Wednesday, September 23, 2009

LOVE STORY # 392: फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती

बहुत सारे अँधेरे खामोश में बीच एक शब्द जैसे एक झील में उछाला हुआ कंकर और डूबने से पहले फिर फिर उछलता हुआ. उस अँधेरे खामोश में आवाज़ का अपना अमूर्त था, अपना जादू, अपना यथार्थ. दूरी की खाई को लांघती हुयी, माइकलएंजेलो की पेंटिंग में बढ़ी हुयी उंगली की तरह. एक लम्बी रस्सी का सिरा पकड़ता हुआ, थमता हुआ, पूछता हुआ उस सन्नाटे की जगह का पता जहाँ उसे उतरना है, अदृश्य की सीढियों से.
वह उस अदृश्य का हिस्सा होती. अदृश्य की अपनी आज़ादी होती. अदृश्य का अपना विन्यास. जैसे जैसा चाहा, वैसा. अँधेरा मखमल बन जाता. खुश होने के लिए ऑंखें बंद हो जाती. आवाज़ अपने मायने उस आज़ाद अदृश्य में गढ़ती. आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती. आवाज़ उसके साथ प्यार करती. आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती. आवाज़ उसे सुला देती. आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड मड्ड कर देती. कभी यहाँ से बुलाती. कभी वहां से. आवाज़ कवितायेँ पढ़ती. आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे वाक्य को दुबारा कहती. आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती. आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती. आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती. आवाज़ उसे पेट से हंसा देती. और कई बार इतनी खामोशी से भर देती कि हाथ बढाकर कांच पर जामे कुहरे की तरह उसे साफ़ करना पड़ता. आवाज़ कई बार शरीर होती, कई बार आत्मा. अक्सर आवाज़ के मायने शब्द के मायनों से अलग होते.
वह हुंकारे भरती. पलट कर आवाज़ देती. नए विन्यास और व्याकरण को रचते. जो आसमान, खामोशी, रात के पहर, अँधेरा तय करता.
फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती. असल में बहुत सारा शोर होता. ठण्ड, गर्मी, उमस, पसीना, चाँद, बदल, बारिश, अख़बार, दुनिया. असल का एकांत बँटा हुआ होता. असल का ध्यान कई बार भटका हुआ.
वह अँधेरे खामोश में आवाज़ का इंतज़ार करती. खामोश अँधेरे एकांत में आवाज़ का अपना सच था. और असल का अपना. दोनों एक नहीं थे.

3 comments:

poemsnpuja said...

इन शब्दों में बहुत सी लम्बी रातों के लॉन्ग distance काल्स याद आये, दिल्ली की गर्मी में चाँद का सहारा थामे हॉस्टल की छत पर टहलती लड़कियां याद आई...वाकई फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज असल की आवाज से अलग होती है.

smita choudhary said...

all along the piece I felt- kaaash and longing.

And at the end I could only say- drat!!

Prem ki kahaniyon ka shayad yahi ant hona chahiye? Jo ki prem ka hota hai- hahaha

neera said...

शब्दों के जादू से टपकता आवाज़ का जादू ...
जैसे हवा में तैरती रजनीगंधा की खुशबू ...