Monday, September 29, 2008

LOVE STORY 497: पराये मुल्क में कोई ऐसा शब्द था, उसके नाम से मिलता हुआ


वहां वह किसी को नहीं जानता था. वह एक पराया मुल्क था. परायी जुबान aur चेहरे. एअरपोर्ट से निकल कर वह रेलवे स्टेशन में बहुत देर तक भटकता रहा उस स्टेशन की ट्रेन पकड़ने के लिए जो उसे उसके होटल तक ले जाती. सुबह दफ्तर जाने का वक़्त था इसलिए कभी भीड़ भड़क्का और गहमा गहमी का माहौल. वह ढूंढता रहा बहुत देर तक कोई ऐसा शख्स जो अंग्रेज़ी जानता हो, ताकि ८ घंटे की उड़ान के बाद के बाद इस तरह उसका भटकना ख़त्म हो. जिन दो एक लोगों ने उसकी मदद करने की कोशिश की, वे अंग्रेज़ी नहीं जानते थे. स्टेशन काफ़ी बड़ा था.तभी उसे लगा किसी ने उसका नाम लिया है. पर यहाँ कैसे ये मुमकिन था? यहाँ वह किसी हो नहीं जानता था. और उसके नाम को जो उस तरह से लेता था, वह सालों पहले दुनिया से जा चुका था. पूरे स्टेशन पर शोर एकबारगी थम गया. जैसे पूरा स्टेशन खाली हो गया हो. अगले ही पल शोर वापस भर गया.वह फिर मदद के लिए किसी अंग्रेज़ी जानने वाले को ढूँढने लगा.

Sunday, September 28, 2008

LOVE STORY # 498: बहुत एहसान है उनका मुझपर जिनसे मुझे मोहब्बत नहीं

शुक्रिया: नोबेल से सम्मानित पोलिश कवि वास्लावा शिम्बोर्स्का

बहुत एहसान हैं उनका मुझपर
जिनसे मुझे मोहब्बत नहीं
बहुत राहत है कि वे ज्यादा प्यारे हैं
किसी और को
इस बात की खुशी कि मैं
उनकी भेड़ों के बीच छिपा हुआ भेड़िया नहीं
उनके साथ मैं शान्ति से हूँ
उनके साथ मैं आजादी से हूँ
और ये दोनों बातें
मोहब्बत न दे सकती है
न बर्दाश्त कर सकती है
मुझे उनका इंतज़ार नहीं करना पड़ता
खिड़की से लेकर दरवाजे तक चहलकदमी में
सूर्य घड़ी की तरह संयमशील
मुझमें वह समझ है जो मोहब्बत में नहीं
मैं उसे माफ़ कर सकती हूँ, जिसे प्यार कभी माफ़ नहीं कर सकता

मुलाक़ात से चिट्ठी के दरमियाँ
कोई युग नहीं बीतता
बस कुछ दिन और हफ्ते ही तो

उनके साथ सफर हमेशा ही कामयाब रहे
कंसर्ट सुने गए
गिरिजाघर घूमे गए
उनके साथ
नज़ारे हमेशा साफ़ रहे
अंग्रेजी से अनुवाद : आस्तीन का अजगर

Friday, September 26, 2008

LOVE STORY # 499:सलीब से उतरने के बाद भी खून बहता रहा उसका

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वह सलीब लेकर चल रहा था. उसने उसे सलीब से उतारा. वह लहूलुहान वहीं बैठ गया. उसने उसे पानी दिया. कहा तुम्हें थोड़ा आराम करना चाहिए. वह घुटने में सर देकर बैठा रहा. उसने उससे कहा- ज्यादा मत सोचो. और देखो जो हुआ सो हुआ, अब आगे देखो और सोचो कि बिना सलीब का इंसानी जीवन कितना बेहतर होगा. तभी उसे उसकी निगाहें उसके पावों पर गई, जहाँ से खून बंद होने का नाम नहीं ले रहा था. उसका एक पांव बेडी से बंधा था और जो सलीब से जुड़ी हुयी थी. घुटने में सर देकर वह वहीं बैठा रहा. जिसने उसे सलीब से उतारा था, वह भी थका था, वह सो गया. नींद में एक सपना था. सपने में सलीबों का एक पार्क था. बहुत सरे लोग वहां सलीब- सलीब खेल रहे थे.

LOVE STORY # 500: साथ की खुशी ख्वाहिशों की खुशी से अलग है, पर मरने से पहले उससे एक राग जरूर सीखना है


वह राग आसावरी उसे सुनाना है. ये डीवीडी उसके साथ देखनी है. मिर्ज़ा ग़ालिब के घर जाना है फिर से साथ में. उस किताब का हिस्सा उसे पढ़ कर सुनाना है. उसके लिए एक दिन साड़ी पहननी है. साइकिल के कैरियर पर बिठाकर उसे एक दिन घुमाना है. देर रात शोपेन को उसके साथ सुनना है. पार्क की उस बेंच पर उसकी बगल में बैठकर चुप रहना है. निजामुद्दीन में खुसरो की कब्र पर बैठकर जुमेरात की सर्दी में कव्वाली सुननी है. बनारस जाकर नाव में देर शाम बैठकर गंगा को बहते हुए देखना है. अपनी अलबम दिखानी है. एक दिन सिर्फ लियोनार्द कोहेन को ही सुनना है उसके साथ. बहुत करीब होकर उससे अपना नाम बार बार सुनना है. उसकी छाती के साल्ट एंड पेपर बालों को जैक्सन पॉलक की पेंटिंग में बदलते देखना है. एक दिन वह जो बहुत सारी बातें इकट्ठा हो रही हैं, इतने सारे दिनों से, उनको लेकर लड़ना है. मरीन ड्राइव पर उसके बालों को उड़ते हुए देखना है. वह जो बहुत पहले अन्याय हुआ था, उसे लेकर उसके कंधों पर सिर रखकर रोना है. उसके लिए पाब्लो नेरूदा की एंथोलॉजी खरीदनी है. ये जो मकईबारी की हरी दार्जीलिंग चाय है, उसके साथ पीनी है. उसके साथ चांद की तरफ जाने वाली सड़क पर जाना है. बहुत गहरे में चुप हो जाना है. रायपुर में विनोद कुमार शुक्ला की बातें सुनने उसके साथ जाना है. वह चमड़े का बैग जो बाहर से आया था, उसे देना है. उसके लिए बैंगन का चोखा बनाना है. बस्तर जाना है, केसकाल की घाटी को उसके साथ देखना है. वहां से लकड़ी की वह कंघी खरीदनी है, जो लड़के लड़कियों के बालों में लगा देते है. पेरिस के मोंमात्र गिरिजाघर वाली पहाड़ी पर स्टूडेंट पेंटर से मोलभाव कर उसका स्कैच बनवाना है. नाराज़ होने का नाटक करना है. अपने इनबॉक्स में रखी उसकी मेल के हिस्से पढ़कर उसे सुनाने हैं. कई साल पहले सिगरेट छोड़ दी है उसने, उसके पीले दांत साफ करवाने है. उसके लिए पान खरीदना है. मरने से पहले उससे एक राग सीखना है. ऑक्तोवियो पॉज की कविता उसे पढ़कर सुनानी है. कसौली की पहाड़ी पर दूर तक पैदल जाकर चीड़ के पेड़ों के बीच उसका नाम जोरों से लेना है. अमरूद की चटनी बनानी है. मल्लिकार्जुन मंसूर को सुनने के बाद की घनी खामोशी में आसक्त बैठे रहना है. अपनी दीवार पर फ्रेम करने के लिए उसकी कविता हाथों से लिखवानी है. मोहम्मद रफी की मनहूसियत (रोता आया, मरते की ख़बर लाया टाइप के गानों को लेकर) पर उससे आखिरी बार बहस करनी है.
साथ होने से पहले तक हजारों ख्वाहिशों की कितनी लम्बी फेहरिस्त है. उसके साथ हर वह चीज़ करनी है, जिसका वास्ता खुशी से है. खुशी का बांटा ही स्वर्ग है, न बांटा ही नरक. साथ की खुशी उस खुशी से अलग है, जिसका वायदा हजारों ख्वाहिशों में है.
पर मरने से पहले उससे एक राग जरूर सीखना है.

