उसकी डायरी में उसने कभी झांक कर नहीं देखा. कहती है मर जाऊंगी तो पढ़ लेना. पर कभी कभी खुद ही से कुछ एंट्रीज बांट लेती है. पता नहीं वे पूरे पन्ने होते हैं या कुछ पैराग्राफ ही. जब ज़िंदगी को जिया जा रहा होता तकलीफ़ और राहत के बीच, तो डायरी छोटी हो जाती, पर जब दिन खाली होते और रातें लम्बी और वीरान, तो डायरी और लंबी हो जाती.डायरी में दुख अपना ब्यौरा विस्तार से लिखता. ईश्वर के खिलाफ, नियति के खिलाफ, भाग्य के खिलाफ एक चश्मदीद गवाह के निर्णायक हलफनामे की तरह. हर बात का बारीकी से जिक्र. वक्त, कपड़े, मौका, वारदात, शब्दों का एक एक अक्षर. एक एफआईआर की तरह दुःख खुद को काग़ज पर पूरा का पूरा उकेरता शायद इस उम्मीद से कि कह देने से मन हल्का हो जाएगा.
डायरी में दुःख की स्मृति और सुख के सपनों का ही ब्यौरा होता. वह खुद को हर बार नई रौशनी में अधूरा देखती. कई बार बहुत बाद में जब पुराने पन्ने पलटती तो उसे अचरज होता कि ये वाक्य उसने लिखे हैं. उसे यकीन न होता कि उसका दुःख उस वक़्त कितना गहरा था और चोट कितनी ज्यादा और धोखा कितना बुरा. पर उन शब्दों में दुःख और उम्मीद के गहरे मायने गड़े हुए कालपात्र की तरह थे. परछाइयों की तरह डायरी के पन्ने उसी हिसाब से लंबे और स्याह होते जाते, जितना वह अकेली और खाली होती जाती. दुःख एक वकील ढूंढता, जिरह करता, न्याय की गुहार लगाता. दुःख निर्मल वर्मा की कहानी की तरह शब्दों के बीच की खाली जगह मोम की तरह पिघल पिघल गिरता.
ऐसा नहीं हुआ था कि ज़िंदगी में तकलीफ और उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं था.
कई सफेद फूल बगीचे में खिले थे. बिल्ली ने बच्चे दिये थे, जो कार के टायरों के पीछे छुपने का खेल खेलते थे. एक दिन सैर से लौटने पर जमीन पर हजारों हरसिंगार महक रहे थे. कई दिन आसमान बहुत साफ था, कई बार बहुत रंगीन. सैवन सिस्टर्स कई शामों में इतना शोर करती थीं कि न्यूज चैनल्स के एंकर उनके आगे अप्रासंगिक थे. कई राग उसके फेफड़ों से फूटे थे, दमे के बावज़ूद. खुशी थी. इतने दबे पांव, इतनी ठिठकी हुई, इतनी अस्थाई, इतनी वायदाखिलाफ, इतनी जिंदा कि उसे दर्ज करना उस वक़्त मुमकिन न था. खुशी थी, पर दुख के लम्बे उपन्यास में एक विषयांतर और एक फुटनोट की तरह. खुशी जब होती थी, तब उसका कोई न तो ठौर था, न ठिकाना. डायरी में भी नहीं।
photo : way to success ARG on flickr




4 comments:
बेहतरीन प्रस्तुति ......किसी के बारे में यूँ लिखना ...काबिले तारीफ़
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
wow! the photosynthesis between pain and happiness...
उफ़ कमाल का सच लिखते हो आप...बिलकुल जिंदगी से जुड़ा हुआ. कई बार तो लगता है खुद को जी रही हूँ आपके हर लफ्ज़ में.
इधर काफी जल्दी आपकी दो कहानियां आयीं, लगा जैसे ice lolly order ki ho, aur icecream sunday serve ho gaya ho. awesome!
Jiye hua ko shabd dena sab ke liye aasan nahin hota .......
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