Monday, August 25, 2008

LOVE STORY # 514: स्पीड डेट (एक) शीशे की असलियत जुदा थी चेहरे की असलियत से

1992 की गर्मियों में अकेले होने की शामों में से एक वह भी थी. इतवार की छुट्टी थी. पहले उसे लगा कि मंडी हाउस की तरफ जाकर कोई नाटक देखेगा, पर अख़बार की लिस्टिंग से उसके भीतर ऐसी कोई प्रेरणा नहीं जगी, कि घंटे भर जाने और घंटे भर आने की धक्का मुक्की अफोर्ड की जा सके. दिन भर वह अकेला था. सिगरेट. चाय. फिर सिगरेट. चाय. अख़बार. किताब. चाय. दाढ़ी उसने उस रोज नहीं बनाई थी. बाल उसके हमेशा बेतरतीब ही रहते थे. पंखा चलता रहा. जैसे उसे इंतजार था कि शाम होगी, तो कुछ दिलचस्प बात हो ही जाएगी. उसे जैसे यकीन था कि अगर आप ज्यादा शिद्दत से दिलचस्प बातों को ढूंढते हैं, तो वे आपको नहीं मिलती. नहीं मिलतीं इसलिए कि वे भी आपको ढूंढ रही होती हैं आपके पते पर, और आप उनके पते पर उन्हें ढूंढ रहे होते हैं. और मनुष्य के जीवन में सबसे पेचीदा सवाल यह है कि दिलचस्प मछलियां पकड़ने के लिए वह जाल फेंके या कांटा डाल चुपचाप किताब लिए बैठ जाए. उसे दूसरा तरीका भाता था.

पर दिन ढलने लगा और कुछ भी दिलचस्प नहीं हुआ. उसकी गर्ल फ्रेंड इतवार को उससे नहीं मिलती थी और उसके शहर का एक परिचित जो दिल्ली आकर दोस्त में बदल गया था, आज किसी जरूरी काम से दफ्तर में था. शाम आठ बजे तक वह समय को काटता रहा. समय उसे. फिर वह नहाया. जींस पर कमीज डाली और कोल्हापुरी चप्पल चटकाता हुआ निरूला की तरफ बढ़ लिया.

वहां भीड़ थी. चिल्लपों. संडे क्राउड. जो लोग खा रहे थे वे बहुत आराम से खा रहे थे. जो लोग खड़े होकर इंतजार कर रहे थे, उन्हें काफी जल्दी थी. वह एक कुर्सी पर बैठने ही वाला था कि उसने देखा कि एक महिला ने भयानक फुर्ती दिखाते हुए अपने बच्चे को लगभग फेंकते हुए बिठा दिया. और खुद सामने बैठ गई. उसे लगा कि वह उससे लड़े. उस प्राकृतिक न्याय के लिए जो उसने उस कुर्सी के करीब 17 मिनट खड़े होकर इंतजार करते हुए अर्जित किया था. फिर उसे लगा उसके पास लड़ने की ताकत तो है, पर संयम नहीं.

वह दूसरी तरफ चला गया. जहां कोने की एक बहुत छोटी टेबल पर उसे ज़ल्दी ही जगह मिल गई. नोयडा का निरूला तब बिरले फास्ट फूड ज्वाइंट्स में से एक था. और वहां शीशे लगे थे. जहां दीवार होनी चाहिए थी, वहां. तो आप खाना खाते लोगों की शक्लों से बचना भी चाहें तो मुश्किल था. दीवार के शीशे में एक संयुक्त परिवार था. खीझ, तानों, मज़ाक, हिदायतों, हंसी, शिकायतों, बुरा मानने और दूसरे कई हिसाब करने जैसे उपक्रमों में चाकू, कांटे और चम्मच का इस्तेमाल करते हुए. दो बच्चे, दो बूढ़े और चार जवान.

पहले तो उसे लगा कि वह गलती पर है, पर शीशे में से एक चेहरा उसकी तरफ देख रहा था. बीच बीच में वह चेहरा शीशे के इस तरफ चल रही बात चीत में सिर-हिलाने लगता, एक दो वाक्य कहता, फिर उसकी तरफ देखने लगता. उनकी आंखें कई बार मिलीं.

वह एक नव विवाहिता थी. उस फैमिली फोटो में, जहां सब चीज़ कहकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे. और वह उसकी तरफ ऐसे देख रही थी, जैसे वह उसे जानती हो. इतना जानती हो कि उसकी आंखें इसकी आंखों से ईमानदार हो सकती हों. शीशे से उसकी आंखों में झांकता वह चेहरा नोयडा के निरूला, गरमी की उस शाम, कुर्सी पर बच्चा फेंककर भठूरे भकोसने वाली औरत, इतवार को न मिलने वाली गर्लफ्रेंड, और दफ्तर में खटते व्यस्त दोस्त से एक चकित विषयांतर की तरह था. शीशे से उसकी तरफ झांकती वे आंखें पता नहीं कौन सा आशवस्तिबोध उसमें ढूंढ रही थीं और वह उसे झटक नहीं पा रहा था.

उसे भी मजा आने लगा था. पर फिर तभी उसका खाना खत्म हो गया और इंतजार कर रहे कुछ लोग उसके उठने की राह देखने लगे. एक बूढ़ी आंटी सामने की कुर्सी को खाली पा बैठ गईं.

उसे इस खेल को छोड़कर उठने का अफसोस था. वह उठा और फिर बाहर के रास्ते की तरफ निकलते वक्त उसने उस परिवार को. उसकी आंखें उस चेहरे पर गईं, जो शीशे से उसे देख रहा था.

उस चेहरे पर अपरिचय था, उन आंखों में कोफ्त। वह चेहरा भी उस फेमिली फोटो में चीज़ कहकर खुशियां बिखेरने की कोशिश कर रहा था.

फोटो: ब्लेक मिरर / थियोडोरा, फ्लिकर से

Friday, August 22, 2008

LOVE STORY 515: उसने सिगरेट जलाते हुए तीसरी मंज़िल की खिड़की पर झूलते जींस के पहचाने फटे पायंचों की तरफ देखा

नागपुर से दिल्ली वह पढ़ने पंहुचा था. कनॉट प्लेस उसके रास्ते में नहीं पड़ता था, पर उसने मोहन सिंह पैलेस जाकर जींस सिलवाई थीं, जो इंडियन कॉफी हाउस के अलावा सस्ती जींस के लिए मशहूर थीं. 1991 में एक जींस की कीमत सौ रुपये की थी. उसने दो लीं. उसने पंद्रह रूपये ज्यादा देकर उसमें कुछ पैचवर्क भी करवाए थे, जिनमें से एक फिडो डिडो का था. मोहन सिंह प्लेस में तब फिडो डिडो कई तरह की हरकतें करता हुआ उपलब्ध था, क्योंकि पेप्सी ने तभी सेवन अप लॉंच किया था. कोका कोला की वापसी तब तक नहीं हुई थी.

