Sunday, November 16, 2008

LOVE STORY # 477: नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें और तुम भी उन्हें पुकार सको



नाम दो उन बिल्ली के बच्चों को कि वे डरना भूल सकें. और ठिठकने का संकोच भी. ताकि वे आ सके तुम्हारे पास बिना दबे पांव भी. ताकि वे भूखे हों तो तुम्हारे पास आ कर भूखी म्याऊं कर सकें. कि वे आएं तुम्हारे पास और तुम्हारे पांवों से खुद को रगड़ते हुए वहीं कहीं पसर सकें. तुम्हारा मिज़ाज ताड़ने की अन्यमनस्कता से मुक्त हो सकें. कार के टायर के नीचे छिपने की जरूरत तभी पड़ें जब धूप बहुत हो, तुम्हारी नज़रों से बचने के लिए नहीं. नाम दो उन्हें कि वे आ सकें तुम्हारे करीब बिना सोचे अपनी हरी बिल्ली आंखों से झांकते अपनी बिल्ली खुशियों औऱ बिल्ली अरमानों के साथ. नाम दो कि वे डरना भूल सकें. कि वे दौड़ते हुए आ सकें, तुम्हारे फर्श पर फिसलकर, तुम्हारे कदमों से लिपटते हुए. नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें. और तुम उन्हें पुकार सको.
नाम दो उस खुशी को जो उस फूल की तरह तुम्हारे बगीचे में उग आई, जिसका किसी को इंतजार नहीं था, तुम्हें, मौसम को, न मुहुरत, न क्यारी को... पर वह उग आया सारे अंदाजों को चौंकाता हुआ.
नाम दो उस हक को, जिसने कमा लिया तुम्हें. बिना ख़बर दिये भी.
नाम.
दो.

1 comments:

ravindra vyas said...

लगता है, यह कोई जवाब है।