Friday, October 31, 2008

LOVE STORY # 482: पाब्लो नेरुदा से ज्यादा प्यार उनकी कविताओं के हिस्से आया


पाब्लो नेरूदा की एक कविता उसने उसे पढ़ कर सुनाई.
पाब्लो नेरूदा की एक कविता उसने उसे पढ़ते सुना.
पाब्लो नेरूदा की बातें उसे लगा, उसकी खुद की हैं.
पाब्लो नेरूदा की बातें उसे लगा, उसीके लिए लिखी गई हैं.
जितना प्यार उनके रास्ते, उनके हिस्से आया, वह पाब्लो नेरूदा की लेटिन कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद ने कई गुना कर दिया. क्या ये कम आश्चर्य की बात थी कि चिली जैसे देश में कई दशकों पहले एक आदमी वह सब लिख रहा था, जो इस पल दो दिलों में रेलगाड़ी के कोयला इंजन की तरह धधक और धड़क रहा है. जितना प्यार पाब्लो नेरुदा के हिस्से आया, उससे कहीं ज्यादा, कहीं उसकी कविताओं के. कई जुबानों और महाद्वीपों में प्यार करते लोगों के चुप में वे साँस लेती हैं. असंख्य निजी पलों की चश्मदीद गवाह की तरह पता नहीं कितनी बार प्यार को कविता पढ़ती है और प्यार कविता को और एक दूसरे में प्राण प्रतिष्ठित होती रहती हैं. पाब्लो नेरूदा की कविताएं वहीं रहेंगी, जहां लोग प्यार में पड़ और जी रहे होंगे. पाब्लो नेरूदा के चले और कोयला इंजन के गुजर जाने के बाद भी.

LOVE STORY # 483: एक काम ऐसा था, जिससे बचने के लिए कहीं नहीं जाना था

वह भी एक वक़्त था. जब वह उसकी आंखों में झांक रहा था. एक ट्रेन छूटने वाली थी. एक बियर का मग खाली होने में खासी देर हो रही थी. जब वह उसकी आंखों में झांक रहा था, वह कहीं और देख रही थी. मेज पर रखे हाथ, सिगरेट, गिलास और उसकी उंगलियों में से कोई एक चीज़ ही छू सकते थे. उसने कहा ट्रेन छूट जाएगी. उसने कहा अगली ट्रेन से चली जाना. यानी एक घंटे बाद वाली ट्रेन. उनकी आंखों में प्यार अपना जाल बुन रहा था. अपने असंभव से में. फिर ट्रेन. जाना. लौटना. जाना. ट्रेन. गड्डमड्ड. जल्दी से बीत रहे पल का स्लो मो. फ्रेम दर फ्रेम. फेड इन. फेड आउट. उसने मेज के नीचे उसके एक पांव के ऊपर रखे हुए दूसरे को अपने जूते के ऊपर रखकर झुलाता रहा. एक वही ऐसा काम था, जो वह उम्मीद, संभावना, कसम, वादे के बाहर एक खेल की तरह मुमकिन था. जिससे बचने के लिए कहीं नहीं जाना था.

LOVE STORY # 484 (स्पीड डेट) : फिर फंस जाओ तो फोन कर लेना

उस मुल्क में वह किसी को नहीं जानता था. उसे ऐसी जगहों पर नींद ठीक से नहीं आती थी, जहां वह किसी को नहीं जानता हो. एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही वहां कोई भी अंग्रेजी नहीं बोल रहा था. फ्रेंच उसे नहीं आती थी. उसे पता था उसे कहां जाना था, पर ट्यूब स्टेशन की हैल्प डैस्क पर काम कर रहे लड़के- लड़कियों ने उसे जो भी बताया फ्रेंच में बताया. उसकी समझ में कुछ नहीं आया. उसने इशारों से बात करने की कोशिश की, पर फिर भी वे कहीं नहीं पंहुच सके. वह प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे लोगों को ढूंढने लगा जिनसे वह मदद ले सके. पेरिस में उस वक़्त सुबह के दस बज रहे थे और कामकाजी दिन की व्यस्तताओं ने लोगों के चेहरों पर अदृश्य डू नॉट डिस्टर्ब बोर्ड टांग रखे थे. वह अपना सामान घसीटता हुआ यहां से वहां और वहां से यहां घूमता रहा. किसी ऐसे शख्स की तलाश में जो उसे ये बता सके कि पिगाले ले जाने वाली ट्रेन उसे कहां से मिलेगी. वह किसी भी जगह के उच्चारण को लेकर अनिश्चय में था. दिल्ली से लंबी उड़ान के बाद की थकान उसे महसूस होने लगी थी. वह चाहता था, जल्दी से होटल पंहुचे और थोड़ा सो ले.
फिर उसे तीन ऐसी चमड़ी के लोग दिखाई दिये, जो दक्षिण भारतीय लगते थे. वे उसे सगे से लगे. उनके पास गया और पूछा और कहा- कैन यू हैल्प मी. उनमें से एक ने कहा. नो इंगलिश.
आर यू नॉट फ्रॉम इंडिया, उसने पूछा, विच लैंग्वेज यू नो देन
तमिल एंड फ्रेंच. पॉंडिचेरी.
वह आगे बढ़ गया. उसे राहत इस बात से हुई कि जिस कॉन्फ्रेंस में उसकी कंपनी ने उसे भेजा है, वह अगले दिन से है.
उसे एक और भारतीय मूल की महिला दिखाई दी. उसने उससे अंग्रेजी में पूछा- कैन यू हैल्प.
उसने कहा- नो इंगलिश. यू इंडियन.
उसने कहा – यस
औरत ने कहा- मैं पंजाबी –हिंदुस्तानी जानती हूं.
आह, उसने राहत की सांस ली.
उसने बताया कि पिगाले के जाने वाली ट्रेन का प्लेटफॉर्म वहां से काफी दूर था, और क्योंकि उसकी ट्रेन आने में देर थी और वह अपनी शिफ्ट से लौट रही थी, इसलिए वह उसे वहां तक छोड़ आएगी, जहां से वहां प्लेटफॉर्म दिखलाई देगा.
रास्ते में उसने पूछा- क्या आप हिंदुस्तान से हैं.
औरत ने कहा- नहीं मॉरिशस से. पर मेरा पति पंजाब से है. और हिंदुस्तानी पंजाबी मैंने उससे मिलने के बाद ही सीखी है. उसने उससे पूछा हिंदुस्तान में कहा रहते हो, फिर कहा – हमें जाना है अमृतसर, मैंने देखा नहीं है..
वे सीढ़ियां चढ़ते, सबवे से गुजरते, लंबे गलियारों में करीब 12 मिनट चलते रहे. फिर उसने दिखाया वहां से ट्रेन मिलेगी. और टिकट है न आपके पास.
हां उसने कहा, टिकट मैंने एयरपोर्ट से ले लिया था.
उसने अपना नाम और फोन नंबर दिया, कहा कि कहीं फिर फंस जाओ तो फोन कर लेना.
वह पर्ची उसके पास नहीं है. नाम क्या था उसका.

