Thursday, July 31, 2008

LOVE STORY 531: न लौटने की जगह पर वापस जाने के बाद


जाने से पहले मिलना जरूरी तो था, पर वे उस वक्त इतने खुश थे कि उसे लगा जाते वक्त कहीं मिलने चला गया, तो कहीं वह खुशी, जादू और नशे का तिलिस्म टूट न जाए. उसे यकीन था कि एक दिन अचानक इस तरह चले जाने से उनके साथ, उनके प्यार, उनके रिश्ते के मायने बदलेंगे नहीं. जाते वक्त वह दुनिया भर की दुनियादारियों में फंसा हुआ था और उसे इस बात का अफसोस तो था कि वह मिल कर नहीं जा रहा है. पर इस बात की राहत भी थी, कि जाते वक्त मिलते, तो सिवा तकलीफ के क्या हासिल होता.
वह इस तकलीफ को दर्द से आज़ाद करने की फिराक़ में था. अंडर ग्राउंड होकर.
कुछ उम्मीदें ज्यादा थीं, कुछ बेवकूफाना अंदाज था.
ऐसा भी कभी होता है.
साथ छूटने पर ऐसा क्यों होता है कि साथ छोटा हो जाता है और छूटना बड़ा. जबकि छूटना एक पल की घटना है, और और साथ कई नियतियों का विहंगम संयोग, एक सफर, एक अपनी अलग जिंदगी. छूटना उस सफर का एक सराय है, और कोई भी सराय क्या सफर से ज्यादा बड़ा, ज्यादा अहम हो सकता है. क्या रेलवे प्लेटफॉर्म, एयरपोर्ट के बाहर मिलते-रोते- हंसते-बिछड़ते लोगों की जिदंगियों और रिश्तों में और कुछ भी दिलचस्प नहीं हो रहा होता. दिलचस्प जैसे कि खुद जिंदगी.
मुश्किल लगता है. पर ऐसा नहीं है. कितना कुछ है जो अपने न होने में न सिर्फ जीवित है, बल्कि एक तरह का समारोह भी. न होने का समारोह. न होने की मौजूदगी. वह बार बार कठघरे मे खड़ा हो यह दलील देता रहा कि वह जाने के लिए नहीं गया है. और जाने के बाद भी साथ छूटा नहीं है. वह लौटकर नहीं आएगा, पर जहां भी जाएगा, इस साथ को अपनी कांख में, अपनी आंखों में, अपनी छाती पर, अपने हथेलियों में लिए जाएगा. वह साथ इतना करीब हो चला था, कि अलग होने पर भी छूट नहीं सकता था.
वह एक लंबे वक्त तक सोचता रहा कि जाते वक्त मिल लेता तो आखिर क्या हो जाता. उनके बीच जो रिश्ता था, उसकी एक अपनी जिंदगी थी. और अब वह उस जिदंगी के लिए भी दुनियादार होने की बेसाख्ता कोशिश कर रहा था. उसे यकीन था कि साथ छूटने से ज्यादा बड़ी बात है. और लौटने की कोशिश में जब भी कोई शख्स कहीं जाता है, तो एकदम नई जगह पर ही.
वह एक दिन उस न लौटने की जगह पर जाता है. एक बार फिर जाने से पहले मिलने की तरह. एक छूटे हुए साथ का उधार चुकता करने के लिए नहीं. बल्कि एक कंधे पर अपना हाथ रखकर ये बताने के लिए कि वह कहीं गया ही नहीं था.

