Tuesday, November 18, 2008

LOVE STORY # 475: पेंटिंग पूरी होने का पता उसे वैसे ही चलता है जैसे प्यार करने के पूरा होने का


लाइफ मैगजीन: आप कैसे जान लेते हैं की पेंटिंग पूरी हो गई?
जैक्सन पॉलक: आप कैसे जान लेते है प्यार करना कब पूरा हो गया?
(सोनी पिक्स पर सोमवार रात फ़िल्म पॉलक देखने के बाद)

हम अपनी मनुष्यता में अकेले हैं. वह एक अरण्य है. बेतरतीब और कुदरती. अरण्य की तरफ़ जाने वाले पहले कदम रोमांच के होते हैं, फिर सैलानियों के, फिर कारोबारियों के. कई बार ये कदम एक ही आदमी के हो सकते हैं. पहले जंगल पटवारियों के नक्शे से बाहर अपरिमित होता है, फिर धीरे से एक पगडण्डी बनती है, फिर सड़क, फिर कांटो की बाड़ में जंगल क़ैद होने लगता है, और मनुष्यता बेदखल. मनुष्यता के जंगल ने यकीन करना पहले सीखा है. शक करना बाद में. यकीन के शक में बदलने की विकासशील प्रक्रिया पूरी होने में देर लगती है. जितनी एक आदिवासी को कारोबारी होने में.
जंगल फिर खुदकुशी क्यों कर लेता है, सभ्य समाज शाम के कारोबार को समेटता हुआ सवाल नहीं करता, सिर्फ़ मुस्कुराता है.

1 comments:

ravindra vyas said...

पहले पता होता तो हम भी देखते पोलक को क्योंकि उनकी पेंटिंग्स को गाहे-बगाहे देखता रहता हूं लेकिन कल रात मैंने भी वर्ल्ड मूवीज पर एक फिल्म देखी-दे मैच फैक्टरी गर्ल। मैं उसे देखकर लगभग स्तब्ध था। मुझे नहीं पता फिल्म की कोई भाषा होती है या नहीं लेकिन यह फिल्म अपनी धूसर-भूरी-कत्थई रंग योजना, अपनी आंतरिक लय और टोन में इतनी गहरी फिल्म थी जैसे सन्नाटे में पतझड़ का बिछड़ा जर्जर पीला-कत्थई पत्ता। जो आपके सिरहाने आकर चुपचाप बैठ जाता है और धीमे-धीमे अपनी कहानी कहता है-अपने बदलते रंग से, अपने उड़ते आने के ढंग से, अपने रूके होने, ठिठके होने में से। यह फिल्म फिनलैंड के फिल्मकार अकी कौरिस्माकी की थी। कहीं मिल सके तो जरूर देखें। इन्हीं फिल्मकार की दो अन्य फिल्मों का जिक्र प्रमोद सिंह अपने ब्लॉग पर कर चुके हैं।