Thursday, October 23, 2008

LOVE STORY # 485: खुशी को जिस चश्मदीद गवाह की दरकार थी, वह प्यार था


उसने कहा उसे लौटना है. उसने पूछा कहाँ? उसने कहा - अब उसे पता है रास्ता ख़ुद के पास जाने का. उसने कहा अब वक्त आ गया है कि थोड़ा अकेले हुआ जाए, ख़ुद के साथ. एक आलाप में, ध्यान में, कविताओं के सफ़ेद में. कई बार जब वह अपने में डूबने लगती तो उसे लगता कि वह लौटेगी नहीं, अपने उस होश हवास में जहाँ बाकि दुनिया है. कई बार वह अपने भीतर की ऊँचाई से नीचे देखती तो सब ठहरे हुए साफ़ पानी की तरह इतना पारदर्शी नज़र आता जैसे सिक्के चमकते नज़र आते हैं गहरे में साफ़. कई बार अवरोह पतंग की तरह बहुत ऊपर ले जाता, उसे डर लगता कि उस जगह पर लौट पाना मुमकिन होगा, जहाँ से चले थे. प्यार उसे अपने करीब ले आया था. एक तरह से वह ख़ुद के पास लौटना तो था, पर वापस आना नहीं था. क्योंकि वह जो थी, वह वैसी नहीं थी, जैसा लौटने से बहुत पहले हुआ करती थी. प्यार ने उसे जो खुशी दी थी, उसने उसे बदल कर रख दिया था सिरे से. वह भीतर से खूबसूरत हो गई थी, और बाहर जो दीखता था, वह तो सिर्फ़ झलक थी उसके भीतर के सौंदर्य की. अब जब वह भर गई थी, खुश थी और ख़ुद को इतना खूबसूरत महसूस कर रही थी कि वह अपनी ज़िन्दगी के, नियति के, दुनिया के बहुत से अधूरे अध्यायों को नज़रंदाज कर सकती थी. उसके पास जो इस समय था, उसमे वह पूरी थी. और ये बड़ी बात थी. क्योंकि दुनिया उसकी ज़िन्दगी को नहीं, उसकी ज़िन्दगी उसकी दुनिया को तब्दील कर रही थी. उसका अपने पास लौटना प्यार से दूर जाना नहीं था. खुशी को जिस चश्मदीद गवाह की दरकार थी, वह प्यार था. जिसके साथ वे जहाँ भी गए, हर बार नई जगह, नए रास्ते, नए हालातों में पहुंचे. इसलिए लौटना हर बार वापस होना नहीं हुआ.
photo: solitude by m4gic/ flickr

LOVE STORY # 486: वह पृथ्वी की तरह निर्वासित है. वह शहर की तरह शरणार्थी नहीं.

