Monday, February 23, 2009

मीडिया के मारेः नौकरियां फिर आएंगी पर..

( रविवार डॉट कॉम पर २३ फरवरी को प्रकाशित लेख)

जब अनापशनाप भर्तियों का दौर था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि छंटनी का वक्त कैसा होगा? कोई नहीं सोचता. पर सिर्फ नहीं सोचने से आप उसे टाल नहीं सकते. मीडिया का धंधा ही परजीवी है. अगर बाज़ार अच्छा चलेगा, तभी विज्ञापन आएंगे, अगर नहीं चलेगा, तो नहीं आएंगे.
अब जब छंटनी का वक्त है, तो यकायक बाज़ारवाद बुरा हो गया है. बाजार वाद को बुरा कहने से कोई समाधान निकलने वाला है, ऐसा भी नहीं है. कोई भी धंधा मुनाफे के सिद्धांत पर चलता है, और पत्रकारिता के पेशे में आने वाले वे लोग जो खुद को प्रोफेशनल कहते हैं यहां न खैरात खाने आए थे, न खैरात बांटने. उनका काम ऐसा कुछ करना था, कि जिस पन्ने, रिपोर्टिंग बीट, जिस प्रोग्राम को वे अंजाम दे रहे हों, उसपर पाठक या दर्शक का ध्यान जाता हो, और एकबारगी वह वहां ठिठक जाए, ताकि वहां पर विज्ञापन आ सके, और विज्ञापनदाता को ग्राहक मिल सके, और मीडिया के उस पन्ने या प्रोग्राम को मुनाफा और इस पत्रकार को इंक्रीमेंट या तरक्की. एक सफल बिजनेस मॉडल में ये पारस्परिक निर्भरताएं अंतरनिहित थीं. और एक का असर दूसरे पर पड़ना लाजिमी था. नौकरी से निकाले जाने की किसी को खुशी नहीं होती, पर 2009 में हम सातवें दशक के समाजवाद की अगर दुहाई देंगे, तो वह न समाज, न उद्योग और न समय के साथ इंसाफ होगा. हम सुख के वक्त अमेरिका और दुख के वक्त सोवियत संघ नहीं हो सकते. अब विज्ञापन वैसे नहीं हैं, जैसे पहले थे. अखबारों में पन्ने कम हो रहे हैं. उनका मुनाफा भी कम हो रहा है. लोग भी जाहिर है कम होंगे. तरक्कियां और इंक्रीमेंट- बोनस पर भी असर पड़ेगा. हम जिस अर्थ व्यवस्था के हिस्से हैं वह बहुत सारे अनुमानों पर चलते हुए बहुत तेज़ी से विस्तार कर रही थी, क्योंकि आगे बढ़ने का यही सही रास्ता समझा जा रहा था कि तेज़ चलो. वे अनुमान गलत निकल रहे हैं तो नजला सिर्फ पत्रकारों पर ही नहीं झड़ रहा है. इंडस्ट्री पर हर तरफ पड़ रहा है. विज्ञापन लाने वाले पर, जगह बेचने वाले पर, मुनाफे पर, रिकवरी पर. इतनी बड़ी और व्यापक तस्वीर को सिर्फ पत्रकारों के खिलाफ साजिश और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले की तरह पेश किया जाना सही नहीं है कामरेड. अब जब बहुत सारी नौकरियां जाने की बात हो रही हैं, तो ये सवाल करना बुरा तो है, पर ज्यादती नहीं कि उत्कृष्ठ पत्रकारिता की ऐसी कौन सी मिसालें कायम हो रहीं थीं, जिनके न रहने का समाज को अफसोस होने वाला है. जिन लोगों को निकाला जा रहा है, उन्हें हम पत्रकारों की बिरादरी तो मिस करेगी, पर क्या यह समय, समाज, उद्योग भी मिस करेगा. अगर हां तो फिर सचमुच यह त्रासदी है. पर किसी पत्रकार के नौकरी से निकाले जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना, किसी कार फैक्ट्री या बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी से निकाले गये आदमी से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा मानना मुश्किल है.
समाज मीडिया के जरिये खुद से बात करता है. इस वक्त उसके पास बात करने को बहुत ज्यादा औऱ बहुत अच्छा नहीं है. सबसे दर्दनाक तो बिजनेस के अखबार हैं- जो फुलटाइम स्यापे में लगें हैं. मीडिया की अपनी तकलीफें हो सकती हैं, पर अपनी बात को दिलचस्प तरीके से सामने रखना उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा है. आर्टीकुलेशन का चुनौती हमेशा है, अभी और भी ज्यादा, जहां बदलते हुए वक़्त को, उसकी जटिलताओं को सिर्फ कुछ नौकरियों के आने – जाने से देखना एक तरह का सरलीकरण है.
