वह उस अजनबी को वैसे ही जानती थी, जैसे उसके भीतर एक हिस्से को वह नहीं जानती थी.
उस बोतल में एक ख़त था. वह किनारे पर थी. जब उसने उसे देखा. वह ख़त किसी के लिए भी हो सकता था. पर उसे लगा कि वह उस ख़त का इंतज़ार कर रही थी. उसे लगा जिसने ख़त लिखकर उसे बोतल में भर समुद्र में बहाया है, वह उसे जानती है. हम अजनबियों के एक हिस्से को ठीक वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने भीतर के एक हिस्से को नहीं जानते. वह उस खत को अकेले में पढ़ने बैठती है, क्योंकि सिर्फ उसी को पता है कि वह खत उसी के लिए लिखा गया है. नहीं तो क्या जरूरत थी उस बोतल को, कि वह बिना टूटे पानी में डूबती उतराती ठीक उसीके रास्ते आकर पड़ती. उस ख़त में लिखने वाले ने अपने अकेलेपन, अधूरेपन के बारे तफसील से लिखा था और ख़त को पढ़ने वाले को दुआएं दी थी. उसे बार बार लगा कि वह जानती है उसे उसकी बातों से, उसके शब्दों से, दुआओं से, उसके अक्षरों के घुमाव और भूले गये हिज्जों से. वह जानती है उसे उस ख़त में शब्दों के बीच खाली रह गई जगह से. वह जानती है उसे जैसे हम जानते हैं अपने भीतर के किसी को. जिसका हम इंतजार नहीं करते, जिसके लिए हम कोशिश भी नहीं करते, पर जिसके लिए हम हमेशा अपने दरवाजे खुले रखते हैं. ताकि जब वह आये तो न आहट की आवाज़ हो और न दस्तक की दरकार.
बहरहाल उसने उस ख़त को कई बार कई तरह से अकेला होकर पढ़ा. हर बार उसके मन में एक नयी शक्ल का जंगल उग आता, नये तरह के बादल, नये तरह की हवाएं, नये तरह का आकाश.
अपनी दुनिया से छुपकर उसने उस ख़त का जवाब लिखा. कई दिन लगे. जिस अजनबी को वह जानती थी, जो उसका ही हिस्सा था, उसी को अपने मन की बात समझाने की उलझी हुई कोशिश. बहुत संभालकर रखा उस कागज को. बहुत तौलकर लिखा एक एक हर्फ. फिर एक दिन उसे बोतल में भरा, उसकी डाट लगाई और पानी में बहा दिया.
ये काफी हिम्मत का काम था. कोई देख लेता तो. कोई जान लेता तो. कोई पकड़ लेता तो. उस भरोसे का क्या होता, जो उसपर दुनिया ने किया. उसने यह सब पाप की तरह किया, छिपकर. पर जो किया, वह उसके अपने लिए जरूरी था.
समंदर के इस तरफ रेत में कई सारे किले थे. दुनिया थी. पति, बच्चे, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ौसी, जानने वाले सब थे. वह लौट आई सोचकर कि जिसने उसे ख़त लिखा है, उसे उसका जवाब मिल जाएगा. उसे लगा कि इस बहाने वह अपने भीतर के अजनबी से दोस्ती बढ़ा लेगी, उसे लगा बोतल को वापस पानी में फेंक वह अपनी जमीन पर वापस लौट आएगी.
ये तय कर पाना मुश्किल था कि बोतल में भेजा गया संदेश उसके सपने में था, कल्पना में, सच में, सोच में कहां.. ये तय कर पाना मुश्किल नहीं था कि उसने जिया था उस पूरे वाकये को, पल पल बित्ता बित्ता. किसी को पता नहीं था. सिवा उसके. पर वह जहां लौट रही थी, जिस रेत, दुनिया, दिनचर्या, पड़ोस में वहां सब कुछ सामान्य था.
वह असहज तौर पर सामान्य होने, दिखने की कोशिश कर रही थी. हालांकि इससे भी किसको फर्क पड़ता था.
Sunday, April 19, 2009
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3 comments:
"ये तय कर पाना मुश्किल नहीं था कि उसने जिया था उस पूरे वाकये को, पल पल बित्ता बित्ता. किसी को पता नहीं था. सिवा उसके"
uffffffff....fir se kamaal ka likha hai, is bahav me main bhi bah gayi.
उसने उस ख़त को कई बार कई तरह से अकेला होकर पढ़ा. हर बार उसके मन में एक नयी शक्ल का जंगल उग आता, नये तरह के बादल, नये तरह की हवाएं, नये तरह का आकाश.
तय कर पाना मुश्किल था कि बोतल में भेजा गया संदेश उसके सपने में था, कल्पना में, सच में, सोच में कहां.. ये तय कर पाना मुश्किल नहीं था कि उसने जिया था उस पूरे वाकये को, पल पल बित्ता बित्ता. किसी को पता नहीं था. सिवा उसके. पर वह जहां लौट रही थी, जिस रेत, दुनिया, दिनचर्या, पड़ोस में वहां सब कुछ सामान्य था.
भई ... किस दुनिया से आये हैं आप ....? ये लेखनी तो मुझे इस दुनिया के बन्दे की नहीं लगती....!
लाजवाब लिखते आप...और अब तक हमारी नज़र से कैसे बचे रहे पता नहीं.....!!
bahut accha likha hua hai ye
It held my eyes from blinking off for a long time.
thanks.
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