Saturday, January 19, 2008

बिलकीस का बलात्कार मोदी ने नहीं किया

उसके जिस्म से खिलवाड़ हुआ. वह सात माह से थी, जब ख़ुद को हिंदू राष्ट्रभक्त कहने वालों ने उसकी इज्ज़त लूटी. उसके परिवार को लगभग नेस्तनाबूत कर दिया गया. उसकी आंखों के सामने उसके कुनबे के सत्रह लोगों को भीड़ ने मार डाला. मारे जाने वालों में बिलकीस बानो की बच्ची भी थी. सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा बुरे सपनों में होता है. पुलिस थाने में रिपोर्ट नहीं लिखी गई. मेडिकल जांच में झूठ लिखा गया. अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को गुजरात से बाहर ले जाने का हुक्म न देता और एक महिला कलेक्टर ने बिलकीस बानो की मदद कर अपनी ड्यूटी ईमानदारी से नहीं निभाई होती, तो बिलकीस बानो की कौन सुनता। क्योंकि गोधरा के गुस्से में सब जायज़ था, हत्या, बलात्कार, बच्चों की हत्या, पुलिस का पक्षपात, डॉक्टरों की डंडी मारती रिपोर्ट. इस बात की सम्भावना काफ़ी थी कि २३ साल की बिलकिस को इस धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले देश में इन्साफ मिले ही न. गोधरा के गुस्से में आपा खोना स्वाभाविक सी बात है, ऐसा कुछ तो भाजपा के भारत रत्न अटल बिहारी ने भी संसद में बुदबुदाया था. बिलकीस बानो की किस्मत एक तरफ़ ये सब देखने को मजबूर थी, जो एक आज़ाद हिंदुस्तान और गाँधी की जमीन में एक गर्भवती औरत को कभी नहीं देखना चाहिए था. तारे जमीन पर देखकर दो टसुये बहा कर बाल्टी भर पब्लिसिटी बटोरने वाले अडवानी और उनके पूरे परिवार ने कभी बिलकीस के बारे शायद ही सोचा हो. अगर नरेन्द्र मोदी का फिर मुख्य मंत्री बनना गुजरात का फ़ैसला है तो बिलकीस बनो केस दरअसल उस गुजरात पर फ़ैसला है जो नरेन्द्र मोदी चलाते हैं. राम के नाम पर चीर हरण हो रहा था. और दो महीने बाद ही माँ बनने वाली औरत मुस्लिम हो तो राम (या कृष्ण) क्यों उन्हें आकर बचायेंगे. बिलकीस बानो के साथ जो हुआ, उसमे जाहिर है मोदी का कोई रोल नहीं है. जिन बारह लोगो को इसका दोषी पाया गया उनमे गुजरात के गौरव का नाम नहीं है. साक्षात विकास पुरूष ने थोड़े ही कहा ये बिलकीस बानो है, सात माह से है इसके परिवार को ख़त्म करो, इसकी इज्ज़त लूटो. पुलिस तुम्हारे ख़िलाफ़ कुछ नहीं करेगी. मोदी ने डॉक्टरों से भी नहीं कहा कि बिलकीस बानो की रिपोर्ट सही मत लिखो. गुजरात सरकार के ये कारिंदे पता नहीं किसके इशारे पर ये ड्यूटी बजा रहे थे. और जब गलती नहीं की तो अफ़सोस किस बात का जाहिर करें. मोदी तो बच्चों कि तरह मासूम हैं और लोग देखिये गोधरा के बाद इतने गुस्सा हैं कि वह कहीं तो निकलता ही. भले ही इन लोगों को चुनाव का टिकेट मिला, उन्होंने मोदी को वोट दिया और ख़ुद को सच्चे रामभक्तों कि तरह प्रतिष्ठित किया. हालांकि वे लोग भगवा बनने का दावा करते थे, पर कानूनन मोदी न तो इस घटना के लिए जिम्मेदार हैं और न ही भागीदार. और फिर इस सबके बाद भी देखिये पूरा राज्य चाहता है कि मोदी उनके मुख्यमंत्री रहें. इन लोगों के एयरटेल और हच फ़ोन में रिंग टोन संस्कृत मंत्रों की थी जिसमे प्रचोदायत टाइप के शब्द सुनाई पड़ते हैं. मोदी उनके मुख्य मंत्री हैं और जनहित में अब कोई उनके ख़िलाफ़ कुछ भी बोला जाना गुजरात के ख़िलाफ़ बोला जाना है. इसलिए उसके साथ जो भी हुआ, उसके लिए मोदी के पास न तो कोई शब्द हैं, न तो प्रकट तौर पर कोई भाव. हादसे के छः साल बाद जब शुक्रवार को ये फ़ैसला आया, तो बिलकीस बानो के बचे खुचे घरवाले और रिश्तेदार (करीब साठ लोग) अपने घरों में ताला लगाकर रान्धिकपुर से भाग खड़े हुए कि कहीं फैसले के बाद फिर कोई फजीता न खड़ा हो जाए. ये डर भी मोदी ने थोडी ही पैदा किया है. बिलकीस बानो इस वक्त और गुजरात का सच है. जैसे ये सच है कि नरेन्द्र मोदी को लोग चुन रहे हैं. बड़ी बात ये है कि सारी मुश्किलों के बाद भी बिलकीस ने इन्साफ कि आस न छोड़ी और भले ही जनता की अदालत ने मोदी के पक्ष में फ़ैसला देकर उसकी लाज, उसका स्त्रीत्व, उसके साठ हुए जुल्म और जुर्म, दोनों को छोटा कर दिया हो, कानून की अदालत में ऐसा नहीं हुआ. ये भी सोचने की बात है कि अगर यही मामला गुजरात कि अदालतों में सुना जाता तो क्या तब भी उसका हश्र यही होता. मुम्बई में जब गुरुवार को ये फ़ैसला सुनाया गया, उसके तीन दिन बाद ही यानी कल रविवार को दादर में मोदी की रैली होने वाली है. मैराथन और मुहर्रम के दिन. मुम्बई में भाजपा के लोग और उनके गुजराती समर्थक मोदी की मर्दानगी की वाह वाही करेंगे. मोदी के मुंह से फिर छः करोड़ गुजराती निकलेगा जिसमे बिलकीस बानो शामिल नहीं होगी.