पेंटिंगः जैकसन पॉलक, म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट (मोमा) न्यूयॉर्क

Wednesday, September 24, 2008

LOVE STORY # 501: नफरत के ईमेल इनबॉक्स से तो डिलीट हो गये, पर एमिली के दिमाग से नहीं

पर एमिली के लिए गॉकर में वक़्त हमेशा ऐसा ही नहीं रहा. वह बहुत तेजी से अपने दोस्त और दुश्मन बना रही थी. यह बिल्कुल ऐसा ही था जैसे आप किसी हॉबी क्लब से निकलकर पेशेवर खेल के सर्किट में पंहुच जाते हैं. वहां के नियम अलग होते है, तरीके भी. कुछ गॉकर का चरित्र ऐसा था और कुछ एमिली भी खिलंदड़ थी. और इंटरनेट पर न तो आपको पसंद और प्यार करने वालों की कमी थी और न ही नफरत करने वाले हूलिगन्स की. न्यूयॉर्क का प्रभावी तबका वैसे भी गॉकर से काफी परेशान रहता था कि पता नहीं कब किसी पोल पट्टी खुल जाए, नशे में लहराते हुए सेलिब्रिटी का फोटो या फिर फ्लर्ट करते हुए का. एमिली एक तरफ जहां अपनी आज़ादी को लेकर बहुत आग्रही और आश्वस्त थी, वहीं दूसरी तरफ वह सिर्फ 24 साल की थी और उस ब्लॉगज़ीन की एडिटर, जो न्यूयॉर्क के रसूख वाले मैनहटन में गपसड़ाके का सबसे बड़ा अड्डा बन गया था. इस बीच एक अच्छी बात ये हुई कि सीएनएन के सबसे लोकप्रिय प्रोग्राम लैरी किंग लाइव में एमिली को बतौर मेहमान बुलाया गया.

सबसे बुरी बात ये कि वहां उससे ऐसे सवाल किये गये जिनका कोई ठीक जवाब एमिली के पास नहीं था. लैरी किंग की गैर मौजूदगी में शो के होस्ट जिमी किमेल थे और गॉकर ने कुछ महीने पहले ही नशे में धुत्त गलियों में घूमते किमेल की तस्वीर अपने स्टॉकर मैप में प्रकाशित की थी. जिमी को ये निजी खुंदक थी, कि गॉकर ने उसके प्राइवेसी में दखल दिया और वह बेहद गुस्सा था. ये गुस्सा उसने इस शो में एमिली पर निकाला.
आधी रात से जरा पहले उसने अपना स्टूडियो मेक अप उतारने के बाद जब घर में अपनी मेल खोली, तब तक उसके इनबॉक्स में संदेश भरे पड़े थे. नफरत के, हताशा के. एक में लिखा था- तुम्हारी तो हवा निकल गई. शो में तुम एक ऐसी बच्ची की तरह दिख रही थी, जो बहुत डरी हुई है. दूसरे में- मैं तुमसे ये बताना चाहता हूं कि तुम शो में बहुत ज्यादा गंवार और बेवकूफ नज़र आई. तुम सचमुच एक बिना दिलवाली इंसान हो और तुम्हें जिदगी में एक दिन इसी तरह की गंध का शिकार बनना पड़ेगा, जो इस वक़्त खुद हो.
एमिली इस सब के लिए तैयार ही नहीं थी. वह शो में अपने इस तर्क को ठीक से रख ही नहीं सकी कि सार्वजनिक जीवन में जो लोग होते हैं, उनके हर पहलू के बारे में लोगों की दिलचस्पी होती है और उनपर हर कहीं नज़र रखी जा सकती है. जिमी किमेल (इस वक्त लैरी किंग से ज्यादा पॉपुलर शो कर रहे हैं) टॉक शो के इतने बड़े माहिर हैं, कि एमिली का वैसे भी उनके सामने कोई चांस नहीं था.
बिना देर के इस शो की क्लिप यू ट्यूब पर आ गई. याहू के फ्रंट पेज पर भी. एक रिपोर्टर एमिली के मां बाप का कोट लेने पंहुच गया. ई मेल्स का जखीरा बढ़ता गया. उसे लगा ये कभी खत्म होने वाला नहीं. जब भी वह खुद को सही बताने और बचाने की कोशिश करती, उस पर हमले और बढ़ जाते. जिन सेलीब्रिटीज की निजी जिंदगियों को उघाड़ने की मान्यता एमिली ने सामने रखी थी, लैरी किंग लाइव शो में जाने के बाद वह खुद उन्ही सेलीब्रिटीज में शामिल हो गई थी. और खुद उसी के उसूल के मुताबिक लोगों को हक था, वे उसकी जिंदगी में झांके और अपनी राय दें- जो कुछ भी हो सकती है, अच्छी, बुरी या तेज़ाब में डूबी हुई. धीरे धीरे ई मेल आना कम तो हुए, पर एमिली के दिमाग से उन्हें डिलीट करने का कोई तरीका नहीं था.
एक दिन वह गॉकर के बाथरूम के फर्श पर लेटी हुई पाई गई. पैनिक अटैक का यह जिंदगी में पहला मामला था. उस दिन उसने काम नहीं किया.