वह निर्वासित है. नियति से. भाग्य से. सामान्य से. साधारण से. चीथड़ा सुख और टुच्ची सुविधा से. कुनबा परस्ती से. दुनियादारी से. अदालत में न्याय से. भीड़ के कोहराम से. धनुष की तरह तने हुए राग से निर्वासित अस्थमा की सांस में. वह निर्वासित है अपनी मनुष्यता में. वह निर्वासित है कविताओं में. किताब में. दो प्याले चाय के आसपास पसरी हुई गहरी चुप्पी के आरपार झांकती गहरी नज़रों में. शक़ के डगमग से यकीन की छलांग में. निर्वासित. वह निर्वासित है पानी से छिटककर दीवार पर नाचते सूर्य के चकत्ते में. अपनी गुमशुदगी से लौट आये बिल्ली के बच्चे को फिर से देखने की खुशी में. शोपेन के संगीत में. कतरा कतरा खुशी और कतरा कतरा आंसू में. शहरी होने से बची रह गई पृथ्वी की प्रकृति में. अपने हरे में उगते ही आते सफेद फूलों में. वह निर्वासित है अपने आईने पर लिपस्टिक के लिखे में. वह ईश्वर से निर्वासित है प्रार्थना में. वह सब कुछ तय और सब कुछ सही होने के बंदोबस्त से निर्वासित है यहां और अभी के कौतुक स्वयंस्फूर्त में. वह हरसिंगार के गिरे हुए फूलों की उठती हुई गंध में निर्वासित है. अपने एकांत के अनंत में निर्वासित है. खुशी के एक पल, प्यार के एक छिन और प्रार्थना के प्राचीनतम में.
वह पृथ्वी की तरह निर्वासित है. वह शहर की तरह निर्वासित नहीं.

photo: garden of exile, jewish museum berlin by pug

Wednesday, October 22, 2008

LOVE STORY 487: उसने दिल को तसल्ली दी कि मुसलमान है... क्या फ़ायदा मिलने का

वह एक रिपोर्टर थी. और उसके लिए वह एक ख़बर बन कर आया था. काम के हर दिन उसे किसी न किसी का इंटरव्यू करना होता था. एक नए शख्स से मुलाक़ात, एक नए दिमाग में झाँकने की कोशिश. वह ख़ुद से बचने के लिए कहीं दूसरों की ज़िन्दगी में, उनके मन में, दिमाग में झांकती. उसने इसकी हद यहीं तक खींच रखी थी. रिपोर्टर की नौकरी के जरिये ये काम आसान था, कि बिना निजी हुए, बिना दोस्त बने और सिर्फ़ दोस्ताना रहकर आप बहुत सारे लोगों के बारे में वह सब जान समझ सकते हैं, जो किसी और तरह से मुमकिन नहीं. उसे ये पसंद था इसलिए भी कि उसका दायरा बढ़ता था और उसकी आज़ादी बरक़रार रहती थी. उस दिन उसे जिनका इंटरव्यू करना था वे ईरान से आए हुए संगीतकार थे. एक म्यूजिक ग्रुप. उसने ख़ुद से कहा आयातोल्लाह खोमेनी के मुल्क के गाना गाते लोग.. कैसे होंगे?
वे लोग भले थे. सभी पढ़े लिखे, प्रोफेशनल (इंजिनियर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर) जो शौकिया अपने मुल्क के शास्त्रीय संगीत को सीख भी रहे थे और उसका प्रचार भी कर रहे थे. हिन्दुस्तानी क्लासिकल के बरक्स उनके यहाँ ये ज्यादातर ग्रुप में होता था. वह उस ग्रुप के वाद्य बजाने वालों से बात करती रही एंड थोडी देर बाद ही उसे ऐसा लगने लगा कि उनमें से एक शख्स ऐसा है, जो इंटरव्यू जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता. वह बातों को खींच रहा था, चाह रहा था कि उसके साथी उसे उसके साथ अकेला छोड़ दें, उसने ऐसे इशारे करते उसे देखा. उसे अजीब तो लगा पर उसने ऐतराज़ नहीं जताया. अखबार का फोटोग्राफर तभी आ गया और फोटो खिंचवाने के बाद भी वह कोशिश करता रहा कि वह बात करती रहे.
जब फोटोग्राफर उसकी तस्वीरें ले रहा था, तब उसका ध्यान उस शख्स पर गया. वह एक हैण्डसम आदमी था, लंबे घुंघराले बालों वाला, लगभग ईशवर की तरह, और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के फ्रेम में जंचता- फबता हुआ. वह पेशे से डॉक्टर था, जिसकी डिग्री उसने अमेरिका से ली थी. वह संगीत का दीवाना था और इस बात से काफ़ी प्रभावित कि वह संगीत के बारे में कितना कुछ जानती है. वह इंटरव्यू देने की बजे लेने लगा- ज़िन्दगी के बारे में, पढ़ाई, परिवार और कल्चर के बारे में. वह उसकी सराहना करता रहा. उसकी विद्वता की. उसकी खूबसूरती की. पहली बार इतनी छोटी सी मुलाक़ात में उसने किसी को इतना खुल कर साफगो होते देखा. पर वह वहां काम पर आई थी और उसने कहा कि उसे देर हो रही है अगले काम पर पहुँचने की.
वह जिद कर रहा था कि वह शाम को उसका प्रोग्राम देखने जरूर आए.
वह गई, थकी होने के बावजूद.
उसने उसे मंच से देखा. और जब सारे कलाकार बैठ चुके थे, वह उठकर उसके पास प्रेस गैलरी तक आया. शुक्रिया कहा और कहा अपना विजिटिंग कार्ड दो. उसने अपना कार्ड भी उसे दिया.
कंसर्ट काफ़ी अच्छा रहा और अली बयानी पूरी शाम सेतार बजाता रहा एकटक उसकी तरफ़ देख. बीच बीच में वह मुस्कुराता और फिर डूब जाता अपने संगीत में. उस संगीत में कई सौ साल पहले की रौ थी, प्राचीन कामनाओं से भरा हुआ, रेगिस्तान शाम की हूक की तरह, वह संगीत किसी और वक़्त, किसी और जगह, किसी और जनम का था। लगता था जैसे कोई बचा हुआ हिसाब पूरा होने आया हो, जैसे कोई खोई हुई याद दस्तक दे रही हो दिलो दिमाग पर हल्के से. मनुष्य होने की निशानी देता, मनुष्य होने की निशानी मांगता संगीत. डूबता, तैरता, गहराता, उतराता.
उसे लगा कि कहीं वह प्रोग्राम के बाद उसके पीछे न लग जाए, इसलिए ख़त्म होने से पहले ही वह चली गई. भीड़ से भी बचना था.
उसने फ़ोन किया. मिन्नत की कि वह मिले उससे. अगले दिन उसे दिल्ली जाना था, क्या वह सुबह ब्रेकफास्ट पर उससे मिल सकती है. वह उससे एक बार बस एक बार मिलना चाहता था, इससे पहले कि सरहदें और सभ्यताएं उसे वापस उस जगह ले जाती, जहाँ का वह रहने वाला था.
वह समझ नहीं पा रही थी उसकी आवाज़ के मर्म को. आखिर वह ऐसा क्यों कर रहा था.
एक इंटरव्यू ही तो था.
अगली सुबह जब वह उठी तो इसी पसोपेश में. जाए. कि न जाए. हैमलेट नाटक की तरह वह शंकाओं से घिरी हुयी थी.
उसने उससे न मिलने की वजहें तलाशनी शुरू की. वह उससे मिलने नहीं गई.
दिल को तसल्ली दी कि वह मुसलमान है. वह भी ईरान का. आखिर क्या फायदा. (साफ साफ तो कुछ भी नहीं था अकेली औरत की दुनियादार व्यावहारिकता में, और जब दिल पर दस्तक आई तो दिमाग कान्यकुब्ज ब्राह्मण हो गया).
जाने से पहले उसका फ़ोन आया- ' मैंने आपका इंतज़ार किया. मेरे दोस्तों ने कहा था आप नहीं आएँगी, पर मैं शर्त लगाने को तैयार था कि आप जरूर आयेंगी. मैं बस एक और बार आपसे मिलना चाहता था. क्या हम किसी और जगह किसी और वक्त मिलेंगे?
उसके पास कोई जवाब नहीं था.
उसने कहा कि एक पैकेट उसके लिए वह छोड़े जा रहा है, क्या वह होटल के रिसेप्शन से ले लेंगी.
और हाँ, अख़बार में जो उसने उनके बारे में लिखा है, वह उसकी कतरन लिए जा रहा है- 'किसी ने मेरे बारे में इतनी गहराई से नहीं लिखा!'
वह सोचती रही कि क्या वाकई उसे संगीत की इतनी समझ है?
photo: music room, ifshahan/ laura and fulivio/ flickr

