Saturday, April 25, 2009

LOVE STORY # 460- 394: एक ज़िंदगी की एक लाइन में दुनिया भर से 66 कहानियां प्यार की

(धूमिल की एक कविता ऐसे शुरू होती है- ओ अपराध सी अंधी, पाप सी उजागर, आदम इरादों से बित्ता भर ऊपर उठी हुई पृथ्वी. ये 66 कहानियां ट्विटर पर मिलीं. एक ऐसी साइट पर जहां आप अंग्रेजी के 140 कैरेक्टर्स में अपना रहस्य लिख कर उस भार से मुक्त हो सकते हैं, जो आपको खाये जा रहा है. अजगर पहले तो उन्हें एक वोयरिस्ट की तरह पढ़ता रहा, पर जल्द ही लगा कि रहस्य की हर पंक्ति के पीछे एक जीता जागता संसार है, एक जीती-मरती जिंदगी है. चरित्र हैं. 140 कैरेक्टर के विन्यास में न बांटे के दर्द से छुटकारा पाते हुए. जरूरी नहीं कि यहां जो कहा गया, वह सब कुछ सच हो. पर ये आप भी जानते हैं और मैं भी ये सब कुछ झूठ नहीं है क्योंकि हम सब के सच का कोई न कोई हिस्सा इससे मिलता जुलता है. भले ही ज्यादातर लाइनें अमेरिका से हैं. ज्यादातर रहस्य औरतों के हैं. ज्यादातर उलझनें उन फैसलों के बारे में हैं, जहां जिंदगी दुनिया बनने बनाने की देहरी पर कदम रखती है. और ज्यादातर भयावहताएं एक वाक्य में कही जा सकती हैं, भले ही हम उनके लिखने वालों को कभी नहीं जान पाएंगे सिवा एक नंबर के )
36467 अच्छा होता कि मैं अपने पति को कभी न छोड़ती. मैं अपने बच्चों की आंखों में तकलीफ पढ़ सकती हूं. अच्छा होता कि मैं लौट सकती और सब ठीक कर देती.
36538 सबसे बड़ा डर मेरा यह है कि वह जिस शख्स के काबिल है, वह मैं नहीं हूं. मुझे यह खुद को रोज़ बताना पड़ेगा कि मैं वह शख्स बनकर रहूं.
36520 मुझे दस साल लगे अपने एब्यूजिव पति को छोड़ने में. अब वह कसमें खा रहा है कि वह बदल गया है और मुझे वापस चाहता है. आखिर अब न कहने में इतनी दिक्कत क्यों हो रही है.
36428 बीवी, कामकाजी, फुलटाइम स्टूडेंट, पति दूसरी स्टेट में, मुझे न मदद मिलती है न प्यार. भाग जाने के लिए एक सेलिब्रिटी की कल्पना
36423 मुझे बात वहीं खत्म कर देनी थी, जब शादी की रात मेरी बीवी रो पड़ी थी, क्योंकि वह मेरे साथ सोना नहीं चाहती थी. यह 1993 की बात है.
36356 अगर मुझे पता होता कि शादी इस कदर मुश्किल है, तो शादी पैसे के लिए की जाती.
36353 मेरा मंगेतर मुझसे धोखा कर रहा है, मुझे शादी के दो रोज पहले पता चला. मैंने फिर भी उसी से शादी की, क्योंकि मेरा कोई दोस्त नहीं.
36259 बीवी और उसकी सहेली आजकल ज्यादा मिलते जुलते नहीं. मैं असल में भले ही कुछ न करूं, पर मुझे फैंटेसियों से प्यार है.
36198 मेरे पिता का एक सीक्रेट लव चाइल्ड है. मैंने जासूसी कर ये पता लगाया. किसी से नहीं कहा.
36015 मुझे अपनी बीवी से प्यार है, पर मंगलवार की हर रात मैं किसी मर्द के साथ रहता हूं. मैं गे हूं, पर बीवी को नहीं छोड़ सकता.
35948 साल भर पहले मैंने अबार्शन करवाया था. मुझे अभी भी लगता है कि दुनिया में मुझसे बुरा कोई नहीं.
35702 मेरे पति को नहीं मालूम कि मैं अपने थेरेपिस्ट के बारे में सैक्सुअली फैंटेसाइज करती हूं
35589 मेरे साथ रात बिताने का शुक्रिया. खुद को मार डालने का जब मैं मजाक कर रहा था, वह मजाक नहीं था. तुमने मेरी जान बचा ली.
35210 इराक का अपना दौरा खत्म करने के बाद मैं नहीं चाहता कि तुम घर वापस आओ. तुमसे उबरना मेरे लिए जरूरी है और तुम्हारी शक्ल नहीं देखना काफी मददगार होगा.
35176 मैं अपने पति को पोर्नोग्राफी देखने की इजाजत नहीं दे सकती क्योंकि मेरा कहना है कि वह न सिर्फ भद्दा है और फिर औरतों के लिए असम्माननीय भी. पर मैं खुद अकेले में पोर्नोग्राफी देखती हूं.
