
यहां आओ और बैठ जाओ, बेटे.
वह अपने पिता के पास बैठ गया. वे सोने जा रहे थे. मां पास में बैठी है.
‘तुम इतनी स्मोकिंग क्यों कर रहे हो’, उन्होंने पूछा.
बहुत सारी घनी चुप्पी. छुए जा सकने वाले कुहासे की तरह. नवम्बर का महीना.
‘पापा वह मर रही है’, उसने कहा.
‘पर तुम?’
फिर बहुत सारी चुप्पी. घना होता कुहासा.
'तुम तो अपना ख्याल रखो.'
'पापा, उसने तो कुछ नहीं किया ऐसा, फिर भी हो गया न कैंसर उसे!'
कुहासा एक दम छंटने लगा. वह उठा और बाहर फिर. एक और सिगरेट.
एक लंबी मियाद बीत चुकी है. पिता अब नहीं हैं. वह मर चुकी है. सिगरेट छोड़े उसे पांच साल हो चुके हैं. पर सपने में याद लौटती है. एक पिता पूछता है, तुम सिगरेट क्यों पी रहे हो?
सपने में वह सफाई देता है. सपने में जो याद की फाइल है, जिंदगी से अलग है. कोई एक जगह छूटी रह गई है, जहां वह मर रही है, वह सिगरेट पी रहा है, उसका पिता परेशानी को एक खामोश गुस्से की शक्ल देता पूछता है. जो जिंदगी में नहीं है, यादों में दफन है. जो यादों में दफन है, वह सपनों में लौटता है. कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है। सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ.
photo: cigarette by lanier/ flickr




4 comments:
touching!
there was a black hole in his life from where he could fall .. free fall into the dream ..and then maybe never be able to climb out !
जो जिंदगी में नहीं है, यादों में दफन है. जो यादों में दफन है, वह सपनों में लौटता है
एक एक शब्द छू जाता है!
kuhasa yaadon ka hai, sapnon ka hai ya ki sigret ka dhuan hai? sab gaddmadd hai jindagi me.
kahani khoobsoorat hai.
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