Wednesday, February 27, 2008

मुम्बई पोस्टकार्ड छहः गाय को रोटी देने के लिए टैक्सी लेनी पड़ी थी


तीन साल पहले ही वह मुम्बई आया था किसी काम से। कुछ ही समय पहले उसके पिता नहीं रहे थे। वह बड़ा बेटा था। मुम्बई में उस बरस बादल फट पड़े थे। चेरापूंजी से ज्यादा बारिश हुई थी। एक दिन उसे गाय के लिए रोटी निकालनी थी। वह रोटी पर घी और चीनी चुपड़कर निकल पड़ा बारिश में गाय ढूंढने। प्रभादेवी में तब हवा तेज थी और छाता उड़ा जा रहा था। रोटी प्लास्टिक की थैली में लिपटी हुई थी। वह इस कस्बाई यकीन से बाहर निकला था कि नुक्कड़ के पास जहां भी लोग कचरा फेंकते होंगे, गाय मिल ही जाएगी। पर गाय कहीं नहीं थी। अनजान शहर के अजनबियों से वह पूछता कि गाय कहां मिलेगी, कोई कहता इधर जाओ, दरिया किनारे खड़ी रहती हैं गाय। वह समंदर के किनारे गाय ढूंढने गया। नहीं मिली। सिद्धिविनायक मंदिर के आसपास भी नहीं। प्रभादेवी मंदिर पर भी नहीं। गाय कही नहीं। उसे लगा कि गाय नहीं मिली तो उसे दिवंगत पिता भूखे रह जाएंगे। वह भटकता रहा। पान वालों से, दुकान वालों से पूछता रहा, गाय कहां मिलेगी। वह खाली पेट था और काम पर जाने का समय भी बीता जा रहा था। उसने एक टैक्सी वाले से पूछा। उसने बोला गाय तो यहां हर कहीं मिल जाती हैं। उसने कहा तो ले चलो मुझे वहां। टैक्सी वाला भी बड़े यकीन से उस बिल्डिंग के पीछे, इस कूड़े घर के पास ले गया, जहां उसने गाय हमेशा देखी थीं। आज कहीं गाय नहीं थी। टैक्सी ड्राइवर ने पूछा क्यों बहुत जरूरी है क्या। उसने कहा हां, पिताजी के लिए रोटी निकालनी है। टैक्सी ड्राइवर ने फिर कुछ नहीं पूछा। वह लोगों से खुद ही पूछने लगा कि कहीं गाय देखी है। लोग बोलते इतनी बारिश में कहां ढूंढने निकले हो गाय। ड्राइवर कहता कि आप समझ ही नहीं रहे, जरूरी है भाई। गली गली घूमते हुए फिर वे दादर आ गये। बारिश में कई रास्ते बंद। कई जगह गाड़ियां फंसी हुई। वहां एक जैन मंदिर के बाहर बोरा लपेटे हुए दूर से दो बछड़े दिखलाई दिए। वे एक औरत के साथ थे। उसके एक हाथ में घास थी। दूसरी में गाय और बछड़े की डोर। दोनों छोटे थे। उसने पूछा गाय को रोटी देनी है। औरत ने कहा पैसे लगेंगे। उसने बीस रूपये औरत को दिये। औरत ने गाय आगे कर दी।

एक बड़ा ही सर्रियल नजारा था। दादर, घी-चीनी से चुपड़ी रोटी, बारिश, बोरे में लिपटी गाय, पैसे मांगती औरत और वह टैक्सी वाला। पिता की याद। और ये भी कि उन्हें घी कितना पसंद था।
चलो प्रभादेवी वापस। गाड़ी में दोनों चुप रहे। प्रभादेवी पंहुचे तो उसने पूछा कितने पैसे। ड्राइवर ने कहा एक सौ साठ रूपये। उसने उसके पास जितने पैसे थे, उसे देकर बाहर निकल आया। बारिश तेज थी और सड़क पर टखने तक पानी बह रहा था।

Monday, February 25, 2008

मुंबई पोस्टकार्ड पांचः मेरी प्यारी रंडी, मध्य वर्गीय आकाश, और बादलों में तैरता कैफे और प्यार

कविताओं में मुंबई के कई अवतार हैं. नामदेव धासाल एक दलित मराठी कवि की निगाह अलग है, अंग्रेजी में लिखने वाले निसिम एजेकील की अलग और गुजराती मध्यवर्ग के सुरेश दलाल की अलग. तीनों की कविताएं मैंने बॉम्बेः मौजेक ऑफ मॉडर्न कल्चर नाम के संकलन में पढ़ीं, जो मुंबई पर आयोजित महत्वपूरण सेमिनार के बाद सुजाता पटेल और एलिस थॉर्नर ने संपादित कर बनाई हैं. ये किताब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने छापी है. कविताओं का अनुवाद थोड़ा घूमा फिरा हो सकता है, क्योंकि वह अंग्रेजी से होकर आया है.