मोहन सिंह प्लेस में सिली जींस की कीमत ब्रांडेड जींस के मुकाबले काफी कम थी. उसने वे फैशन के लिए कम, दिल्ली की धक्कामुक्की के लिए ज्यादा लीं थीं. ये जींस वही थी जिनके बारे में ग्रेटर कैलाश में रहने वाले एक नौकरीपेशा दोस्त ने कहा था- ये क्या पहन रखा है? लगता है मोहन सिंह पैलेस से आ रहे हो. पहले तो वह भी हंसा पर देर तक नहीं. नागपुर से दिल्ली आना उसके लिए एक नई दुनिया में आना था. यमुना पार मयूर विहार पॉकेट फोर के मैत्री अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 24 में अटैच्ड बाथरूम वाला कमरा उसने ले रखा था, जिसकी बाल्कनी कवर्ड थी और जहां उसका कामचलाऊ किचन था. उस कमरे के बाहर महानगर का जंगल फैला हुआ था. नागपुर में तब फाइव डेज वीक नहीं थे. दिल्ली में थे.

जिस शनिवार का ये वाक्या है, उस दिन उसने दोनों में से एक भी जींस को नहीं पहना था. उसने टेरिलीन की एक पैंट पहन रखी थी. दोनो जींस किचन की खिड़की में मुड़ी तुड़ी सूख रही थीं जिसके फटते हुए पायंचे बाहर की तरफ लटके हुए थे, इस अंदाजे के साथ कि अगर हवा जोरों से चले भी, तो वह तीसरी मंजिल की उस खिड़की से बाहर न गिर जाएं.

शनिवार की शाम करीब पांच बजे किताब खत्म करने के बाद वह उठा तो पाया कि सिगरेट नहीं थी. उसने चाय पीकर गंदा मग सिंक में रखा. और कमीज़ पहन ली. वह अपने अपार्टमेंट से बाहर निकला और सहयोग अपार्टमेंट के पीछे नीलगिरी रेस्रां की तरफ जाने वाले रास्ते पर मौजूद पान ठेले से विल्स नेवी कट के दो पैकट लिये. शाम को जीके वाला दोस्त आने वाला था. जहां वे कुमार गंधर्व के निर्गुण भजन सुनते हुए बैगपाइपर व्हिस्की पीते और फिर फैंसी ढाबे या नीलगिरी में साउथ इंडियन खाना खाकर शाम को संपन्न करते. नीलगिरी थोड़ा जल्दी बंद हो जाता था, फैंसी ढाबा देर रात तक खुला रहता.

पान ठेले से लौटते वक्त वह सहयोग अपार्टमेंट के पीछे ही दायें मुड़ गया शॉर्ट कट के चक्कर में.

पंद्रह कदम भी नहीं चला होगा कि उसे महसूस हुआ कोई उसके पास आकर चलने लगा है. उसने देखा तो एक लड़की थी. उसके चेहरे पर पसीना था. वह सामने देखने लगी और उसने कहा 'सामने देखते रहो और प्लीज़ मेरे साथ चलते रहो'.

उसे अजीब लगा.

फिर और भी अज़ीब जब लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया. जैसे दोस्त पकड़ते हैं. उसे महसूस हुआ कि लड़की की हथेली भी पसीने से भीगी हुई है.

लड़की से उसने पूछा- 'क्या हो गया ?'

लड़की बोली- 'दो-तीन लड़के हैं जो रोज पिछले कई दिनों से उसके पीछे चलते रहते हैं.'

फिर?, उसने पूछा

'तो मेरे साथ चलो थोड़ी देर. तुम्हें साथ देखकर वे चले जाएंगे.'

उसने कुछ नहीं कहा.

वे चलते रहे. अगले दो सौ कदम.

लड़कों की मारूति 800 जहां से पीछा करने के लिए उसका इंतज़ार कर रही थी, वहीं खड़ी रही.

लड़की ने उससे पूछा, 'तुम्हें कहा जाना है ?'

मैत्री में. सामने ही है.

और तुम्हें, उसने लड़की से पूछा.

थोड़ा आगे तक.

वह उसे उसके अपार्टमेंट तक छोड़ आया. उसने थैंक्स कहा होगा, पर उसे याद नहीं. उसकी हथेलियों को वह डर जरूर याद था, जो लड़की की पकड़ और पसीने से झांक रहा था.

सिगरेट जलाते हुए अपने कमरे की तरफ लौटते हुए उसे अज़ीब तरह से अच्छा लगा. खिड़कियों से जिन जींस के फटे हुए पायंचे झांक कर उसकी तरफ देख रहे थे. वह उन्हें पहचानता था

फोटोः टॉमस क्रूतबर्गर, फ्लिकर

Monday, August 18, 2008

LOVE STORY # 516: संगीता सिंह को 25 साल बाद देखा तो तुरंत पहचान लिया


वे एक स्कूल में पढ़ाती थीं. केजी विंग का वह स्कूल डे बोर्डर्स के लिए था. वह स्कूल एक बड़े स्कूल का हिस्सा था, जहां देश भर के लड़कों को सुनहरा भविष्य बनाने के लिए भेजा जाता था. वे ग्यारह की उम्र में आते और सब कुछ ठीक चल रहा होता.. यानी पढ़ाई और बदमाशियों का हिसाब, तो अट्ठारह की उम्र में स्कूल से निकलते. फौज में जाते. इंजीनियर- डॉक्टर बनते. बाकी उम्मीद करते कि एक दिन वे भी कहीं न कहीं एडस्ट हो जाएंगे.

इस जूनियर स्कूल में ज्यादातर टीचर बोर्डिंग स्कूल के टीचर्स की पत्नियां थीं. वे हर तरह से अपवाद थीं. वे जवान थीं, करीब चार सौ एकड़ में फैले स्कूल में क्योंकि और कोई नहीं था, इसलिए वे ही खूबसूरत थीं. और एक सभ्रांत परिवार से होने के अलावा गैर शादीशुदा थीं. वे कॉस्मेटिक रिवॉल्यूशन से पहले के दिन थे, जब महिलाओं के पास बदबूदार वीको टरमरिक लगाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं था. ज्यादातर औरतें या तो बदसूरत थीं और कुछ खूबसूरत भी. प्रजेंटेबल बनना मास कल्चर का हिस्सा नहीं हुआ था. वह इंटरनेट, रंगीन टीवी, डीवीडी, मोबाइल फोन, एसटीडी, आईएसडी, टेलीफोन बूथ से पहले के दिन थे, जब ख़त को तार समझा जाता था और लौटती डाक से जवाब देने की जल्दबाज उम्मीद रखी जाती थी. स्कूल डिसिप्लिन, चरित्र निर्माण, बहुमुखी विकास के लिए न सिर्फ जाना जाता था, बल्कि वहां इसके लिए कड़क बंदोबस्त भी था.

संगीता सिंह उस स्कूल में एक विषयातंर झोंके की तरह थीं.

स्कूल में भर्ती होने वाले 500 लड़के वहां से पास आउट होने से पहले जवान होते थे. आठवीं पास करते करते ज्यादातर शेविंग किट का इस्तेमाल करने लगते. शेविंग किट, अश्लील तस्वीरों वाली बदरंग पत्रिकाओं, पहले स्वप्नदोष के अलावा जवान होती हुई इस पौध में एक और बात साझा थी. अगर वह स्कूल लड़कों को बड़ा करने की फैक्ट्री थी, तो संगीता सिंह एक तरह से उसके क्वालिटी चैक का हिस्सा थीं.

