मुंबई में जब वह धमाकों के बीच भाग रही थी, उसका चेहरा पीछे छूट चुका था.उसमें कोई भाव नहीं थे. दहशत हर जगह थी. सड़क पर. होटलों में. सड़क पर गश्त करती पुलिस जिप्सी के टोही दलों के चेहरों पर. मुंबई में उसे सब कुछ दिया था. बान्द्रा में बंगला. सुपर स्टार का दर्जा. 100 करोड़ के देश में पच्चीस साल से ज्यादा तक जिस आदमी को लोग भगवान समझ रहे थे, उसका प्यार. उनके प्यार पर फ़िल्म तक बनी थी. लोग कहते थे कि उसकी घड़ी उलटी घूम रही है. जब वह मुंबई आई थी, तब वह बहुत ही बौड़म, भौंडी, बेतरतीब और एक हद तक बचकानी भी थी. पर अब वह सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं, गरिमा और लावण्य की प्रतीक भी बन गई थी. मुंबई ने उसे एक्टिंग सिखाई और भीड़ से एक अलग दर्जा दिया. पर उस दिन जब वह ताज होटल से अपने घर जाने के लिए निकली तो कार का ड्राईवर आवाज़ देने पर भी नहीं आया. शायद वह जान बचाकर भाग गया था. फ़ोन लगा नहीं. उसे लगा कि वह सड़क से टैक्सी ले लेगी. दूर तक टैक्सी नहीं थी. जो थी, वे तेजी से निकल रही थी. उसके लिए कोई रुक नहीं रहा था. उसे पहली बार लगा वह अकेली है. उसका चेहरा न कोई देख पा रहा था, न पढ़. उसने अपने पर्स से छोटा आईना निकाल कर देखा, तो दंग रह गई. उसका चेहरा गायब हो चुका था. उसे लगा ये उसी दहशत का हिस्सा है, जिसके कारण उसकी पुरानी फिल्मों के जोडीदार हीरो को उस रात मुंबई में भरी पिस्तौल के साथ सोना पड़ा था. उसे मुजाहिदीन हो चले वक्त में वह खोखली जगह याद आई, जो बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएँ उड़ाने के बाद रह गई थीं. उसे समझ में नहीं आया कि वह उस शाम मुंबई में अपना चेहरा ढूंढें या फिर जान बचाकर उसी तरह भागे जैसा भरी पिस्तौल के साथ सोना होता है.
Sunday, November 30, 2008
LOVE STORY # 474: मुंबई की मुजाहिदीन शाम में उसे बामियान बुद्ध को उड़ाने के बाद की खाली जगह याद आई
मुंबई में जब वह धमाकों के बीच भाग रही थी, उसका चेहरा पीछे छूट चुका था.उसमें कोई भाव नहीं थे. दहशत हर जगह थी. सड़क पर. होटलों में. सड़क पर गश्त करती पुलिस जिप्सी के टोही दलों के चेहरों पर. मुंबई में उसे सब कुछ दिया था. बान्द्रा में बंगला. सुपर स्टार का दर्जा. 100 करोड़ के देश में पच्चीस साल से ज्यादा तक जिस आदमी को लोग भगवान समझ रहे थे, उसका प्यार. उनके प्यार पर फ़िल्म तक बनी थी. लोग कहते थे कि उसकी घड़ी उलटी घूम रही है. जब वह मुंबई आई थी, तब वह बहुत ही बौड़म, भौंडी, बेतरतीब और एक हद तक बचकानी भी थी. पर अब वह सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं, गरिमा और लावण्य की प्रतीक भी बन गई थी. मुंबई ने उसे एक्टिंग सिखाई और भीड़ से एक अलग दर्जा दिया. पर उस दिन जब वह ताज होटल से अपने घर जाने के लिए निकली तो कार का ड्राईवर आवाज़ देने पर भी नहीं आया. शायद वह जान बचाकर भाग गया था. फ़ोन लगा नहीं. उसे लगा कि वह सड़क से टैक्सी ले लेगी. दूर तक टैक्सी नहीं थी. जो थी, वे तेजी से निकल रही थी. उसके लिए कोई रुक नहीं रहा था. उसे पहली बार लगा वह अकेली है. उसका चेहरा न कोई देख पा रहा था, न पढ़. उसने अपने पर्स से छोटा आईना निकाल कर देखा, तो दंग रह गई. उसका चेहरा गायब हो चुका था. उसे लगा ये उसी दहशत का हिस्सा है, जिसके कारण उसकी पुरानी फिल्मों के जोडीदार हीरो को उस रात मुंबई में भरी पिस्तौल के साथ सोना पड़ा था. उसे मुजाहिदीन हो चले वक्त में वह खोखली जगह याद आई, जो बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएँ उड़ाने के बाद रह गई थीं. उसे समझ में नहीं आया कि वह उस शाम मुंबई में अपना चेहरा ढूंढें या फिर जान बचाकर उसी तरह भागे जैसा भरी पिस्तौल के साथ सोना होता है.
