
जाने से पहले मिलना जरूरी तो था, पर वे उस वक्त इतने खुश थे कि उसे लगा जाते वक्त कहीं मिलने चला गया, तो कहीं वह खुशी, जादू और नशे का तिलिस्म टूट न जाए. उसे यकीन था कि एक दिन अचानक इस तरह चले जाने से उनके साथ, उनके प्यार, उनके रिश्ते के मायने बदलेंगे नहीं. जाते वक्त वह दुनिया भर की दुनियादारियों में फंसा हुआ था और उसे इस बात का अफसोस तो था कि वह मिल कर नहीं जा रहा है. पर इस बात की राहत भी थी, कि जाते वक्त मिलते, तो सिवा तकलीफ के क्या हासिल होता.
वह इस तकलीफ को दर्द से आज़ाद करने की फिराक़ में था. अंडर ग्राउंड होकर.
कुछ उम्मीदें ज्यादा थीं, कुछ बेवकूफाना अंदाज था.
ऐसा भी कभी होता है.
साथ छूटने पर ऐसा क्यों होता है कि साथ छोटा हो जाता है और छूटना बड़ा. जबकि छूटना एक पल की घटना है, और और साथ कई नियतियों का विहंगम संयोग, एक सफर, एक अपनी अलग जिंदगी. छूटना उस सफर का एक सराय है, और कोई भी सराय क्या सफर से ज्यादा बड़ा, ज्यादा अहम हो सकता है. क्या रेलवे प्लेटफॉर्म, एयरपोर्ट के बाहर मिलते-रोते- हंसते-बिछड़ते लोगों की जिदंगियों और रिश्तों में और कुछ भी दिलचस्प नहीं हो रहा होता. दिलचस्प जैसे कि खुद जिंदगी.
मुश्किल लगता है. पर ऐसा नहीं है. कितना कुछ है जो अपने न होने में न सिर्फ जीवित है, बल्कि एक तरह का समारोह भी. न होने का समारोह. न होने की मौजूदगी. वह बार बार कठघरे मे खड़ा हो यह दलील देता रहा कि वह जाने के लिए नहीं गया है. और जाने के बाद भी साथ छूटा नहीं है. वह लौटकर नहीं आएगा, पर जहां भी जाएगा, इस साथ को अपनी कांख में, अपनी आंखों में, अपनी छाती पर, अपने हथेलियों में लिए जाएगा. वह साथ इतना करीब हो चला था, कि अलग होने पर भी छूट नहीं सकता था.
वह एक लंबे वक्त तक सोचता रहा कि जाते वक्त मिल लेता तो आखिर क्या हो जाता. उनके बीच जो रिश्ता था, उसकी एक अपनी जिंदगी थी. और अब वह उस जिदंगी के लिए भी दुनियादार होने की बेसाख्ता कोशिश कर रहा था. उसे यकीन था कि साथ छूटने से ज्यादा बड़ी बात है. और लौटने की कोशिश में जब भी कोई शख्स कहीं जाता है, तो एकदम नई जगह पर ही.
वह एक दिन उस न लौटने की जगह पर जाता है. एक बार फिर जाने से पहले मिलने की तरह. एक छूटे हुए साथ का उधार चुकता करने के लिए नहीं. बल्कि एक कंधे पर अपना हाथ रखकर ये बताने के लिए कि वह कहीं गया ही नहीं था.
वह इस तकलीफ को दर्द से आज़ाद करने की फिराक़ में था. अंडर ग्राउंड होकर.
कुछ उम्मीदें ज्यादा थीं, कुछ बेवकूफाना अंदाज था.
ऐसा भी कभी होता है.
साथ छूटने पर ऐसा क्यों होता है कि साथ छोटा हो जाता है और छूटना बड़ा. जबकि छूटना एक पल की घटना है, और और साथ कई नियतियों का विहंगम संयोग, एक सफर, एक अपनी अलग जिंदगी. छूटना उस सफर का एक सराय है, और कोई भी सराय क्या सफर से ज्यादा बड़ा, ज्यादा अहम हो सकता है. क्या रेलवे प्लेटफॉर्म, एयरपोर्ट के बाहर मिलते-रोते- हंसते-बिछड़ते लोगों की जिदंगियों और रिश्तों में और कुछ भी दिलचस्प नहीं हो रहा होता. दिलचस्प जैसे कि खुद जिंदगी.
मुश्किल लगता है. पर ऐसा नहीं है. कितना कुछ है जो अपने न होने में न सिर्फ जीवित है, बल्कि एक तरह का समारोह भी. न होने का समारोह. न होने की मौजूदगी. वह बार बार कठघरे मे खड़ा हो यह दलील देता रहा कि वह जाने के लिए नहीं गया है. और जाने के बाद भी साथ छूटा नहीं है. वह लौटकर नहीं आएगा, पर जहां भी जाएगा, इस साथ को अपनी कांख में, अपनी आंखों में, अपनी छाती पर, अपने हथेलियों में लिए जाएगा. वह साथ इतना करीब हो चला था, कि अलग होने पर भी छूट नहीं सकता था.
वह एक लंबे वक्त तक सोचता रहा कि जाते वक्त मिल लेता तो आखिर क्या हो जाता. उनके बीच जो रिश्ता था, उसकी एक अपनी जिंदगी थी. और अब वह उस जिदंगी के लिए भी दुनियादार होने की बेसाख्ता कोशिश कर रहा था. उसे यकीन था कि साथ छूटने से ज्यादा बड़ी बात है. और लौटने की कोशिश में जब भी कोई शख्स कहीं जाता है, तो एकदम नई जगह पर ही.
वह एक दिन उस न लौटने की जगह पर जाता है. एक बार फिर जाने से पहले मिलने की तरह. एक छूटे हुए साथ का उधार चुकता करने के लिए नहीं. बल्कि एक कंधे पर अपना हाथ रखकर ये बताने के लिए कि वह कहीं गया ही नहीं था.



