Saturday, April 18, 2009

LOVE STORY # 464: वह जो लाल रंग फैल रहा था, क्रांति का नहीं था

(इस श्रृंखला की यह सौवीं कहानी है. इसके बाद 463 कहानियां और इस सरदर्द से निज़ात पाने के लिए. लंदन से एक मित्र ने अपने बहुत अकेले दिनों को बिताते हुए इसे लिखा है. लिखना हम सबके अकेले होने की निशानी है. और अच्छा लिखना बहुत अकेले होने की. अकेले होने के लिए लंदन एक शानदार शहर है. क्योंकि वह बहुत खूबसूरत और गहरे, ज्ञानी और संवेदनशील, सवालों से जूझते अकेले लोगों का शहर है. वक़्त को जब भी सांस लेने, एक गिलास बियर पीने, सिगरेट का सुट्टा और गप मारने के लिए अगर रुकना हो तो लंदन से मुफीद कोई जगह शायद ही हो. चाहे कोई भी वक़्त हो. कहीं का भी. जैसे यहां है मॉस्को और छत्तीसगढ़ का एक फ्रेम में और फिर उससे बाहर आते हुए.)

टेट मॉर्डन गैलरी में वे वह सोवियत संघ के पुराने पोस्टरों का संग्रह देख रहा था. एक बड़े हॉल में चारों ओर पोस्टर ही पोस्टर थे. स्टालिन से लेकर लेनिन तक. हँसिया, हथौड़ा और तनी हुई मुट्ठियाँ और झंडे. भाषा समझ में नहीं आ रही थी. लेकिन समय के क़दमों के निशान को पहचानना कठिन नहीं था. लगा कि घूमते-घूमते थक गया सो उस बड़े से हॉल के बीचों-बीच लगी बेंच पर बैठ गया. पूरे कमरे में लाल रंग भर गया था.
विवरण में लिखा था कि सोवियत संघ की क्रांति में महिलाओं का बड़ा योगदान था. पोस्टरों में छपी उनकी तस्वीरों से उनकी भूमिका स्पष्ट दिखती थी. मक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ याद आ गया. फिर कॉलेज के दिनों के दिन याद आ गए. एसएफ़आई के लिए रात-रात पोस्टर लिखना फिर वॉल राइटिंग के लिए निकल जाना और आधी रात को घर लौटते हुए कॉमरेडों से सुबह मिलने के वादे याद आए. कॉमरेड शैली का भरोसा याद आया कि सर्वहारा वर्ग में चेतना जाग रही है और क्रांति अब बहुत दूर नहीं है.
विचारों की श्रृंखला और पोस्टरों का अवलोकन साथ-साथ चल रहे थे. बेंच और पोस्टरों के बीच से लोग गुज़रते जा रहे थे. लेकिन उसे लगा जैसे वे सब पारदर्शी से हैं. अचानक बेंच और पोस्टरों के बीच एक लड़की आ खड़ी हुई. इस बार आर-पार दिखना बंद हो गया. सालों पुराने अतीत और कुछ क्षणों पुराने अतीत से टूटकर वह एकदम वर्तमान में आ गया.
लड़की सिर से पैर तक इतनी सुडौल थी मानों नकली हो. वह कमर पर हाथ धरे पोस्टरों को निहार रही थी. उसके हाथ और कमर के बीच बने तिकोने से उसे कुछ पोस्टर अभी भी दिख सकते थे. लेकिन नज़रें इसी तिकोने जाल में फँस गई थीं. लाल रंग अब और सुर्ख़ हो गया था. लेकिन अब वह पोस्टर से निकलकर लड़की के कपड़ों में आ गया था. जो उसकी नाज़ुक गोरी देह पर कम ही जगह पर था.
अचानक लड़की को मानों मेरे पीछे बैठे होने का अहसास हुआ. अचानक पीछे मुड़ी तो उसने देखा कि लाल रंग मेरे चेहरे पर भी फैल गया था. वह मुस्कुराई और फिर पोस्टर देखने लगी.
क्रांति का इंतज़ार ख़त्म हो गया था. कॉमरेड शैली को आत्महत्या किए भी अब कई बरस बीत गए.

photos: www.tate.org

7 comments:

Alok Nandan said...

supr story!! I love the stuff....fantastic

Anonymous said...

good good good! you are getting into newer territory...love encompasses everything from the earth to the sky...you'll always have plenty to write about.

poemsnpuja said...

m speechless!

Anonymous said...

haqeekat kaa bayaan kahaanee ke bahaane kitnaa aasaan ho jata hai.
I never met Shalendra but one of his cousin is my good friend and I have heared a lot of stories about him too. Including one of the reception party which family gave the newly weded couple and they donated all the gifts, jewlry and money for common good.

Khali Dimagh said...

तो क्रांति को किसने मारा? या क्रांति होनी ही न थी? या क्रांति पहले भी बकवास थी, है और रहेगी?

PIYUDEO said...

lalam lal,kranti nahi aur kuchh ki lali hai har jagah,achchha hai

Reality Bytes said...

umda post bhai sahib