सब पूछ रहे थे उसके पति का हालचाल. वह बंबई के उस होटल में कामकाज के सिलसिले में गये हुए थे, जहां उस शाम गोलियां दनदनाते आतंकवादी घूमते देखे जा रहे थे. वह टीवी से चिपक कर बैठी हुई थी. फोन पर वह लोगों को यही कहती कि उसे उम्मीद है सब ठीक हो जाएगा.. पर वह डर भी रही थी.. टीवी चैनलों पर बैठे लोग तरह तरह के कयास लगा रहे थे, इस खतरनाक वारदात की संजीदगी को लेकर, उसमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या को लेकर.. चौबीस घंटे बाद भी कोई खबर नहीं थी..
48 घंटे बाद जब आतंकवादी मार गिराये गये, तब तक ये भी साफ होने लगा कि उन्होंने जानमाल का कितना नुक्सान किया है.
टीवी चैनल के नीचे पट्टी पर उस होटल के उन मेहमानों के नाम आ रहे थे, जिन्हें आतंकवादियों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था.
फेहरिस्त में सातवां नाम उसके पति का था.
आठवां खुद उसका.
वह टेलीविजन पर अपनी मौत की ख़बर खुद पढ़ रही थी. और आंसुओं से लबालब होती आंखों के बीच यह सोच रही थी कि अपने ज़िंदा होने की सफाई में वह क्या कहेगी.
Sunday, January 4, 2009
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4 comments:
स्वागत है आपका, नए साल की मंगलाएं।
इतनी बेरहमी से तो प्यार की कहानी मत सुनाईये... कि प्यार पर ही शक होने लगे...
आपकी इन कहानियों में कोई छुपा रहता है...... यह कौन है पता नहीं
:-|
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