Tuesday, November 18, 2008
LOVE STORY # 475: पेंटिंग पूरी होने का पता उसे वैसे ही चलता है जैसे प्यार करने के पूरा होने का

जैक्सन पॉलक: आप कैसे जान लेते है प्यार करना कब पूरा हो गया?
(सोनी पिक्स पर सोमवार रात फ़िल्म पॉलक देखने के बाद)
हम अपनी मनुष्यता में अकेले हैं. वह एक अरण्य है. बेतरतीब और कुदरती. अरण्य की तरफ़ जाने वाले पहले कदम रोमांच के होते हैं, फिर सैलानियों के, फिर कारोबारियों के. कई बार ये कदम एक ही आदमी के हो सकते हैं. पहले जंगल पटवारियों के नक्शे से बाहर अपरिमित होता है, फिर धीरे से एक पगडण्डी बनती है, फिर सड़क, फिर कांटो की बाड़ में जंगल क़ैद होने लगता है, और मनुष्यता बेदखल. मनुष्यता के जंगल ने यकीन करना पहले सीखा है. शक करना बाद में. यकीन के शक में बदलने की विकासशील प्रक्रिया पूरी होने में देर लगती है. जितनी एक आदिवासी को कारोबारी होने में.
जंगल फिर खुदकुशी क्यों कर लेता है, सभ्य समाज शाम के कारोबार को समेटता हुआ सवाल नहीं करता, सिर्फ़ मुस्कुराता है.
LOVE STORY # 476: कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है. सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ.

यहां आओ और बैठ जाओ, बेटे.
वह अपने पिता के पास बैठ गया. वे सोने जा रहे थे. मां पास में बैठी है.
‘तुम इतनी स्मोकिंग क्यों कर रहे हो’, उन्होंने पूछा.
बहुत सारी घनी चुप्पी. छुए जा सकने वाले कुहासे की तरह. नवम्बर का महीना.
‘पापा वह मर रही है’, उसने कहा.
‘पर तुम?’
फिर बहुत सारी चुप्पी. घना होता कुहासा.
'तुम तो अपना ख्याल रखो.'
'पापा, उसने तो कुछ नहीं किया ऐसा, फिर भी हो गया न कैंसर उसे!'
कुहासा एक दम छंटने लगा. वह उठा और बाहर फिर. एक और सिगरेट.
एक लंबी मियाद बीत चुकी है. पिता अब नहीं हैं. वह मर चुकी है. सिगरेट छोड़े उसे पांच साल हो चुके हैं. पर सपने में याद लौटती है. एक पिता पूछता है, तुम सिगरेट क्यों पी रहे हो?
