Wednesday, April 9, 2008

LOVE STORY # 534: हाशिये से आता है वह जो तब दर्ज नहीं हुआ था

थोडी दूर में पन चक्की है पहाड़ी पर। कुछ हिलता नहीं है। अंधेरे में कोई रेडियो बंद करना भूल गया है और उसका अनाउन्सर घर जा चुका है चार लड़कियों के बाद लड़का पैदा करने के लिए अमावस से चौथी रात सहवास करने। यादें यकायक इकठ्ठा होती हैं। उन्हें पता नहीं क्यों जल्दी है अपनी गुमशुदगी से बाहर आकर इस रजिस्टर में दर्ज हो जाने की। पहाड़ी में पनचक्की अब चलती नहीं है। जशपुर में रौशनी अब ६० वाट के बल्ब बिजली से करते हैं। गरियाबंद में मिथिलेश साहू हमारे बरामदे में छत्तीसगढी गाने सुनाते हैं। किशोर तिग्गा अपनी कापी के आखिरी पन्ने पर हमेशा पुलिस और पिस्तौल बनाता है, क्योंकि वह पुलिस लाइन में रहता है। किशोर तिग्गा ३० साल बाद जेहन में लौटता है अपनी कॉपी के आखिरी पन्ने के साथ। मिडिल स्कूल के हेड मास्टर चौबे जी मुहर्रम के दिन कोयले पर चलते हैं। उनके दफ्तर की दीवार के हर सुराख में अगर बत्तियां ठुन्सी हुयी हैं। दूर कहीं भजन हैं। भजन में बनारस के घाट हैं। सुबह बजते भजन में बनारस के घाट जैसी कुछ बात है। हवा में भी। रीवा में एक फ़िल्म के टिकट के लिए धक्का मुक्की है, वहां राम सिंह किसी के कंधे पर चढ़कर खिड़की तक पहुँच गया है। सिस्टर मत्रोना स्टाफ रूम की खिड़की से लंच के बाद हाथ धोते हुए मुझे देखती हैं, मुस्कुराती हैं। हम एक कुवे में नहाने जाते हैं। वहाँ पर सांप है। हम घर बता कर नही आते। क्या कोई हमारे यहाँ आएगा? क्या हम कहीं जायेंगे? ये क्या है जो याद के दहाने तक जाने की कोशिश करता है। धक्कामुक्की में। इनमे वो सब नहीं है जो सच हुए सपनों और पूरी हुयी ख्वाईशों में था। इसमे वह है जो हाशिये पर कही था, न दाखिल न दर्ज।