हर साल कुछ नये लड़के जब जहां मौका लगता, उन्हें देखने जाते. वे हसरतों को अपने भीतर उगता हुआ महसूस करते. वहां सर्द आहें उन्हें ढूंढ लेतीं. कोई कुछ कहता नहीं. कोई परची नहीं. वे लौट आते. संगीता सिंह हर साल जवान होते सैकड़ों लड़कों की निजी फैन्टेसीज का हिस्सा थीं. सभी के सपनों, ख्यालों में संगीता सिंह अलग थी.

असली संगीता सिंह से भी अलग. जिन्हें शायद ये तो अंदाजा था कि लड़के उन्हें घूरकर बड़े हो रहे हैं, पर ये नहीं कि वे घूरने का क्या करते हैं. कि किस तरह से स्कूल की एक पीढ़ी उन्हें देख कर बड़ी हुई है. उनमें से ज्यादातर का वे पहला प्यार हैं. जैविक प्रक्रिया का एक रागात्मक पक्ष. जवानी की दहलीज पर कदम रखती वे सैकड़ों प्रेम कहानियां पूरी तरह काल्पनिक थी. अगर वह कहीं सच था, तो वह संयोगवश था. संगीता सिंह वह संयोग थीं.

एक दिन उनका विवाह हो गया. वे उसी शहर में रहती हैं. घर, परिवार, बच्चे. स्कूल से पच्चीस साल पहले पास आउट हुए एक ओल्ड बॉय ने उन्हें हाल में देखा और तुरंत पहचान लिया. फिर दूसरों से बताया- वे बिल्कुल ठीक हैं.

नागेश कुकुनूर की रॉकफोर्ड फिल्म तो बहुत बाद में आई थी, जिसमें नंदिता दास आती है, तो उस स्कूल के सारे लड़कों की बांछे खिल जाती हैं.

फोटो: जन्रुस/ फ्लिक्क्र

Sunday, August 17, 2008

LOVE STORY # 517: एक शाम शुरू हुआ जो संगीत, जीता रहा मौत के बाद भी

पहली बार मिली तब उनकी उम्र 65 साल के आसपास थी. पर उनके उजास भरे चेहरे पर जो ताज़ग़ी थी, वह उन्हीं को हासिल होती है, जिनके भाग में प्यार आता है. मैं जानना चाहती तो थी, पर हमेशा हिचकिचाहट होती. कहीं अजीब तो नहीं लगेगा उन्हें. कहीं ग़लत तो नहीं होगा इस तरह किसी के निजी मामलों को लेकर उत्सुकता दिखाना. हालांकि मेरी हिचकिचाहट बेकार थी. उनका संगीत सब ज़ाहिर कर देता था.
उसकी शुरूआत तब हुई जब वे पांच बच्चों की मां थी और लंदन की हाई सोसाइटी का अटूट हिस्सा. खाविंद मल्टीनेशनल तेल कंपनी में बड़े साहब. घर हालांकि थोड़ा दूर था, पर लंदन के अपने जलवे थे और जिंदगी अच्छी चल रही थी.
और ऐसा भी नहीं था कि उनकी जिदंगी में कुछ गुमशुदा सा नहीं था. उस एक दिन तक.
हिंदुस्तानी क्लासिकल की एक शाम. लंदन में कुछ चुनींदा लोगों के लिए . उस शाम कुछ ऐसा मन लगा जो अब तक के किसी भी रेस कोर्स, क्लब, ओपेरा या बॉल रूम डांस में नहीं लगा था. वह बैक स्टेज गईं उस शाम के गायक को ये बताने कि उनके संगीत ने उनकी जिंदगी को कितनी ज्यादा और कितनी नई और कितनी अलग खुशी दी है.
उन्हें मिलने से पहले उनके दिल को सिर्फ संगीत ने ही छुआ था. पर उन्हें देखने के बाद तो उनके पांवों तले जमीन ही खिसक गई. न सिर्फ वह गायक उन्हें बेहद प्यारा लगा, बल्कि उनकी तमीज और उर्दू ज़ुबान ने उनके सामने एक ऐसी दुनिया खोल दी, जहां वे अभी तक गई ही नहीं थी. वे तो अपने भीतर तक अंग्रेजियत से भरी हुई थीं.
ये मुलाकात उनके ज़हन से जा न सकी. कई सालों बाद उनके खाविंद का तबादला लंदन से कलकत्ता हो गया. और फिर एक शाम ऐसी आई हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की, जहां उनको जाना हुआ. गाने वाले उस्ताद वही. उन्हें ये जानने पर आसानी से यकीन न हुआ कि उस्ताद कलकत्ते के ही रहने वाले हैं.
पांच बच्चों की मां ने 36 साल की उम्र में तय किया कि उन्हें शास्त्रीय संगीत सीखना है. उस्ताद ने काफी मना किया, उन्हें काफी दूर रखने की कोशिश की, पर उनकी जिद के आगे फिर मान गये. और फिर उनकी तालीम शुरू हुई. न सिर्फ संगीत की. बल्कि एक नई तरह की जिंदगी की भी. जिंदगी का एक ऐसा रास्ता जहां काम को लेकर इज्ज़त, नियम, तहजीब और लगन का हर तरह से हर वक्त़ ध्यान रखना था.
वह उस्ताद की तरफ ऐसी खिंची जा रही थी, जैसे वे चुम्बक हों. उनके भीतर जो बदलाव आ रहे थे, वे सिर्फ संगीत ही नहीं ला रहा था. उनके गुरू ये साफ देख सकते थे. हाई सोसायटी के सारे नाज़ो नखरे एक एक करके पीछे छूटते जा रहे थे. वे हरचंद कोशिश कर रही थीं अपनी नकचढ़ी अंग्रेजी की जगह उर्दू के तलफ्फुज़ और तहज़ीब को ठीक से हासिल कर सकें.
उनके पति को लगता था कि ये एक बुख़ार है, जो अमीर लोगों की बीवियों को अक्सर चढ़ता रहता है. उन्हें पता था कि ये भी उतर जाएगा.
पर ये वाला थोड़ा अलग था.
छह साल की तालीम के बाद, जिसमें हर तरह की रोक-टोक और बंधनों की जरूरत पड़ी, उस्ताद को लगा कि अब वे एक गायक की तरह समाज के सामने आ सकती हैं. तब तक वे दिल्ली आ चुकी थीं. अपने रियाज़ को बरकरार रखने के लिए दिल्ली में उन्होंने अपने गुरू के लिए एक फ्लैट किराये पर लिया था, जहां वे कभी कभी आते और कुछ रोज ठहरते. उन्हें अपना संगीत का घोंसला बेहद पसंद था, जहां वे अपने गुरू की बड़ी सी तस्वीर के सामने रोज रियाज़ करतीं. इस बार का रियाज खास था क्योंकि इसके तुरंत बाद उनका पब्लिक प्रोग्राम होना था.
जिस तय तारीख़ को उस्ताद कलकत्ते से दिल्ली पंहुचने वाले थे, उनके पास फोन आया. उनकी नींद में ही मौत हो गई थी.
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनका करियर वैसा नहीं हो सका, जैसा उनके उस्ताद ने तय किया था. वैसा भी नहीं जैसा उन्होंने सोचा था, पर संगीत को खुद से उन्होंने फिसलने नहीं दिया. उनका संगीत पहले से ज्यादा गहरा होता रहा. उनकी गैरमौज़ूदगी में उनके लिए उमड़ते प्यार की तरह. उनके सुरों में उस प्यार की गूंज थी. उनके आलाप में उनका प्यार घुला हुआ।
फोटोः टॉमस अलॉर्ड फ्लिकर