सपने में वह सफाई देता है. सपने में जो याद की फाइल है, जिंदगी से अलग है. कोई एक जगह छूटी रह गई है, जहां वह मर रही है, वह सिगरेट पी रहा है, उसका पिता परेशानी को एक खामोश गुस्से की शक्ल देता पूछता है. जो जिंदगी में नहीं है, यादों में दफन है. जो यादों में दफन है, वह सपनों में लौटता है. कुहासे में गड्डमड्ड सपने की याद में वह एक सिगरेट जलाता है। सपने के कुहासे में धुंआ छोड़ता हुआ.
photo: cigarette by lanier/ flickr
Sunday, November 16, 2008
LOVE STORY # 477: नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें और तुम भी उन्हें पुकार सको

नाम दो उन बिल्ली के बच्चों को कि वे डरना भूल सकें. और ठिठकने का संकोच भी. ताकि वे आ सके तुम्हारे पास बिना दबे पांव भी. ताकि वे भूखे हों तो तुम्हारे पास आ कर भूखी म्याऊं कर सकें. कि वे आएं तुम्हारे पास और तुम्हारे पांवों से खुद को रगड़ते हुए वहीं कहीं पसर सकें. तुम्हारा मिज़ाज ताड़ने की अन्यमनस्कता से मुक्त हो सकें. कार के टायर के नीचे छिपने की जरूरत तभी पड़ें जब धूप बहुत हो, तुम्हारी नज़रों से बचने के लिए नहीं. नाम दो उन्हें कि वे आ सकें तुम्हारे करीब बिना सोचे अपनी हरी बिल्ली आंखों से झांकते अपनी बिल्ली खुशियों औऱ बिल्ली अरमानों के साथ. नाम दो कि वे डरना भूल सकें. कि वे दौड़ते हुए आ सकें, तुम्हारे फर्श पर फिसलकर, तुम्हारे कदमों से लिपटते हुए. नाम दो कि वे सुन सकें तुम्हें. और तुम उन्हें पुकार सको.
नाम दो उस खुशी को जो उस फूल की तरह तुम्हारे बगीचे में उग आई, जिसका किसी को इंतजार नहीं था, तुम्हें, मौसम को, न मुहुरत, न क्यारी को... पर वह उग आया सारे अंदाजों को चौंकाता हुआ.
नाम दो उस हक को, जिसने कमा लिया तुम्हें. बिना ख़बर दिये भी.
नाम.
दो.
Friday, November 14, 2008
बहुमत की लठैती वाले लोकतंत्र में आस्थाएं मरी जा रही हैं आहत होने के लिए

इस तरह के चरित्र प्रमाणपत्र योगा मास्टर रामदेव भी दे रहे हैं, जिनकी चमत्कारी और शुद्ध और मंहगी आयुर्वेदिक औषधियों में इंसानी हड्डियों के होने का आरोप लगा था, जिसका खंडन तो उन्होंने किया था, पर ऐसी कोई कैमिकल एनालिसिस रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई. एक हिमानी सावरकर हैं, जो खुद को वीर सावरकर के भाई की बहू बताती है, जो साध्वी और दूसरे आरोपियों के लिए कानूनी मदद जुटा रही हैं. वे ये नहीं बताती कि वे नाथूराम गोड़से की भतीजी और गांधी हत्या के दूसरे आरोपी गोपाल गोड़से की बेटी भी हैं. हिमानी सावरकर जिस अभिनव भारत की कल्पना को साकार करने में लगी हैं, राजनाथ सिंह उसकी तस्वीर का हिस्सा हैं. आडवाणी जी की मज़बूरी है कि प्रधानमंत्री बनने का उनके पास ये आखिरी मौका है. इसलिए अब वे पार्टी निर्माण, और राष्ट्र निर्माण जैसी बेकार की बातों में समय न गंवाते हुए सिर्फ पीएम की कुर्सी की तरफ फोकस कर रहे हैं. उन्होंने अपनी एक हिंदी वेबसाइट भी शुरू की है, जिसमें उस भाषा को लेकर उनका प्रेम छलकता है, जिसे वे अपने जबड़ों से चबाते हुए कहते हैं. हिंदी वह जुबान है, जिसे जबड़ों से चबाते हुए आडवाणी और उनके चपाटियों ने नफरत फैलाई है. (अगर वे देवभाषा संस्कृत में अपनी नफरत पेलते, तो शायद इस नागरिक समाज का इतना बुरा न होता, जितना आज है.) उनकी जिंदगी एक नाखुश आदमी के संघर्ष में निकली है. उन्होंने पार्टी को किस गर्त से किन ऊंचाइयों तक पंहुचाया. त्याग किया. बलिदान किया. तकलीफ सहीं. अरमानों पर पत्थर रखे. और अब जब लास्ट चांस है, तो चांस कैसे लिया जा सकता है.
