Saturday, March 28, 2009

LOVE STORY # 467 : दुःख की लम्बी एफआईआर होती, खुशी का न ठौर न ठिकाना

उसकी डायरी में उसने कभी झांक कर नहीं देखा. कहती है मर जाऊंगी तो पढ़ लेना. पर कभी कभी खुद ही से कुछ एंट्रीज बांट लेती है. पता नहीं वे पूरे पन्ने होते हैं या कुछ पैराग्राफ ही. जब ज़िंदगी को जिया जा रहा होता तकलीफ़ और राहत के बीच, तो डायरी छोटी हो जाती, पर जब दिन खाली होते और रातें लम्बी और वीरान, तो डायरी और लंबी हो जाती.
डायरी में दुख अपना ब्यौरा विस्तार से लिखता. ईश्वर के खिलाफ, नियति के खिलाफ, भाग्य के खिलाफ एक चश्मदीद गवाह के निर्णायक हलफनामे की तरह. हर बात का बारीकी से जिक्र. वक्त, कपड़े, मौका, वारदात, शब्दों का एक एक अक्षर. एक एफआईआर की तरह दुःख खुद को काग़ज पर पूरा का पूरा उकेरता शायद इस उम्मीद से कि कह देने से मन हल्का हो जाएगा.
डायरी में दुःख की स्मृति और सुख के सपनों का ही ब्यौरा होता. वह खुद को हर बार नई रौशनी में अधूरा देखती. कई बार बहुत बाद में जब पुराने पन्ने पलटती तो उसे अचरज होता कि ये वाक्य उसने लिखे हैं. उसे यकीन न होता कि उसका दुःख उस वक़्त कितना गहरा था और चोट कितनी ज्यादा और धोखा कितना बुरा. पर उन शब्दों में दुःख और उम्मीद के गहरे मायने गड़े हुए कालपात्र की तरह थे. परछाइयों की तरह डायरी के पन्ने उसी हिसाब से लंबे और स्याह होते जाते, जितना वह अकेली और खाली होती जाती. दुःख एक वकील ढूंढता, जिरह करता, न्याय की गुहार लगाता. दुःख निर्मल वर्मा की कहानी की तरह शब्दों के बीच की खाली जगह मोम की तरह पिघल पिघल गिरता.
ऐसा नहीं हुआ था कि ज़िंदगी में तकलीफ और उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं था.
कई सफेद फूल बगीचे में खिले थे. बिल्ली ने बच्चे दिये थे, जो कार के टायरों के पीछे छुपने का खेल खेलते थे. एक दिन सैर से लौटने पर जमीन पर हजारों हरसिंगार महक रहे थे. कई दिन आसमान बहुत साफ था, कई बार बहुत रंगीन. सैवन सिस्टर्स कई शामों में इतना शोर करती थीं कि न्यूज चैनल्स के एंकर उनके आगे अप्रासंगिक थे. कई राग उसके फेफड़ों से फूटे थे, दमे के बावज़ूद. खुशी थी. इतने दबे पांव, इतनी ठिठकी हुई, इतनी अस्थाई, इतनी वायदाखिलाफ, इतनी जिंदा कि उसे दर्ज करना उस वक़्त मुमकिन न था. खुशी थी, पर दुख के लम्बे उपन्यास में एक विषयांतर और एक फुटनोट की तरह. खुशी जब होती थी, तब उसका कोई न तो ठौर था, न ठिकाना. डायरी में भी नहीं।
photo : way to success ARG on flickr