Saturday, August 16, 2008

LOVE STORY # 518: उसकी खुशी का पता तानपूरे को था और थकती हुई सांस को भी


लंबे समय तक संगीत की कक्षाएं चलीं. सबकी जगह तय थी. तानपूरे की. क्लास की. वक्त की. किस वक्त के किस आलाप, आरोह और अवरोह की. हर चीज धीरे धीरे अपनी अपनी जगह पर निखरती चली गई. जैसे कदम राजमार्गों पर चलते चलते हर मोड़, ढलान और चढ़ाई और गड्ढों और ठोकरों को पहचान लेते हैं, वैसे ही रियाज़ ने रास्ता साध लिया था संगीत का. पर ये सब कुछ बाहर का था. राग दूसरों ने लिखे थे, कसौटियों पर दूसरों ने कसा था, परीक्षा लेने वाले बाहरी लोग थे, सिखाने वाले गुरू बहुत मेहरबान तो थे, पर उनकी कोशिश भी यही थी कि उनकी छाती गर्व से फूली न समाये, जब लोग उसका संगीत सुनें. कभी रियाज़ मत छोड़ना, बेटी, तुम्हारी प्रतिभा तुम्हें बहुत दूर तक ले जाएगी.
रियाज़ चलता रहा, पर एक वक्त के बाद सब ठहर सा गया. क्योंकि जो भी कुछ था, वह पहले का दुहराव ही था. नया कुछ नहीं था.
उसे उम्मीद थी कि उसका रियाज़ उसे एक दिन उस संगीत तक ले जाएगा, जो उसके भीतर से फूटेगा. ये उम्मीद हमेशा से थी, जुगनू के टिमटम की तरह, जो जिन बहुत सारी वजहों से यकीन में नहीं बदल पाई, उनमें से एक ये भी थी, कि यकीन बनने के बाद टूट गया तो कितनी तकलीफ होगी. वह उतना ही करती रही, जितना उससे होता रहा. पर अपने अकेले में, अपने सहज में, अपने एकाकी में वह गुनगुनाती उस उम्मीद को जो कई राग बनकर उस तक आये थे.
इस बीच कई चीजें बदलीं. शक्ल बदली. आईने बदले. शहर बदले. निगाहें बदलीं. एक बार टीबी का झटका. फिर दमे का दौर. इन्हेलर. और ज्यादा लम्बा खींचा जा सकने वाला सुर.
पर ऐसा कितने लम्बे समय तक खिंच सकता था.
एक दिन पहले भटके बादलों की तरह, फिर निशानदेह रास्ते की तरह उसके राग उसमें से फूटने लगे. कोंपलों और फुनगी की तरह, अपना आसमान ईज़ाद करती हुई, खुशियों को बिखेरती हुई, उन जगहों की तरफ भी, जहां का रास्ता तय नहीं था. उन्हें उन राजमार्गों का पता तो था, पर कुछ पगडंडियों ने ढूंढ निकाला था उसे.
इस बात का उसे अफसोस तो रहा कि उन रागों को, उन सुरों को वह उस कामयाबी से नहीं लगा सकी, जैसा वह पहले कभी कर सकती थी. पर फिर भी ये खुशी कि उसके राग उस तक पंहुचे और उसके भीतर से फूटे, किसी बड़ी खुशी से कम नहीं थी. कि उसकी उम्मीद खरी उतरी. कि उसके गीत आखिर उसे गाने लगे. चुप्पी के अकेले और लाइट चले जाने के अंधेरे में. जब ये संगीत फूटा तो वह सिर्फ रागों में ही नहीं, बल्कि कई और तरह से भी. गाये जाने के अलावा भी कई तरह से वह आकार लेता रहा. मसलन वह यकायक खूबसूरत हो गई, कई गुलाबी और सफेद कविताएं उसे लिखने लगीं, उसके बगीचे में बहुत दिनों बाद कुछ नये तरह के फूल खिले.
पहले जब वह संगीत को साध रही थी, तब उसका अपना संगीत कहीं और था.
अब जब उसका संगीत उसे साध रहा था, तब वह कहीं और थी.
तानपूरे को ये पता था. उसकी थकती हुई सांस को भी.
पर सब था तो. कहे में भी महसूस किया जाता हुआ सा. खुशी नहीं तो खुशी जैसा ही कुछ. बहुत कुछ.
अमूर्त का. चुका हुआ..

Wednesday, August 13, 2008

LOVE STORY # 519: वह मर्द उससे मिलने के बाद उड़ने लगा था

कहानी : डेव एगर्स
जब वे मिले और जब उन्होंने एक दूसरे को बहुत ज्यादा पसंद किया, उसका सुनना पहले से बेहतर हो गया और उसकी नज़रों में दुनिया की लकीरें पहले से ज्यादा साफ़ हो गयीं. वह पहले से ज्यादा स्मार्ट हो गया, ज्यादा जागरूक, और वह सोचने लगा अपने वक्त में नया कुछ करने को. वह उन बातों के बारे में सोचने लगा, जिसपर अभी तक कभी उसने ठीक से गौर भी नहीं किया था. पर अब इस नए साथी के साथ उन्हें करने की जल्दबाज़ी उसे परेशान करने लगी थी. वह उसके साथ हल्के वजन वाले कॉन्ट्रैप्शंस के साथ उड़ना चाहता था. ग्लाइडर, पाराशूट्स, अल्ट्रालाइट और हैंगग्लाइडर उसे हमेशा अजीब लगते थे, और अब उसे लगता था कि उनकी नई ज़िन्दगी इन्हीं सब के इर्द गिर्द रहेगी. लगता था कि वे दोनों एक ऐसा जोड़ा होंगे, जो वीकएंड और छुट्टियों में यहाँ वहां उड़ा करेंगे अपने छोटे से जहाज़ में.
इसके लिए वे उसकी जरूरी शब्दावली को सीखेंगे, वे क्लबों के सदस्य बनेंगे. उनके पास एक बड़ी सी गाड़ी होगी या फिर एक ट्रेलर- जिसमें वे विंग्स को तह कर रख सकेंगे और साथ में अपनी नई मशीनों को भी. फिर वे नई जगहों तक जायेंगे उन्हें आसमान से देखने. जिस तरह का उड़ना उसे दिलचस्प लगता था, वह जमीन से बहुत ऊपर नहीं था. ज़मीन से हज़ार फीट ऊपर से ज्यादा वह नहीं जाना चाहता था. वह चाहता था कि ज़मीन पर हिलती चीज़ों को वे ऊपर से देख सकें, नीचे के लोगों को देखकर हाथ हिला सकें, जंगली जानवरों को दौड़ते हुए देखें और तट से गहरे समुद्र कि तरफ़ जाती डोल्फिन मछलियों की गिनती कर सकें. उसे उम्मीद थी कि इसी तरह का उड़ना वह भी चाहती होगी. उस औरत और इस उड़ान के विचार से वह इस कदर जुड़ चुका था और उसकी ज़िन्दगी में उड़ान का फितूर कुछ इस तरह गुंथ चुका था कि उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा न था कि अगर ये सच न हुआ तो फिर वह क्या करेगा. वह इन उडानों पर अकेला नहीं जाना चाहता था, उसके साथ न जाने से तो न जाना ही ठीक था. जब वह उससे साथ उड़ने की पेशकश रखेगा और अगर उसे ये बात बहुत न जमे, या फिर वह बहुत उत्साहित न हो इस ख्याल को लेकर, तब? क्या वह तब भी उसके साथ रहेगा? क्या सचमुच? उसने तय किया कि नहीं. अगर वह उसकी वैन में तह किए हुए पंखों के साथ ड्राइव पर जाने को तैयार नहीं होगी तो उसे उससे दूर जाना होगा, मुस्कुरा कर दूर जाना होगा, और वह फिर नए सिरे से अपनी तलाश करेगा. पर जब और कहीं उसे अपना नया साथी मिलेगा, उसे ये अभी से पता है कि वह उसके साथ उड़ने का कोई प्लान नहीं रखेगा. कोई और औरत के साथ कोई और प्लान होगा. क्योंकि अगर ज़मीन से सटकर वह कभी भी उड़ेगा तो इसी वाली के साथ.
(अमेरिकी लेखक डेव एगर्स की यह कहानी गार्डियन, लंदन से साभार, अनुवाद आस्तीन का अजगर)
फोटो दारको हृस्तोव, फ्लिकर

