहने को कुछ नहीं था, तब उसे महसूस हुईं.उसकी साँसों की आवाज़. चढ़ती उतरती हुयी.उसे लगा कि वे साँसे उसे छू रहीं हैं. बहुत दूर से. कनपटी पर महसूस की जा सकने वाली नजदीकी के साथ.इतनी घनी कि वह उसे छू सकता था, उसके घने को, साँस का शरीर था. कुहासे के सर्द में भाप की तरह एक धुन, ताल, पैटर्न, रंग. वह कई बार मज़ाक में कहता कि कहीं किसी दिन गुस्से में छूना बंद करने का फ़ैसला किया, तो साँस लेना मुश्किल हो जाएगा. वे साँसे उनके साथ के चुप को विन्यास देती.वो धीरे से उसका नाम लेता. उसकी गहराईयों में. उसे पुकारने के लिए नहीं, बल्कि साँस के छुए को पकड़ने के लिए.
शब्द और शरीर के चुकने के बाद भी उनका स्पर्श जिंदा था. साँस का अपना शरीर था. नाम का अपना. शरीर के शरीर से अलग. जहाँ आत्मा का शरीर खुलता था.
वे दूर थे, जुदा नहीं.
photo: leo reynolds/ flickr

5 comments:

Anonymous said...

concentrated intensity, palpable...almost touchable. where the hell do you find these amazing pictures to gel so well with your stories!

रंजना said...

वाह ! लाजवाब ..

Parul said...

beautiful!!!!!!

Aheer bahirav said...

Ek Sawaal - Kya ye sab Tha ?.....Ya...Hai ???
Ab bhi... aur sadaa sadaa..

poemsnpuja said...

बेहद खूबसूरत, पानियों में बहती किसी कागज़ की नाव की तरह, थोड़ा कुहासा सा...कहानियाँ ऐसी की लगता है कहीं खो गई हूँ, पात्र ऐसे की लगता है मेरी जिंदगी के हैं, शब्द ऐसे की जिन्दा लगते हैं...ये लाइन बहुत पसंद आई मुझे "वह कई बार मज़ाक में कहता कि कहीं किसी दिन गुस्से में छूना बंद करने का फ़ैसला किया, तो साँस लेना मुश्किल हो जाएगा"...सच ही है...कोरा सच