मुंबई, मुंबई मेरी प्यारी रंडी (एक लंबी कविता के कुछ अंश)
नामदेव धासाल


सालों सालों के बाद भी
वे लौट न सके जहां से आये थे
नुक्सान ज्यादा सहा
थोड़े फायदे के लिए
वक़्त कोई राहत नहीं देता
मेरे लिए बचा कर रखना दर्द का एक पल
चीथड़ पहने भिखारी की तरह
मैं तुझसे दूर नहीं जाऊंगा
मुम्बई, मेरी प्यारी रंडी
मैं पहले तुझे लूटूंगा, फिर जाऊंगा.
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ओ सूर्य
इस शहर को पी लो
ओ पृथ्वी, इस शहर को समेट लो अपने गर्भ में
ओ जल, गला घोंट कर मार दो इस शहर को
सिर्फ धूल और हवा में इंसान अकेला वारिस है
नमक पर बैठे टिड्डे
बादलों के नाटक में, एक दूरी खींच दी जाती है
अनुवांशिक बीमारियां फिर लौटती हैं
लक्ष्मी, सरस्वती बड़ी पक्षपाती वैश्याएं हैं
उन्हें बुलाया था हमने, पर वे कभी नहीं आईं
हमने कहा, हमारे नीचे बिछ जाओ, पर मना कर दिया उन्होंने
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प्यारी मुंबई, तुम हमसे सच्ची और वफादार रहना
हमारे बिस्तरों को जिंदा रखना
अमरत्व की बंसुरी को खेलना
हमारे सपनो के साथ खेलना
हमारे बीजों को आग फूंकते रहने
ताकि वे फल दे सकें

ओ बंजारन जिस्मफरोश
ओ पतिता तवायफ
ओ खांदोबा की रखैल
ओ लंपट दिलफरेब
ओ सोने के दिल वाली रंडी तू
मैं चीथड़े पहने भिखारी की तरह तुझसे दूर न जाउंगा
मैं तुझे तेरी हड्डियों तक नंगा करूंगा
आओ अब गरीब शैतानों के लिए भी अपने स्वर्ग के दरवाजे खोल
मुंबई मेरी प्यारी रंडी
मैं तुझ पर सवार होकर
तेरी बोलती बंद कर दूंगा
फिर जाऊंगा

(मराठी से अंग्रेजी में मंगेश कुलकर्णी और अभय सरदेसाई द्वारा अनूदितः बाम्बे मौसैक ऑफ मॉडर्न कल्चर किताब से साभार)

एक मध्यम वर्गीय आकाश
सुरेश दलाल


कल जो सूरज डूबा था
आज स्याही की बूंद में बदल गया है
घरेलू हिसाब की किताब पर

आज का सूरज
एक रुमाल की गद्दी पर जमा हुआ
मेरी जेब में

कल का सूरज
तनख्वाह का दिन है
तेजी से उछलता कूदता हुआ
मालिक मकान, परचून, दूधवाले, अख़बार वाले, स्कूल की फी, कपड़े वगैरह
फिर खत्म होगा
हिसाब की किताब पर
स्याही की बूंद की तरह


लव सोनेट
निसिम एजेकील

परिंदों के बीच पहाड़ी पर कैफे
बहुत आसानी से
गुजरते बादलों को पनाह दे सकता था अपने यहां

शहर की रोशनियां जल उठी हैं
तुम और मैं शब्दों के इंतजार में हैं
गर्म रातों में ओस की तरह हमारा प्यार जम रहा है
हवा ने तुम्हारे बाल बेतरतीब कर दिये हैं
हम समंदर की तरफ राहत के लिए देखते हैं
और उसे घुमड़ता और नमकीन महसूस करते हैं
उत्तेजना के बरकरार रहस्य की तरह