LOVE STORY # 520: वेटिंग का टिकट कन्फर्म नहीं हो सका, ट्रेन उसके सामने से ही चली गई

उसने लौटने का टिकट वेटिंग में ये सोचकर ले लिया था, कि जब तक ट्रेन पर सवार होने का वक्त आएगा, तब तक टिकट कन्फर्म हो चुकेगा. उस शहर में कुछ लोगों को वह जानता था, पर किसी को पता नहीं था कि वह वहां आया हुआ है. शादियों का साया था और भीड़ बहुत ज्यादा थी. उसकी आंखों के सामने से ही ट्रेन चली गई. उस सर्द रात वह उस शहर को जल्दी से जल्दी छोड़ देना चाहता था, और वेटिंग रूम में जगह नहीं थी.

उसे पता था उसे किससे मिलना था. वह उससे ढूंढता रहा तो था. पर जैसा सोचते हैं, वैसा कहां होता है. कई बार उसे लगा कि सपने सच नहीं होते. और उसने फिर शादी कर ली. बच्चे पैदा किये. और फिर एक तरह की दुनियादारी ओढ़ ली. किसी अंधेरे कोने में कभी ऐसा जरूर लगता कि कुछ अधूरा है, पर सच तो ये भी था कि सपने सच नहीं होते और दुनियादारी की अपनी जिम्मेदारियां हैं, अपनी जवाबदेहियां भी. मध्यवर्गीय नियतियां, रेलगाड़ी के जनरल डब्बे की तरह धीरे धीरे एडजस्ट होते होते एक दिन सेटल हो ही जाती हैं.

और तब एक दिन अचानक वह शख्स उसे मिल ही गया, जिसे मिलकर उसे अधूरा लगना बंद हो गया. जिसकी तलाश, इंतजार, उम्मीद वह छोड़ चुका था. दोनों को पता था कि उनकी जिंदगियां और आत्माएं एक दूसरे से गुंथी हुई हैं. वे बहुत कम समय के लिए मिलते. और दोनों की बहुत सारी बातें एक दूसरे में अपने मायने ढूंढ लेती... वे जिंदगी के अलावा हर कहीं साथ थे. सपने में, स्मृति में, कविताओं और फंतासियों में, जीने के जोखिम और प्रार्थना के अमूर्त में.

एक दिन नाराज होकर उसने भी शादी करने का फैसला कर लिया. वह उसकी शादी में शरीक होने गया. उस दिन वे ज्यादा देर तक तो नहीं मिल पाए. पर उसे भला लगा कि वह दूसरे शहर और दूसरी दुनिया से इस मौके पर आ सका. जैसे कि शादियां होती हैं, उतनी चमक दमक तो इसमें न थी, पर फिर भी एक औपचारिक समारोह तो था ही. एक ऐसा समारोह.. जहां वह सिवाय उसके किसी को ठीक से नहीं पहचानता था.

पर अब उसकी जद्दोजहद प्लेटफॉर्म पर खाली बेंच ढूंढने को लेकर थी. वह एक और नये इंतजार में कदम रख रहा था. जो पहले से कहीं ज्यादा कोरा, सफेद और बियाबान था

फोटो : अलेक्सेउस / फ्लिकर

Tuesday, August 12, 2008

LOVE STORY # 521: मर्द रिमोट से चैनल बदलने लगा, औरत रसोई में बर्तन रखने लगी


दोनों टेबल पर आकर बैठ गये थे। काम से लौटा एक मर्द। रसोई में पसीना पसीना हुई एक औरत। वे साफ साफ एक दूसरे पर हमला करने से बच रहे हैं, पर ऐसा कोई मौका हाथ से जाने भी नहीं दे रहे, जो एक दूसरे को बिना सामने से हमला किये जख्मी करने वाला हो.

मसलन उसने औरत के मायके वालों पर कुछ हल्की बात कही.
उसने मर्द की माली हालत के बारे में एक बारीकी के साथ कुछ याद दिलाया.
ये भी कहा कि मर्द के दोस्त उसके मुकाबले कितना कुछ कर रहे हैं.
उसने औरत के बनाये खाने में ज्यादा नमक की शिकायत की.
औरत ने तुरत चखकर देखा और कहा मुझे तो कम लग रहा है.
औरत ने बराबरी के अधिकारों की दुहाई दी.
मर्द ने परंपरा और ऐतिहासिक भूलों को ठीक करने की बात कही.
उसने मर्द के पसंदीदा राजनेता को दो अदृश्य जूते जड़े.
उसने औरत के पसंदीदा टीवी शो के बारे में दो बुरी बातें कहीं.
ये सब कुछ बिना हिंसक या जोर से बातचीत किये बहुत देर तक चलता रहा. खाने के बाद मर्द डकार लेता हुआ टीवी के सामने बैठ गया और रिमोट से चैनल बदलने लगा. औरत रसोई के सिंक में बर्तनों को रखने लगी.
आप इस घटनाक्रम के दौरान झेंपू, गुटनिरपेक्ष, हींही-हूंहूं करते हुए खुद को बिना किसा का तरफदार बनाए हुए इस बात का बेसब्री से इंतजार करते देखे गये कि ये जोड़ा अपने बैडरूम में कब जाएगा. ताकि आप ड्राइंग रूम के दीवान पर पसर सकें और अगली सुबह की बस पकड़ सकें.
फिर बहुत दिनों बाद आपने सल्वाडोर डॉली की ये पेंटिंग ऑटमल कैनिबलिज्म देखी और वह शाम, वह टेबल और वह जोड़ा इतनी शिद्दत से कौंध क्यों गया?

