Wednesday, March 26, 2008

जोशिम की कविता पढने के बाद

(जोशिम की कविता यहाँ पढ़ें)
बहुत दिनों तक मैं प्यार के बारे में सोचता रहा. और प्यार मेरे बारे में. सच में जो हुआ वह उससे काफ़ी कम था जो स्मृति और सपनों में गड्ड मड्ड रहा. और फिर उसने अपना काम किया. कई सारे वसंत, कई सारी दूब खिलने की राह देख रही थी, खिल उठी. माटी का कन्नौजिया इत्तर हम में महकने लगा. एक नदी जंगल में बहने लगी, एक जंगल नदी में बहने लगा. एक वक्त ऐसा आया कि लगा और कोई भी तो खुशी नहीं बची है हासिल करने को. हालांकि वह भी एक हवा के झोंके की तरह अभी अभी तो यहीं था. और पता नहीं कब हाथ से फिसल गया. वहाँ दो ही विकल्प थे. एक तो कुछ और खुशियों के लिए जगह बनाना, थोड़ा और उगने के लिए आसमान तलाश करना या फिर मान लेना की सड़ने की शुरुआत हो चुकी है. मौत एक छाया की तरह, इशारे की तरह आती है. अपने शरीर पर नीला रंग लगाये हुए एक बहुरूपिये के संकेतों में, पूर्वभासों में, यकायक उड़ते हुए कबूतरों और झरोखों से झांकते गहरी आंखों वाले बूढों की रहस्यमय चमगादड़ नीरवता के साथ. वह तयशुदा आयोजन की तरह दबोचती है. ज़िंदगी की तरह कौतुक, आश्चर्यों और चमत्कारों की तरह घटित नहीं होती, जहाँ जिंदगी अपने भरोसे चलती है. कितनी बार जीना एक सहज दुस्साहस की तरह अपना पांव आगे बढ़ा लेता है. वह जानने से आगे की कोई बात होती है जैसे एक बच्चे में पहला डग भरने का प्राचीनतम भरोसा होता है. भले ही वह मौत के एहसास को देखना ही क्यों न हो. एक झड़ते हुए पत्ते को ठिठक कर एक बार हरी दुनिया और फोटो सिंथेसिस के नाम एक हलफिया बयान जारी नहीं करना चाहिए?एक सच है जो हमारी चारो तरफ़ घटित हो रहा है. एक सत्य है जो हमारे भीतर है. कई ऐसे पल हैं जहाँ सत्य और सच एक साथ शराब पीने या समझौता करने बैठते हैं. कई बार वह धुंध या खुमार कहीं भी हो जाता है. कभी एक जलसे की तरह कभी एक बवाल की. फिर बहुत सारा न जिए का हिसाब सुलटा लिया जाता है, बहुत सारे उस सबके साथ जो जिया गया. जब आप एक ऐसे शहर में सुबह को उठते हैं, जहाँ आप किसी को नहीं जानते तो वह धुंध थोडी देर तक पीछा करती है.

Wednesday, March 19, 2008

LOVE STORY 536: प्यार का रशियन रौलेट

उसने अपने मोबाइल पर टाइप किया .... तलाक... तलाक़... तलाक़
और ड्राफ्ट सेव कर के रख लिया