Wednesday, January 16, 2008

LOVE STORY # 537: दिक्कत प्यार की नहीं थी

उसने कहा - वह दूर जा रहा है. उसने कहा - ख्याल रखना. उसने कहा -तुम भी. उसने कहा - अपनी ख़बर भेजते रहना अपनी. उसने कहा - वह जल्द लौटेगा. उसने कई लंबे ख़त लिखे. पर ख़राब नेट कनेक्शन कि वजह से वे जा नहीं सके. उसका मोबाइल गुम गया और उसे उसका नंबर ही याद नहीं रहा. वे किसी भयावह साजिश की तरह एक कॉस्मिक नेटवर्क जैम के शिकार हो गए. उसने उसके घर फ़ोन किया, जहाँ वो नहीं थी. वह सोच ही रहा था कि क्या टेलीग्राम भेजना मुनासिब होगा, तभी लैंडलाइन पर नम्बर मिला गया बात होने लगी. उसने उससे कहा- मैंने तुम्हे बहुत मिस किया. उसने कहा - वह मरने के बारे में सोचने लगी थी. उसने कहा- ऐसा कैसे सोच सकती हो.. वह भी इसलिए कि हम टेक्नोलॉजी ब्रेक डाउन के शिकार थे. उसने कहा- तुम्हें यकीन तो हैं न मुझ पर? उसने उससे कहा - तुम प्यार तो करते हो न मुझसे? कुछ दिनों बाद वे करीब हुए. थोडी देर तक उनकी दूरियां भी उनके साथ थी.

