Monday, June 2, 2008

LOVE STORY # 533: पेट में तितलियाँ थी, हाथ में चुम्बक


पेट में बहुत सारी तितलियाँ क़ैद थीं. जब भी वह खुश होती तो तितलियाँ पेट के भीतर उछलने कूदने लगती. जैसे समां में सुर तैरने लगते हैं, अपने अदृश्य नाच के साथ, तितलियाँ उस नाच को साक्षात् कर रहीं हैं, पेट को ऐसा महसूस होता. तितलियाँ खुशी के उस पल का इंतज़ार करतीं और तब तक दीवारों से लग कर बैठी रहतीं. कई बार एक हाथ पेट पर हाथ लगा उन तितलियों को जागते हुए, पतंग की तरह पेट के आस्मान में फडफडआते हुए महसूस करता. कई बार वे तितलियाँ उस हाथ की गर्माहट को अपनी खुशी में घुलते हुए महसूस करतीं. उनके बीच प्यार एक चुम्बक की तरह काम करता रहा. बहुत सालों तक हथेली पर से तितलियों के निशान भित्ति चित्रों की तरह बने रहे. ये हाथ उसका नहीं था, जिसका पेट था. जिसके पेट में तितलियाँ थी, उन तितलियों का रिश्ता उस हाथ से था. पेट सिर्फ़ उनकी खुशी, उनकी हँसी, उनके ठहाकों, उनके अलाप, उनके नाच की ख़बर हाथ को देता था.