वेब दुनिया में अजगर की लव स्टोरी का चर्चा

अविनाश जहाँ जिंदगी में युवा और ब्लोगिंग के बुजुर्ग हैं, रविन्द्र व्यास अपने पच्चीस साल के तजुर्बे के कारण पत्रकारिता के बड़े तो कहे ही जा सकते हैं। हिन्दी का सबसे सम्माननीय पोर्टल वेब दुनिया में अखाडे का उदास मुगदर का जिक्र देखकर आश्चर्य हुआ और खुशी भी। अपनी गुमशुदगी को पहचान देने वालों का शुक्रगुजार होना चाहता तो हूँ, पर किस मुंह से ? :-) शुक्रिया इस बात का भी कि इस सब के बाद अजगर का बहुत दिनों तक अलाली में सोते रहना थोड़ा मुश्किल है। आस्तीन का अजगर अब इन दरियादिली को देख कर अपने अखाडे में लौट रहा है।

कटाक्ष की रूला देने वाली प्रेम कहानियाँ

जैसा कि टीवी रिपोर्टर कहते हैं अजगर के लिए थोड़े अफरा-तफरी के दिन हैं। जगह और नौकरी के साथ आदमी का अपना अमन-चैन भी बदल जाता है। प्रेमकहानी लिखने के लिए गहमागहमी नहीं बल्कि थोड़ा अवकाश चाहिए होता है। थोड़ा आकाश। थोड़ा अन्तरिक्ष। थोड़ी फुर्सत। तो अब लग रहा है कि कैसे खत्म होंगी 563 प्रेम कहानियाँ। प्यार की ताक़त पर अजगर को भरोसा है। वह निकाल ही लेगा अपना रास्ता। कहते हैं न- दिल के तर्क अजीब होते हैं, जो तर्कों को समझ नहीं आते। दुनिया प्यार कर रही है। एक राष्ट्राध्यक्ष अपनी प्रेमिका को साथ लेकर खड़ी जाना चाह रहा था। एक सियासी शख्स में बदल चुका एक क्रिकेट का खिलाड़ी अपनी अलग हो चुकी पत्नी से बॉक्सर शॉर्ट्स में फ़ोन पर बात कर रहा है। प्यार अपनी जगह बना रहा है।रेडियो से आती ख़बरों, बाहर खेलते बच्चों और बोरियत से बोर होकर खरीददारी करने निकली औरतों, साइबर कैफे में चैट करते लोगों के बीच। बहुत सारी दुनियादारी, लुच्चई, नंगे स्वार्थों, महत्वाकांक्षाओं के बीच थोडी सी गुंजाइश है। एसएमएस पर एक नाम लिखने की और उसे पढ़कर मुस्कुराने की। क्या इस ब्लॉग को पढ़ने वालों के पास कहानियाँ हैं? क्या उन्होंने प्यार किया है? क्या वे इसमें अपनी कहानी देना चाहेंगे? सादर आमंत्रित हैं।
प्रेमकहानी लिखने के लिए गहमागहमी नहीं बल्कि थोड़ा अवकाश चाहिए होता है। थोड़ा आकाश। थोड़ा अन्तरिक्ष। थोड़ी फुर्सत। तो अब लग रहा है कि कैसे खत्म होंगी 563 प्रेम कहानियाँ। प्यार की ताक़त पर अजगर को भरोसा है।
यह एक ब्लॉग पर लिखी जा रही प्रेम कहानियों का एक टुकड़ा है, आमंत्रण है। नाम तो जाहिर हो ही गया है कि ये कोई अजगर महाशय हैं लेकिन इस ब्लॉग पर उनके द्वारा लिखी जा रही प्रेम कहानियों को पढ़ने वाले यह नहीं जान पा रहे हैं कि आखिर यह अजगर कौन है? और अजगर है कि अपना असली नाम और धाम और काम नहीं बताता और अपने दीवानों के लिए प्रेम कहानियाँ लिख रहा है। हजारों लोग इस ब्लॉग पर कमेंट करते हैं कि अजगर अपना नाम बताए, पहचान बताए। लेकिन अजगर है कि अपनी पहचान बताए बगैर हमारे लिए एक से एक प्रेम कहानियाँ लिख रहा है। अजगर के ब्लॉग का नाम कटाक्ष है और सुखद यह है कि यहाँ कोई कटाक्ष नहीं है। हैं तो बस दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानियाँ। ऐसी प्रेम कहानियाँ कि आप दीवार से टिकाकर, किसी