Tuesday, January 15, 2008

LOVE STORY # 538: कहानी नही है पर प्यार तो है

जैसा कि टीवी रिपोर्टर कहते हैं अजगर के लिए थोड़ा अफरा तफरी के दिन हैं. जगह और नौकरी के साथ आदमी का अपना अमन चैन भी बदल जाता है. प्रेम कहानी लिखने के लिए गहमा गहमी नहीं बल्कि थोड़ा अवकाश चाहिए होता है. थोड़ा आकाश. थोड़ा अन्तरिक्ष. थोडी फुरसत. तो अब लग रहा है कि कैसे खत्म होंगी 563 प्रेम कहानियाँ. प्यार की ताक़त पर अजगर को भरोसा है. वह निकाल ही लेगा अपना रास्ता. कहते हैं न - दिल के तर्क अजीब होते हैं, जो तर्कों को समझ नहीं आते. दुनिया प्यार कर रही है. एक राष्ट्राध्यक्ष अपनी प्रेमिका को साथ लेकर खड़ी जाना चाह रहा था. एक सियासी शख्स में बदल चुका एक क्रिकेट का खिलाड़ी अपनी अलग हो चुकी पत्नी से बौक्सर शौर्ट्स में फ़ोन पर बात कर रहा है. प्यार अपनी जगह बना रहा है. रेडियो से आती ख़बरों, बाहर खेलते बच्चों और बोरियत से बोर होकर खरीदारी करने निकली औरतों, साईबर कैफे में चैट करते लोगों के बीच. बहुत सारी दुनियादारी, लुच्चई, नंगे स्वार्थों, महत्वाकांक्षाओं के बीच थोडी सी गुंजाइश है एसएमएस पर एक नाम लिखने की और उसे पढ़कर मुस्कुराने की. क्या इस ब्लॉग को पढने वालों के पास कहानियाँ हैं? क्या उन्होंने प्यार किया है? क्या वे इसमे अपनी कहानी देना चाहेंगे? सादर आमंत्रित हैं.

Sunday, January 13, 2008

(कायदे आज़म से फायदे आज़म तक) मैं भी बनना चाहता हूँ प्रधानमंत्री: एक गुप्त डायरी का सनसनीखेज पन्ना

