दिल्ली में कुहरे के कई दिनों के बाद धूप निकली थी. वे तीनों एक ही साथ पढ़ती थी और एक ही दफ्तर में काम करती थीं. जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच वे तीनों अपनी दफ्तरी कुर्सियां धूप में ले आतीं और दोपहर के खाने के वक्त बैठकर उस वक्त की बातें करती, जो बीत चुका है. वे चढ़ती हुई चर्बी, ढीली होती त्वचा, डी ऑडरेंट की गंध और मध्य वर्गीय ऊब के बीच टीवी सीरियल्स की बातें करती और कई बार लंच आवर कुछ ज्यादा चलता, और टीवी की बातें खत्म हो जातीं और फिर भी बात करने का बहुत सा मन उनका रह जाता, तो तीनों अपने अतीत के उस मुहाने तक जातीं, जहां से वह साझा होना शुरू हुआ था.
बातें यहां वहां होते हुए उनके क्लास के लड़कों पर घूमने लगतीं.
जवानी की अंगड़ाई और बुढ़ापे की जम्हाई के बीच उनकी आंखों से उन लड़कों के बारे में एक तुरत फुरत का ओपिनियन पोल पढ़ा जा सकता था. वे अपने मजाक याद करतीं. वे बतातीं कौन किस पर किस कदर मरता था. कौन भला था और कौन धोखेबाज़. कौन कविताएं लिखता था और कौन अच्छे सा प्रेमपत्र.
वे लंच के बाद ड्यूटी पर फिर लौट आतीं. बाहर धूप कुछ और देर खिली रहती.
Monday, January 5, 2009
Sunday, January 4, 2009
LOVE STORY # 471: टीवी चैनल पर जारी फेहरिस्त में उसका नाम भी था
सब पूछ रहे थे उसके पति का हालचाल. वह बंबई के उस होटल में कामकाज के सिलसिले में गये हुए थे, जहां उस शाम गोलियां दनदनाते आतंकवादी घूमते देखे जा रहे थे. वह टीवी से चिपक कर बैठी हुई थी. फोन पर वह लोगों को यही कहती कि उसे उम्मीद है सब ठीक हो जाएगा.. पर वह डर भी रही थी.. टीवी चैनलों पर बैठे लोग तरह तरह के कयास लगा रहे थे, इस खतरनाक वारदात की संजीदगी को लेकर, उसमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या को लेकर.. चौबीस घंटे बाद भी कोई खबर नहीं थी..
48 घंटे बाद जब आतंकवादी मार गिराये गये, तब तक ये भी साफ होने लगा कि उन्होंने जानमाल का कितना नुक्सान किया है.
टीवी चैनल के नीचे पट्टी पर उस होटल के उन मेहमानों के नाम आ रहे थे, जिन्हें आतंकवादियों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था.
फेहरिस्त में सातवां नाम उसके पति का था.
आठवां खुद उसका.
वह टेलीविजन पर अपनी मौत की ख़बर खुद पढ़ रही थी. और आंसुओं से लबालब होती आंखों के बीच यह सोच रही थी कि अपने ज़िंदा होने की सफाई में वह क्या कहेगी.
48 घंटे बाद जब आतंकवादी मार गिराये गये, तब तक ये भी साफ होने लगा कि उन्होंने जानमाल का कितना नुक्सान किया है.
टीवी चैनल के नीचे पट्टी पर उस होटल के उन मेहमानों के नाम आ रहे थे, जिन्हें आतंकवादियों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था.
फेहरिस्त में सातवां नाम उसके पति का था.
आठवां खुद उसका.
वह टेलीविजन पर अपनी मौत की ख़बर खुद पढ़ रही थी. और आंसुओं से लबालब होती आंखों के बीच यह सोच रही थी कि अपने ज़िंदा होने की सफाई में वह क्या कहेगी.
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