अगर वे उस जगह पर वापस जाते भी, तो सब कुछ वैसा ही न होता जैसा उस बार था. ढलती सर्दियों वाली दोपहर में भला से लगता सूरज और ज़मीन से टकराकर उछलती रौशनियों का जादूई असर. ब्रह्मांड के उस कोने पर शहर में नौकरी न ढूंढने वाला चाय बेचता अनपढ़ बच्चा और चार देसी पिल्ले. पहाड़ और खाई. खाई में उगा हुए ठूंठ की तरह एक और पहाड़. ऱौशनी. कुछ उस तरह की जो फुजीकलर फिल्मों में दिखता था. जैसे सब कुछ पर एक हाईलाईटर चला हुआ है. बहुत आक्रामक सा नहीं, पर भला सा. वक्त, सड़कों, पंहुच, दुनिया, मोबाइल नेटवर्क, हवाई यातायात, रिंगटोन, हॉर्न की हद से बाहर.
लौटना न तो आसान था. और लौटते भी तो क्या मिलता. सिर्फ पहाड़. चाय वाला लड़का शहर चला गया होता नौकरी ढूंढने. कूं कूं करते पिल्ले भौंकना सीख चुके होते. सूरज के मिजाज बदल चुके होते. उस वक़्त के बादल पता नहीं कहां पानी बन बरस चुके होते.
लौटना कहां हो पाता है किसी भी जादू में. जो तैलचित्रों की तरह बहुत तयशुदा नहीं थे. वे जलरंगों की तरह थे. काबू से बाहर. प्यार की तरह.
अगली बार वे मिलते तो ब्रह्मांड के किसी और कोने में. जहां से उन्हें अपना ही एक सिरा मिलता. अपने अगले संयोग तक.




4 comments:
जलरंगों की तरह काबू से बाहर ? उस बाहर में सब फिर फैला हुआ धुँधलापन , वहाँ से लौटना ? वो दूसरा देश है .इस नियम के परे कोई और नियम भी है क्या ?
Beautiful!
There will always be love stories,each love,never knowing....yet always knowing,never changing ,yet always changing...theres always magic,its just a different kind
कुछ खोया खोया सा लग रहा यहां
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