Sunday, August 10, 2008

LOVE STORY # 522 : वे जिंदगी में अकेले थे और मौत में साथ


दोनों ने जिंदगी देखी हुयी थी। दोनों की एक दुनिया थी. वे दोनों अकेले थे. दोनों को साथ की दरकार थी. बात ये थी कि वे दोनों अलग-अलग महाद्वीपों में अकेले थे. एक यूरोप में, एक एशिया में. एक संयोग हुआ और वे मिले. अकेलापन दोनों के बीच की कड़ी थी. जिस दुनिया में दोनों ने जिंदगी बितायी थी, उसमें ऐसे लंबे और सर्द दौर थे, जहाँ वे अकेले थे. वो पचास की थीं और वे पचपन के. दोनों वैधव्य में. एक लन्दन में नौकरीपेशा. जहन के किसी कोने में एक स्मृति का सपना, घर चलाने का, मर्द और सुरक्षा का. दूसरा हिंदुस्तान में अपनी स्टडी से कहीं न बाहर निकलने की जिद लिए, पर एक औरत की घरेलू गर्माहट का शिद्दत से जरूरतमंद. उम्र, जिंदगी और नियति के जिस मोड़ पर वे मिले थे, वहां उन्हें ऐसा लगा कि उनकी तलाश यहाँ पूरी होती है. जब तलाश पूरी हुयी और वे साथ साथ रहने लगे, तो उनके अपने-अपने अकेलेपन दूर हो गए. वे साथ में अकेले होने लगे. और दोनों को इसकी आदत नहीं थी. वे लड़खडाने लगे, कुछ नए किस्म के डरों में. दोनों एक दूसरे को पाना पता नहीं कितना चाहते रहे, पर दोनों एक दूसरे को खोने के ख्याल से आतंकित रहते. वे एक दूसरे के अमरत्व के ख्वाहिशमंद हो गए. अपनी पत्नी के लिए उन्होंने एक मकान डिजाईन किया और उसे बनवाने लगे. वे यकायक और ज्यादा धार्मिक हो गयीं. उनके जाप बढ़ गए. बीच में कहीं उन्हें याद ही नहीं रहा कि उन्हें जीने के लिए भी थोड़ा वक्त निकालना था. एक दिन पता चला कैंसर. जब मौत सामने थी, तो यकायक वे जिंदगी से प्यार करने लगीं. जीना चाहने लगीं.उनकी मौत के बाद वे फिर कभी ख़ुद के साथ अकेले न रह सके. जब वे मौजूद थी, तब वे अकेले होना पसंद करते थे.

फोटो: फोटो फ्रेंडली / फ्लिकर

Friday, August 8, 2008

LOVE STORY # 523: उसने मुझे बास्टर्ड कहा !

बास्टर्ड!'

'क्या??'

'बास्टर्ड!!'

और दोनों हंसने लगे. उसके पेट में यकायक सारी तितलियां उड़ने लगीं.
उसकी हथेलियां उन तितलियों की पुकार सुनती रहीं.

बहुत रोज बाद तक.


फोटो : ब्रिनट्रिक / फ्लिकर

Thursday, August 7, 2008

LOVE STORY # 524: धूप थी, बारिश थी, इंद्रधनुष नहीं था


उसने सब कुछ उलट पलट डाला. कमरे का हर समान. अलमारी. बाहर का आंगन, दालान, धोबी का हिसाब और किताबों, सीडी और डीवीडी का रैक. अच्छा ये हुआ कि जो धूल वहां बहुत दिनों से जमा थी, वह अपनी जगह से हटकर कहीं और बैठ गई. उसने अपने अतीत के बारे में सोचा. यादों की टटोल की. वह भविष्य में गया. अपनी योजनाओं का इंस्पैक्शन किया. अपनी गलतियों की लिस्ट बनाई. अपने सही फैसलो के आगे दो - दो राइट टिक लगाए. पुरानी कमीज की तरह अपने नियति को झाड़ा और उसकी तह बनाई. उसने पांच साल आगे की दिनचर्या को आज ही तय करने की कोशिश की. परहेज करने वाली बातों की फेहरिस्त बनाई. उसने तय किया कि वह अपने वकील, डॉक्टर, इन्वेस्टमेंट कंसल्टेंट, दोस्त, रिश्तेदारों की हर बात की संजीदगी से लेने की कोशिश करेगा.

कुछ था जो नहीं मिल रहा था. पर था जरूर.

वह अभी और यहीं के अलावा हर कहीं था. अभी और यहीं से लापता. अपने आप में नहीं. अपने बाहर में खुद को तलाशता. उसे पता नहीं क्यों ये यकीन था कि वह खुद को उन जगहों पर ढूंढ निकालेगा, जो न अभी में थीं, न यहीं में. बाहर धूप थी. हल्की बारिश भी. बच्चे कीचड़ में खेल रहे थे. स्कूली कॉपियों से कागज फाड़कर नावों को नाली में दूर तक जागकर डूबता हुआ देखते. और जहां तक निगाह जाती थी, वहां तक इंद्रधनुष नहीं था.


जो उसकी तलाश थी, उसके बाहर नहीं था.

फोटो: क्रिकित / फ्लिकर

Wednesday, August 6, 2008

LOVE STORY # 525 : कयामत के पल में एक दूसरे पर लुढ़के जाते टी बैग्स

पीछे चाय के खाली कप थे. और ठंडी केतली. लुढ़के जाते एक दूसरे पर गिरे हुए टी बैग्स में चाय की फूली हुई पत्तियां. 98 डिग्री सेल्सियस के गरम पानी की याद लिये. और थोड़ी भाप की भी. और उस साझा गुनगुने पल की जो जिंदा होकर उनकी आंखों में दमका था. बहुत सारे इंतजार के बाद राहत और आशवस्तिबोध से भरा हुआ. वह दुनियादारी के सफर की शाम में जिंदगी की सराय थी. और इस सराय का अपना सफर था. वहां वक्त नहीं था क्योंकि एक भी पल अधूरा नहीं था. न ही अक्षांश और देशांतर थे. जो खाली था, वह भी भरा हुआ था. एक कमरा पूरी दुनिया के खिलाफ, उसके परे, उसके इधर और उधर अपने चाय के प्यालों, केतली और भाप के साथ मौजूद था. उसके अपने मायने थे. अमूर्त से. कमरे में संगीत कभी मौन की तरह बजता. कभी मौन संगीत की तरह. वहां हर पल कयामत थी, क्योंकि वक्त वहां खत्म होता रहा था. दुनिया की नज़रों से बाहर उनकी आंखों में एक पूरा, साबुत, खुश प्लानेट था, जहां पानी भी था.

कमरे में आने के लिए वक्त और दुनिया को चप्पल की तरह बाहर उतार कर आना पड़ता. दरी पर बैठकर उस पल में बिना किसी याद, अफसोस या अरमान के, उस कमरे में बिना किसी सैलानी सपने के,चाय की केतली, टी बैग्स, प्यालों से निकलती भाप के बीच आंखों में झांकते हुए मरा जा सकता था. एक स्माइली :-) भाव के साथ.

(रेलवे इंजनों के बनने से बहुत पहले न्यूयॉर्क टाइम्स मे किसी ने चिट्ठी लिखी थी- केतली से निकलती भाप हमें कहां ले जाएगी. यहां. एक के जहन ने कहा दूसरे के जहन से.)

