Wednesday, September 23, 2009

LOVE STORY # 391: उस रात कुछ नहीं हुआ. वह बहुत ज़्यादा शराब पीता था

वह बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी औरत नहीं थी और सिर्फ पंजाबी में ही लिखती थी. दूसरी भाषाओँ का लिखा वह बमुश्किल पढ़ पाती थी और इसलिए लिखने में कोई बहुत तहजीब नहीं थी. वह बॉलीवुड पर मरी जाती थी. उसके लिए कामयाबी का असली मुक़ाम अपने उपन्यास या कहानियों की फिल्म बनते देखना था. पंजाबी से अंग्रेजी में तर्जुमा होने वाली उसकी पहली नॉवेल पिंजर (द स्केलेटन) थी. ये तर्जुमा मैंने सिर्फ मोहब्बत के नाते किया था. मैंने उस किताब की पूरी रॉयल्टी उसे दे दी इस शर्त पर कि वह अपनी लव लाइफ का पूरा चिट्ठा मुझे तफसील से बता दे. कई बैठकें हुयीं भी. जिस इकलौते इश्क़ का जिक्र उसने किया वह फ़िल्मी गीतकार साहिर लुधियानवी को लेकर था, जिससे वह कभी मिली नहीं थी. पर ख़त ओ खिताबत जरूर हुयी थी. मुझे यह सुनकर काफी निराशा हुयी. मैंने उससे कहा, ' इतनी सी बात तो एक रसीदी टिकट के पीछे लिखी जा सकती है.' बहरहाल जब उसने अपनी आत्मकथा लिखी तो उसका नाम उसने रखा - रसीदी टिकट (हालाँकि रसीदी टिकट में जिक्र है कि साहिर लाहौर में उससे मिला करते थे- एडिटर, आउटलुकइंडिया.कॉम)आखिरकार लुधियानवी से उसकी मुलाक़ात यहाँ दिल्ली में हुयी। उसको उड़ने से डर लगता था, सो वह बम्बई से ट्रेन लेकर पहुंचा. वे क्लारिजेस होटल में मिले, जहाँ उनकी महान प्रेम कहानी को अपने अंजाम तक पहुंचना था. कुछ नहीं हुआ. लुधियानवी बहुत ज्यादा शराब पीता था.
( लेखिका अमृता प्रीतम की मृत्यु पर उनके मित्र खुशवंत सिंह का लेख। इसे श्रद्धांजली कहने में अजगर को संकोच है)

3 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

चलिए! हम ही श्रधाजन्ली दे देते हैं

Apoorv said...

पता नही इतने प्रभावी और युगप्रवर्तक साहित्यिक व्यक्तित्वों के बारे मे सबसे उज़बक ख्याल खुशवंत जी के दिमाग मे ही क्यों पाये जाते हैं..शायद कभी अच्छा न लिख पाने की मानसिक कुंठा इसकी वज़ह रही हो...फिर पाश पर तो कुछ लिखना भी वो अपनी शान के खिलाफ़ समझते होंगे..

Harkirat Haqeer said...

जो हमेशा उनके खिलाफ में रहे हो .....जो उन्हें अपनी आत्मकथा एक राशिदी टिकट के पीछे लिख देने की सलाह दे रहे हो ..... वे भला कैसे उनके हिमायती हो सकते हैं .....?