मुंबई में राज ठाकरे की आस्था आहत है और कांग्रेस सरकार अपनी टांगों में दुम दिये बैठी है. 93 साल का मकबूल फिदा हुसैन अदालत के फैसले के बाद भी हिंदुस्तान नहीं लौट रहे, क्योंकि उसे बाल ठाकरे की गारंटी चाहिये, आडवाणी का क्षमादान (देखिये आइंदा हमारी देवियों को बिना ब्रा-पैंटी- ब्लाउज- साड़ी के आप पेंट नहीं करेंगे... अदालतें जो भी कह रही हों, आपको पता है न हम आपका क्या हाल कर देंगे मकबूल जी) चाहिए, राज ठाकरे का प्रोटेक्शन चाहिए. 93 साल का एक बूढ़ा भारतीय जो पद्मविभूषण है, वह उन हिंदू आस्थाओं का दुश्मन है, जो इस्लामिक जेहादियों के तेवर अपना चुकी हैं. अगर मकबूल फिदा हुसैन हिंदू देवी देवताओं को नंगा दिखाकर असम्मान करते हैं, तो खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों और अजंता के चित्रों को यह देश अपने विरासत में क्यों गिन रहा है. वे कामसूत्र और वात्साययन पर शर्मिंदा क्यों नहीं हैं और उनपर प्रतिबंध क्यों नहीं लगातीं. करोड़ों हिंदू औरतें सांपों के बीच शिव के लिंग को दूध चढ़ा रहीं है एक अच्छे से पति के लिए, पर इसमें कोई असम्मान, अश्लीलता का सवाल नहीं है. (अच्छा पति नहीं मिलने पर भी उनकी आस्था आहत नहीं होती..) वे ताज़ महल को हिंदू मंदिर बताने वाले थ्योरिस्ट की बात को मानते हुए वहां भजन कीर्तन और शाखा क्यों नहीं शुरू करवा देती. यह देश तस्लीमा नसरीन को सुरक्षा, शरण, घर सब दे सकता है, मकबूल फिदा हुसैन को नहीं. तस्लीमा की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा भी जरूरी है, पर हुसैन को ठीक करना जरूरी है.
सिलेक्टिव आस्थाओं का दौर है. और आस्थाएं आहत होने के लिए कमबख्त मरी जा रही है. और आस्था किसी भी बात से आहत हो सकती है. बहुसंख्य की आस्था लठैती हो गई है. लोकतंत्र में बहुमत मायने रखता है. लोकतंत्र में अल्पमत मायने नहीं रखता, ये नई सीख है. और वह सब पर लागू होती है. चाहे वह सरहद को बचाने वाला हो, या फिर कोई और. अगर हिंदू नहीं है, तो मर सकता है. कई बार जान बूझ कर, कई बार गलती से, कई बार तैश में, कई बार आस्थाएं आहत होने पर, कई बार सिर्फ इसलिए कि एक ईसाई नन या बिलकीस बानो का बलात्कार करने से हिंदूत्व का झंडा थोड़ा और ऊंचा हो जाता है. इस ऊंचे झंडे के बूते आडवाणी और उनके लोग इस मुल्क पर राज करना चाहते हैं. एक बार और. बस एक बार. उनमें ऐसा क्या खास है, जो मुझमें नहीं.
