
(एक दोस्त ने ये कहानी भेजी है. नाम न बताने की हिदायत के साथ)
वह बहुत दिनों से पार्क में बैठा था. घड़ी देखी. शाम के सात बज रहे थे, पर सूरज डूबा नहीं था. बल्कि चमक रहा था जैसे दोपहर अभी ढली न हो. यूरोप में ये गर्मियों का मौसम था. वीकेंड था इसलिए पार्क में भीड़ थी. हर कोई सूरज को जितना हो सके, सोख लेना चाहता था. जोड़े बाहों में बाहें डाले घूमते हुए जोड़े उसे और भी अकेला बना रहे थे.
न तो वह पहली बार विदेश आया था, न पहली बार अकेला था. वह आता था अक्सर और अकेला ही. बारह साल की उम्र में उसके मां-बाप एक हादसे में चल बसे थे और उसके चाचा उसे अपने पास लंदन ले आये थे. वह वहीं पढ़ा एलएसई में, और पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद उसे हिंदुस्तान में ही एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई. पर यूरोप उसके ज़हन में हमेशा रहा. वह बार बार यहां लौटता. रोम की संकरी गलियों या लंदन के चौड़े रास्तों या मेपल के पत्तों से ढंकी म्यूनिख की सड़कों पर घंटों टहलना उसे अच्छा लगता. पर इस बार कुछ और बात थी. वह अच्छा नहीं लग रहा था. अज़ीब सी बैचेनी. जब से आया था, यादों से बाहर निकल नहीं पा रहा था. पहले ऐसा कहां हुआ था.
मार्क उसका दोस्त था, जिसके यहां वह ठहरा था, वीकेंड पर बाहर गया हुआ था. वह उस मकान में अकेला था और हरारत से भरा हुआ. और दिन भर बिस्तर पर पड़े रहने के बाद शाम को निकला था पार्क की तरफ. शायद थोड़ा मन बदल जाएगा.
बच्चे वहां खेल रहे थे. एक दिन बाल्कनी में खड़े खड़े उससे उसने पूछा था- जानते हो दुनिया का सबसे मीठा शोर कौन सा होता है.. उसने पूछा था कौन सा.. खेलते हुए बच्चों का शोर
यादें परछाइयों से इस मायनों में अलग होती हैं कि पीछे पड़ जाएं तो रौशनी में आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़तीं. वह बैंच से उठ खड़ा हुआ.
अगर शादी नहीं करनी तो मुझे एक बच्चा ही दे दो. मैं अकेले पाल लूंगी उसे. तुम से कुछ नहीं मांगूगी, किसी और दिन उसी ने कहा था उससे और उसे पता था कि वह सच ही कह रही थी. वह हमेशा सच ही कहेगी. एक बच्चे की जिम्मेदारी डालकर वह आज़ादी से यहां वहां उड़ता फिरे, वह परिंदा होना उसे गवारा नहीं था.
घर आकर फिर बिस्तर पर. बुखार शायद फिर चढ़ रहा था. आंखों में जलन से पता चल जाता है, बुखार का. उसके हाथों की छुअन उसे याद आई. शाम को वह अक्सर उसके घर पर पाया जाता, जहां वे साथ खाना बनाते. प्याज हमेशा वही काटता. वह कहती- तुम्हारी आंखों में प्याज के आंसू भी नहीं आते, जबकि मेरी आंखों मे... उसे याद नहीं मां-बाप के गुजर जाने के बाद वह कब रोया था.
उसकी आंखों में पानी आ रहा था और जलन बढ़ रही थी. वे आंसू नहीं थे. वह उठा और अपने बैग से पैरासिटामोल की गोली निकालकर गटक ली. पानी पिया. फ्रिज से एक चॉकलेट बार निकाला और उसे कुतरते हुए दीवार पर पीठ टिका बिस्तर पर बैठ गया. पांव फैला कर.