पहाड़ी से नीचे किसी बादल पर सवार फिसलते हुए
प्रेमियों की तरह गौरवान्वित पर अबूझ
हम खो जाते हैं, भीड़ की धकापेल में
अपनी अनिश्चित नियति से निडर होकर नहीं
हम देखते हैं कौतूहल से सड़क और आसमान को
मर जाना- एक तयशुदा खुशी होगी

मुंबई पोस्टकार्ड चारः टैक्सियों की तरह इस खटारा नज़्म का मीटर भी खराब़ है, पर मीटर पर नहीं मंजर पर निगाह रखिये

(जवानी बरबाद कर बुढ़ापे में पढ़ाई करने निकले एक दोस्त की स्क्रिप्ट के लिए एक जानकार की मुम्बई पर लिखी नज़्म, जिसको लेकर ये अफसोस सालता रहा कि थोड़ा मीटर ठीक होता, तो सफर भी बेहतर कटता... नौश फरमाइए युनुस मियां की उन शायरियों की रौशनी में, जो उन्होंने पिछले पोस्ट पर चस्पा की थीं)

सपनों में जागता है ये शहर मुंबई
नींदों में भागता है ये शहर मुम्बई
भागता और दौड़ता आता है, जाता है
कहीं पहुँच भी पाता है ये शहर मुम्बई

भीड़ में चेहरे लिए कुछ गुमशुदा से
इस शहर के लोग हैं, थोड़े जुदा से
न जमीं के पास हैं, न आसमाँ के
हर सफर कुछ दूर है अपने मकाँ से

सपनों में जागता है ये शहर मुम्बई
नींदों में भागता है ये शहर मुम्बई

कोई सिक्का उछाला हुआ है हवा में
सर झुके हैं कभी मन्नत, कभी दुआ में
किस्मत कौन सा जुम्मा चुनेगी, तय नहीं है
ये यकीं है दिन वह बहुत दूर नहीं है

सपनों में जागता है ये शहर मुम्बई
नींदों में भागता है ये शहर मुम्बई
बहुत मुमकिन है यहाँ पैरों को जमीं न मिले
धक्के बहुत हों, हुनर को मौके न मिलें
सैकड़ों उम्मीदों में कोई एक चमक जाएगा
मायूसी का पूरा मंजर खुशी में बदल जाएगा

सपनों में जागता है ये शहर मुम्बई
नींदों में भागता है ये शहर मुम्बई

फोटोः मिलानी मॉरिस, फ्लिकर

Saturday, February 23, 2008

मुम्बई पोस्टकार्ड तीनः मेरे हाथ पर कब्जा कर हथेली पर उग आई झुग्गी


शोर के बाद दुर्गंध के भभकों और बाजारू खाने में ठूंसी हुई गंध अंधेरी की औरतों के पसीने से टकराकर लौटती डिऑडरेंट बदबुओं के बाद मैं सूंघने की शक्ति खो चुका हूं और स्वाद की भी। औद्योगिक अस्तित्व की लड़ाई में जीना, जीते रहना पहली शर्त है किसी भी कीमत पर, भले ही मनुष्यता की। परेल में एक जगह खड़े होकर बाईं तरफ देखते हुए मुझे यकायक पता चला कि मेरे दांए हाथ पर गरीब झुग्गी झोपड़ियों ने अतिक्रमण कर लिया है। हाथ को झटकने का एक पूरा व्याकरण है। जैसे मच्छर को भगाने, मक्खी को उड़ाने का होता है। यह व्याकरण मजबूरी आपको सिखाती है। आप जितने मजबूर होते हैं, उतना जल्दी ये सीख लेते हैं। एक दोस्त कहता है कि जिनके टॉयलेट के दरवाजे मुम्बई में भीतर की तरफ खुलते हैं, वह उन लोगों को दूर से ही पहचान सकता है। ये लोग ज्यादा फ्लैक्सिबल, अकोमोडेटिव होते हैं। जैसे गये जमाने में दिल्ली में एक दोस्त ने कहा था कि यहां मर्द अंशों में प्यार और अंशों में बलात्कार करते हैं और औरतें अपने बैग्स का इस्तेमाल अंजीर के पत्तों की तरह करती हैं, इज्ज़त बचाने के लिए। मुम्बई की मजबूरी मुझे व्याकरण सिखा तो रही हैं, पर मैं बहुत तेज विद्यार्थी कभी भी नहीं था। बहुत बार भीड़ में चलते हुए मुझे शतरंज के घोड़े की चाल याद आई, जो ढाई घर चल कर आपका रास्ता और रफ्तार दोनों रोक देता था।
मान लीजिए सामने वाले आदमी को एड्स है। मान लीजिए मुझे नहीं है। एक मादा एनोफीलिस सामने वाले को काटती है। उसका खून पीती है। फिर वह मुझे काटती है। तड़ाक से मैं उस मादा एनोफिलीस को मारता हूं। उस आदमी का खून मेरे खून के संपर्क में आता है। क्या तब भी कुनैन खाने से मेरा बुखार उतर जाएगा? कुछ नहीं होगा दोस्त लोग कहते हैं। वे नहीं कहते वे कई साल से मुम्बई मे फाइट मार रहे हैं। उनके भीतर का कस्बा कहता है, जो मुझे पहचानता है और प्यार भी करता है। पर उनके भीतर का महानगर जल्दी में है, थका हुआ है, बताता नहीं पर थोड़ा हारा हुआ है। महानगर कस्बे से बचना चाहता है। कस्बा महानगर में जिंदा रखने के लिए अतीत का ऑक्सीजन वर्तमान के फेफड़ों में भरता है। वह शहर के आयतन से एक पल के लिए ही आपको बाहर ला पाता है। फिर औद्योगिक अस्तित्व के अपने मार्केट फोर्सेस हैं। तरक्की के हाईवे पर कई सारी पुलिया संकीर्ण हैं।
फोटो: मारिया वित्तोरिअरिवा/ फ्लिकर