समुद्र के किनारे तूफान के बाद जो नांवे बंधी रह गई थीं, उनकी शक्ल पर बदहवासी पढ़ने के लिए चश्मे की जरूरत नहीं थी.


फोटो : •sнªωα5τϊoи•'s /flickr

Tuesday, August 5, 2008

LOVE STORY # 526: उनके साथ की अपनी जिंदगी थी, बरक्स उनकी जिंदगियों के

क्या तुम एक ही इंसान को हमेशा के लिए एक ही शिद्दत से प्यार कर सकते हो? नहीं.

क्या तुम एक ही इंसान को हमेशा के लिए एक ही शिद्दत से नफरत कर सकते हो? नहीं.

उन्हें ऐसा लगा था, जब वे मिले थे और जब वे बिछुड़ रहे थे. पर उन्हें पता था, कि उनका कोई भी अंतरंग अंधेरा या उजाला तब तक अधूरा था, जब तक वह दूसरे से बांट नहीं लेते थे. मिलने और बिछुड़ने के बीच में एक साथ का लंबा घटनाक्रम था, जिसमें प्यार था, नफरत थी, जलन थी, कुढ़न थी, झगड़ा था (कई बार ख़ामख्वाह का कई बार बहुत संजीदा सा), आंसू थे, ठहाके थे, सहारे थे, आसरे थे, छाती पर मुक्के और चांद को चुप होकर एक साथ देखना था, उस सड़क से जो चांद को जाती थी. मिलने और अलग होने के बीच एक साथ था.

ये साथ जो था, इसकी अपनी जिंदगी थी. किसी ने अनुष्ठान नहीं किया था, न हीं कोशिश कि वे मिलें और प्यार हो जाए. पता नहीं कब से ये साथ अपने जिंदा होने की बाट जोह रहा था.

दरअसल यह सब जब हुआ , तो उन्हें पता ही नहीं चला. जब हो गया, तब तक उनके पांवों तले से जमीन खिसक चुकी थी. और तब क्या हो सकता था.

जब वे करीब नहीं थे, तो दोनों अलग जगहों से एक ही चांद को एक ही समय और एक ही तरह के खालीपन को एक ही चुप्पी में देखते थे. जो उन्हें अकेला तो बहुत कर देता था, पर करीब भी ले आता था. साथ की नजदीकी से अकेलेपन की करीबी थोड़ी अलग जरूर थी, पर इतनी नहीं कि वे अलग हो जाएं.

वे जब साथ थे, और जब फिर दूर हुए, तो दुनिया अपने हिसाब से चलती रही. बच्चे पैदा होते रहे, गर्भपात होते रहे, फलस्तीन से लेकर गुजरात इंसानियत को लेकर अपना अपना हिसाब करती रही, लोग प्यार करते रहे, धोखा देते रहे. हवस की आग का शिकार बनाते रहे. कत्ल करते रहे. खुदकुशियां भी.

वे कई बार दूर हुए. पर साथ अपने रास्ते निकालता रहा, पास होने के. पर साथ की अपनी नियति थी. अपनी जिंदगी. अपने रिश्ते. अपनी कहानी. अपने अर्थ। अपनी गतिशीलता. अपने आरोह, अवरोह. अपनी खामोशियां. इस साथ का बहुत कुछ उनके चाहने और न चाहने के बाहर था. वे क्या कर सकते थे. सिवा खुद से ये गिला कर बदला लेने के कि ये सब उनका किया धरा था. और वे चाहते तो इससे बच सकते थे. जिये की जो खुशी थी. साथ का जो हासिल था. क्या दूर हो जाना उससे कभी भारी और बड़ा हो सकता था?

साथ की अपनी जिंदगी थी, कई बार उनकी जिंदगियों से जुदा. उनके रिमोट कंट्रोल, मोबाइल फ़ोन की रेंज, हाथ और अरमानों की पंहुच से बाहर भी।

चित्रः टीना मैंथोर्प, फ्लिकर


Monday, August 4, 2008

LOVE STORY # 527: जो बड़ोग में रहते हैं..

उन्होंने जैसा सोचा, जैसा चाहा, जैसा मांगा सब वैसा ही हुआ. उनका सारा हिसाब सही रहा. जिनकी जिंदगी में बड़ोग जानने और चाहने से हो सका, क्या वे सचमुच खुश रह सके? पर क्या उनकी खुशनसीबी ने उनसे बाद में कोई बदला नहीं लिया? क्या पहाड़ी हवाओं में उनकी खामोशियां कंपकंपाई नहीं? क्या वे भी एक दिन बड़ोग से ऊब कर टीवी चैनल नहीं देखने लगे? जैसे रेलगाड़ियों की खिड़कियों ने हर बार कौतुक से बड़ोग के प्लेटफॉर्म को देखा, क्या वैसे ही प्लेट फॉर्म ने सिर उठाकर उन रेल गाड़ियों के भीतर देखने की कोशिश नहीं की? क्या वे हर रोज सुबह उठकर आईने में दुनिया के सबसे खुशनसीब और सुंदर लोगों की शक्लें देखते रहे? क्या वे कभी बोर नहीं हुए? क्या वे एक दिन अचानक बिना कोई अगला पता दिये हमेशा के लिए बड़ोग से चले नहीं गये? क्या वे शिमला के स्लम या मैदानों में आकर गुमशुदा नहीं हो गये?
अकेला होता हुआ आदमी कई बार इतनी शिद्दत से लापता क्यों हो जाना चाहता है? उस दृश्य से, जिसका वह हिस्सा था। उस दृश्य से जो उसका हिस्सा है. जिसके पिक्चर पोस्टकार्ड अपने दोस्त, रिश्तेदारों को भेजता भेजता वह कभी थका नहीं. ऐसा क्या हो जाता है उस सुंदर और असहनीय अकेलेपन में, कि वहां आप अपना वीकेंड तो मना सकते हैं, जिंदगी बिता नहीं.

और उनका क्या, जो बड़ोग में ही पैदा हुए. वहीं बड़े हुए. क्या उनकी जिंदगी में बड़ोग हो सका? बड़ोग ही में या कहीं और किसी मल्टीप्लेक्स में चलती यश चोपड़ा के स्लो मो कुहासे के बीच पॉप कॉर्न और कोक के साथ?

फोटोः उपिंदर कौर, फ्लिकर से

Sunday, August 3, 2008

LOVE STORY # 528: बड़ोग का प्लेटफॉर्म सभी की जिदंगी में है

जिनकी जिंदगी में प्यार है. बड़ोग का प्लेटफॉर्म उनकी जिंदगी में है. यश चोपड़ा की फिल्मों के स्लो-मो कुहासे की तरह. हमारी उम्मीद के प्यार और प्यार की उम्मीद की तरह. बहुत सारे लोग बड़ोग नहीं गये. बहुत सारे लोग बड़ोग जानते भी नहीं. बहुत सारे लोग रेल गाड़ियों में सफर करते हुए निकल गये, जिन्हें पता ही नहीं चला कि बड़ोग कब गुजर गया. जिन्हें पता चला उनकी रेल गाड़ियां वहां रुकी नहीं. पर बड़ोग है अपनी जगह. 1901 के बने प्लेटफॉर्म के साथ. एक खाली बेंच. एक ऊंची छत वाला वेटिंग रूम. सुरंगों के बीच पहाड़ पर बना हुआ पत्थरों का प्लेटफॉर्म. देखकर ही लगता है कि जिस प्यार की इस दिल को तलाश थी, वह इससे कम कुदरती और इससे कम नाटकीय जगह पर मुमकिन न हो सकेगा. हालांकि बड़ोग में ऐसा होता कम ही होगा. वह एक सेट है. कहानी कहीं और लिखी जाती है.