जब ये सब हो रहा होता है, तो नवीन पटनायक और विलास राव देशमुख और डॉ मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल जो बोलते हैं उसमें से बेचारगी की ऐसी आवाज़ निकलती है- चूंचूंचूंचूंचूं.. कहीं ऐसा न हो कि जो मुंह में दही जमाकर बैठे हों, उसमें ख़ल़ल पड़ जाए. जैसे सरकार चलाने की जगह उन्हें भंडैती करने का जनादेश मिला हो. वे पता नहीं किस ख़ौफ में सबकी नाफरमानी कर रहे हैं- संविधान की, जनादेश की, अदालतों की, इंसानियत के तकाजे की. लोग तो ये शरीफ लगते हैं, पर वे हमेशा कम्प्रोमाइजिंग पोजिशन में क्यों पाये जाते हैं. इन शरीफ और पनीले लोगों के कारण समाज में शराफत से रहना ही मुश्किल हो गया है.
लोकतंत्र, संविधान, गणतंत्र, मानव अधिकार खुशी से तेल लेने जा सकते हैं.
Thursday, November 13, 2008
LOVE STORY # 478: जब वह लौट कर उस तक पंहुचा तो एकबारगी लगा वह जा चुकी है

(एक दोस्त ने ये कहानी भेजी है. नाम न बताने की हिदायत के साथ)
वह बहुत दिनों से पार्क में बैठा था. घड़ी देखी. शाम के सात बज रहे थे, पर सूरज डूबा नहीं था. बल्कि चमक रहा था जैसे दोपहर अभी ढली न हो. यूरोप में ये गर्मियों का मौसम था. वीकेंड था इसलिए पार्क में भीड़ थी. हर कोई सूरज को जितना हो सके, सोख लेना चाहता था. जोड़े बाहों में बाहें डाले घूमते हुए जोड़े उसे और भी अकेला बना रहे थे.
न तो वह पहली बार विदेश आया था, न पहली बार अकेला था. वह आता था अक्सर और अकेला ही. बारह साल की उम्र में उसके मां-बाप एक हादसे में चल बसे थे और उसके चाचा उसे अपने पास लंदन ले आये थे. वह वहीं पढ़ा एलएसई में, और पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद उसे हिंदुस्तान में ही एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई. पर यूरोप उसके ज़हन में हमेशा रहा. वह बार बार यहां लौटता. रोम की संकरी गलियों या लंदन के चौड़े रास्तों या मेपल के पत्तों से ढंकी म्यूनिख की सड़कों पर घंटों टहलना उसे अच्छा लगता. पर इस बार कुछ और बात थी. वह अच्छा नहीं लग रहा था. अज़ीब सी बैचेनी. जब से आया था, यादों से बाहर निकल नहीं पा रहा था. पहले ऐसा कहां हुआ था.
मार्क उसका दोस्त था, जिसके यहां वह ठहरा था, वीकेंड पर बाहर गया हुआ था. वह उस मकान में अकेला था और हरारत से भरा हुआ. और दिन भर बिस्तर पर पड़े रहने के बाद शाम को निकला था पार्क की तरफ. शायद थोड़ा मन बदल जाएगा.
बच्चे वहां खेल रहे थे. एक दिन बाल्कनी में खड़े खड़े उससे उसने पूछा था- जानते हो दुनिया का सबसे मीठा शोर कौन सा होता है.. उसने पूछा था कौन सा.. खेलते हुए बच्चों का शोर
यादें परछाइयों से इस मायनों में अलग होती हैं कि पीछे पड़ जाएं तो रौशनी में आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़तीं. वह बैंच से उठ खड़ा हुआ.
अगर शादी नहीं करनी तो मुझे एक बच्चा ही दे दो. मैं अकेले पाल लूंगी उसे. तुम से कुछ नहीं मांगूगी, किसी और दिन उसी ने कहा था उससे और उसे पता था कि वह सच ही कह रही थी. वह हमेशा सच ही कहेगी. एक बच्चे की जिम्मेदारी डालकर वह आज़ादी से यहां वहां उड़ता फिरे, वह परिंदा होना उसे गवारा नहीं था.