दैनिक हिंदुस्तान में अखाड़े के उदास मुगदर पर रवीश की कमेंट्री

ब्लॉग वार्ताः नेट कथा की दुनिया में प्रेम

प्रेम पर कुछ भी बोलने-लिखने या दिखाने का ठेका अब सिर्फ सिनेमा और सीरियल के पास रह गया है। साहित्य भी रोमांस की आपाधापी को छोड़ रोजमर्रा की आपाधापी को पकड़ने में लगा है। हिंदी में वैसे भी संकोच से लिखी जाती रही हैं प्रेम कथाएं।

कमेंट्रीः रवीश कुमार


आज के समय में कोई बड़ा लेखक इस एक पहचान के साथ मौजूद नहीं है कि वह सिर्फ प्रेम कथाओं का कलमकार है । प्रेम रहित इस उदास दुनिया में एक ब्लॉग ऐसा है जो कहता है खुद को अखाड़े का उदास मुगदर लेकिन रचना है प्रेम की उदासियां, सिसकियां, बेकारियां और दिल्लगियां।

यहां अजब गजब प्रेम के वे क्षण हैं जो हमारे भीतर अक्सर किसी अनजान टकराहट से पैदा होते रहते हैं । कभी नोएडा के निरूला में सामने वाली से मिलती नज़र तो कभी किसी लड़की का अचानक हाथ थाम लेना।

गुंडों से बचने के लिए थोड़ी दूर चलने की गुजरिश बहुत लंबे समय तक दिल में उतरती रही। ये प्रेम कथाएं हैं जो शुरू होने से पहले की हैं । जो बीच में कहीं नहीं पहुंचती हैं , यहीं खत्म होती हैं । यह बस हर किसी के भीतर छूट जाती है ।

www.kataksh.blogspot.com प्रेम कथाओं का पार्क है । पढ़ने वाले ब्लॉग के भीतर का प्रेमी बिना किसी इजाजत के इस पार्क में टहलने लगता है । कितना अजीब है । हम सार्वजनिक जीवन में प्रेम प्रसंगों पर रचे न जाने कितने गाने सुनते रहते हैं । कार में हो या सिनेमा हॉल में।

प्रेमी के भीतर खुदा तो खुदा से प्रेमी मांगते ऐसे तमाम गाने शोर बनकर आते हैं , सुनाते हैं और चले भी जते हैं । धूम धड़ाम की संगीत पर थिरकते ये इश्किया गाने रोमांस नहीं पैदा करते। थोड़ी देर के लिए रोमांचित कर देते हैं ।

कहां यह संस्मरण है और कहां हम सबकी जिंदगी की एक महागाथा पकड़ना मुश्किल हो जाता है ।

ऐसी ही एक कहानी है जो स्कूल के दिनों में अपनी एक खूबसूरत टीचर को याद करके लिखी गई है । कहानी आखिर तक पहुंच कर कुछ यूं कहती है- संगीता सिंह हर साल जवान होते सैकड़ों लड़कों की निजी फैन्टेसीज का हिस्सा थीं। सभी के सपनों, ख्यालों में संगीता सिंह अलग थीं। असली संगीता सिंह से भी अलग। जिन्हें शायद ये तो अंदाज था कि लड़के उन्हें घूर कर बड़े हो रहे हैं पर ये नहीं कि वे घूरने का क्या क रते हैं । किस तरह से स्कू ल की एक पीढ़ी उन्हें देखकर बड़ी हुई है । उनमें से ज्यादातर का वे पहला प्यार हैं । जैविक प्रक्रिया का एक रागात्मक पक्ष। जवानी की दहलीज पर कदम रखती वे सैकड़ों प्रेम कहानियां पूरी तरह काल्पनिक थीं। अगर कहीं सच था, तो वह संयोगवश था। संगीता सिंह वह संयोग थीं।

इस प्रेम कथा के दर्शक , पाठक और किरदार न जाने कि तने लोग होंगे। अखाड़े का उदास मुदगर उन सबको इस क हानी का हिस्सा बना रहा है

प्रेम कथाएं लघु कथाएं ही होती हैं । इस छोटी सी कहानी में टीवी के आने से पहले की एक कथा है - उस गांव में वे सालों से साथ थे, उन्होंने साल गिनने बंद कर दिए थे। वह अपना मायका भूलने लगी थी और मायका उसे। उनके बड़े होते बच्चे थे। वे इतने साल से साथ थे, कि दोनों का बोलना, चालना, चलना, हाथ हिलाना, चुप रहना, दुख की लकीरें और खुशी की चमक भी एक जैसी हो चुकी थीं। उनकी शक्लें भी मिलने लगी थीं।

आपको शक हो सकता था कि कहीं वे भाई -बहन तो नहीं। सब कुछ इतने दिनों से इतना ठीक चल रहा था, कि लग रहा था कि कुछ असामान्य है । टीवी तब आया नहीं था और इसलिए उनकी जिंदगी में कुछ भी नाटकीय नहीं था। आखिर ऐसा कब तक चल सकता था?

इस ब्लॉग पर एक लेख है जिसे पढ़ने में आपको मजा आएगा। खुशी का ब्रांड इतना पंजाबी क्यों है ? आगे लिखते हैं पंजाब हमारा मैक्डोनाल्ड है । फास्ट फूड, फास्ट म्यूजिक , फास्ट डांस और फास्ट लाइफ ।

ऐसा क्यों है कि ढाई घंटे में खत्म होने वाली है प्पी एंडिंग लव स्टोरी अमूमन पंजाब की पृष्ठभूमि लिए होती हैं ।

बाजर में निकलो तो खाना, पार्टियों का खाना पंजाबी ही है । चिकन जब भी शहीद होता है तो या तो तंदूर में या बटर में।

सैकड़ों प्रेम कथाएं। एक शख्स है जो रचना किए जा रहा है । पत्रकारिता में रहते हुए भी अपने नाम को जहिर नहीं करना चाहता। प्रेम में यही तो होता है । आप सारा कुछ जहिर नहीं करना चाहते। रोमांस का अड्डा है अखाड़े का उदास मुगदर।

(लेखक एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ पत्रकार हैं और उनका ब्लॉग है www.naisadak.blogspot.com )



LOVE STORY # 502: सातवीं सीढ़ी और पीले फूल (रविंद्र व्यास की कहानी)