Tuesday, October 21, 2008

LOVE STORY # 488: साँस के छुए को नाम से छुए से पकड़ना था

वे दूर थे, पर जुदा नहीं. जब भी अकेले होते साथ होते. बहुत दिनों तक जब वे करीब न हो पाते तो शब्दों से एक दूसरे को छूते. शब्द शरीर बन जाते. ऐन्द्रिक हो जाते. कई बार उनके बीच शब्द चुक जाते. पर साथ होने के लिए जरूरी था कुछ तो कहना.एक बार जब कहने को कुछ नहीं था, तब उसे महसूस हुईं.उसकी साँसों की आवाज़. चढ़ती उतरती हुयी.उसे लगा कि वे साँसे उसे छू रहीं हैं. बहुत दूर से. कनपटी पर महसूस की जा सकने वाली नजदीकी के साथ.इतनी घनी कि वह उसे छू सकता था, उसके घने को, साँस का शरीर था. कुहासे के सर्द में भाप की तरह एक धुन, ताल, पैटर्न, रंग. वह कई बार मज़ाक में कहता कि कहीं किसी दिन गुस्से में छूना बंद करने का फ़ैसला किया, तो साँस लेना मुश्किल हो जाएगा. वे साँसे उनके साथ के चुप को विन्यास देती.वो धीरे से उसका नाम लेता. उसकी गहराईयों में. उसे पुकारने के लिए नहीं, बल्कि साँस के छुए को पकड़ने के लिए.
शब्द और शरीर के चुकने के बाद भी उनका स्पर्श जिंदा था. साँस का अपना शरीर था. नाम का अपना. शरीर के शरीर से अलग. जहाँ आत्मा का शरीर खुलता था.
वे दूर थे, जुदा नहीं.
photo: leo reynolds/ flickr