घर आकर फिर बिस्तर पर. बुखार शायद फिर चढ़ रहा था. आंखों में जलन से पता चल जाता है, बुखार का. उसके हाथों की छुअन उसे याद आई. शाम को वह अक्सर उसके घर पर पाया जाता, जहां वे साथ खाना बनाते. प्याज हमेशा वही काटता. वह कहती- तुम्हारी आंखों में प्याज के आंसू भी नहीं आते, जबकि मेरी आंखों मे... उसे याद नहीं मां-बाप के गुजर जाने के बाद वह कब रोया था.
उसकी आंखों में पानी आ रहा था और जलन बढ़ रही थी. वे आंसू नहीं थे. वह उठा और अपने बैग से पैरासिटामोल की गोली निकालकर गटक ली. पानी पिया. फ्रिज से एक चॉकलेट बार निकाला और उसे कुतरते हुए दीवार पर पीठ टिका बिस्तर पर बैठ गया. पांव फैला कर.
डिनर के बाद वह ऐसे ही बैठती और वह उसकी गोद को तकिया बना लेता. वह एक हाथ में रिमोट पकड़े रहती और दूसरे से उसके बालों को सहलाती रहती. वे बातें करते. सैन्सक्स, सब्जी के दाम, बेढंगे रियलिटी शो, नीरज पांडे की फिल्म, स्मृति ईरानी की वापसी, ओबामा का इलेक्शन कैम्पेन..
तीन साल पहले वे मिले थे. वह एक इंटरनेशनल एनजीओ में प्रोग्राम डिरेक्टर थी. चार साल की थी जब मां- बाप का तलाक हो गया था. वह मां के साथ रहती थी और पिता अमेरिका जाकर दूसरी शादी में सैटल हो गये थे. मां को कैंसर हुआ था. फिर वह अकेली हो गई थी. उसे लगा कि न वह उस मकान में अपने अकेलेपन को हैंडल कर पा रही है, न ही उन तमाम रिश्तेदारों को – जो यकायक और अजीब तरह से उसके नजदीक होने की कोशिश कर रहे हैं. उसने अपना तबादला इस अजनबी से शहर में करवा लिया.
वह अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसके दफ्तर मिलने आई थी. और पहले तो वे काम के सिलसिले में मिलते. फिर बिना काम के भी. घर में, कॉफी शॉप में, थियेटर, संगीत सभाओं में. करीब हो गये.
चढ़ते हुए बुखार और तपते हुए माथे पर जोर डालकर उस शाम उसने ये याद करने की कोशिश की कि उनमें प्यार किस पल हुआ.. प्यार ने खुद के इजहार करने का वक्त कौन सा चुना... पर उन्होंने ऐसा कभी किया ही नहीं था. जरूरत ही नहीं महसूस हुई. और बताना क्या था. वे जान चुके थे.
वह बता चुका था कि वह आज़ाद परिंदा है. बंधनों में नहीं जी सकता. वह कहीं एक जगह ठहर नहीं सकता. वह अक्सर वह दूर देशों की यात्राओं, या जंगलों में ट्रेकिंग करने अकेला चला जाता. कभी बताकर नहीं लौटता. अचानक ही लौटता और उसे चौंका देता.
वह लौटता तो सीताराम सीटी बजाने लगता. वह सीताराम को पिंजरे से निकालता और अपने कंधे पर बिठा लेता. सीताराम उसके कंधे को सिंहासन समझता और शान से तब तक बैठा रहता, जब तक उसे उसके पिंजरे के हवाले फिर से नहीं कर दिया जाता. पिछली मकर संक्रांति पर सीताराम बाल्कनी पर उसे जख्मी हालात में गिरा मिला था. पतंग की तांत ने उसके एक पंख को काट दिया था. उसने उसकी मरहम पट्टी की और फिर साथ रख लिया. बिल्ली से बचाने के लिए जरूरी था कि पिंजरे में सीताराम ठीक से बंद हो. पहले तो सीताराम बिल्ली को देखकर डर जाता था, पर फिर उसे भी लगने लगा था कि वह पिजंरे में महफूज है.
इस बार सीताराम को पिंजरे में रख वह जब घर से निकल रहा था तो वह कुछ उदास थी. क्या तुम हमेशा के लिए नहीं ठहर सकते. तुम मेरे बिना कैसे जी लेते हो. क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि जिंदगी का हर पल मेरे साथ बिताओ.
