Friday, October 3, 2008

LOVE STORY # 496: पतंग की तरह खुशी जब आसमान नापती है, तो लगता नहीं कि कभी खत्म होगी

कई बार उदासी कुछ इस तरह से दबोच लेती है, लगता है अबकी बार नहीं जाने वाली. पर मौसम बदलता है. बादल छंटते हैं. रौशनी होती है. पसीने के साथ बुख़ार उतरने के बाद लौटते स्वाद की तरह हवा का हल्का सा झोंका पहले हल्के से छूता है, फिर जोरों से झटका देकर बैठे हुए मन को उठा ले जाता है, एक नई खुशी में. एक पतंग की तरह खुशी आसमान को इस तरह और इस कदर नापती है, कि उतरने का नाम नहीं लेती. अब कल खेलना- मांए बुलाती है बच्चों को मैदानों से अंधेरा होने से जरा ही पहले. पर पतंग की तरह बच्चे आखिरी बार- एक और बार – खुशी की एक और बाजी खेलते हैं. न खत्म होने वाले आसमान में. एक ज़िंदा पल की शिद्दत के साथ. बिना किसी अगली इच्छा. बिना किसी पिछले पछतावे के. स्मृति और उम्मीदों से शाप मुक्त. और लगता है कि ऐसे जिया भी जा सकता है.
पर ऐसा भी कहां होता है.

3 comments:

seema gupta said...

बिना किसी अगली इच्छा. बिना किसी पिछले पछतावे के. स्मृति और उम्मीदों से शाप मुक्त. और लगता है कि ऐसे जिया भी जा सकता है.
पर ऐसा भी कहां होता है.
"very well said, pr aisa bhee khan hotta hai..'

regards

ravindra vyas said...

स्मृति और उम्मीदों से शाप मुक्त. क्या बात है।

swapandarshi said...

bahut baDhiya,

Badhe ho jaane par jeene ka yahee tareeka bhool jaate hai shayad.
apane bachcho kee khatir ise yaad rakhanaa zarooree hai.