ये समय दिलचस्प है क्योंकि वे सारे लोग जो उथलपुथल का हिस्सा हैं, अगर वे सचमुच सूझबूझ से भरे लोग हैं, तो वे कोई रास्ता जरूर निकालेंगे. अगर वे सचमुच अपने अपने मीडिया में ऐसी प्रॉपर्टीज खड़ी कर रहे होते, जिनपर लोगों का ध्यान जाता, तो शायद नौकरी जाने के आसार अपने आप ही कम हो जाते. जिन्हें नौकरियों से निकाला गया और जो इस वक्त कतार में हैं- क्या उन्होंने उत्कृष्ठ पत्रकारिता का कोई उदाहरण पेश किया. इस सारे स्यापे के बीच कि नौकरियां जा रही हैं, क्या आइने में झांककर ये नहीं देखा जाना चाहिए कि जब वक्त अच्छा था तब क्या हो सकता था. हम अपने आसपास ऐसा क्या खास देख रहे हैं कि कुछ लोगों के नौकरी पर नहीं रहने से नहीं दिखलाई देगा.
प्रिंट हो या टेलीविजन- बकौल श्रीकांत वर्मा- कोंसल में विचारों की बहुत कमी है. अच्छी और पेशेवर पत्रकारिता की जरूरत एक संक्रांत समय में समाज को और भी ज्यादा होगी. जिनके पास सूझबूझ होगी, जिनके पास विचार होंगे, उनकी जरूरत समाज को भी होगी और मीडिया उद्योग को भी. दिक्कत उस मनोदशा की बहुत अधिक है, जहां ध्यान काम पर नहीं, नौकरी पर था, जहां हर नौकरी को हमेशा के लिए तयशुदा मान लिया गया था. हम उस दौर में हैं, जो हमारे पिताओं और माताओं की तरह एक जिंदगी में एक नौकरी वाली नियतियों में नहीं है.
एक सवाल इसके ठीक उलट है. जिन लोगों को नौकरी से निकाला गया, क्या वे बेहतर भविष्य, तनख्वाह, बेहतर सुविधाओं के लिए अपनी नौकरी नहीं बदलते. अगर नहीं बदलते, तो आश्चर्य का विषय होता.
पिछले लगभग दो दशकों से मीडिया का चश्मदीद गवाह होने के कारण ये कह सकता हूं कि ये स्यापा हमेशा के लिए नहीं है. दूसरा ये समय एक ऐसी उथलपुथल का है, जहां मोटे तौर पर फिटेस्ट सरवाईव करेंगे. इस नौकरी में नहीं तो, किसी और काम में. टाइपराइटर के प्रति मेरा सम्मान कम नहीं है, पर खुद को अपग्रेड करने की जरूरत हमेशा थी. अब पहले से बहुत ज्यादा.
तीसरा ये कि मीडिया स्कूल के कर्ताधर्ताओं को अपने तौरतरीके बदलने की जरूरत पड़ेगी क्योंकि वे बहुत सारे नौजवानों का समय और उनके मां-बाप का पैसा और दोनों के सपनों से खिलवाड़ कर रहे हैं. वे ऐसी फसल तैयार नहीं कर रहे, जो मीडिया के बहुत काम की हो. मसलन मीडिया स्कूलों में पढ़ रहे बतेरे डिग्री धारकों को जानता हूं, जिन्होंने न तो कोई गंभीर स्तर पर पढ़ाई की है और न ही लिखाई. बहुतों की तो भाषा ही गड़बड़ है. वे क्वार्क एक्सप्रेस चलाने के अलावा बहुत माहिर नहीं लगते. सबसे बुरी बात तो ये है कि वे मीडिया कोर्स करने के कारण ये बहुत तयशुदा मानते हैं कि उन्हें नौकरी मिल ही जाएगी (जबकि मैंने ये पाया कि भाषा, इतिहास या अर्थशास्त्र की पढ़ाई किए हुए लोग अक्सर ज्यादा बेहतर होते हैं, हालांकि मैंने खुद एक मीडिया स्कूल में दाखिला और वहां से डिप्लोमा लिया था. बहुत तयशुदा होकर अब नहीं कह सकता कि वहां पढ़ाई की थी और जो की, वह किसी काम आई) और नौकरी मिल ही जाएगी, तो उन्हें निकाला नहीं जाएगा. ये कमाल का और बहुत खतरनाक दुराग्रह है. इन नौजवानों को अब तक नौकरियां मिलती रहीं तो सिर्फ इसलिए कि मीडिया बहुत तेजी से विस्तार कर रहा था, पर जाहिर है अब ऐसा नहीं होगा. और छंटनी जब होगी, तो उन लोगों के बचने का चांस ज्यादा होगा, जो क्वार्क एक्सप्रेस से ज्यादा कुछ जानते होंगे. उनकी डिग्रियां शायद सरकारी नौकरियों के लिए दरख्वास्त लगाने के काम आए.
