Saturday, October 18, 2008

LOVE STORY # 490: वे चले भले ही जाएंगे, पर खोएंगे नहीं


वे खुशी की तलाश में नहीं थे. साथ काफी था. उनके बीच बहुत सारे सवाल थे. बहुत सारी मुश्किलें भीं. इतने कि ये किसी भी तरह से तयशुदा नहीं हो सकता था कि एक रोज वे मिलेंगे और इतने करीब हो जाएंगे. वह एक जगह थी और दुनिया में सबसे अकेली थी. वह कई जगह था, बंटा हुआ और अब एक होने की कोशिश में. इस बीच जी जा चुकी एक जिंदगी थी, जिसमें बहुत कुछ साबुत, सलामत और पूरा नहीं था. अधूरापन भी नहीं. पर उनके अधूरेपन को पता था, कि वह पूरा हो सकता था. उनके साथ से ये मुमकिन हो सका था. जो कुछ रह गया था, कहे जाने से, लिखे जाने से, रोने और हंसने से, अपनी आंखों में पहचान पाने, पहचान देने से, गाये और चिल्लाए जाने से, लिपटने और मारे जाने से, चुप रहने से. वह इस छोटे से साथ में मुमकिन था. एक फास्ट फॉरवर्ड फिल्म की तरह साथ अपना एजेंडा लेकर आता था, तेजी से रिकॉर्ड होता हुआ, जिसे साथ के बाद की सदियों में खुलते हुए, घुलते हुए, खिलते हुए महसूस किया जा सकता था. साथ उन्हें सिरे से बदलता था. उनकी आंखों को, उनके चेहरों को, उनकी गंधों को, रंगों को. उसमें वे हो सकते थे, जो वे सच में थे. उनके सच होने के लिए साथ जरूरी था. साथ की अपनी जिंदगी थी, अपने दुख- सुख, अपनी नियति. बहुत बार उन दोनों की जिंदगी, सुख- दुख और नियतियों और रंगों से अलग. कई बार साथ सफेद कविताओं में तब्दील हो जाता था, कई बार साथ का न होना भी. वे रंगों के बनने से पहले की स्थिति में आ जाते थे. साथ के दौरान ही पता चला कि वे चले भले ही जाएंगे, पर खोएंगे नहीं. पर एक ही जगह और वक्त पर सुनी गई अलसुबह परिंदों की आवाज़ें किसी भी दिन उस चांद से बेहतर थी जो वे अलग अलग जगहों से एक ही वक़्त देखते थे.
फोटोः टुगेथर वी स्टैंड स्ट्रांग- रोजीरो प्लिकर

2 comments:

वर्षा said...

हां वो नहीं खोएंगे। दिल को छू लेनेवाली और यथार्थ की ज़मीन पर खडी प्रेमकहानी। जिसका अंत एक ख़ामोश मुस्कान के साथ होता है।

swapandarshi said...

"जो कुछ रह गया था, कहे जाने से, लिखे जाने से, रोने और हंसने से, अपनी आंखों में पहचान पाने, पहचान देने से, गाये और चिल्लाए जाने से, लिपटने और मारे जाने से, चुप रहने से"

bahut khoob!!! civilized society se hamane jo bhee seekhaa, aapne us par ek sire se lakeer fer dee?