क्या खुशी उसी प्लेटफॉर्म पर हमारा इंतजार कर रही होती है, जहां हम उसकी उम्मीद करते हैं. क्या उम्मीद करने पर मिली हुई चीज खुशी होती है. चाह कर जो हासिल होता है, क्या खुशी उनमें से एक है. ऐसा क्यों होता है कि खुशी के ज्यादातर पल हमें उस वक्त पकड़ते हैं, जब हमें पता भी नहीं होता कि कोई आने वाला है. ऐसा क्यों होता है कि लोग पानीपत या फगवाड़ा में प्यार करते हैं. और फिर बड़ोग से गुजरते वक्त लहर पैप्सी के खाली लिफाफे वहां फेंक जाते हैं. सचमुच बड़ोग जाने वालों की तादाद उन लोगों से काफी कम है, जिन्होंने सोचा बड़ोग जैसे प्लेटफार्म के बारे में और आत्मा के लिए थोड़ा ऑक्सीजन इकट्ठा कर लिया.

बड़ोग हमारी स्मृति का प्लेटफॉर्म है. बड़ोग हमारे सपनों का प्लेटफॉर्म है. हमारी हक़ीकत जो भी हो लेकिन दरअसल प्यार पूरा नहीं होगा, जब तक हमारे सफर का एक सराय बड़ोग न हो. बड़ोग में कोई बिछड़ता नहीं. बड़ोग से कोई बिछड़ता नहीं. बड़ोग मिलने का प्लेटफॉर्म है. बड़ोग में कोई रहता नहीं. बड़ोग से जिंदगियां गुजरती हैं. और बड़ोग जिंदगियों से. कई बार बिना चाहे भी. कई बार बिना जाने भी.

फोटो : toreajade / flickr

Saturday, August 2, 2008

LOVE STORY # 529: मौत के फ्रेम में फंसा हुआ जिंदगी का प्रेम


जब तक उनके मिलने की खुशी उनकी आंखों में ठहर पाती, जाने का वक्त हो चला था. एक कविता ने उन्हें इस रिश्ते में जिंदा किया था, एक कविता में वे अपने अंत को पढ़ रहे थे. वे देर से मिले और जल्दी जा रहे थे. प्यार का साथ हमेशा कम शायद इसलिए भी पड़ता है कि क्योंकि वह सुंदर होता है.
..........

वे तब मिले जब वह अपने कुनबे में एक और मौत हो जाने से परेशान थी। उसने लंबी सांस ली और फिर हंसते हुए कहा- मैं अब दुनिया की सबसे अकेली इंसान हूं. वह हंसना ऐसा ही था जैसा दुख के सीलने भरे धब्बे पर एक सूखा पोंछा मारने की बेचारी और साहसी कोशिश. उसने कुछ कविताएं उसे दी और कहा इस अकेलेपन में ये कविताएं तुम्हारा साथ देंगी. उसने उसे दया से नहीं देखा. समझना चाहने की कोशिश के साथ. उसे अच्छा लगा. वह उसकी तरफ खिंची तो इसलिए वह मौत को कितनी तसल्ली से देख सकता है लगभग मुस्कुराते हुए. कभी उसके प्यार को मौत ने छीन लिया था.
उन्होंने एक जिंदगी शुरू की। कविता की जिंदगी। उसके लिए जिंदगी सिर्फ इवॉल्यूशनरी थी। हर बार एक नये तल, एक नई गहराई या ऊंचाई तक जाना और वहां पर उसे मौत के परफैक्शन में फ्रेम कर देना। वहीं छोड़ देना। आगे नये तल की तलाश में निकल जाना। वह जिंदगी को सड़ते हुए नहीं देख सकता था। वह मौत के रोमांस के पूरेपन में जिंदा था। उसे कुछ उस तरह के परफेक्शन में खत्म होने वाले प्यार की तलाश थी, जो उस फ्रेम में ही फिट हो सके। उससे न इधर ना उधर। जब भी जिक्र छिड़े उसी फ्रेम में वह यादों को जिंदा करता। उसी शिद्दत, उसी रोमांस के साथ।..
वह जिंदगी ढूंढ रही थी। बदलते स्थाइत्व वाली जिंदगी। वह मौत को अपने बचाव के हथियार के बतौर नहीं इस्तेमाल नहीं कर सकती थी। वह उसकी जिंदगी की मद्धम पुकारों को कभी न सुन सका। उन्होंने जिंदगी और उसके नष्ट होने के सच- दोनों से पीठ कर ली। वे कविता में जीवित रहे। फ्रेम मे फंसे हुए। न इधर न उधर। बिना कोई समझौता किये। खुशी खुशी हमेशा के लिए।

Friday, August 1, 2008

LOVE STORY # 530: खुशी, मोटे चश्मे और झुर्रियों के परे


दीव के टापू पर वे छुट्टियां मनाने आए थे। होटल से सटा हुआ ही अरब सागर का किनारा था। क्योंकि बहुत भीड़ नहीं थी, तो बीच भी साफ था। दिन भर समुद्र की लहरें जहन में आवाजें करती रहतीं. कुछ हिप्पी और बैकपैकर्स भी थे, जिन्हें गोवा से भी ज्यादा सस्ती जगह की तलाश थी.
सूरज डूबने के वक्त से जरा पहले बीच पर भीड़ तो थी पर बहुत ज्यादा नहीं. जगह इतनी थी कि बच्चे पानी से आराम से खेल सकते थे. हनीमून वाले जोड़े बिना किसी की परवाह किये एक दूसरे को पानी में भीगता हुआ महसूस कर सकते थे.
उस भीड़ में वह जोड़ा थोड़ा अलग था. वे बहुत बूढ़े थे. झुर्रियां. चश्मा. बेंत.
सूरज डूबने से पहले ही बूढ़े ने अपना हाथ बढ़ाया.
और बूढ़ी औरत ने पकड़ लिया.
दोनों हंसे. डूबते सूरज की लहरों से टकराती अनंत रश्मियां उनके चेहरे से टकराईं और नावों की तरह हिचकोले खाती रहीं.
क्या उस औरत को संभालने के लिए उस मर्द ने हाथ बढ़ाया था?
क्या हाथ पकड़ना गिरने के लिए था?
क्या उनके कमजोर, तनी नसों और झुर्रियों वाले हाथ इस दिन के इंतजार में थे?
क्या वे पति पत्नी थे और हाथ पकड़ने की शर्म उन्हें कभी छोड़ न सकी थी?
क्या वे पति पत्नी नहीं थे और एक सच खुद को कहने के साहस में बुढ़ा गया था?
सूरज डूबने से पहले के उस पल में अरब सागर की लहरें अपने झिलमिल में इन खामख्वाह से सवालों की बजाय उस खुशी को पढ़ रहीं थी, जो चश्मे के नंबर और झुर्रियों के परे खिली हुई थी.