हरा कोना रचनाधर्मी पत्रकार रविंद्र व्यास का ब्लॉग है और ये कहानी उन्होंने अपने ब्लॉग पर अजगर को समर्पित की है. आस्तीन का अजगर उनका आभारी है और खुशबुओं की तरह यह सुंदर कहानी उनसे इज़ाजत लेकर प्रकाशित कर रहा है. इसी बहाने अजगर यह साबित भी करना चाहता है कि यहां जो कुछ लिखा हुआ है, उसका अपना और भोगा हुआ नहीं है. ये सिर्फ कोशिश है प्यार के फिल्टर से दुनिया को देखने की. अगर आपने भी दुनिया को ऐसे देखा हो और कुछ दिलचस्प दिखाई दिया हो, तो इस ब्लॉग में उसका स्वागत है. अगर आप चाहेंगे तो नाम के साथ, नहीं चाहेंगे तो नहीं भी. पर कहे जाने की नियति से बचा रह गया प्रेम हमारी मनुष्यता में मुक्त कैसे हो सकेगा ;-) रविंद्र व्यास की कहानी -

सातवीं सीढ़ी और पीले फूल (अजगर को समर्पित करते हुए...)
वे कॉलेज के चमकीले दिन थे और हमेशा की तरह वह सीढ़ियां गिनते हुए चढ़ रहा था। जब वह सातवीं सीढ़ी पर था, एक लड़की उसके पास से बहुत तेजी से उतरी। बेफिक्र और बेपरवाह। उसकी पीली चुन्नी उसे छूते हुए निकल गई। वह उसी सीढ़ी पर थोड़ी देर के लिए खड़ा रह गया, अवाक्। उसने महसूस किया, उसके सीने के बाईं ओर कहीं उस चुन्नी का पीला रंग छूट गया है जो धडकनों के साथ मिलकर छोटे-छोटे पीले फूलों में खिल गया है। उसने एक गहरी सांस ली और पाया कि सांसों में खुशबू बसी है। उस लड़के को पहली बार यकीन हुआ कि दुनिया में जादू भी होते हैं।
उसे ध्यान आया कि वह उस लड़की का चेहरा नहीं देख पाया। यही सोचकर वह पलटा तो उसने देखा वहां एक खाली और सूना गलियारा है और सन्नाटा पसरा हुआ है। सातवीं सीढ़ी पर खड़ा होकर वह सोचने लगा कि उसी लड़की के साथ सात जनम की कसमें खाएगा, सात फेरे लेगा और कभी भी उससे सात समंदर दूर नहीं जाएगा।
उसके दिन बदल गए। उसकी शामें बदल गईं। उसकी रातें बदल गईं। उसकी करवटें औऱ सलवटें बदल गईं। उसकी धड़कनें और सांसें बदल गईं। फिर उसकी आदतें बदल गईं। वह एक नई और अजीब-सी आदत का शिकार हो गया। वह उसके पास से गुजरने वाली हर लड़की को बहुत ध्यान से देखता। और उस लड़की को तो वह बहुत ही ध्यान से देखता जिसने पीली चुन्नी डाल रखी हो। जब भी कोई लड़की उसके पास से गुजरती वह रुककर गहरी सांस लेने लगता। इस आदत की वजह से कई बार कई लड़कियां उसे संदेह की निगाह से देखतीं। कुछ बिचकतीं, कुछ सहमतीं। कुछ रास्ता बदल लेतीं।
मौसम बदलते हैं। रिमझिम बारिश होती है, गुलाबी ठंड पड़ती है और बसंत आता है और पीले फूल खिलते हैं।
फिर एक दिन ऐसा आता है कि वह उसकी क्लास की ही एक लड़की की शादी में अपने दोस्तों के साथ जाता है और लडकी को शादी की बधाई देते हुए हाथ मिलाता है तो सीने के बाईं ओर एक पीला रंग और पीला होकर चमकने लगता है और धड़कनों के साथ घुलमिल कर छोटे-छोटे पीले फूलों में खिल गया जाता है। वह उस लड़की के पास थोड़ी देर खड़ा रहता है, फोटो खिंचवाता हुआ। गहरी सांस लेता है, तो पाता है कि उसकी सांसों में खुशबू बसी है और वह अपने कॉलेज की उसी सातवीं सीढ़ी पर खड़ा है, अवाक्, जहां एक लड़की की चुन्नी का पीला रंग उसके दिल पर छूट गया था।
चारों तरफ चहल-पहल है, लोग एक-दूसरे से हंसते-खिलखिलाते मिल रहे हैं, संगीत बज रहा है लेकिन वह लड़का अब भी सातवीं सीढ़ी पर खड़ा होकर फिर से सोचना चाहता है कि वह उसी लड़की के साथ सात जनमों की कसमें खाएगा, सात फेरे लेगा और उससे कभी भी सात समंदर दूर नहीं जाएगा...

Tuesday, September 23, 2008

LOVE STORY # 503: (स्पीड डेट-3) दुःख के दो महाद्वीप थे, सुख का छोटा सा कमरा

ब्रुसेल्स के होटल में उन्हें कमरा शेयर करना था. वे पांच दिन के लिए यूरोपियन यूनियन की कान्फ्रेंस में आई हुई थी. पहली ईरान से थी. दूसरी किसी अफ्रीकी मुल्क से. जैसा कि दुनिया भर की एक्टिविस्ट औरतों में होता है, उनमें भी एक बहनापा था. वे हंसती और एक दूसरे को जगह देती. वे बार बार दिल पर हाथ रखती और आंखें ऊपर घुमाती, जैसे वे दोनों एक दूसरे की भाषा न जानते हुए भी एक मज़ाक की साझी समझ रखती हैं. एक दूसरे की मेकअप किट को बनावटी कौतुक के साथ देखतीं. ईरानी औरत की चादोर अफ्रीकन को दिलचस्प लगती. और अफ्रीकी औरत की गुंथी हुई बीसियों लटों को ईरानी छू-छूकर देखती.
ईरान वाली अपनी बेटी से फोन पर रोज बात करती, और अफ्रीकी एक मर्द से, जो पता नहीं उसका मंगेतर था या फिर पति. फोन पर कई बार उनकी आवाज़ तेज़ हो जाती, कई बार एक दम फुसफुसाहट में बदल जाती. फोन पर बातचीत के दौरान उनकी निगाहें मिलती, तो वे मुस्कुराती. पर समझा जा सकता था कि कुछ था जो सहज नहीं था. उनकी भाषा की अजनबियत आवाज़ के दर्द, गुस्से और प्यार को छिपा नहीं पा रही थी. एक बार ईरानी औरत रात में देर तक रोती रही. और अफ्रीका वाली अंधेरे में उसका रोना सुनते हुए जगी रही. फोन पर बातचीत के बाद कई बार उनका एक ही पृथ्वी के भले इंसान बने रहने का कवच थोड़ा टूट या फट जाता, जिसे वे रात के अंधेरे में अपने मेकअप की तरह ठीक कर लेतीं.

