उसने कहा था- दो दिन में लौट आऊंगा. हफ्ता भर हो गया था. वह परेशान थी. हालांकि खबर आ गई थी कि फंस गये हैं सरकारी काम से. वक़्त लगेगा. दो बार ख़बर आई कि अगले दिन आएंगे. नहीं आये. जगदलपुर से वह गांव करीब 40 किलोमीटर दूर था. दिन में एक बार बस आती थी, कई बार नहीं भी- मौसम या मशीन कुछ भी खराब हो सकता था.एक शहर के कॉलेज में पढ़ाने के बाद वह शादी कर एक गांव में आई थी, क्योंकि पति की पोस्टिंग यहीं थी. वह एक जंगली इलाका था, जहां आदिवासी रहते थे और साठ के दशक में वहां बिजली आने का सवाल ही नहीं था. वह वहां पुरानी परिचित सब्जियों के नये नाम सीख रही थी. वहां बहुत सारा अकेलापन था, अपरिचय, अंधेरा, खपरैल की छतों में झींगुरों की आवाज़ें भी. उत्तरप्रदेश के उस शहर के डिग्री कॉलेज की अपनी साथियों को जब वह लौटकर बताएगी, कि वह कैसे रहती है, किस तरह के लोगों के बीच, उन्हें यकीन ही नहीं होगा. कल्पना के आदिवासी हक़ीकत के आदिवासी से काफी कम दुरूह थे, पर दिलचस्प थे. अपने पति के इंतज़ार में बिताए हुए हफ्ते में उसने कर्नल रंजीत के उपन्यासों को कई बार पढ़ लिया था. देर शाम अंधेरे में दूर कहीं नशे में झूमते गाते आदिवासियों की आवाज़े और ढोल की आवाज़ें थीं, अकेले- अंधेरे को और गहरा करती हुई.
अगला दिन भी खाली ही गुजर गया. उसे लगा कि जगदलपुर लौटने वाली बस से चली जाएगी. दोपहर को पता किया तो पता चला कि लौटने वाली बस आज आई ही नहीं है. किसी ने बताया एक सरकारी जीप आई है, अगर वह लौटेगी, तो उसमें उसे सवारी मिल सकती है. पर इसके आगे कोई जानकारी नहीं.
शाम थोड़ी देर के लिए आसमान साफ हुआ तो उसने नौकर से एक साइकल का इंतजाम करने को कहा. एक नौकर की खुद की साइकल थी. दोनों जगदलपुर की तरफ निकल पड़े. बीच में कई बार बारिश हुई. कई बार वह गिरी भी साइकिल से. घुटने छिले. कच्ची सड़क पर कई मील पैदल चलना पड़ा.
बस्तर जिले का मुख्यालय साठ के दशक की किसी शाम कैसे रौशन होता होगा, इसका अंदाजा लगाना अब मुश्किल है. पर शाम साढ़े नौ बजे जब वह अपने पति से वहां मिलीं, तो वह आश्चर्य में पड़ गईं. सरकारी रेस्ट हाउस के हॉस्टल नुमा कमरे में कई दोस्त भी साथ थे.
सिर्फ इतना कहा- अरे, आ ही तो रहा था. तुम इतना परेशान क्यों हो गई.
फ्लिकर फोटो : केंऑफ़सीटल




4 comments:
zindagi ka ek panna to nahi reproduce kar diya dost? ek hunch hua
वह जनाब, वह
बहुत खूब, कहाँ लाकर छोड़ा है. बहुत ही सटीक कहानी, पढने के बाद एक गिल्ट फील हुई.
टेक्टॉनिक प्लेट्स ?
सिर्फ इतना कहा- अरे, आ ही तो रहा था. तुम इतना परेशान क्यों हो गई.
' hmm nice story, or keh bhee kya sektta tha vo...'
regards
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