1992 की गर्मियों में अकेले होने की शामों में से एक वह भी थी. इतवार की छुट्टी थी. पहले उसे लगा कि मंडी हाउस की तरफ जाकर कोई नाटक देखेगा, पर अख़बार की लिस्टिंग से उसके भीतर ऐसी कोई प्रेरणा नहीं जगी, कि घंटे भर जाने और घंटे भर आने की धक्का मुक्की अफोर्ड की जा सके. दिन भर वह अकेला था. सिगरेट. चाय. फिर सिगरेट. चाय. अख़बार. किताब. चाय. दाढ़ी उसने उस रोज नहीं बनाई थी. बाल उसके हमेशा बेतरतीब ही रहते थे. पंखा चलता रहा. जैसे उसे इंतजार था कि शाम होगी, तो कुछ दिलचस्प बात हो ही जाएगी. उसे जैसे यकीन था कि अगर आप ज्यादा शिद्दत से दिलचस्प बातों को ढूंढते हैं, तो वे आपको नहीं मिलती. नहीं मिलतीं इसलिए कि वे भी आपको ढूंढ रही होती हैं आपके पते पर, और आप उनके पते पर उन्हें ढूंढ रहे होते हैं. और मनुष्य के जीवन में सबसे पेचीदा सवाल यह है कि दिलचस्प मछलियां पकड़ने के लिए वह जाल फेंके या कांटा डाल चुपचाप किताब लिए बैठ जाए. उसे दूसरा तरीका भाता था.
वहां भीड़ थी. चिल्लपों. संडे क्राउड. जो लोग खा रहे थे वे बहुत आराम से खा रहे थे. जो लोग खड़े होकर इंतजार कर रहे थे, उन्हें काफी जल्दी थी. वह एक कुर्सी पर बैठने ही वाला था कि उसने देखा कि एक महिला ने भयानक फुर्ती दिखाते हुए अपने बच्चे को लगभग फेंकते हुए बिठा दिया. और खुद सामने बैठ गई. उसे लगा कि वह उससे लड़े. उस प्राकृतिक न्याय के लिए जो उसने उस कुर्सी के करीब 17 मिनट खड़े होकर इंतजार करते हुए अर्जित किया था. फिर उसे लगा उसके पास लड़ने की ताकत तो है, पर संयम नहीं.
पहले तो उसे लगा कि वह गलती पर है, पर शीशे में से एक चेहरा उसकी तरफ देख रहा था. बीच बीच में वह चेहरा शीशे के इस तरफ चल रही बात चीत में सिर-हिलाने लगता, एक दो वाक्य कहता, फिर उसकी तरफ देखने लगता. उनकी आंखें कई बार मिलीं.
वह एक नव विवाहिता थी. उस फैमिली फोटो में, जहां सब चीज़ कहकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे. और वह उसकी तरफ ऐसे देख रही थी, जैसे वह उसे जानती हो. इतना जानती हो कि उसकी आंखें इसकी आंखों से ईमानदार हो सकती हों. शीशे से उसकी आंखों में झांकता वह चेहरा नोयडा के निरूला, गरमी की उस शाम, कुर्सी पर बच्चा फेंककर भठूरे भकोसने वाली औरत, इतवार को न मिलने वाली गर्लफ्रेंड, और दफ्तर में खटते व्यस्त दोस्त से एक चकित विषयांतर की तरह था. शीशे से उसकी तरफ झांकती वे आंखें पता नहीं कौन सा आशवस्तिबोध उसमें ढूंढ रही थीं और वह उसे झटक नहीं पा रहा था.
उसे भी मजा आने लगा था. पर फिर तभी उसका खाना खत्म हो गया और इंतजार कर रहे कुछ लोग उसके उठने की राह देखने लगे. एक बूढ़ी आंटी सामने की कुर्सी को खाली पा बैठ गईं.
उसे इस खेल को छोड़कर उठने का अफसोस था. वह उठा और फिर बाहर के रास्ते की तरफ निकलते वक्त उसने उस परिवार को. उसकी आंखें उस चेहरे पर गईं, जो शीशे से उसे देख रहा था.
उस चेहरे पर अपरिचय था, उन आंखों में कोफ्त। वह चेहरा भी उस फेमिली फोटो में चीज़ कहकर खुशियां बिखेरने की कोशिश कर रहा था.
फोटो: ब्लेक मिरर / थियोडोरा, फ्लिकर से




