कोई है जो मर रहा है।

मुझे पता है उसके मरने का।

मैं उसके पास बैठा हूँ। शब्दों के झूठ से दिलासा की चुप्पी अच्छी है।

उसका हाथ मुझे छूता है।

मैं तेजी से पलट कर उसे देखता हूँ।

डर गए ? एक सवाल। आंखो में पहचान। चमक। मुस्कराहट।

नहीं तो, मैं थूक गटकता हूँ।

Thursday, April 3, 2008

LOVE STORY # 535: मैं नहीं चाहता प्यार का वह पल दुबारा आए

आखिरकार तुम और मैं यही चाहते हैं कि दूसरा हमें वैसे ही समझ ले जैसा हम चाहते हैं. वैसा नहीं जैसा दुनिया अमूमन हमें समझ लेती है. दुनिया अक्सर हमें समझने कि कोशिश ही नहीं करती. जब करती है तो ग़लत समझती है. और अगर धोखे से अगर सही समझती भी है तो तब तक वक्त गुजर चुका होता है. बीज में जीवन की तरह यह हमारी अदम्य इछ्चा है कि तुम वैसा समझ सको जैसा मैं हूँ. मेरी कमजोरियों, दुष्टताओं, असफलताओं, पाप और गलतियों के साथ मेरे मनुष्य के आकर में. न सिर्फ़ समझ सको बल्कि स्वीकार भी कर सको उस मनुष्य को जिसे तुमने भरोसा दिया कि तुम्हारे सामने वह निरस्त्र होकर ईमानदारी से अपने तमाम गुनाह कबूल कर सकता है. बिना शर्त और बिना लाग लपेट के. ऊपरी तौर पर यही चाह एक मनुष्य को दूसरे के करीब लाती है. कुछ पल जादुई होते हैं. जहाँ ये अपने आप होता है. जैसे तुम जान लेते हो, मैं क्या सोच रहा हूँ. हम एक ही पेड़ के नीचे बैठना चाहते हैं. हम दुनिया में जहाँ भी हों, एक ही पल में चाँद को देखना चाहते हैं. हम एक ही संगीत में ख़ुद को धड़कता हुआ महसूस करते हैं. उन पलों का न तो कोई दस्तावेज होता है न ही कोई हिसाब. वे जब होते हैं तो उन्हें छुआ नहीं जा सकता. छू देना उस सम्मोहन को तोड़ देना है, जो उस पल ने तुम्हारे और मेरे दरमियाँ बुना है. वे पहले से कहीं और किसी और मंशा से लिखे गए होते हैं. उसे छूना ध्यान की गहराई या ऊंचाई नापने की बेजा कोशिश करना है. जो मुखरित है क्या वही सच है? क्या वही जरूरी है? कई बार मुझे लगता है मैं तुम्हे वैसे नहीं देख सका जैसा तुम्हें उम्मीद थी. मैंने तुम्हे अपनी निगाहों से देखा. अपने सन्दर्भ और प्रसंग में. अपने अतीत, अपनी स्मृति, अपनी कल्पनाशीलता के साथ. तुमने मुझे सुना तो अपनी तरह से. उसमे जुड़ने वाली बात तो थी, पर बहुत ज्यादा नहीं. जुड़ने वाली बात ये थी कि तुम्हारे और मेरे पास एक दूसरे के लिए जगह थी, वक्त था. कहने के लिए शब्द थे और उन्हें विभक्त करने के लिए सन्नाटा भी था. हम उस शोर से बाहर एक दूसरे को सुन, देख और महसूस कर रहे थे और एक दूसरे के जरिये ख़ुद को भी. यही तो जादू था. क्या ये पल हमेशा रहेंगे? मुमकिन नहीं है. क्योंकि इस बीच बहुत सारी दुनिया, बहुत सारे समझौते, बहुत सारा यथास्थितिवाद, बहुत सारा क्लेश, तनाव और दुनियादारी है और हमारा चलता हुआ दिमाग भी, जो हर दिल की बात पर तर्क का सवाल दाग देता है. जो हर भरोसे की धड़कन पर शक की सुई घुमा देता है. छोटा सा पत्ता खडकता है और कल्पना के सुराख से बहुत से डर हमें घेर लेते हैं. दूसरे का अतीत उसके लिए यथार्थ है मेरे लिए काल्पनिक. इसलिए ये डर और बड़े हो जाते हैं. कई बार इतने कि रिश्ता ही लगता है खतरे में पड़ गया है. क्या एक इंसान दूसरे को हमेशा के लिए एक ही इंटेंसिटी से चाह सकता है? अगर प्यार जिंदा है तो वह गतिशील भी होगा और इसलिए बदलेगा भी. अगर वह सशर्त होगा, तो हमेशा जमानत पर रिहा होगा, आज़ाद नहीं. और आज़ाद नहीं होगा तो न वह स्वाभाविक तौर पर गतिशील होगा और न ही परिवर्तनशील. उन सारे पलों में लौट कर कभी देखो तो महसूस करोगे कि ये जादू उसी गतिशीत प्रवाह का है जो पल हमारे बीच पैदा हुआ, जिंदा रहा और हमें एक अगले पल में छोड़कर आगे चला गया. मैं नहीं चाहता कि वह पल दुबारा हमारे बीच घटित हो. बल्कि ये कि ज़िंदगी में जितना हो सके इस तरह के जिंदा पल हर बार हमारे बीच होते रहें हमें नई गहराई या नए तल पर एक नए जादू के साथ जिंदा करते हुए