पेड़ के पीछे या बाथरूम में जाकर रोने लगें। बेहद संवेदनशील और मार्मिक। इन कहानियों को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि इनमें एक तरह का शॉक है और यह कोई सोचा-समझा शॉक नहीं है बल्कि उस घटना से सहज निकला हुआ शॉक है। यह शॉक ठीक उस तरह का शॉक है कि आप किसी खूबसूरत फूल के प्रेम में पड़कर उसे छूने जाएँ तो अचानक एक आँधी आती है और फूल टूटकर धूल में गिर पड़ता है और उस धूल में लिपटा फूल धूल के ही किसी बवंडर में फँसा आपसे दूर... दूर और हमेशा के दूर चला जाता है। ये कहानियाँ ठीक वैसी हैं जैसे जिंदगी एक कागज की पुड़िया है और पानी लगते ही गलकर ओझल हो जाती है।
इन कहानियों को पढ़कर आप स्तब्ध हो सकते हैं। आपमें एक सन्नाटा गूँजेगा और धीरे से फिर एक रुलाई फूटेगी। ...और वह रुलाई भी ऐसी फूटेगी कि आसपास किसी को सुनाई नहीं देगी। इस शोर भरे और चारों ओर से आती कर्कश आवाजों के बीच ये प्रेम कहानियाँ प्रेम की रुलाई को सुनने-सुनाने का खामोश जतन हैं। दोस्तों, आज हम जिस दौर में रह रहे हैं वहाँ दो मिनट की ख्याति का जलवा है। कोई भी उठकर चला आता है और कुछ भी उलजलूल कर चलता बनता है और आप देखते हैं कि उसके पीछे फूल बिछे हुए हैं औऱ तमाम फोटोग्राफर उसकी एक झलक को कैद करने के लिए मरे जा रहे हैं। यानी हम जिस दौर में रह रहे हैं वहाँ एक पूरी पीढ़ी जरा से प्रचार पाने के लिए किस कदर मरी जा रही है। तब अजगर की कहानियाँ हमारे सामने आती हैं। बिना कोई पोज दिए, बिना कोई हल्ला किए, बिना किसी अतिरिक्त भावुकता के और बिना किसी कृत्रिम मुद्राओं के। और इसका लेखक अजगर भी अपना नाम बताए बगैर, अपनी पहचान बताए बगैर अपने जीवन की धड़कती कहानियों को लेकर, दूसरों के जीवन की कहानियों को लेकर हमारे लिए एक ऐसी दुनिया को रचने में मुब्तिला हैं जहाँ हम अपने ही भुला दिए गए प्रेम, प्रेम की टूटन और उसके अवसाद को एक बार फिर समझने-बूझने की कोशिश करते हैं। हमारे समय के एक महान चेक उपन्यासकार हैं मिलान कुंदेरा। (और यह संयोग ही है कि कटाक्ष पर जो कहानियाँ हैं उसमें मिलान कुंदेरा के उपन्यास के पात्र आते हैं, उनकी बातें आती हैं, किताब का जिक्र आता है और किताब से जुड़ी प्रेम कहानी भी आती है)। मैं गलत नहीं कह रहा तो एक जगह मिलान कुंदेरा ने कहा है कि एक लेखक को अपनी रचना के पीछे छिप जाना चाहिए। अजगर की प्रेम कहानियों को पढ़कर इस बात को हम बेहतर तरीके से जान सकते हैं। इस ब्लॉग पर आप जाएँगे तो कविताएँ भी मिलेंगी। विशेषकर मुंबई पर मराठी, गुजराती और अँग्रेजी कवियों की कविताएँ भी मिलेंगी। कुछ संस्मरण भी मिलेंगे और हिंदी कमेंटरी पर खूबसूरत कमेंट भी मिलेंगे। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन रुला देने वाली प्रेम कहानियों को लिखने वाले ने अपने पाठकों के दिलों में कितनी जगह बना ली है यह उन कमेंट्स को पढ़कर पता लगाया जा सकता है जो यहाँ किए जाते हैं। क्या आप इन प्रेम कहानियों को नहीं पढ़ना चाहेंगे? तो जाइए और पढि़ए, ये रहा उसका पता - http://kataksh.blogspot.com