पांच दिन पूरे हो गये. अफ्रीकी औरत की फ्लाइट का वक़्त हो गया.

जाने से पहले दोनों गले लगीं. ईरानी औरत ने उसे चूमा. सीधे मुंह पर. दूसरी ने विरोध नहीं किया.

भोले से साढ़े तीन सैकंड बाद वे लौट गईं भली बनने की कोशिश करती पृथ्वी के उन महाद्वीपों में, जहां बड़ी होती बेटी और ख़ार खाया मर्द रहते थे.

चित्र: sarah rose c (http://srosecarson.blogspot.com/2006_01_01_archive.html)

Monday, September 22, 2008

LOVE STORY # 504: घरघराते हुए एयरकंडीशनर के नीचे जिंदा पल अपना रहस्यमय और माहिर गुप्तचरों की तरह अपना घोंसला बनाते


उनके रंग आसमान बनाता. ये रंग हमेशा चटख, दिलफेंक, इंद्रधनुषीय और मुस्कान लाने वाले नहीं होते, पर ज़िंदगी उनमें हमेशा होती. वे हमेशा बदलते होते. वे हर बार नये तरह के चित्र बनते.
जब वे साथ होते, जो ज्यादातर बार ऐसा होता कि वे बेहद जिंदा हो जाते, घने, रौशन, एक एक पल की अपनी जिंदगी होती, बिना अतीत और भविष्य वाले फक्कड़ साधुओं की तरह.

उस पल से बाहर आकर लगता कि इतने जिंदा पलों में न सिर्फ वापस जाना मुश्किल है- (क्योंकि जीने का दुहराव जीने को कम करना है,) बल्कि यह डर भी कि क्या फिर कभी वे किसी नये सिरे से, किसी नये तरह से उतने घने, जिंदा, रौशन हो पाएंगे. कई बार ऐसा लगता कि वे पके हुए फलों की तरह अब आगे सड़ने के लिए अभिशप्त हैं, जिसके लिए उन्हें तैयार हो जाना चाहिए. जब वे टोह लगाते, अंदाजे लगाते, हिसाब देखते, जिंदा पल उनके पास नहीं आते. कई बार बगल से निकल जाते. कई बार बिना पहचाने भी.
पर वे आते, जब उम्मीद अपना आख़िरी दामन छोड़ रही होती, जब लगता कि अब आगे अंधेरे, अकेलेपन और चुप्पी के अलावा और कुछ नहीं है. वे धोखे की तरह आते. यक़ीन करना मुश्किल हो जाता.
जिंदा पलों में ये फर्क कर पाना मुश्किल होता, कि क्या हंसी है, क्या भारी होती सांस, क्या रोना, क्या शब्द और क्या चुप्पी. वे ध्यान की तरह अमूर्त होते. उन्हें छूने की कोशिश उन्हें खंडित करना होता. जादू को तोड़ने की तरह. हबड़ तबड़ वक़्त और जंजाल भरी दुनियादारी और संस्कृत मंत्रों का इलेक्ट्रानिक उच्चारण करती रिंग टोन्स के शोर से बाहर एक घरघराते हुए एयरकंडीशनर के नीचे जिंदा पल अपना रहस्यमय और माहिर गुप्तचरों की तरह अपना घोंसला बनाते. और आसमान अपने रंग चुन रहा होता.

जब तक जिंदा पल थे, वे ज़िंदगी में नये तरह से खुलते और घटित होते. आसमान रंग बनाता. ये रंग हमेशा चटख, दिलफेंक नहीं होते.
उस आसमान में कविताएं उन पलों को तितलियों को पकड़ने की कोशिश करती हुई उन्हें लिखतीं.
जिंदा पलों की हथेली में किस्मत नहीं लिखी थी। आसमान था. लिखे और पढ़े के बाहर.
फोटोः बार्सिलोना स्काई फ्लिकर पापालर्स

Saturday, September 13, 2008

LOVE STORY # 505: वे जोरों से हंसते भी नहीं थे. बड़े से बड़े मज़ाक पर स्माईली :-) टाइप करके काम चल जाता था

एमिली की उम्र उस वक़्त 24 साल की थी. गॉकर नाम की ब्लॉगज़ीन (कई ब्लॉग्स का नेटवर्क) ने उसे एडिटर बना दिया था. पब्लिशिंग कंपनी में जो काम एमिली कर रही थी, वह बहुत अहमियत वाला नहीं था. इतना बड़ा ब्रेक उसे शायद ब्लॉगिंग की बदौलत ही मिला था. गॉकर न्यूयॉर्क की गॉसिप करने, वहां के मीडिया की बखिया उधेड़ने, पेज-3 हस्तियों की धज्जियां पीटने और नौजवान लोगों की अलमस्त ब्लॉगज़ीन है, जहां हर बात की पहले तो खिल्ली उड़ाई जाती थी. और उसके बाद कोई काम की बात. सेलिब्रिटीज के शहर में गॉकर उनका पीछा कर, उनकी तस्वीरें निकाल, उनके रहस्यों को खोलने का काम करता, मीडिया की गलतियां निकालता.. वह न्यूयॉर्क में उंगली उठाने वाली स्वयंभू शक्ति बन गया था.


गॉकर की नौकरी एमिली के लिए एक मुहर थी, अभी तक उसने जो कुछ जिंदगी में किया था, उसके सही होने की. उसे हैनरी के खिलाफ एक और तर्क मिल गया था. हालांकि उसे हमेशा लगता कि वह जो कुछ कर रही है सब सही नहीं है, पर ये ख्याल कभी भी बहुत मज़बूती से उसके ज़हन पर नहीं उभरा और न हावी हुआ. कई बार वह सोचती कि उसे शायद वहां इसीलिये रखा गया क्योंकि उसके पास अनुभव नहीं है. गॉकर जितना आक्रामक था, वैसे ही उसको पढ़ने वाले थे. वे स्पीड डेट और वन नाइट स्टैंड की तरह तेजी से अपनी राय बनाते, साइड लेते, प्यार और नफरत करते. सब आक्रामकता के साथ. एमिली के निजी ब्लॉग के भागीदारों में जो जहनियत थी, वह गॉकर के कमेंटेटरों में गायब थी. कई बार वे निर्ममता से एमिली की आलोचना करते, उसे ख़ारिज़ कर देते और उसे लगने लगता कि दुनिया में उससे बुरा लिखने वाला कोई है ही नहीं. कई बार वे इतनी प्रशंसा करते कि लगता वह झूठ है. पर एमिली के लिए वे कमेंट्स सबसे ज्यादा अहमियत रखते थे. एमिली से पहले जो उस पद पर थी, उसने उसे कहा भी था, कमेंट्स की तरफ ध्यान मत दो. वे तुम्हें काफी प्रभावित कर देते हैं. जैसिका ने ये भी कहा था कि किसी भी पोस्ट में अगर आप कोई पर्सनल टच देते हैं, तो लोग उसे पसंद करते हैं. एमिली ने पहली बात पर ध्यान नहीं दिया, दूसरी बात तो उसे पता ही थी. उसे लगा कि उसका अंदाजा सही था.