पहले तो भाईसाहब मैं इस देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ. भले ही प्रधानमंत्री बनना रेलगाड़ी के जनरल डब्बे की सीट नहीं है की गमछा डाला और हो गया कब्जा, पर फिर भी कभी न कभी तो दावा करना था मुझे. आख़िर कितना कुछ किया है मैंने इसके लिए. रथयात्रा की, दंगे करवाए, मस्जिद तोड़ी, दंगे करवाए, चुनाव हुए, दंगे करवाए, यहाँ तक कि नरेन्द्र के राज में एक गर्भवती औरत का पेट तक फाड़ा गया, सोनिया गाँधी का विरोध किया, जिन्ना का समर्थन किया, पर मेरा नंबर नहीं आया. इस बार मैं कोई चांस नहीं लेना चाहता. ये मेरा आखिरी और इकलौता चांस है. और इस देश के प्रधान मंत्री बनने के लिए अगर इशटाइल मारनी हो तो नेहरू से बेहतरीन और कोई शख्स नहीं है. और जब भारतीय जनता पार्टी का काफी कुछ कांग्रेसीकरण हो ही चुका है तो नेहरू से परहेज कैसा. हाँ हम हमेशा नेहरू और परिवार की निंदा करते रहेंगे. हाँ अन्तर राष्ट्रीय मंचों पर हम उन्ही के गुण गान करेंगे क्योंकि फ्रेंक्ली हमारे परिवार में इतने बड़े दायरे रखने वाले लोग कभी थे ही नहीं. इसलिए पहले मैंने वाजपेयी जी के साथ वह किया जो नेहरू ने गाँधी के साथ किया था. मतलब देव तुल्य स्तर पर महान कर देने का कुछ ऐसा एहसान कि अटल जी बजे अपने मन की बात बोलने की जगह एक तो चुप रहे और जब भी बोलें मेरे समर्थन में बोलें. अच्छा ये ऐलान करना राष्ट्रीय चुनाव के दौरान नहीं बल्कि एक राज्य के चुनाव के दौरान करना जरूरी था कि भाजपा के प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार मैं हूँ, नहीं तो मालूम पड़ता कि गुजरात के लोग कहीं किसी नई खुशफ़हमी के शिकार हो जाते. हालांकि अभी तय नहीं हुआ है कि एनडीए के सभी लोग मेरी उम्मीदवारी पर अपना ठप्पा लगायेंगे या नहीं ( बाई जॉर्ज !!) पर पहले से ही नाम उछालने में क्या हर्ज है. एक तरफ़ तो तो बड़े बुजुर्ग का निपटाया दूसरी तरफ़ नरेन्द्र टाइप के लोगों को भी बता दिया कि उन्हें अभी गुजरात से बाहर नहीं जाना है. अच्छा नफरत से, खून खराबे से, तोड़फोड़ से, कर्फ्यू और जांच कमीशनों से जितने वोट हमें मिलने थे मिल गए. पर उससे तो मेरा प्रधानमंत्री बनना मुमकिन नहीं. तो अब नई चालें चलनी पड़ेगी. आप देख रहे हैं न भाईसाहब के कैसे अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न कि मांग रखकर मैंने एक धेले से कई शिकार करने कि शानदार कोशिश की. एक तो अटल जी इससे अमर हो जायेंगे और इसके बदले वे मुझे प्रधानमंत्री बनने में पूरी मदद करेंगे. मेरा अगला मास्टर स्ट्रोक किसी आमिर नाम के लड़के की फ़िल्म देख कर आंसू बहने की ख़बर फैलाना है. जो ख़ुद आमिर फैला रहा है. क्योंकि उसे गुजरात और हमारे दूसरे इलाकों में अपना धंधा करना है और हमें इस तरह के मुसलमानों की जरूरत है. अच्छा भाई साहब लोग तो याद नहीं रखेंगे न कि इस लौह पुरूष के डुप्लीकेट का दिल वीभत्स दंगे करवाने, गर्भवती औरतों का पेट फाड़ने जैसी घटनाओं के बाद भी दुखी नहीं हुआ था, वह एक बच्चे कि कहानी देखकर तड़प उठा. सुषमा स्वराज जैसी शहरी औरतों की राय में मेरे सेंटीमेंटल हो जाना मुझे औरतों में काफ़ी लोकप्रिय कर देगा. शायद उन्हें घडियाली आंसू जैसे मुहावरे याद नहीं आयेंगे. शायद वे सोचेंगे कि वह कोई और व्यक्ति था. शायद उन्हें पता नहीं चलेगा कि मैंने नफरत के लफ्जों को अपने जबडे से चबाकर बोलना बंद कर दिया है. मैं अब मनुष्य होने की इमेज को आगे बढ़ाना चाहता हूँ क्योंकि नफरत ने मुझे जहाँ तक पहुँचाना था, पहुँचा दिया. पर बात नहीं बनी. अब आगे बढ़ने के लिए शान्ति, सौहार्द्र, मोहब्बत का सहारा लेना पड़ेगा. पहले बात दूसरी थी. तब देश को बांटकर पार्टी को मजबूत करना था. अब पार्टी मजबूत हो न हो, प्रधानमंत्री बनने का चांस नहीं खोना है. आख़िर उसूलन हर हिरोइन अंग प्रदर्शन के ख़िलाफ़ होती है, पर कहानी की मांग पर तो कपड़े उतरने को राजी हो जाती हैं. देखिये न, वक्त ही कितना बचा है? अब नहीं तो फिर कब?