Friday, February 22, 2008

मुम्बई पोस्टकार्ड दोः कोई हिलेगा तो फैलने की जगह मिलेगी भाई

ये शहर इंतजार में है, मौत के, मौके के। और कई बार मौत ही मौका है। अपनी या दूसरे की। कोई हिलेगा तो फैलने की जगह मिलेगी भाई। पर जब फैलने की जगह मिलेगी, तब क्या पांव हिलने लायक जान लिये होंगे। पता नहीं, पर इंतजार उम्मीद पर कायम है। मुम्बई ने मुझपर कुछ ऐसा ही रंग दिखाया, जो भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश ने किरण बेदी पर दिखाया था (क्या वे जिलेट शेविंग किट के नये कमर्शियल के लिए साइन कर ली गई हैं ? नहीं न, शायद अफवाह ही है)। मैं मैं न रहा। जब आप न सोच के रहे न समझ के, तो क्या फर्क पड़ता है कि मैं सांताक्रुज हवाई अड्डे पर अपना गंतव्य खो चुका बैगेज हूं। मेरे आसपास शोर है, हॉर्न का, पटरियों पर दौड़ती रेलगाडियों का, हवाईजहाज का, राज ठाकरे का, रिलायंस फोन पर की जा रही चुहल का (यस आई लव यू टू मच डार्लिंग यस आई डू)। जो संगीत, शास्त्रीय आलाप मेरी आत्मा की गुप्त गुफाओं में द्रव्य की तरह भर जाता था, मनुष्य होने के बारीक और मद्धम और जरूरी अहसासों को सामने लाते हुए (प्यार उनमें से एक है, खुशी दूसरी, खुशमिजाजी तीसरी) यकायक गायब हो गया। सब बुरा नहीं है। कई बार अच्छी हवा चलती है। कई बार वक्त आपको ढूंढ ही निकालता है एक लंबी सैर या चहलकदमी के लिए। कई बार खुशी भी मौका ढूंढ लेती है खुद को मनाने का। किसी दीवार पर ठिठके हैं समीर मंडल के वॉटर कलर्स ( गतिमान होने का मंत्र पढ़े जाने का इंतजार करते) या बैजू परधान की पेंटिंग। पर वह सब थोड़ा गुमशुदा है और इसलिए थोड़ा हलाकान परेशान भी।