LOVE STORY # 489: उसने दरवाजे की चौखट पर खड़े होकर कहा वह कहीं नहीं जायेगी

वह दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थी. उसने उसे छुआ. और भरोसा दिलाते लहजे में कहा- मैं कही नहीं जा रही. दरअसल वह जाने की कोशिश कर के देख चुकी थी और हार मान चुकी थी. ये कोई फ़ैसला नहीं था. जानकारी थी कि वह कहीं नहीं जा रही. ये जानकारी वह उसके साथ साझा कर रही थी बाकी सारे सचों की तरह. उसकी अपनी गहराई थी, जो बढ़ती जा रही थी. लगता था किसी दिन वह डूब जायेगी अपने ही भीतर, अपनी ही गहराई में. अपने भीतर के छलकते लबालब भरे हुए एहसास से.
वह ख़ुद से बचना चाहती थी.
मैं जानता हूँ, उसने कहा. तुम कहीं नहीं जाओगी. पर वह उससे ये सुनना नहीं चाह रही थी. शायद वह उससे सुनना चाह रही थी कि वह भी कहीं नहीं जाएगा. शायद हम सब जो कहते हैं वही सुनना भी चाहते हैं. उसी में गूंजना चाहता हैं. वह सोचती थी कि वह भी उसे भरोसा दिलाएगा उसे कि तुम कहीं भी चली जाओ, मैं कहीं नहीं जा रहा. मैं यहीं हूँ तुम्हारे साथ. हमेशा.
पर उसने ऐसा कुछ नहीं कहा. और इसलिए वह ग़लत था.
उसे पता था कि वह चला जाएगा. जाना तो उसे था ही. आख़िर उसकी एक दुनिया थी. डर थे, जो उसके वर्तमान से बड़े थे.
देहरी पर खड़ी होकर वह सोच रही थी कि उसने जो कुछ भी चाहा था, वह चला गया था. एक दिन प्यार चला गया था उसकी दुनिया से, वह पत्थर हो गई थी, सारे स्वर छोड़ गए थे उसे. उसे डर था कि एक दिन उठेगी और शब्दकोष के सारे शब्द उसे छोड़ कर चले जायेंगे.
अगर वह चला गया तो.
वह दरवाजे कि चौखट पर खड़ी रही. उसे मालूम था कि वह चला जाएगा. उसका डर ऐसे न बदलने वाला सच था, जिसमे जाना तैशुदा लकीर की तरह था. बाकी सब बेहलावा था.
वह चला गया. इस भरोसे से कि वह कहीं नहीं जायेगी. दरवाज़े की चौखट पर उसे अन्यमनस्क छोड़.
photo: rusty hinge and face/fd

Saturday, October 18, 2008

LOVE STORY # 490: वे चले भले ही जाएंगे, पर खोएंगे नहीं


वे खुशी की तलाश में नहीं थे. साथ काफी था. उनके बीच बहुत सारे सवाल थे. बहुत सारी मुश्किलें भीं. इतने कि ये किसी भी तरह से तयशुदा नहीं हो सकता था कि एक रोज वे मिलेंगे और इतने करीब हो जाएंगे. वह एक जगह थी और दुनिया में सबसे अकेली थी. वह कई जगह था, बंटा हुआ और अब एक होने की कोशिश में. इस बीच जी जा चुकी एक जिंदगी थी, जिसमें बहुत कुछ साबुत, सलामत और पूरा नहीं था. अधूरापन भी नहीं. पर उनके अधूरेपन को पता था, कि वह पूरा हो सकता था. उनके साथ से ये मुमकिन हो सका था. जो कुछ रह गया था, कहे जाने से, लिखे जाने से, रोने और हंसने से, अपनी आंखों में पहचान पाने, पहचान देने से, गाये और चिल्लाए जाने से, लिपटने और मारे जाने से, चुप रहने से. वह इस छोटे से साथ में मुमकिन था. एक फास्ट फॉरवर्ड फिल्म की तरह साथ अपना एजेंडा लेकर आता था, तेजी से रिकॉर्ड होता हुआ, जिसे साथ के बाद की सदियों में खुलते हुए, घुलते हुए, खिलते हुए महसूस किया जा सकता था. साथ उन्हें सिरे से बदलता था. उनकी आंखों को, उनके चेहरों को, उनकी गंधों को, रंगों को. उसमें वे हो सकते थे, जो वे सच में थे. उनके सच होने के लिए साथ जरूरी था. साथ की अपनी जिंदगी थी, अपने दुख- सुख, अपनी नियति. बहुत बार उन दोनों की जिंदगी, सुख- दुख और नियतियों और रंगों से अलग. कई बार साथ सफेद कविताओं में तब्दील हो जाता था, कई बार साथ का न होना भी. वे रंगों के बनने से पहले की स्थिति में आ जाते थे. साथ के दौरान ही पता चला कि वे चले भले ही जाएंगे, पर खोएंगे नहीं. पर एक ही जगह और वक्त पर सुनी गई अलसुबह परिंदों की आवाज़ें किसी भी दिन उस चांद से बेहतर थी जो वे अलग अलग जगहों से एक ही वक़्त देखते थे.
फोटोः टुगेथर वी स्टैंड स्ट्रांग- रोजीरो प्लिकर

LOVE STORY # 491: फैले हुए काजल से पता चलता है रोने का


कई बार आंसू दिखाई नहीं देते. वे हर बार दुख के भी नहीं हो पाते. कई बार खुशी के भी नहीं. कई बार वे उस वक़्त धोखा दे जाते हैं, जब दुनिया, जमाना और यहां तक कि आपके चाहने वाले भी अपनी शक्लों पर ये उम्मीद की तख्ती टांगे होते है. कई बार किसी लम्बे सफर में बिना किसी उकसावे के, कई बार कोई सदियों पुराना भजन सुनते हुए, कई बार किसी के दिवंगत हुए के अरसे बाद वे आते हैं.. अनामंत्रित साधुओं की तरह, कई बार दान के लिए नहीं, सिर्फ आत्मा को आकाश और ऱौशनी और पानी देने के लिए. कई बार टीस की तरह चुभते और पत्थर की तरह दुखते भार को हल्का करने के लिए भी.
कई बार आंसुओं को बहता हुआ महसूस किया जा सकता है, देखा नहीं. तूफान के बाद की तबाही फैले हुए काजल और भर्राते हुए गले में पढ़ी जा सकती है. कई बार प्रार्थना कहे जाने के लिए किये गये अकस्मात अनुष्ठान के बाद के यज्ञ स्थल की तरह.
कई बार बिना मन्नत की इबादत की तरह. बिला वजह गाने, जीने, मुस्कुराने, मरने, सांस लेने की तरह.
फोटोः आईज - डेड्रीमर फ्लिकर