Thursday, January 10, 2008

LOVE STORY # 539: प्यार. सचमुच ( दो खतों से झांकता हुआ)

चिट्ठी एक - फ़ोन पर तुमसे बात और फिर तुम्हारा ख़त बढ़िया रेसिपी थी रात में नींद उडाने की और सुबह सरदर्द की. तुम सारे मर्द अपना मामला सामने रखने और कहने में इतने साफगो क्यों होते हो? आख़िर क्या चाहते हो मुझसे? की मैं जवाब में वही करूं जो तुम कह रहे हो? क्या हासिल होगा इससे? क्या मिलेगा तुम्हे? क्या कोई फ़ायदा है जज्बातों का पोस्टमोर्टम करने से? मुझमे न तो तुम्हारे जितनी ताक़त है और न ही हिम्मत. फर्क क्या पड़ेगा हम वे शब्द कहें या न कहें. सच तो ये है की तुम चार दिनों में लौट जाओगे और फिर व्यस्त हो जाओगे अपने काम में, दुनिया में. और ये तूफ़ान वक्त के साथ ठंडा पड़ जाएगा. ज़िंदगी वैसे ही बहुत पेचीदा है.. इसे सिम्पल ही रखो प्लीज. ये मेरी विनती भी है, दलील भी और हुक्म भी. हमें इस बारे में और बात नहीं करनी चाहिए वरना हमारा मिलना मुश्किल हो जाएगा. मुझे अपने आप से नफरत है तुम्हे ये बताने के लिए पर मैं भीतर तक हिली हुई हूँ. समझने की कोशिश करो प्लीज.
चिट्ठी दो- क्यों तुम इसे रोकना चाहती हो? ये सब इतना सच्चा है. ये सब इतना तुम है. खड़े हो इसके लिए. तूफ़ान तो तुम हो. मैं सिर्फ़ तुम्हे तुम होता हुआ देख रहा हूँ. दावा करो ख़ुद पर. ख़ुद पर यकीन करो और अपने अस्तित्व के प्रति अपनी ईमानदारी पर भी. एक लंबे समय से तुम त्याग की देवी रही हो. अब वक्त है तुम तुम हो जाओ.
चलते चलते एक और बेहूदी सी बात. पर मुझे लगता है मुझे कह देना चाहिए.
प्यार. सचमुच.

हरिओम शरण: मैली चादर ओढ़ के कैसे

वो ज़माना अलग था। बोर्डिंग स्कूल में अलसुबह जब पीटी के लिए उठाया जाता, तो हवा में उनकी आवाज़ तैर रही होती। टेप रिकॉर्डर और आडियो कैसेट तब प्रचलित होना शुरू ही हुए थे। और एल पी रेकॉर्ड ही ज्यादा बजा करते थे। सातवें दशक के आख़िरी सालों में जगजीत सिंह चित्रा के साथ गजलें ही गाया करते थे। अनूप जलोटा को कोई नहीं जानता था। न तो टी सीरीज़ ने उस वक़्त संगीत चोरी को एक पेशेवर धंधे में बदला था और न ही म्यूजिक टुडे और दूसरी कंपनियों ने थोक में शास्त्रीय संगीतज्ञों को उपलब्ध करवाना शुरू किया था। अनुराधा पौडवाल का हुनर और वैष्णो देवी का खजाना गुलशन कुमार को हासिल नहीं हुआ था और वो शायद तब करौल बाग़ में फलों का रस या लस्सी बेच रहा था. उस वक़्त ग़ैर फिल्मी भक्ति संगीत के सबसे बडे हीरो हरिओम शरण थे। एच एम् वी के दो एलबम पुष्पांजलि और प्रेमांजलि के दो रेकॉर्ड हमारे स्कूल के पब्लिक एड्रेस सिस्टम में बजा करते थे. वह बाज़ार के खुलने और नंगे होने और संस्कार और आस्था चॅनल के बहुत पहले का वक्त था. मार्केट फोर्सेस ने संगीत को तब बाजारू और हवा को उतना प्रदूषित नहीं बनाया था. हरिओम शरण तब हमारी सुबह होने का बैक ग्राउंड में बजते थे. चोंच खोलते परिंदों और सुबह की बारिश की तरह. तब आधी नींद में दिन के लिए तैयार होते हुए हरी ओम शरण जगाने की लोरी की तरह काम करते थे. मैंने उनके बाकी रेकॉर्ड्स तो नहीं सुने, पर उनके ये भजन बेहतरीन थे. उनमे बहुत सारी करुना थी, एक खास किस्म का दारिद्र्य था, और इश्वर के सामने याचना से कहीं ज्यादा मनुष्य होने का मामूलीपन था. रीवा के स्कूल और सिविललाइन्स गरियाबंद के मन्दिर में उनके ही भजन बजते थे ख़ास तौर पर तब जब ढोल मंजीरों के साथ लोग ख़ुद नहीं गा रहे होते थे.
· मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तिहारे आऊँ
· गोपाला हरी का प्यार नाम है, नंदलाला हरी का प्यारा नाम है, श्री राधे गोबिन्दा मन भजले हरी का प्यारा नाम
· दाता एक राम दुखियारी सारी दुनिया
· तेरा राम जी करेंगे बेडा पार उदासी मन कहे को डरे
· साईं तेरी याद महासुखदाई