दोस्तों के मोहल्ले में अजगर का जिक्र

आलस में अजगर बहुत दिनों से निर्विकार पड़ा रहा है। इधर एक दो जगह उसका जिक्र छिड़ा है जो भला सा लगता है। इसलिए भी कि जब अविनाश और ब्लोगिंग की दुनिया के बड़े बुजुर्ग कुछ अखाडे के उदास मुगदर के बारे में कहते हैं, तो इससे अजगर कि गुमशुदगी को एक पहचान मिलती है। उसके दूसरे और स्प्लिट व्यक्तित्व के बरक्स और जुदा। जो दोस्तों बहुत थोड़े दिनों कि बहुत बड़ी उपलब्धि है। स्नेह बनाएं रखें।

इच्छा का पिलपिला सेब और दुनिया के आख़‍िरी आदम-हव्वा

हिन्दी भी थी, उर्दू भी। अंग्रेज़ी भी, रूसी भी। दिल्ली के एक मैदान में कुछ लंगर डाले गये थे किताबों के। उठ गये। अब सब अपने अपने मंडी हाउस कॉफी हाउस की टी-डिबेट की शामों में लौट चुके हैं। किताबें कुछ सिरहाने, कुछ आलमारी के सीसों के पार सांस रोके अपने पढ़े जाने का कर रही हैं इंतज़ार। रोज़मर्रा के आम दिनों में किताबें पढ़ना आसान नहीं होता। शहरों में ज़्यादा वक़्त सफ़र में निकल जाता है और नौकरी के पूरे आठ घंटों में किताब पलटने की बेख़याल फुर्सत शायद ही किसी को नसीब रहती है। घर लौटते-लौटते चैराहे के आसपास सब्ज़ी के ठेले, पान की दुकानें और पड़ोसियों से दो-चार बातें रोकती हैं, वक्त ले लेती हैं। हफ्ते की छुट्टी में घर की सफाई, दोपहर की धूप, सोसाइटी की मीटिंग... के बीच किताबें उदास रहती हैं।लेखक उल्लास से लिख रहे हैं। प्रकाशक चालाकी से उन्हें छाप रहे हैं। लेकिन सिगरेट के छल्लों में फंसी पाठक की बेचैनी कहीं नहीं है। शायद किताबों में ही वो जान नहीं। ऐसे में थोड़े में ज़्यादा बातें करने वाले गल्प की खोज शुरू हुई है। आइए सबसे पहले एक कहानी से गुज़रते हैं। चूंकि चलन ऐसा है कि हर कहानी का एक शीर्षक होता है, इसलिए इसका भी शीर्षक है। इच्छा का पिलपिला सेब और दुनिया के आख़‍िरी आदम-हव्वा
“तेरह साल हो गये उन्हें मिले। फिर जाकर उन्होंने शादी का फ़ैसला किया। इस बीच दोनों की ज़‍िंदगियों में कई लोग आये, कई रिश्ते बनते-बनते रह गये, कई छोटे रिश्ते बने, जो टूट गये। कई बार घर वालों ने अरेंज्ड मैरिज की बात चलायी। वे सामने वाले शख्स को, रिश्ते को नियति को, जन्मकुंडलियों को, दिल के अरमानों और दिमाग़ के तर्कों को अपनी कसौटियों पर कसते रहे। इस बीच नदियों में पानी बहता रहा, ग्लेशियर पिघलते रहे, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती रही, बच्चे पैदा होते रहे, कैफे कॉफी डे नये नुक्कड़ों पर अपनी शाखाएं खोलते रहे। वे ऐसे ही सीसीडे पर एक दिन मिले। और बातों बातों में उन्हें पता चला कि दोनों ने अपने सारे परम्यूटेशन कॉम्बीनेशन लगा कर देख लिये हैं। उनके सारे संभावित साथी या तो ब्याह रचा कर घर बसा चुके हैं या फिर ऐसी बीमारियों के शिकार हैं (जैसे कैंसर या अकेलेपन या देवत्व) कि नियति के एटीएम पर शादी वाला बटन उन्होंने दबाना ही ज़रूरी नहीं समझा। इच्छा वाला सेब जो तेरह साल पहले उनके जे़हन में प्यार बन कर कौंधा था, अब थोड़ा पिलपिला होने तो लगा था, पर अगले किसी भी पल वह पूरी तरह से सड़ सकता था। उस पल से पहले तक उनके पास मौक़ा था। उन्होंने एक दूसरे को कुबूल कर लिया। और सुनामी लहरों, एटमी धमाकों, गृहयुद्धों, नरेंद्र मोदी और जॉर्ज डब्ल्यू बुश की नफ़रत के बाद की बची हुई दुनिया के वे आख़‍िरी आदम और हव्वा थे।”