Saturday, October 11, 2008

LOVE STORY # 492: अमृतसर में कोई उदास नहीं है, सिवा उनके जिन्होंने ज्यादा कुलचे खाए हैं

ज्यादा कुलचे खाने की खुशी एक उदास चेहरे में मॉर्फ हो जाती है. अमृतसर खुशियों का शहर है. वहां हर आदमी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा मोटा, बड़ा और कम पिलपिला है. अमृतसर को कुलचों से प्यार है. और दुनिया में कुलचे खाने वालों की राजधानी अगर कहीं हो सकती है तो वह अमृतसर ही है. अमृतसर ने अगर बाबा रामदेव की उद्भट योग कला को अपनाया है, तो सिर्फ इसलिए कि अगली बार बिना उदास हुए एक कुलचा और खा सकें. जो लोग कुलचों से प्यार करते हैं, वे इंसान के प्यार को अपनी खट्टी और तेज़ाबी डकारों के बीच कह देते हैं- कल आना।

फोटोः चार्ल्स हेन्स फ्लिकर

LOVE STORY # 493: वे इतना ही चाहते थे कि किसी एक को पता हो उनके बहुत अकेले होने का

कॉफी हाउस के बाहर कॉफी की गंध थी. कॉफी के प्याले से ज्यादा. वह हमेशा कहता था, कि यह गंध ग्राहकों को पटाने के लिए है. कॉफी का वह तेज़ भभका जो दुकान से निकलता है और याददाश्त की कल्पना को झकझोर देता है, वह तलाश प्याले के सच से पूरी नहीं होती.

वे वहां कॉफी पीने नहीं, मिलने आते थे. समय और दुनिया से बाहर खुले में बैठने की थोड़ी जगह चाहिए थी.
वह तभी तभी दुनिया की सबसे अकेली इंसान बनी थी.
वह हमेशा अकेलेपन के साथ होना चाहता था.
एक अनुष्ठान की तरह सब तय था. एक कैपिचैनो, एक ब्लैक एस्प्रेसो. मशीन से बिल निकलने की आवाज़. काउंटर पर सेल्समैन की बोरियत भरी मुस्कान. दीवार पर जॉज संगीतज्ञों की तस्वीर.
भाप. बातें. उत्तेजना. बहस. एक अनुष्ठान की तरह वे एक ऐसी दृश्य में थे, जिसे पेंट किया जा सकता था. फ्रेम दर फ्रेम. इतनी साफ, साबुत और ज़िंदा कि आप अपना हाथ बढ़ा कर उसे छू सकते थे. अगर नहीं छूते तो सिर्फ इसलिए कि आप जादू को टूटने नहीं देना चाहते थे. जैसे आप चांद को देखकर उसे सहेज लेना चाहते हैं. जहां वह दुनिया की सबसे अकेली इंसान थी. और वह अपने अकेलेपन के साथ.

वे चाहते थे किसी एक को तो ये बात पता हो।

पेंटिंगः वुमेन स्मेलिंग कॉफी- गिजेम सका, तुर्की

Friday, October 10, 2008

LOVE STORY # 494: अरे आ ही तो रहा था, तुम इतना परेशान क्यों हो गई?

उसने कहा था- दो दिन में लौट आऊंगा. हफ्ता भर हो गया था. वह परेशान थी. हालांकि खबर आ गई थी कि फंस गये हैं सरकारी काम से. वक़्त लगेगा. दो बार ख़बर आई कि अगले दिन आएंगे. नहीं आये. जगदलपुर से वह गांव करीब 40 किलोमीटर दूर था. दिन में एक बार बस आती थी, कई बार नहीं भी- मौसम या मशीन कुछ भी खराब हो सकता था.

एक शहर के कॉलेज में पढ़ाने के बाद वह शादी कर एक गांव में आई थी, क्योंकि पति की पोस्टिंग यहीं थी. वह एक जंगली इलाका था, जहां आदिवासी रहते थे और साठ के दशक में वहां बिजली आने का सवाल ही नहीं था. वह वहां पुरानी परिचित सब्जियों के नये नाम सीख रही थी. वहां बहुत सारा अकेलापन था, अपरिचय, अंधेरा, खपरैल की छतों में झींगुरों की आवाज़ें भी. उत्तरप्रदेश के उस शहर के डिग्री कॉलेज की अपनी साथियों को जब वह लौटकर बताएगी, कि वह कैसे रहती है, किस तरह के लोगों के बीच, उन्हें यकीन ही नहीं होगा. कल्पना के आदिवासी हक़ीकत के आदिवासी से काफी कम दुरूह थे, पर दिलचस्प थे. अपने पति के इंतज़ार में बिताए हुए हफ्ते में उसने कर्नल रंजीत के उपन्यासों को कई बार पढ़ लिया था. देर शाम अंधेरे में दूर कहीं नशे में झूमते गाते आदिवासियों की आवाज़े और ढोल की आवाज़ें थीं, अकेले- अंधेरे को और गहरा करती हुई.