तब इन शब्दों और उनके मतलब से ज्यादा गहरी छाप इन भजनों के धुनों की थी। तब शोर कितना कम था. कल ही कश्मीर के मरहूम शायर आगा शहीद अली की अंग्रेजी ग़ज़लों में कहीं पढ़ा की - खुदा पर मैं न कर सका, पर इबादत पर भरोसा पूरा था. सपनों में भाप के इंजनों की तरह जब भक्ति संगीत की बात होगी तब लम्पट टी सीरीज़ के चोर बाज़ार की नहीं बल्कि हरिओम शरण कर आवाज़ ही जेहन में होगी. यूनुस के रेडियोवाणी पर हरिओम शरण के भजन यहाँ आप सुन सकते हैं और उनके बारे में और जानकारी यहाँ हासिल करें.

LOVE STORY # 540 : सुखांत वाली कहानी

और फिर वे एक दिन मिले. उसने कहा - बीस साल कहाँ रहे. मैं तुम्हे कब से ढूंढ रहा था.उसने कहा - सिगरेट लेने ही तो गया था. और दोनो हंस पड़े. इस बीच पता ही नहीं चला कि वह बीस साल का एक पल था या फिर एक पल का बीस साल.

Wednesday, January 9, 2008

LOVE STORY # 541 : एक दिन अचानक

एक दिन अचानक वह आया। बीस साल पहले वह चला गया था। कहा था साथ चलो। उसने मना कर दिया था। वह कैसे जा सकती थी। वह तैयार नहीं थी। बीच का बहुत सारा वक़्त दोनो के लिए अजीब रहा। उनके सम्पर्क नाम को ही रहे। दोस्तों और जानने वालों के जरिये। बीस साल बाद वह आया। एक दिन अचानक। उसे अंदाजा नहीं था कि ऐसा भी कभी होगा। इन बीस सालों में उसने कई बार उसके और इस रिश्ते के बारे में सोचा। उसे कई बार ये रिश्ता मुश्किलों से बचा ले गया और कई बार उसे लगा कि इस रिश्ते के कारण उसे तकलीफें झेलनी पड़ी हैं। उसने कहा साथ चलो। उसने फिर मना कर दिया। वह तैयार नहीं थी। उसने कहा वह समझ सकता है। और चला गया। उसने सोचा कि वह उसके साथ ज्यादा नरमी से पेश आ सकती थी। वे आराम से गर्मजोशी से बातें
कर सकते थे। कम से कम अच्छे वाकिफों की तरह। गुम हुए दोस्तों और पुराने प्रेमिओं की तरह। वे अच्छे से मिल सकते थे अगर वह इस तरह से अचानक न आता। बीस साल बाद भी जब उसने पूछा तो वह उसके लिए तैयार नहीं थी। पिछली बार दोनो में बहुत गुस्सा था। इस बार करुणा थी।