LOVE STORY # 468: जिस तवायफ से उसने दिल लगाया है, उसका नाम दिल्ली है

वह हमेशा से दिल्ली के रास्ते पर था. दिल्ली से गुजरकर आगे चला जाता. फिर लौटता दिल्ली के रास्ते पूछता हुआ. दिल्ली का रास्ता भटकने का सवाल ही नहीं था. सब जानते थे. पर दिल्ली न तो उसे आने से मना करती थी, न बैठने को कहती थी. दिल्ली किसी को न नहीं कहती, दिल्ली के बारे में मशहूर है. वह दिल्ली आना चाहता था हमेशा से, क्योंकि उसके पास लौटने की और कोई भी जगह नहीं थी. सिर्फ दिल्ली ही उसे अपना बना सकती थी, क्योंकि न तो उसका कोई अपना था, और न ही दिल्ली का. उसे पता था कि दिल्ली को पता है बार बार उजड़ने का मतलब. हर बार जब भी दिल्ली उजड़ी तो शायद ही किसी को उम्मीद थी, कि अब आगे कुछ होगा. पर दिल्ली फिर बसी, जहां से उजड़ी थी, उसीके बगल में. सात बार उजड़ी, आठ बार बसी. उसे यकीन है कि एक दिन दिल्ली उसे भी बसा लेगी. दिल्ली जानती है, बहुत सारे लोग आएंगे और जाएंगे, बहुत सारे राजे और सरकारें, बहुत सारा इतिहास, बहुत सारे दलाल और कारकून, बहुत सारे दस्तावेज और पालकियां दिल्ली का इस्तेमाल करेंगे और गुज़र जाएंगे. हालांकि दिल्ली को भी पता है कि कितने लोग दिल्ली की आंख में झांक कर उसका दर्द भांप सकते हैं.
जिस तवायफ का नाम दिल्ली है, वह प्यार जानती है. एक दिन दिल्ली का दिल पसीज ही जाएगा और वह गर्मी की किसी शाम पानी के छिड़काव के बाद मूढ़े पर बैठा हुआ दिल्ली की यादों की बातें करेगा. खुसरो और ग़ालिब और भूली भठियारिन की. वह बात करेगा कि किस वफा से दिल्ली ने उसकी थोड़ी सी बेवफाई को रिश्ते की तरह निभाया. इस बात पर वे बेसाख्ता हसेंगे.
उस वक़्त तक वह दिल्ली के रास्ते चलता रहेगा. और दिल्ली उसके रास्ते.
photo: ruins of hauz khas by pranav singh on flickr

लव स्टोरी # 469: एक बदलते हुए दृश्य में मौजूद होने का मतलब


अगर वे उस जगह पर वापस जाते भी, तो सब कुछ वैसा ही न होता जैसा उस बार था. ढलती सर्दियों वाली दोपहर में भला से लगता सूरज और ज़मीन से टकराकर उछलती रौशनियों का जादूई असर. ब्रह्मांड के उस कोने पर शहर में नौकरी न ढूंढने वाला चाय बेचता अनपढ़ बच्चा और चार देसी पिल्ले. पहाड़ और खाई. खाई में उगा हुए ठूंठ की तरह एक और पहाड़. ऱौशनी. कुछ उस तरह की जो फुजीकलर फिल्मों में दिखता था. जैसे सब कुछ पर एक हाईलाईटर चला हुआ है. बहुत आक्रामक सा नहीं, पर भला सा. वक्त, सड़कों, पंहुच, दुनिया, मोबाइल नेटवर्क, हवाई यातायात, रिंगटोन, हॉर्न की हद से बाहर.
लौटना न तो आसान था. और लौटते भी तो क्या मिलता. सिर्फ पहाड़. चाय वाला लड़का शहर चला गया होता नौकरी ढूंढने. कूं कूं करते पिल्ले भौंकना सीख चुके होते. सूरज के मिजाज बदल चुके होते. उस वक़्त के बादल पता नहीं कहां पानी बन बरस चुके होते.
लौटना कहां हो पाता है किसी भी जादू में. जो तैलचित्रों की तरह बहुत तयशुदा नहीं थे. वे जलरंगों की तरह थे. काबू से बाहर. प्यार की तरह.
अगली बार वे मिलते तो ब्रह्मांड के किसी और कोने में. जहां से उन्हें अपना ही एक सिरा मिलता. अपने अगले संयोग तक.