अगला दिन भी खाली ही गुजर गया. उसे लगा कि जगदलपुर लौटने वाली बस से चली जाएगी. दोपहर को पता किया तो पता चला कि लौटने वाली बस आज आई ही नहीं है. किसी ने बताया एक सरकारी जीप आई है, अगर वह लौटेगी, तो उसमें उसे सवारी मिल सकती है. पर इसके आगे कोई जानकारी नहीं.

शाम थोड़ी देर के लिए आसमान साफ हुआ तो उसने नौकर से एक साइकल का इंतजाम करने को कहा. एक नौकर की खुद की साइकल थी. दोनों जगदलपुर की तरफ निकल पड़े. बीच में कई बार बारिश हुई. कई बार वह गिरी भी साइकिल से. घुटने छिले. कच्ची सड़क पर कई मील पैदल चलना पड़ा.

बस्तर जिले का मुख्यालय साठ के दशक की किसी शाम कैसे रौशन होता होगा, इसका अंदाजा लगाना अब मुश्किल है. पर शाम साढ़े नौ बजे जब वह अपने पति से वहां मिलीं, तो वह आश्चर्य में पड़ गईं. सरकारी रेस्ट हाउस के हॉस्टल नुमा कमरे में कई दोस्त भी साथ थे.

सिर्फ इतना कहा- अरे, आ ही तो रहा था. तुम इतना परेशान क्यों हो गई.
फ्लिकर फोटो : केंऑफ़सीटल

Friday, October 3, 2008

LOVE STORY 495: सबसे महानतम कवियित्री की खुदकुशी के बाद उसकी मां को भेजा गया उसके पति का ख़त


सिल्विया प्लाथ (1932- 1963) अमेरिका और दुनिया की सबसे मजबूत और गहरी स्त्री आवाजों में से शायद सबसे महत्वपूर्ण हैं. उनके पति टेड ह्यूज (1930-1998) के ख़त हाल ही में किताब बनकर आए हैं. ये ख़त सिल्विया की आत्म हत्या के बाद टेड ने अपनी सास को लिखा है.

(प्लाथ के हाथ की लिखी हुयी ये कविता )

15 मार्च 1963

टी एस लिली लाइब्रेरी

प्रिय औरेलिया
मेरे लिए इससे पहले ये चिट्ठी लिखना मुमकिन नहीं था. बच्चों की देखभाल के लिए नैनी है और जीन की दोनों बच्चों फ्रीदा और निक से अच्छी बन रही है. निक के साथ तो उसका लगाव काफ़ी है। जितना मुझे अंदाजा था, वह उससे कहीं ज्यादा बेहतर साबित हो रही है। पहले वह थोड़ा संकोच करती थी पर अब वह सहज हो गई है. वह डोरसेट इलाके के किसी कोस्टल गाँव से है और उसमें वह शांत प्रवृत्ति और पक्कापन है, जो खुली जगहों में रहने वाले गैर शहरी लोगों में होता है. निक पहले जैसा ही है. डगमग चलता है और कुछ अजीब से शब्द बोलता है. फ्रीदा अब लंबे वाक्य बोलने लगी है और अब लगातार बात करती रहती है. वह अब पहले से बहुत कम स्वार्थी हैं और शांत होने लगी है. जब घर में मेहमान आते हैं तो उनसे चीजें छीन कर निक के पास ले जाती है. मेरे ख्याल से जीन की तरह शांत इंसान साथ होने में कोई बुराई नहीं है. उसके लिए भी हमें छोड़ना अब काफी दर्दनाक होगा.


मैं इस सदमे से कभी उबार नहीं सकूँगा और न ही मेरी ऐसी कोई मंशा है. सिल्विया ने जो ख़त मेरे मां-बाप को लिखे हैं वे मैंने देखे हैं और मेरा ख्याल है उसने आपको भी ऐसे ही या इससे भी बुरे ख़त लिखे होंगे. हमारी शादी के हालात, असामान्य थे, क्योंकि हम दोनों अपने गहरे मनोवैज्ञानिक विकृतियों के शिकार थे. मतलब यही था कि हम दोनों एक दूसरे को ऐसी हालात में काबू करना चाहते थे, जहाँ से हमारी हर हरक़त और सामान्य सोच भी पागलपन दिखलाई देती. शुरू से आखिर तक शादी को ठीक करने की मेरी कोशिश एक पागलपन थी. जिस तरह से उसने मेरी हरकतों पर अपनी प्रतिक्रिया जताई वह भी एक तरह का पागलपन ही थी- चाहे तलाक़ की जिद, जो उसे चाहिए ही नहीं था, दंभ से भरी नफरत और घृणा और उसी तरह की हरकतें. शायद वह ऐसा इसीलिए कर रही थी, कि अगर मैं उसके पास वापस नहीं गया, तो वह जिंदा नहीं रह पायेगी. सिर्फ़ आखिरी महीने में हम दोस्त हो गए, इतने करीब तो हम पिछले दो साल में कभी भी नहीं थे.