चौथी बात यह कि जिन पत्रकारों की पैनी नज़र भविष्य की तरफ गड़ी होंगी, वे देख सकते हैं कि हम अपने जन्म में ही कागज पर छपे अखबार को खत्म होता हुआ देख सकेंगे. भविष्य इंटरनेट और मल्टीमीडिया का होगा, सिर्फ टैक्नोलॉजी का नहीं बल्कि इस बात का कि किस चतुराई से आप उनका इस्तेमाल अपने ग्राहकों के लिए करेंगे. हर संक्रमण पत्रकारों के लिए शुभ समय होता है और ऑनलाइन मीडिया के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उसके लिए आपको धन्ना सेठ होने की जरूरत नहीं है. अगर आपके पास लिखने के लिए ऐसा कुछ है, जो लोग पढ़ना चाहते हैं, तो उसे बेचने का रास्ता निकाला जा सकता है.
पांचवी बात यह कि यह संकट उन बहुत से लोगों के लिए वरदान होगा, जो जिंदगी में कुछ करने के लिए किसी चुनौती का इंतजार कर रहे थे. वे अपनी किताब लिखेंगे, वे छोटा मोटा ही सही पर अपना धंधा शुरू करेंगे, वे सोचेंगे कि कैसे वे इस तरह के समय में ज्यादा मुस्तैद, तैयार और चतुर हो सकेंगे, वे सिनेमा की स्क्रिप्ट लिखेंगे, वे आलस को अपनी हड्डियों से झाड़ेंगे. मीडिया के सुपरस्ट्रकचर्स के खतरे छोटे, हल्के और जैव विविध प्रयोगों को जगह देंगे, जिनकी जरूरत हमेशा से थी, पर तब तक किसी को पड़ी नहीं थी.
छठी बात- जो नौकरी से निकाले जाने के बाद कुछ नहीं करेंगे, अपने को पहले से ज्यादा माहिर बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, अपनी प्रतिभा को टटोलकर नये प्रयोग नहीं करेगें, समाज के लिए अपनी उपयोगिता को साबित करने का कोई प्रयास नहीं करेंगे और इंतजार करेंगे कि उनके साथ हुए अन्याय का उन्हें मुआवजा मिले, वे ज्यादा बड़े अफसोस के हकदार हैं.
कई ऐसे लोग हैं, जो इस जटिल होते वक़्त में नौकरियां छोड़ रहे हैं. इसलिए कि उन्हें नौकरियां मिल रही हैं. इसलिए नहीं कि वे किसी खास जात, जीपीआरएस या चमड़ी के हैं. इसलिए वे हमेशा एक ऐसा मौका तलाश रहे थे, कि उन्हें किसी की नौकरी न करनी पड़े. इसलिए कि वे हर दिन को चुनौती मान रहे थे. क्योंकि उन्हें अपने काम से प्यार है. क्योंकि अख़बार (मीडिया) का काम ही बदलते हुए वक़्त को दिलचस्प तरीके से रेखांकित करना है, वे खुद को रोज रिइन्वेंट करते हैं.
चुनौती सिर्फ नौकरियों को लेकर नहीं है. ज्यादा बड़ी चुनौती विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए यह है कि वह कैसे इस संक्रमण के समय और समाज के प्रति प्रासंगिक बना रहे और एक सफल बिजनेस मॉडल भी. नौकरियों का गणित इसी समीकरण से तय होगा.
© आस्तीन का अजगर

3 comments:

neera said...

हम सुख के वक्त अमेरिका और दुख के वक्त सोवियत संघ नहीं हो सकते.
…True… the article explain many interdependencies and current difficulties media facing today in an interesting way to a non media person, in the end offers real solutions and food for thought for the future… extremely educating!

अनुराग द्वारी said...

टाइपराइटर से अब कंम्प्यूटर के कीबोर्ड को घसीटते हुए ... कभी इस दौर के बारे में सोचा नहीं था ...
कुछ साथियों की नौकरी गई बहुत बुरा लग रहा है ... लेकिन आपके तर्क अपनी जगह मायने रखते हैं ...
हालांकि ये बात अपनी जगह कायम है कि जितनी मंदी है नहीं उतना हौव्वा खड़ा किया जा रहा है ...
मीडिया कंपनियां (( ज्यादातर)) नुकसान में नहीं हैं ... हां मुनाफे के प्रतिशत में जरूर कमी आई है

जोशिम said...

प्रभु- सही में नजला बहुत जगह झड़ रहा है - फ़िलहाल दुनिया भर में बेरोजगारों की यकायक बड़ी तादाद से सुरक्षित समाज कितना सुरक्षित रहेगा ?