ये कहानी और ऐसी ही बहुत सारी कहानियां किसी किताब में नहीं हैं। अखाड़े के उदास मुगदर के आसपास आजकल इन कहानियों को सुनने के लिए भीड़ लगती है। यहीं दुबका हुआ आस्तीन का अजगर इन्हें सुनाता है। किसी को नहीं पता कि अजगर का असल नाम क्या है। हिंदी में नाम की लालसा से नहाये हुए लेखकों को ये बात अजीब लगेगी, क्योंकि अजगर अपना असल नाम बताना भी नहीं चाहता। अंतर्जाल का एक पक्ष ये भी है। एक शख्स, जो सबसे सुखद एहसास की बेहतरीन अभिव्यक्ति का जादूगर है, वह पर्दे के पीछे रह कर अपने जादू का असर देख सकता है।अखाड़े के उदास मुगदर पर प्रेम कहानियों के सिलसिले की शुरुआत बीत गये साल नवंबर महीने से हुई। पहली कहानी थी, कुंदेरा की किताब
“तब वह 16 की थी। आज वह 31 की है। क्लास में एक किताब पर प्रोजेक्ट लिखने का काम मिला था। उसने लाइब्रेरी में देखा तो अचानक उसके हाथ लगी - अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बींग। उसने वही किताब इशू करवायी थी। वह उस पर मरती थी। वह किताब उसने दो बार पढ़ी। किताब उसे पसंद आयी। फिर वह लड़का और भी ज़्यादा। दोनों की शादी हो गयी। बाद में एक दिन उसने उस लड़के से पूछा, तुम्हें कैसी लगी कुंदेरा की वह किताब। कौन सी किताब, लड़के ने पूछा। अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बींग। तुमने इशू करवायी थी न बुक प्रोजेक्ट के दौरान स्कूल में। आह! वह! हां, इशू करवायी थी। पर पढ़ी नहीं.”लव स्टोरी सीरीज़ में अब तक 26 कहानियां लिखी जा चुकी हैं। दो की बानगी आपने देखी। इनमें स्तब्धकारी कहानियां ज़्यादा हैं। कुछ तो रुला देती हैं! ये कहानियां अपने रचे जाने के पहले पल से ही किसी साहित्यिक पत्रिका की मोहताज नहीं थी। न ही इन कहानियों के लेखक इन कहानियों के जरिये साहित्य में अपनी ख़ास जगह बनने का इंतज़ार कर रहे हैं। बेनाम लेखक की इन कहानियों का भविष्य उन मुहावरों, कहावतों और किस्सों की तरह है, जो श्रुत परंपरा से आयीं और उनके स्रोतों को लेकर हमेशा एक रहस्य बना रहा है और बना रहेगा। आज श्रुत परंपरा का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अब पाठ को कई तरह से सुरक्षित रखने की तकनीक हमारा सहारा हैं। कलम-रोशनाई के बाद छापेखानों, अख़बारों, पत्रिकाओं के साथ ही अंतर्जाल सज्जित कंप्यूटर में साहित्य, समाज, संस्कृति के सभी पाठ क़ैद हो रहे हैं। चूहों और दीमकों की पहुंच से दूर इन पाठों का हश्र उन ऐतिहासिक किताबों की तरह नहीं होगा, जिनका अहम हिस्सा दीमक लग जाने की वजह से नष्ट हो गया। इसलिए अब के पाठों में अपभ्रंश की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।
(ऐसे में लेखक का अपनी बेनाम हैसियत को लेकर कोई भी आग्रह जायज नहीं लगता, इसके बावजूद कि अंतर्जाल किसी को भी बेनाम रहने की पूरी इजाज़त देता है। हम यही उम्मीद करेंगे एक वक्त के बाद इन अनमोल प्रेम कहानियों के लेखक को हम जान सकें।)वक्त बदलेगा। वक्त के साथ समाज के मकान और समाज की सड़कें बदलेंगी। ज़्यादा से ज़्यादा आधुनिक होंगी। ग़रीबी फिर भी बड़े हिस्से पर मौजूद रहेगी। एहसास का वजूद तब भी कायदे से रहेगा... और तब ये कहानियां मनुष्यता के ज़्यादा काम आएंगी।
साभार: कथादेश, मार्च 2008
Posted by avinash तारीख़ Thursday, April 24, 2008
गली का नाम: ,

