
इस तरह के चरित्र प्रमाणपत्र योगा मास्टर रामदेव भी दे रहे हैं, जिनकी चमत्कारी और शुद्ध और मंहगी आयुर्वेदिक औषधियों में इंसानी हड्डियों के होने का आरोप लगा था, जिसका खंडन तो उन्होंने किया था, पर ऐसी कोई कैमिकल एनालिसिस रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. एक हिमानी सावरकर हैं, जो खुद को वीर सावरकर के भाई की बहू बताती है, जो साध्वी और दूसरे आरोपियों के लिए कानूनी मदद जुटा रही हैं. वे ये नहीं बताती कि वे नाथूराम गोड़से की भतीजी और गांधी हत्या के दूसरे आरोपी गोपाल गोड़से की बेटी भी हैं. हिमानी सावरकर जिस अभिनव भारत की कल्पना को साकार करने में लगी हैं, राजनाथ सिंह उसकी तस्वीर का हिस्सा हैं. आडवाणी जी की मज़बूरी है कि प्रधानमंत्री बनने का उनके पास ये आखिरी मौका है. इसलिए अब वे पार्टी निर्माण, और राष्ट्र निर्माण जैसी बेकार की बातों में समय न गंवाते हुए सिर्फ पीएम की कुर्सी की तरफ फोकस कर रहे हैं. उन्होंने अपनी एक हिंदी वेबसाइट भी शुरू की है, जिसमें उस भाषा को लेकर उनका प्रेम छलकता है, जिसे वे अपने जबड़ों से चबाते हुए कहते हैं. हिंदी वह जुबान है, जिसे जबड़ों से चबाते हुए आडवाणी और उनके चपाटियों ने नफरत फैलाई है. (अगर वे देवभाषा संस्कृत में अपनी नफरत पेलते, तो शायद इस नागरिक समाज का इतना बुरा न होता, जितना आज है.) उनकी जिंदगी एक नाखुश आदमी के संघर्ष में निकली है. उन्होंने पार्टी को किस गर्त से किन ऊंचाइयों तक पंहुचाया. त्याग किया. बलिदान किया. तकलीफ सहीं. अरमानों पर पत्थर रखे. और अब जब लास्ट चांस है, तो चांस कैसे लिया जा सकता है.
मुंबई में राज ठाकरे की आस्था आहत है और कांग्रेस सरकार अपनी टांगों में दुम दिये बैठी है. 93 साल का मकबूल फिदा हुसैन अदालत के फैसले के बाद भी हिंदुस्तान नहीं लौट रहे, क्योंकि उसे बाल ठाकरे की गारंटी चाहिये, आडवाणी का क्षमादान (देखिये आइंदा हमारी देवियों को बिना ब्रा-पैंटी- ब्लाउज- साड़ी के आप पेंट नहीं करेंगे... अदालतें जो भी कह रही हों, आपको पता है न हम आपका क्या हाल कर देंगे मकबूल जी) चाहिए, राज ठाकरे का प्रोटेक्शन चाहिए. 93 साल का एक बूढ़ा भारतीय जो पद्मविभूषण है, वह उन हिंदू आस्थाओं का दुश्मन है, जो इस्लामिक जेहादियों के तेवर अपना चुकी हैं. अगर मकबूल फिदा हुसैन हिंदू देवी देवताओं को नंगा दिखाकर असम्मान करते हैं, तो खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों और अजंता के चित्रों को यह देश अपने विरासत में क्यों गिन रहा है. वे कामसूत्र और वात्साययन पर शर्मिंदा क्यों नहीं हैं और उनपर प्रतिबंध क्यों नहीं लगातीं. करोड़ों हिंदू औरतें सांपों के बीच शिव के लिंग को दूध चढ़ा रहीं है एक अच्छे से पति के लिए, पर इसमें कोई असम्मान, अश्लीलता का सवाल नहीं है. (अच्छा पति नहीं मिलने पर भी उनकी आस्था आहत नहीं होती..) वे ताज़ महल को हिंदू मंदिर बताने वाले थ्योरिस्ट की बात को मानते हुए वहां भजन कीर्तन और शाखा क्यों नहीं शुरू करवा देती. यह देश तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा, शरण, घर सब दे सकता है, मकबूल फिदा हुसैन को नहीं. तस्लीमा की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा भी जरूरी है, पर हुसैन को ठीक करना जरूरी है.
सिलेक्टिव आस्थाओं का दौर है. और आस्थाएं आहत होने के लिए कमबख्त मरी जा रही है. और आस्था किसी भी बात से आहत हो सकती है. बहुसंख्य की आस्था लठैती हो गई है. लोकतंत्र में बहुमत मायने रखता है. लोकतंत्र में अल्पमत मायने नहीं रखता, ये नई सीख है. और वह सब पर लागू होती है. चाहे वह सरहद को बचाने वाला हो, या फिर कोई और. अगर हिंदू नहीं है, तो मर सकता है. कई बार जान बूझ कर, कई बार गलती से, कई बार तैश में, कई बार आस्थाएं आहत होने पर, कई बार सिर्फ इसलिए कि एक ईसाई नन या बिलकीस बानो का बलात्कार करने से हिंदूत्व का झंडा थोड़ा और ऊंचा हो जाता है. इस ऊंचे झंडे के बूते आडवाणी और उनके लोग इस मुल्क पर राज करना चाहते हैं. एक बार और. बस एक बार. उनमें ऐसा क्या खास है, जो मुझमें नहीं.