हैनरी को भी लगता था कि उसे कमेंट्स पर ध्यान नहीं देना चाहिए. पर दोनों के बीच झगड़ों के साथ दूरियां बढ़ती गईं.

एमिली को दफ्तर लोग मिले। उसी की तरह के। बिंदास, अलमस्त, गैरजिम्मेदारी की हद तक आज़ादख्याल। वह उनके साथ हंसी-ठठ्ठे चैट पर करती. कई कमेंट करने वालों के साथ भी. कई बार वे अपने अवतारों- के जरिये अंतरंग भी हो जाते. इस समझ के साथ कि जब नैतिकता के मापदंड तय हुए थे, तब टैक्नोलॉजी ने इतनी तरक्की नहीं की थी. और मेरा अवतार अगर तुम्हारे अवतार से छेड़खानी करता है, तो इसका मतलब ये नहीं है कि मैं तुम्हारे साथ छेड़खानी कर रहा हूं.

हैनरी के साथ झगड़ा दो बातों को लेकर था. एक- क्या एमिली जो कर रही है, वह नैतिक तौर पर सही है. दो- क्या ब्लॉगिंग का भूत उसके सर पर इस कदर सवार नहीं हो गया है, कि वह जिंदगी में और कुछ देख ही नहीं पा रही है.

एमिली के पास हैनरी के लिए वक़्त कम होता जा रहा था. उन सवालों के लिए भी.

दुनिया की धुरी मैनहटन में उसके दफ्तर में थी, जहां उसके चैट बॉक्स में बगल के हाफ केबिन में बैठे शख्स का अवतार एक नया शगूफा छोड़ रहा था. उनकी बातचीत इतनी चैट केंद्रित हो चली थी, कि वे जोरों से हंसते भी नहीं थे. बड़े से बड़े मज़ाक पर स्माईली :-) टाइप करके काम चल जाता था.

फोटो: आयर्स नो ग्रसस (अलबर्ट म्यूज़ियम), फ्लिक्क्र

Friday, September 12, 2008

LOVE STORY # 506: उसे अपने ब्लॉग से इतना प्यार हो गया कि उसे न प्राइवेसी का ख्याल रहा, न दूसरों के जज़्बातों का

हैनरी न्यूयॉर्क के एक रॉक बैंड में था. इतना शर्मीला कि जब वे अपना आरकेस्ट्रा पेश कर रहे होते, तो वह दर्शकों की तरफ से पीठ कर लेता. वह सोचता था कि लोगों पर अगर उसने ध्यान दिया, तो वह संगीत से भटक जाएगा. पर उसकी गर्ल फ्रैंड ऐसी नहीं थी. एमिली हर जगह एक रिबेल थी, चाहे क्लास में हो, या घर में या फिर अपनी जिंदगी में. वह एक पब्लिशिंग हाउस में नौकरी कर रही थी. और इस वक्त के उन क्रियेटिव लोगों की तरह- जो अपनी जगह तलाश रहे हैं- उसका एक निजी ब्लॉग था. एमिली को वह सब लिख कर और कह कर अच्छा लगता था, जिनसे आम तौर पर लोग बचते हैं. जैसे बेटूक टीका टिप्पणी करना, निजी और प्राइवेट बातों को उजागर कर देना, जो मन में आये- कह देना- भले ही सामने वाले को अच्छा न लगे. जहां हैनरी के लिए क्रियेटिविटी अपने भीतर के कुंए से कनेक्टेड रहकर खुद को अभिव्यक्त करना था, एमिली के लिए शायद वह ज्यादा जरूरी था, जो उसकी बातों को सुनते हैं, सहमति रखते हैं, या तिलमिलाते हैं, नफरत करते हैं. वह ब्लागोस्फेयर की मर्लिन मनरो बनने का शायद गुप्त सपना संजोये हुए थी.

हैनरी को अच्छा नहीं लगता था कि उसके साथ रहने वाली गर्ल फ्रेंड एमिली गॉल्ड कई बार बहुत कैजुअली भी उनकी निजी बातें अपने ब्लॉग पर लिख देती थी. उसे लगता था कि जो दो-ढाई सौ लोग उसके ब्लॉग में आवाजाही कर रहे हैं यकायक उनके बैडरूम, उनके अंतरंग प्रसंगों और उनके झगड़ों के चश्मदीद गवाह बन गये हैं. एमिली को लगता था, अगर वह अपने मन की बात ईमानदारी से अपने ब्लॉग पर भी नहीं लिख सकती तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब ही क्या है. पर हैनरी का तर्क था कि वह जो बाते लिख रही है, वह इस भरोसे के साथ की गई थी, कि वह दोनों के बीच की बात है, अगर उसे पता होता कि एमिली उन्हें जगजाहिर करने वाली है, तो शायद वह उन्हें कहने से पहले सोचता. कई बार एमिली ने अपने पोस्ट एडिट किये और कई बार उन्हें बदला भी, पर उसे लिखते वक़्त हमेशा वह हमेशा उत्तेजना से भर जाती, कई बार इस अनजाने अपराधबोध के साथ भी, कि वह जो कुछ कर रही है, उसमें सब कुछ शायद ठीक नहीं.

जैसा कि हैनरी की आदत थी, वह भीड़ की तरफ पहले से बड़ी दीवार करके बैठ गया. एमिली का ब्लॉग पहले से कहीं ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. आवाजाही करने वाले लोग ज्यादातर उसके साथ मैत्रीभाव रखने वाले लोग थे, जैसे कि ज्यादातर शरीफ लोग हुआ करते हैं, भलमनसाहत, सहानुभूतियों और मशविरों से भरे हुए.

