वह हमेशा से दिल्ली के रास्ते पर था. दिल्ली से गुजरकर आगे चला जाता. फिर लौटता दिल्ली के रास्ते पूछता हुआ. दिल्ली का रास्ता भटकने का सवाल ही नहीं था. सब जानते थे. पर दिल्ली न तो उसे आने से मना करती थी, न बैठने को कहती थी. दिल्ली किसी को न नहीं कहती, दिल्ली के बारे में मशहूर है. वह दिल्ली आना चाहता था हमेशा से, क्योंकि उसके पास लौटने की और कोई भी जगह नहीं थी. सिर्फ दिल्ली ही उसे अपना बना सकती थी, क्योंकि न तो उसका कोई अपना था, और न ही दिल्ली का. उसे पता था कि दिल्ली को पता है बार बार उजड़ने का मतलब. हर बार जब भी दिल्ली उजड़ी तो शायद ही किसी को उम्मीद थी, कि अब आगे कुछ होगा. पर दिल्ली फिर बसी, जहां से उजड़ी थी, उसीके बगल में. सात बार उजड़ी, आठ बार बसी. उसे यकीन है कि एक दिन दिल्ली उसे भी बसा लेगी. दिल्ली जानती है, बहुत सारे लोग आएंगे और जाएंगे, बहुत सारे राजे और सरकारें, बहुत सारा इतिहास, बहुत सारे दलाल और कारकून, बहुत सारे दस्तावेज और पालकियां दिल्ली का इस्तेमाल करेंगे और गुज़र जाएंगे. हालांकि दिल्ली को भी पता है कि कितने लोग दिल्ली की आंख में झांक कर उसका दर्द भांप सकते हैं.जिस तवायफ का नाम दिल्ली है, वह प्यार जानती है. एक दिन दिल्ली का दिल पसीज ही जाएगा और वह गर्मी की किसी शाम पानी के छिड़काव के बाद मूढ़े पर बैठा हुआ दिल्ली की यादों की बातें करेगा. खुसरो और ग़ालिब और भूली भठियारिन की. वह बात करेगा कि किस वफा से दिल्ली ने उसकी थोड़ी सी बेवफाई को रिश्ते की तरह निभाया. इस बात पर वे बेसाख्ता हसेंगे.
उस वक़्त तक वह दिल्ली के रास्ते चलता रहेगा. और दिल्ली उसके रास्ते.
photo: ruins of hauz khas by pranav singh on flickr




5 comments:
जरूर पसीजेगा दिल्ली का दिल-दिल्ली है दिलवालों की, आपके शब्दों ने साबित कर दिया..
अच्छी जानकारी, सार्थक प्रयास। बहुत बहुत बधाई
bada hasin vaakya hai...dil ke kareeb. dilli se kuch hamara bhi deewano ki tarah ki lagav hai. aapke anokhe andaaj me dilli ki kahani acchi lagi.
bahut khoob!!
गोया मुहब्बत है उसे ....
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