वह हंस दिया था. उसके बालों में उंगलियां फिराते हुए उसने कहा- प्यार के कुछ पल भी काफी होते है.
वह खीज गई थी. उसने गुस्से में कहा- तुम ढूंढोगे मुझे, सन्नाटे और वीरानियों में. मैं नहीं लौटूंगी. तुम खो दोगे मुझे. मै नहीं मिलूंगी. तुम लौटना अपने खालीपन में. खुश रहना इस गैरमौजूदगी में. मैं नहीं लौटूंगी. रहना अपनी खामोशी में.
वह रो रही थी, उसकी कमीज गीली हो रही थी. उसने उसे जोरों से लिपटा लिया था.
बुखार उतर रहा था, ये पता पसीने से चला. उसे लगा वह खुदगर्ज है. और वह लौट जाएगा उसके पास पहले फ्लाइट से. हमेशा के लिए. उसे लगा वह खुद गर्ज है. उसने हमेशा अपनी जरूरतें, अपनी इच्छाएं, मर्जी के बारे में ही सोचा था. आज जब वह लौटना चाहता था, तो भी अपने लिए. कि उसकी तकलीफ को वह अपना बना सके, क्या वह उसके इतने करीब हो पाया था.
एयरपोर्ट से बाहर निकला तो रात हो चुकी थी. हर तरफ पुलिसवाले थे और सिक्योरिटी भी कड़ी थी. टैक्सीवाले ने बताया शनिवार को बम फटे थे. कई मारे गये. सैकड़ों घायल हुए हैं. टैक्सीवाला हैरत में था कि उसे इसके बारे में कुछ पता ही नहीं था. वह बताने लगा बम कहां कहां फटे थे. एक तो वहीं फटा था, उस दफ्तर की बिल्डिंग के सामने जहां वह काम करती थी. वह उसके बारे में सोचने लगा. उसे लगा वह तो दफ्तर से घर आ चुकी होगी. पर फिर याद आया कि आज तो संडे है. वह सीधे उसके घर गया. वहां ताला लगा था. उसके पास चाबी थी. भीतर गया तो अंधेरा था. सीताराम की आवाज़ भी नहीं. उसने बत्ती जलाई. बाल्कनी में गया तो देखा पिंजरा खुला हुआ था और खून की कुछ बूंदे और कुछ पंख बिखरे हुए थे. उसने एक लंबी सांस ली.
वह कमरे में वापस आया. घर खुला देखकर सामने वाला पड़ोसी आया. वह उसका परिचित नहीं था, पर कई बार सीढ़ियों पर उसने देखा था उसे. पड़ोसी ने बताया- हम पुलिस को खबर करने की सोच रहे थे. वह कल सुबह दफ्तर गई थीं और फिर किसी ने देखा नहीं यहां उन्हें.
उसने उसका मोबाइल नंबर लगाया. वह बंद था.
वह फिर बालकनी में आकर खड़ा हो गया. कम्पाउंड वॉल पर बिल्ली अपने पंजे चाट रही थी.
वह लगा उसे चक्कर आ रहा है. बाल्कनी की रेलिंग पकड़ ली उसने. उसने आंखें बंद होने लगीं. सीने में दर्द था. उसे लगा उसके पांवों में ताकत नहीं बची है और वह गिरने वाला है.
तुम कब आये, कुछ ज्यादा ही जल्दी नहीं लौट आये इस बार
उसने मुड़कर देखा. वह थी. सात- आठ साल के एक लड़के के साथ. उसके सर पर पट्टी बंधी थी.
बम फटने के तुरंत बाद मुझे यह सड़क पर रोता हुआ मिला. किसी गांव से यहां आया था, अपने पिता के साथ. वह बहुत जख्मी हैं...ये काफी डरा हुआ था..
वह बताती रही.