डिनर के बाद वह ऐसे ही बैठती और वह उसकी गोद को तकिया बना लेता. वह एक हाथ में रिमोट पकड़े रहती और दूसरे से उसके बालों को सहलाती रहती. वे बातें करते. सैन्सक्स, सब्जी के दाम, बेढंगे रियलिटी शो, नीरज पांडे की फिल्म, स्मृति ईरानी की वापसी, ओबामा का इलेक्शन कैम्पेन..
तीन साल पहले वे मिले थे. वह एक इंटरनेशनल एनजीओ में प्रोग्राम डिरेक्टर थी. चार साल की थी जब मां- बाप का तलाक हो गया था. वह मां के साथ रहती थी और पिता अमेरिका जाकर दूसरी शादी में सैटल हो गये थे. मां को कैंसर हुआ था. फिर वह अकेली हो गई थी. उसे लगा कि न वह उस मकान में अपने अकेलेपन को हैंडल कर पा रही है, न ही उन तमाम रिश्तेदारों को – जो यकायक और अजीब तरह से उसके नजदीक होने की कोशिश कर रहे हैं. उसने अपना तबादला इस अजनबी से शहर में करवा लिया.
वह अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसके दफ्तर मिलने आई थी. और पहले तो वे काम के सिलसिले में मिलते. फिर बिना काम के भी. घर में, कॉफी शॉप में, थियेटर, संगीत सभाओं में. करीब हो गये.
चढ़ते हुए बुखार और तपते हुए माथे पर जोर डालकर उस शाम उसने ये याद करने की कोशिश की कि उनमें प्यार किस पल हुआ.. प्यार ने खुद के इजहार करने का वक्त कौन सा चुना... पर उन्होंने ऐसा कभी किया ही नहीं था. जरूरत ही नहीं महसूस हुई. और बताना क्या था. वे जान चुके थे.
वह बता चुका था कि वह आज़ाद परिंदा है. बंधनों में नहीं जी सकता. वह कहीं एक जगह ठहर नहीं सकता. वह अक्सर वह दूर देशों की यात्राओं, या जंगलों में ट्रेकिंग करने अकेला चला जाता. कभी बताकर नहीं लौटता. अचानक ही लौटता और उसे चौंका देता.
वह लौटता तो सीताराम सीटी बजाने लगता. वह सीताराम को पिंजरे से निकालता और अपने कंधे पर बिठा लेता. सीताराम उसके कंधे को सिंहासन समझता और शान से तब तक बैठा रहता, जब तक उसे उसके पिंजरे के हवाले फिर से नहीं कर दिया जाता. पिछली मकर संक्रांति पर सीताराम बाल्कनी पर उसे जख्मी हालात में गिरा मिला था. पतंग की तांत ने उसके एक पंख को काट दिया था. उसने उसकी मरहम पट्टी की और फिर साथ रख लिया. बिल्ली से बचाने के लिए जरूरी था कि पिंजरे में सीताराम ठीक से बंद हो. पहले तो सीताराम बिल्ली को देखकर डर जाता था, पर फिर उसे भी लगने लगा था कि वह पिजंरे में महफूज है.
इस बार सीताराम को पिंजरे में रख वह जब घर से निकल रहा था तो वह कुछ उदास थी. क्या तुम हमेशा के लिए नहीं ठहर सकते. तुम मेरे बिना कैसे जी लेते हो. क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि जिंदगी का हर पल मेरे साथ बिताओ.
वह हंस दिया था. उसके बालों में उंगलियां फिराते हुए उसने कहा- प्यार के कुछ पल भी काफी होते है.
वह खीज गई थी. उसने गुस्से में कहा- तुम ढूंढोगे मुझे, सन्नाटे और वीरानियों में. मैं नहीं लौटूंगी. तुम खो दोगे मुझे. मै नहीं मिलूंगी. तुम लौटना अपने खालीपन में. खुश रहना इस गैरमौजूदगी में. मैं नहीं लौटूंगी. रहना अपनी खामोशी में.
वह रो रही थी, उसकी कमीज गीली हो रही थी. उसने उसे जोरों से लिपटा लिया था.
