दिल्ली में कुहरे के कई दिनों के बाद धूप निकली थी. वे तीनों एक ही साथ पढ़ती थी और एक ही दफ्तर में काम करती थीं. जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच वे तीनों अपनी दफ्तरी कुर्सियां धूप में ले आतीं और दोपहर के खाने के वक्त बैठकर उस वक्त की बातें करती, जो बीत चुका है. वे चढ़ती हुई चर्बी, ढीली होती त्वचा, डी ऑडरेंट की गंध और मध्य वर्गीय ऊब के बीच टीवी सीरियल्स की बातें करती और कई बार लंच आवर कुछ ज्यादा चलता, और टीवी की बातें खत्म हो जातीं और फिर भी बात करने का बहुत सा मन उनका रह जाता, तो तीनों अपने अतीत के उस मुहाने तक जातीं, जहां से वह साझा होना शुरू हुआ था.
बातें यहां वहां होते हुए उनके क्लास के लड़कों पर घूमने लगतीं.
जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच उनकी आंखों से उन लड़कों के बारे में एक तुरत फुरत का ओपिनियन पोल पढ़ा जा सकता था. वे अपने मजाक याद करतीं. वे बतातीं कौन किस पर किस कदर मरता था. कौन भला था और कौन धोखेबाज़. कौन कविताएं लिखता था और कौन अच्छे सा प्रेमपत्र.
वे लंच के बाद ड्यूटी पर फिर लौट आतीं. बाहर धूप कुछ और देर खिली रहती.
Monday, January 5, 2009
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4 comments:
:-)
बाहर खिली धूप मार्मिक है।
बहुत प्यार है जी आपका ये लेख
दिल को छूने वाली धूप और ये इनका लंच ब्रेक
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