जब ये सब हो रहा होता है, तो नवीन पटनायक और विलास राव देशमुख और डॉ मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल जो बोलते हैं उसमें से बेचारगी की ऐसी आवाज़ निकलती है- चूंचूंचूंचूंचूं.. कहीं ऐसा न हो कि जो मुंह में दही जमाकर बैठे हों, उसमें ख़ल़ल पड़ जाए. जैसे सरकार चलाने की जगह उन्हें भंडैती करने का जनादेश मिला हो. वे पता नहीं किस ख़ौफ में सबकी नाफरमानी कर रहे हैं- संविधान की, जनादेश की, अदालतों की, इंसानियत के तकाजे की. लोग तो ये शरीफ लगते हैं, पर वे हमेशा कम्प्रोमाइजिंग पोजिशन में क्यों पाये जाते हैं. इन शरीफ और पनीले लोगों के कारण समाज में शराफत से रहना ही मुश्किल हो गया है.
लोकतंत्र, संविधान, गणतंत्र, मानव अधिकार खुशी से तेल लेने जा सकते हैं.




11 comments:
सच लिखा है। वाकई '' सिलेक्टिव आस्थाओं का दौर है। और आस्थाएं आहत होने के लिए कमबख्त मरी जा रही है। और आस्था किसी भी बात से आहत हो सकती है। बहुसंख्य की आस्था लठैती हो गई है। अब ये मसला कानून और व्यवस्था का नहीं है। आस्था का है. आस्था कुछ भी करवा सकती है. कत्ल, ब्लात्कार, बम विस्फोट॥"
आस्था और भावनायें फ़सिस्टों की लाठी बन गये हैं।
बहुत अच्छा आलेख।
बहुत अच्छा आलेख है। मगर हमला सिर्फ़ अल्पसँख्यकों तक सीमित नहीं है। असली मकसद है फ़ासिज़्म और असली निशाना है लोकतन्त्र। ग़ैर-फ़ासिस्ट हिन्दू भी बचेंगे नहीं। तलिबानों ने क्या मुसलमानों को नहीं मारा। हिटलर ने क्या यहूदियों के अतिरिक्त और किसी को नहीं मारा था।
'इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे-आगे देखिये होता है क्या।'
सही है, आस्थाओं के साथ-साथ अब घटनायें /तथ्य / आँकड़े / लिंक सभी "सिलेक्टिव" हो गये हैं… "एकतरफ़ा" रिपोर्टिंग के लिये ही धन्यवाद लीजिये…
मेरी समझ में नहीं आता कि किसको कोसूं । उस कांग्रेस को जिसकी छत्रछाया में सांप्रदायिकता फली फूली, या कच्छे के भीतर पल रही पापी सांप्रदायिक और फासिस्ट अ-सभ्यताओं को । आपने जो कुछ कहा है वो काफी है ये बताने के लिए कि हमारी सरकारों के सरोकार समाज से ज्यादा अपनी दुकान चलाने के कितने ज्यादा करीब रहे हैं । भला हो हिंदुस्तान के बहुसंख्यक समाज का जो इन नेताओं के बहकावे में नहीं आता । वरना गज़ब हो जाता । आपके विचारों और भाव के साथ साथ भाषा भी अद्भुत है । सलाम सलाम सलाम
Dear Sir
Good article. Congrats for eyeopener facts about the poltics. Why you are writing here you should go in CNN-IBN. They will give you good job.Or is the way to attract them. Any how money will not get to write on blog, award will not get to write on blog. Join Any SECULER News Channal.
Good article but charechter is changed.
Mandl Bhul gay, 1984 bhul gay, 1992 Mumbai blast bhul gay.
Yad rah to Advani ji ki RATH Yatra.
Jis ne Bharat ki atma jagai.
Regards
Fire
आभूषण ज्यादा जमकदार हों तो चेहरे पर नजर गड़ाना कभी कभी मुश्किल हो जाता है । भाषा का आभूषण इतना चमक रहा है कि चेहना कभी कभी ढूंढना मुश्किल हो जाता है
agreed with fire....
I am quite surprised to see such overwhelming response to ur blog when it addressed hatred, instead of love.Culturally, we are so much more at ease while hating. You slap or abuse a person publically, no one objects, you try and hold hands and moral police will be after you. You fall in love, and, your life will be made miserable by all, join a hate circle and many will join you, will exalt your position with support. Hatred is a stretchable outfit, you keep expanding hate and it will accomodate. Love is like a pair of jeans, you have to keep working hard to continue to fit in. Love requires hard work for the inner life. There is so much hared, because no space is left for love. I hope your blog will continue with more true stories of love.
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behatareen,
vo kahate hai na ki sachche premi sachahe vidrohee bhee hote hai!!
prem, vidroh aur behatar duniyaa ke sapane aapas me juDe hee hote hai.
aur jisake paas ye sapane ho, usee ko samajik avrodh aur amanushahtaa bhee saaf dikhatee hai.
aapaki safgoi ko salam
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