बुखार उतर रहा था, ये पता पसीने से चला. उसे लगा वह खुदगर्ज है. और वह लौट जाएगा उसके पास पहले फ्लाइट से. हमेशा के लिए. उसे लगा वह खुद गर्ज है. उसने हमेशा अपनी जरूरतें, अपनी इच्छाएं, मर्जी के बारे में ही सोचा था. आज जब वह लौटना चाहता था, तो भी अपने लिए. कि उसकी तकलीफ को वह अपना बना सके, क्या वह उसके इतने करीब हो पाया था.
एयरपोर्ट से बाहर निकला तो रात हो चुकी थी. हर तरफ पुलिसवाले थे और सिक्योरिटी भी कड़ी थी. टैक्सीवाले ने बताया शनिवार को बम फटे थे. कई मारे गये. सैकड़ों घायल हुए हैं. टैक्सीवाला हैरत में था कि उसे इसके बारे में कुछ पता ही नहीं था. वह बताने लगा बम कहां कहां फटे थे. एक तो वहीं फटा था, उस दफ्तर की बिल्डिंग के सामने जहां वह काम करती थी. वह उसके बारे में सोचने लगा. उसे लगा वह तो दफ्तर से घर आ चुकी होगी. पर फिर याद आया कि आज तो संडे है. वह सीधे उसके घर गया. वहां ताला लगा था. उसके पास चाबी थी. भीतर गया तो अंधेरा था. सीताराम की आवाज़ भी नहीं. उसने बत्ती जलाई. बाल्कनी में गया तो देखा पिंजरा खुला हुआ था और खून की कुछ बूंदे और कुछ पंख बिखरे हुए थे. उसने एक लंबी सांस ली.
वह कमरे में वापस आया. घर खुला देखकर सामने वाला पड़ोसी आया. वह उसका परिचित नहीं था, पर कई बार सीढ़ियों पर उसने देखा था उसे. पड़ोसी ने बताया- हम पुलिस को खबर करने की सोच रहे थे. वह कल सुबह दफ्तर गई थीं और फिर किसी ने देखा नहीं यहां उन्हें.
उसने उसका मोबाइल नंबर लगाया. वह बंद था.
वह फिर बालकनी में आकर खड़ा हो गया. कम्पाउंड वॉल पर बिल्ली अपने पंजे चाट रही थी.
वह लगा उसे चक्कर आ रहा है. बाल्कनी की रेलिंग पकड़ ली उसने. उसने आंखें बंद होने लगीं. सीने में दर्द था. उसे लगा उसके पांवों में ताकत नहीं बची है और वह गिरने वाला है.
तुम कब आये, कुछ ज्यादा ही जल्दी नहीं लौट आये इस बार
उसने मुड़कर देखा. वह थी. सात- आठ साल के एक लड़के के साथ. उसके सर पर पट्टी बंधी थी.
बम फटने के तुरंत बाद मुझे यह सड़क पर रोता हुआ मिला. किसी गांव से यहां आया था, अपने पिता के साथ. वह बहुत जख्मी हैं...ये काफी डरा हुआ था..
वह बताती रही.
वह अब कुछ सुन नहीं रहा था. उसकी आंखों में आंसू थे और उसकी शक्ल धुंधला रही थी..
photo: flickrohit




4 comments:
अच्छी है, दिल की गली से होकर गुजर गई...
बहुत अच्छी कहानी...
- आनंद
कुछ आस पास की कहानी सी लगती है,कहानी का तर्ज़ इन्टीमेट से है,कहना का अंदाज़ अच्छा लग रहा है,खा़स बात है शुरु से आखि़री फ़्लो बना रहता है,लिखा किसने है ?ये कौतूहल तो मन में बना ही हुआ है....आखिर बेनामी क्यौं?
niraasha ki tapan ke baad khushi ki boondon ka aalam wo hi samajh sakta hai jisne zindagi me kathin paristhitiyon ko bahut nazdeek se dekha ho.
quite good...
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