एक दिन एमिली के पास फोन आया. एक नई नौकरी के ऑफर का।

फोटो: Heels__by_Memphisraine / flickr/ (c) raine angel

Wednesday, September 10, 2008

LOVE STORY # 507: पानी में छपाक!!! होने से पहले उसके चेहरे पर स्माईली वाला भाव था

बिछड़ने से पहले तय हुआ था कि जाने से पहले बात हो सका तो अच्छा रहेगा। पर बाढ़ का पानी बढ़ता ही गया। पानी के बहाव में पता नहीं दोनों कब अलग हुए और कहाँ चले गए। तूफ़ान जब दम लेने के लिए रुका तब वह एक पहाड़ी के सामने था. बारिश थमी ही नहीं. जैसे जैसे पानी का स्तर उठता गया, वह दरकती हुयी पहाड़ी के ऊपर की तरफ़ चढ़ता गया. वहां ऊपर चट्टान पर बैठे हुए उसे कई बार लगता कि दुनिया का वह सबसे अकेला इंसान है. जहाँ तक निगाह जाती, कोई दिखाई न देता. क़यामत का मंजर. भूख, ठण्ड, नींद सब एक साथ लग रहे थे. उसके चेहरे पर जितनी तरह की हो सकती हैं, बदहवासियों ने घर बना लिया था. उसे कई बार लगा कि उसे किसी का इंतज़ार नहीं करना चाहिए ख़ास तौर पर अब, जब ज़िन्दगी में क्या रखा है. एक हल्का सा झोंका, थोड़ी सी बारिश पहाड़ की उस जगह को पानी में मिला सकती थी. पर उसे लगा कि उसे जिंदा रहना चाहिए, जहाँ तक उसकी बस में हो. भले ही ज़िन्दगी कितने ही दुखों से भरी हो. पर इधर बाढ़ का पानी बढ़ा, उधर हवा का वह झोंका आया. पहाड़ के ऊपर जिस चट्टान पर वह अकेला भीगता दुखी बैठा था, वह दरक गई और गिरने लगी. वह भी सर के बल पानी में गिरने लगा. उसे लगा कि जाते हुए उससे बात हो पाने का अरमान अधूरा ही रहा. पर तभी मोबाइल फ़ोन बजने लगा. एक सेकंड के पांचवे हिस्से में उसने जान लिया - उसीका होगा!पानी में छपाक!! होने से पहले उसके चेहरे पर एक स्माइली जैसा भाव था.
रेखाचित्र: आस्तीन का अजगर

Tuesday, September 9, 2008

LOVE STORY # 508: ईमानदार होने के लिए एक ऐसी दीवार चाहिए थी, जो उससे बात भी करे

उसके आसपास एक दुनिया थी. उन लोगों की जिनका उसे ख्याल था. जिनसे वह प्यार करती थी. जिनके लिए वह कुछ भी कर सकती थी. और किया भी था. उसका पति उसे तब छोड़ कर चला गया था, जब दूसरा बच्चा पैदा हुआ था. उसने एक हाथ से बच्चों को संभाला, दूसरे हाथ से खुद को. कई मर्द उसकी जिंदगी में दस्तक देते रहे, पर वह अकेली रही. न्यू यॉर्क के उस अश्वेत मुहल्ले में सब उसे जानते थे और वह सबको. उसने मेहनत की. धीरे-धीरे एक के बाद एक उसे नौकरियां मिलती रहीं और फिर उसने इतना कुछ जमा लिया कि उस मुहल्ले से बाहर आ सके. बेटा फौज मे चला गया और बेटी को एक भला सा लड़का मिल गया. 43 साल की उम्र में वह अकेली हो गई. कहने और बताने के लिए उसके पास पूरी गाथा थी. उसके सामने दीवार थी. पीली होती सफ़ेद दीवार.
वह दीवार से बात करने लगी.
दीवार से वह ईमानदार हो सकती थी. दीवार से बात करके उसे हल्का लगता. वह रो लेती. दिल से कई पत्थर उठा लिए जाते. वह अपनी दुनिया को- जो उसने तिनका तिनका जोड़ी थी, और प्यार कर सकती थी. वापस जाकर बिना किसी शर्त, बदले की अपेक्षा, एहसान या प्रत्याशा के साथ.
कई बार उसे लगता था कि दीवार भी उससे बात करे।
फोटो: जस्ट नील / फ्लिकर

Thursday, September 4, 2008

LOVE STORY # 509: (स्पीड डेट-दो) देर रात पार्टी से लौटते बारिश में कार के रेडियो में वह गाना बजने लगा

देर रात पार्टी से लौटते वक्त उसकी कार के रेडियो में वह गाना बजने लगा. बाहर बारिश हो रही थी. उसने गाड़ी सड़क के किनारे लगा ली. और गाना खत्म होने के थोड़ी देर बाद तक स्टार्ट नहीं की. वह रोना चाहता था. पर फिर उसे लगा कि वह नशे में है. उसने रेडियो बंद कर दिया. खिड़की खोल दी. बारिश का पानी भीतर आने लगा. वह जोरों से अपने बेसुरे गले से उस गाने की मइया करने लगा.

LOVE STORY # 510: फिर एक दिन कविता ने कहा- मैं सिर्फ कविता नहीं


मैं सिर्फ कविता नहीं हूं- कविता ने उससे कहा.

वे कविता में मिले थे. एक कविता ने मिलवाया था उन्हें.

वे कविता हो गये थे. गड्डमड्ड. गुमशुदा. इस कदर कि कविता उन्हें लिखने लगी थी. वे उसके हर्फ बन गये थे. चुप्पियों तक फैले हुए तराशे गये हर्फ.

मैं सिर्फ कविता नहीं हूं- कविता ने उससे कहा.

वे कविता के इर्द गिर्द कविता को ढूंढने लगे.

वहां एक गहरी ख़ामोशी थी. टूटे हुए तिलिस्मी अमूर्त की बीहड़ नाखुश खामोशी.

कविता के इर्द गिर्द टूटे हुए कांच की असंख्य किर्चें थीं. उस खामोशी में आवाज़ सिर्फ नंगे पांवों की थी. कविता का घेरा वहीं पर था, कांच की किर्चों के नीचे. वे झुके और उन्होंने किर्चें साफ किये. और फिर घेरे में आकर खड़े हो गये. कविता के घेरे में जादू था. कविताएं थीं. कविता के घेरे में खड़े होते वक्त उनके पांव जख्मी थे, पर उनके पास कविता की खुशी थी, उस पल की गहराई, शिद्दत और हर बार एक नई तह खोलती हुई.