Thursday, February 21, 2008

मुम्बई पोस्टकार्ड एकः फेफड़े के लिए कम पड़ता है ऑक्सीजन का आसमान

मुम्बई में संगीत नहीं है। शोर है। सफेद शोर। दो महीनों में एक किताब खत्म नहीं कर पाया। एक बड़े शहर का अपना महामशीनी विन्यास होता है। लंदन का भी है और पेरिस, न्यूयॉर्क का भी। पर यहां मशीन न सिर्फ पुरानी है, बल्कि जंग लगी भी है। फेफड़ों में सांस भर लेने की जद्दोजहद है, हर फेफड़े को ऑक्सीजन के लिए आसमान कम सा पड़ रहा है। ये महामशीन उगलती और निगलती है करोड़ों लोगों को एक समय और स्थान के दमघोंटू मंजर में। और इंसान शहर में नहीं, शहर इंसान में रहता है। मशीन इंसान के लिए नहीं है। इंसान मशीन के लिए मुड़ा तुड़ा जा रहा है। हमेशा हंसता था कि मुम्बई में हर कोई ‘कम्प्रोमाइजिंग पोजिशन’ में पाया जाता है। आइना देखा तो लगा कि हंसी नहीं आ रही। बहुत सारे कबूतर जब मरीन ड्राइव पर एक साथ उड़ते देखे तो कई बार मौत का ख्याल आया। कई पारसी अग्यारियों के आसपास वीरान झरोखों में कई स्टिल लाइफ चेहरे वहीं पर रोज एक आदत। और जब झरोखा या चेहरा एक दिन अचानक गायब हो जाएगा दबे पांव उठाईगीर की सफाई से, तब पता भी नहीं चलेगा कि वे इस अफरातफरी भरे दृश्य का हिस्सा थे। एक मुम्बई हिल रहा है। एक मुम्बई ने हिलना छोड़ दिया है। आप कतार में हैं, कृपया प्रतीक्षा कीजिए। मैं न सोच सका, न पढ़ सका और ठीक से लिख भी नहीं सका। हरदम उस अगले पल के पलक झपकते ही (बकौल अज्ञेय- औचक.. हाहाहा) अतीत हो जाने का खतरा और कान उठाए कुत्ते, सीटी बजाते चौकीदार और दुम उठाई बिल्ली तरह चौकस वर्तमान, भिखारियों, हिजड़ों, जेबकतरों से सावधान रहने में ही थक और धक गया कस्बाई आदमी। फोटोः फ्लिकर डीडबल्यूरॉलिंसन

Wednesday, February 20, 2008

उनकी मोटी उंगलियों में अंगूठियां कुछ इस कदर ठुंसी हुई थी कि लगता था उनका हाथ सिर्फ जघन्य कृत्यों के लिए बना है

उनकी मोटी उंगलियों में कई सारी अंगूठिंया ठुंसी हुई थीं। पता नहीं कितने सारे ग्रह, नक्षत्रों को शांत करने, कितने अभिशापों से मुक्त, कितनी मनौतियों को पूरा करने। एक एक उंगली में दो या तीन अंगूठी। वे अंगूठियां शायद शुरू में चमकती और सुंदर रही होंगी जब तक वे जेवरात की दुकान पर थीं। पर कालांतर में वे उन उंगलियों की तरह ही बेडौल होकर लधर गई थीं। उंगलियों में ठुंसी हुई उन अंगूठियों को जिस यकीन से अपनाया गया था, उसे देखकर लगता था कि इस हाथ का इस्तेमाल सिर्फ जघन्य इरादों को आपराधिक अंजाम देने के लिए किया गया है। दरअसल उन उंगलियों से अटैचमैंट की तरह जुड़ा इंसान पाप से नहीं सिर्फ शाप से डरता होगा। और ये अंगूठियां इस दादागिरी वाले यकीन का हिस्सा थीं कि शाप से पहले ही उन्हें माफ कर दिया जाएगा। रात में या अल सुबह जब उन अंगूठियों को उतारा जाता होगा, तो ये कल्पना करना मुश्किल था, कि वे उंगलियां किस कदर अधूरी और बेबस लगती होंगी। इस बीच हाथ एक और पाप करते। एक और अंगूठी एक और ग्रह को शांत करने एक और शाप से मुक्त होने एक और कुपित देवता को खुश करने के लिए एक और अंगुली में ठुंस जाती। मौका ए वारदात पर सुबूत इकट्ठे करने के लिए जब जासूस उंगलियों का निशान लेने की कोशिश करते, तो अंगूठियां उन्हें ठेंगा दिखा देती। बिल्कुल डिप्लोमैटिक पासपोर्ट की तरह वे आरोप और सजा से इम्यून थीं।