सब कुछ ठीक होने लगा था और हम फ़िर से कुछ अच्छा वक्त साथ बिताने लगे थे. तभी उसके पहले ब्रेक डाउन के बारे में उसकी किताब आई और यकायक पचासों अलग अलग बातें उसके ख़िलाफ़ खड़ी हो गयीं, वह उत्तेजित होने लगी, मुझसे भीख मांगने लगी कि मैं कहीं और चला जाऊँ क्योंकि उसे गवारा नहीं था हम एक ही शहर में रहें, मेरी मौजूदगी उसकी आज़ादी को कमज़ोर कर रही थी वगैरह.. फिर यकायक भारी सीडेटिव्स और फ़िर ये. अगर main उसके साथ संघर्ष में इस कदर अँधा और फंसा हुआ न होता तो कितनी आसानी से ये सब देख सकता! और मैं उस मुकाम तक पहुँच गया था, जहाँ से मुझे लगता था कि हम अपनी शादी को बचा सकते हैं. वह तलाक़ की जिद छोड़ने को तैयार हो गई थी. उस वीकएंड मैंने अगले पखवाड़े के सारे अपोइन्टमेंट कैंसल कर दिए थे. मैं उसे सोमवार को बुलाने वाला था छुट्टी पर किसी ऐसे बीच पर जाने के लिए, जहाँ अभी तक हम नहीं गए थे. सोचिये मेरे लिए भी ये सब कैसा रहा होगा.

हम पूरी तरह से अंधे, हम दोनों दम्भी, बेवकूफ और तनावग्रस्त थे. हमारे अभिमान ने हमें एकदम अपारदर्शी बना दिया था, खास तौर पर उसे. मुझे पता था सिल्विया ऐसी ही बनी थी... कि अपने सबसे प्यारे लोगों को सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाली, पर हर कोई थोड़ा बहुत ऐसा ही होता है और मुझे उसकी इस बात से निपटने के लिए थोड़ा दिमाग से काम लेना चाहिए था.

सतह पर हमारे रिश्ते वैसे ही थे जैसे अलग हो रहे सामान्य जोडों के होते हैं, दरअसल उनसे बेहतर भी क्योंकि उसके पास पैसे थे, नाम था, भविष्य कि योजनायें थीं और दोस्त थे. पर शायद इन्ही वजहों से हमारे बीच समझौता टलता रहा.
मैं नहीं चाहता मुझे माफ़ कर दिया जाए. मेरा मतलब यह नहीं कि मैं उदासी और पश्चाताप कि कोई सार्वजनिक मूरत बन जाऊँ, मैं इसके बिल्कुल ठीक उल्टा बनूँगा. पर अगर कहीं अमरत्व है, तो वहां मैं सबसे मुश्किल में रहूँगा. सिल्विया सबसे महानतम और सबसे सच्ची आत्माओं में से एक थी और अपने आखिरी महीनों में वह एक महान कवि बन चुकी थी और एमिली डीकिनसन के अलावा किसी और स्त्री कवि से उसकी तुलना भी नहीं की जा सकती और कोई भी जीवित अमेरिकी तो इस लायक ही नहीं.

तो अब मैं फ्रीदा और निक की देख भाल करूँगा और आप उसके लिए कतई फिक्रमंद न हों. जितना ज्यादा हो सकेगा मैं उनके बारे में लिखता रहूँगा. फ्रीदा अभी स्कूल गई हुयी है - वह सुबह उठते ही स्कूल जाने का शोर मचाने लगती है, और वहां वह काफी अच्छे से घुल मिल रही है. उसके दो पक्के दोस्त भी बन गए हैं. जीन इस वक्त निक को सुला रही है. नैनी सारा काम करती है और हफ्ते के सिर्फ़ 6 पाउंड लेती है. हफ्ते में डेढ़ दिन वह छुट्टी करती है.

मैं नहीं जानता था इस ख़त को कैसे शुरू करुँ और अब ये समझ नहीं आ रहा कि ख़त्म कैसे करुँ। मैं फिर लिखूंगा आपको अपने आगे के प्लान बताने के लिए.


प्यार

टेड


LOVE STORY # 496: पतंग की तरह खुशी जब आसमान नापती है, तो लगता नहीं कि कभी खत्म होगी

कई बार उदासी कुछ इस तरह से दबोच लेती है, लगता है अबकी बार नहीं जाने वाली. पर मौसम बदलता है. बादल छंटते हैं. रौशनी होती है. पसीने के साथ बुख़ार उतरने के बाद लौटते स्वाद की तरह हवा का हल्का सा झोंका पहले हल्के से छूता है, फिर जोरों से झटका देकर बैठे हुए मन को उठा ले जाता है, एक नई खुशी में. एक पतंग की तरह खुशी आसमान को इस तरह और इस कदर नापती है, कि उतरने का नाम नहीं लेती. अब कल खेलना- मांए बुलाती है बच्चों को मैदानों से अंधेरा होने से जरा ही पहले. पर पतंग की तरह बच्चे आखिरी बार- एक और बार – खुशी की एक और बाजी खेलते हैं. न खत्म होने वाले आसमान में. एक ज़िंदा पल की शिद्दत के साथ. बिना किसी अगली इच्छा. बिना किसी पिछले पछतावे के. स्मृति और उम्मीदों से शाप मुक्त. और लगता है कि ऐसे जिया भी जा सकता है.
पर ऐसा भी कहां होता है.