फोटो: कल्पो दी फुल्मिने फ्लिकर

LOVE STORY # 511: गीली मिट्टी का अत्तर उसके रहस्यों को जगा देता

उसके भीतर एक गंध थी. उसे खुद इसका पता नहीं था. दरअसल वह उस गंध को महसूस करने में अक्षम था. वह एक गहरी गंध थी. ड्यूटी फ्री से खरीदे कैल्विन क्लाइन बी की खुशबू और पसीने के पार कहीं गहरी. आदिम. जंगली. हरी. दबी हुई.

गीली मिट्टी का अत्तर उसे छूता. और फिर वह गंध, उसकी, जिसका उसे पता नहीं था. जिसे वह महसूस कर पाता. गीली मिट्टी का अत्तर उसे उस गंध के बारे में बताता. एक रहस्य की तरह वह गंध उसके शरीर में थी, उसकी कल्पनाओं में अंदाजे की तरह खुलती.

पर फिर बहुत दिनों कैल्विन क्लाइन बी से और पसीने से बचा रहता कि वह गंध, जो गीली मिट्टी के अत्तर ने जगाई थी, रची रहे, बसी रहे. जितने भी दिनो तक.

फोटो जावाद जकारिया फ्लिकर

LOVE STORY # 512: सिगरेट पीने वाली औरत की आंखों में प्यार नहीं था....


जलती हुई अदालत थी, लिखा है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक बहुत दमदार कविता में. उसने प्यार किया था, पर दरअसल उसे न्याय चाहिए था. जलती हुई अदालत में एक के बाद मामले पेश हो रहे थे. हथकड़ी पहने हुए मुलजिम. सजा सुनाए गये सर झुकाए हुए मुजरिम. कठघरे. फैसले. फाइलें. गुहार. सुबूत. चश्मदीद गवाह. रिशवत खाता पेशकार.

जलती हुई अदालत वाली आंखों को न्याय का इंतज़ार था. ग़लती उसकी नहीं थी. किसी भी तरह से. उसे यकीन था तर्क की ताकत पर. कारणों की परिणतियों पर.

सिगरेट पीने वाली जिस औरत की आंखों में जलती हुई अदालत थी, क्या वह उस बसंत के साथ न्याय कर सकी, जो उसके बगीचे में सफेद फूलों के बेशर्म झुंड की तरह यकायक सामने आकर खड़ा हो गया था. जलती अदालत के कानून में क्या कोई दफा, कोई शिनाख्त, कोई शाहिद इन बातों के लिए भी था, जो बहस से परे थीं? क्या उसे प्यार में न्याय और न्याय में प्यार की तलाश थी?

इंतज़ार की एक लम्बी मियाद के बाद एक दिन उन जलती अदालत वाली आंखों को न्याय मिल ही जाना था. हासिल के नाम पर सिगरेट पीने वाली औरत के हाथों में फैसलों की नकलें फड़फड़ाती था. थोड़ी देर ऱाख़ कलेजे को ठंडक भी लगी. बहुत कुछ स्थगित रहा उस न्याय के लिए. मसलन कई चहलकदमियां, बहुत सारा मोत्सार्ट, गिफ्ट में दिये जाने से रह गई रैपर में लिपटी ऐश ट्रे, बिल्ली के बच्चे. न किया हुआ रियाज. कोने में रखा रह गया तानपूरा. जवाब का इंतज़ार करती टेलीफोन की घंटी. और चिट्ठी. और सफेद रौशनाई से लिखी जा रही कविताएं.

बसंत फैसले के वक्त नहीं था. वहां जो बरी भी था, तो बाइज्ज़त नहीं. जलती हुई अदालत खुद सजायाफ्ता थी. अपने अकेलेपन में. न किए के जुर्म में. अपनी शिष्ट सभ्यता में. अपनी मासूम खुद्दारी में. निष्पक्षता के यकीन और बराबरी के दावे में.

बसंत जो सफेद फूलों का बेशर्म झुंड बनकर बीच में आया था, अब नहीं था, जब फैसला सुनाया जा रहा था. मौसमों का बेतरतीब होना और ग्लोबल वार्मिंग और सफेद फूलों के झुंड की बेशर्मी पर अदालत का कोई बस नहीं था.

LOVE STORY # 513 : एलबिनो सपने में आंसुओं से लाल आंखों वाला प्यार उससे बदला ले रहा था


वह एलबिनो सपने में खुद को पसीना होते हुए देख रहा था. सफेद रोशनी में कोई उसे प्यार कर रहा था. गुस्से में. बदला लेने वालों की तरह. निभाई जाने वाली दुश्मनी की तरह. बहुत देर तक उसने आंखे नहीं खोलीं. सपने की आंखें. सपने में. बंद किये महसूस करता रहा. फिर धीरे से सपने की नींद से उसने सपने में आंखें खोलीं.

एलबिनो रौशनी में एलबिनो शरीर की लाल आंखों से टपकते आंसुओं के साथ कोई उससे प्यार कर रहा था. एलबिनो ताकत वाले एलबिनो हाथ. एलबिनो अरमान. एलबिनो सांसें. एलबिनो अंधेरे में झांकती एलबिनो रोशनी के आगे पलके झपकाता एलबिनो अंधापन. एलबिनो नाखून. उसके जिस्म में गड़ते हुए. ख़ून की धार. और खराशें. एलबिनो गुस्सा.

वह बेसुध था. वह सांसों को उठता और गिरता और धक्के देता महसूस कर सकता था. हरे पर्दे वाले अस्पताल की फिनाइल घुली सफेद रोशनी में. उसके हाथ बंधे हुए नहीं थे, पर वह उन्हें नही हिला सकता था. शब्द वहां थे, पर काम नहीं आ रहे थे. मायने इतने गुत्थमगुत्था कि सार्थक शब्दों के बूते उन मायनों को जता बता पाना मुश्किल था. जो हलक में आवाज़ थी, ज़ुबान पर नहीं थी. बीच में ही घुटी हुई.


बाहर सफेद शोर था. मंदिर की घंटी, अजान और बच्चे की पतंग जो फिजा में तैरने निकली थी, यकायक घने धुंए में ठिठक गई थीं. वह बीमार था. नींद में एलबिनो सपना था, नींद के बाहर स्याह कमज़ोरी. वह एक से बचकर दूसरे के किवाड़ खटखटा रहा था.

उसे याद था खिड़की के सायबान पर प्यार करते कबूतरों की आवाज़ कमरे में थी. वे सलेटी कबूतर थे. उनमें से एक सफेद कबूतर भी था, जो फड़फड़ा कर उड़ गया था. उसे प्यार की नहीं शांति की तलाश थी.

उसे प्यास लग रही थी

फोटो- सेल्वा फ्लिकर