वह अब कुछ सुन नहीं रहा था. उसकी आंखों में आंसू थे और उसकी शक्ल धुंधला रही थी..
photo: flickrohit
Saturday, November 8, 2008
LOVE STORY # 479: उनके सपने आपस में बात करने लगे थे

एक दिन वे इतने करीब हो गये कि एक दूसरे के सपनों में भी आने और जाने लगे. जब उसे सपने में कोई पीट रहा था, तो सपने की सुरंग से सपने में ही जाकर उसने उसे बचाने की कोशिश की. जब उसके सपने में रेलगाड़ी पटरी से उतर कर एक मोटी दीवार से जा टकराने वाली ही थी, तब वह दौड़ी, अपने सपने की सुरंग से उसके सपने में और जाकर जंजीर खींच दी. सपने में कई बार यादें वक्त़ के फर्श से उखड़ कर आने लगतीं. कई बार ये भी काफी होता कि दोनों के सपनों के बीच सुरंग है, एक चोर रास्ते की तरह दोनों के रहस्य, दोनों का अचेतन आपस में बात कर सकते हैं.. सच में जो मुमकिन नहीं था, उसका खतरा सपने में था, पर अब सपना पसीने से भीगते हुए एक बिना दरवाजे वाले सिनेमाघर में नहीं देखा जा रहा था, बल्कि सपने में अगर परेशानी थी, तो आवाज़ लगाकर दूसरे सपने से मदद आ सकती थी.
ये अपने आपमें एक बड़ी राहत की सांस थी. वे अब ठीक से सो सकते थे. अनिद्रा और दुःस्वप्नों से बाहर. वे सपनों में अकेले नहीं रहे.
फोटोः द ड्रीम ऑफ प्रोमथ्यूस - प्रेन्सियेरो /फ्लिकर से
LOVE STORY # 480: वह नेहरू प्लेस कल जाएगी. वह आज के लिए थक चुकी है

वह उस इस्तेमाल किये जा चुके नये प्रिंटर को देख चुकी है. उसके तार नहीं मिल रहे हैं. प्रिंटर के अंदर धूल और मकड़ी के जाले हैं. ये मशीन भी उसी कतार में शामिल होने वाली है, जिसके लिए मरम्मत वाला चाहिए. ये कतार जो तीन साल शुरू हुई थी. मशीन में कोई खराबी है, ऐसा कहना सही नहीं होगा, पर वह काम कब करेगा, कैसे कहा जा सकता है.
वह उसके लेख का अनुवाद करती रही है- जिसका प्रिंट आउट लिया जाना है और प्रकाशन के लिए भेजा जाना है और जिसे प्रकाशक ने दुबारा लिखे जाने को कहा है.
उसने देखा है अपनी मां को खान मार्केट के चक्कर खाते हुए उस जर्मन कार के पुर्जे ढूंढने के लिए जो उसके पिता को पसंद है. एक दिन जरूर उस कार की एंटीक वैल्यू होगी. तब तक नाती-पोते भी खप चुके होंगे.
अब वह नेहरू प्लेस कल जाएगी. वह आज के लिए थक चुकी है.
फोटो: जेफ़ यंगस्त्रोम
LOVE STORY # 481: शादी बचाने के लिए 43 की उम्र में मां बनने का फैसला किया

वह लव मैरिज थी. जीना बिलकुल बेतरतीब था. एक बेटा है. खुद को और बच्चे को बचाने के लिए जरूरी था, शादी को तोड़ना. एक दिन वह निकल आई.
फिर बहुत साल ऐसे ही निकल गये. सबने बहुत जोर दिया और उसे भी लगा कि कब तक अपने बूढ़े होते मां बाप के भरोसे और नौकरी करते जीती रहेगी.
एक शरीफ सा उम्रदराज आदमी मिला, शादी कर ली. पर सब कुछ वैसा का वैसा तो नहीं ही होता, जैसा हमारे अरमान सोचते हों. भले शरीफ आदमी ही क्यों न हो.
एक दिन उसने फोन किया- मेरी शादी टूट रही है.
शादी बचाने के लिए उसने 43 की उम्र में मां बनने का फैसला किया.