2 कमेंट्स:
DR.ANURAG ARYA said...
shukr hai kathdesh ke is panne ko aap internet pe apne mohale me laye...
April 25, 2008 1:59 PM
Suresh Chandra Gupta said...
वक्त तो अवश्य बदलेगा। बदलना उस की प्रकृति है. वक्त के साथ इंसान भी बदलेगा. उसके आस पास का माहौल भी बदलेगा. जिसे आज आधुनिकता कहा जाता है वह भी बदलेगी. कल उसे रूढ़िवादिता कहा जाएगा. आधुनिकता के और नए रूप सामने आयेंगे. अमीरी और गरीबी दोनों रहेंगी. अहसास का वजूद भी रहेगा पर कितने कायदे से कहा नहीं जा सकता. यह कहानियाँ मनुष्यता के कितने काम आएँगी यह तो वक्त ही बताएगा. उम्मीद कर सकते हैं.
April 26, 2008 5:52 AM

Thursday, July 10, 2008

LOVE STORY # 532: पहले संगीत तैरता था फिर सिसकियाँ

वे पड़ोस में नए थे. बड़े खुशनुमा से लोग. कभी भीतर तो नहीं गए उनके मकान में, पर फिर भी लगता था कि उनके ड्राइंग रूम में किताबों का रैक होगा और उनके बिस्तर के सिरहाने भी दो एक किताबें होती होंगी. ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि उनके किवाड़ और खिड़कियों से तैरता हुआ संगीत भला भला सा था. पश्चिम का शास्त्रीय संगीत. चैकोवोसकी का स्वैन सॉंग या फिर शोपेन की सिम्फोनी. देर शाम को मेरे किवाड़ की झिरी से बहुत मद्धम सा वह संगीत तैरता था तो लगता था कि ये लोग गहरे हैं और अच्छे शौक वाले भी. पर ऐसा हमेशा नहीं था. कई बार संगीत रुक जाता था. तो किसी की तेज सिसकियों की आवाज़ आती थी. और कई बार सिगरेट की गंध भी.