34969 कई बार चाहता हूं कि मेरी पत्नी मर जाए (चैन से) ताकि मुझे तलाक के कागजों से मुझे उसका दिल न तोड़ना पड़े.
34948 मेरी मां ने अपनी जिंदगी के प्यार को मेरे लिए छोड़ा. अब वह एक नाखुश शादी में तीन और बच्चों के साथ है. मुझे इससे नफरत है.
34896 मेरा पति पोर्नोग्राफी देखता है और मेरा कहीं और चक्कर है. मुझे फिर भी लगता है, उसका धोखा मुझसे बड़ा है.
34804 मेरी नौकरी छूट गई, हम कंगाल हैं और मुझे पता चल गया कि पिछले 6 सालों से मेरा पति मुझसे धोखा फरेब कर रहा था. मैं अपने बच्चों की खातिर खुश रहने का नाटक कर रही हूं.
34725 मैं अपनी बीवी को तलाक दे दूंगा अगर उसने वज़न घटाना शुरू न किया. मैं उसके आलस और मोटापे से थक चुका हूं.
34562 यह लगभग तयशुदा है कि मेरी बीवी मुझसे प्यार नहीं करती.
34201 पहली मुलाकात में तुमने मुझे बता दिया कि तुम इनफर्टाइल हो और मैंने कहा कि मुझे कोई दिक्कत नहीं. पर अब मुझे बच्चे चाहिए.
34195 मैंने अपने पति से धोखा दिया. तब वह अफ़गानिस्तान की जंग में था.
34150 मैंने अबार्शन करवाया, क्योंकि मेरा बॉयफ्रेंड ने मजबूर किया..मुझे तभी पछतावा हुआ. 4 माह बाद वह चल बसा. कम से कम बच्चा तो रह जाता.
34120 मेरे पिता मेरी मां से पिछले 26 सालों से धोखा कर रहे हैं. मैं 29 साल की हूं और वे पिछले 49 सालों से साथ हैं. अच्छा होता वह उन्हें पहले ही छोड़ देती .
33868 प्यार में उस औरत के साथ, जो मेरे प्यार में हैं. शादीशुदा, बाल बच्चेदार, कोई परवाह नहीं.
33552 सोचती हूं मुझे पति से ज्यादा प्यार अपने पपी से है. उसमें कोई दिक्कत नहीं है, पर पपी कितना बेशकीमती है.
33524 जब मेरे बच्चे मुसीबत लगने लगते हैं, तो मैं इनफर्टिलिटी ब्लॉग्स पढ़ती हूं और खुद को फिर भाग्यशाली मानने लगती हूं.
33516 मैं उसे छोड़ना चाहती हूं पर मैं ऐसा करूंगी नही. मैं नहीं चाहती बच्चों को इस सबसे गुजरना पड़े.
33326 मुझे अपनी बीवी से अब बिल्कुल प्यार नहीं. मैं शादी से बाहर आना चाहता हूं, पर मुझे डर अपनी बेटी को लेकर हैं.
33224 हमसे अलग औऱ दूर रह रहे डैड से मैंने कहा कि आई लव हिम, ताकि वे मुझे कार खरीदने का पैसा दे सकें.
33051 मैं कई बार उस पैसे को खर्च करने के तरीकों के बारे में फैटेसाइज करती हूं, जो मेरे पति के मरने पर बीमा वालों से मिलेगा.
32968 मुझे कैंसर है जिसमें 4फीसदी लोग ही 5 साल से ज्यादा बचते हैं. मैं इतना अकेला हूं और शॉवर में खड़ा होकर मैं रोज रोता हूं.
32920 मुझे पक्का पता है मैं प्रेगनेंट हूं. डर इस बात का कि वह मुझे छोड़ देगा.
32848 मैं 31 एफ हूं, जो अभी भी वर्जिन है. मुझे इस बात का गर्व भी है और शर्मिंदगी भी.
32840 बस अभी ही खत्म हुई मेरे पहले प्यार से घंटे भर लंबी बातचीत. वह इराक में है. अभी भी चिंगारियां हैं हमारे बीच. मैं शादीशुदा, पेट में तीसरा बच्चा. उसकी सगाई हो चुकी है.
32824 मुझे मुहब्बत है उससे जिससे मैं कभी कोई संपर्क नहीं रखूंगा.
32777 इस बात से खीझ है कि मुझे इस काल्पनिक चरित्र (एडवर्ड) से ज्यादा प्यार है बनिस्बत खुद अपने बॉय फ्रेंड के.
37971 मैं 27 का हूं. और मेरे सेलफोन कॉंटैक्ट में तीन लोगों के नंबर हैं. एक तो मेरा खुद ही का है.
31565 मैं सिंगल हूं तीन बच्चों को पाल रही हूं. मेरी मां चाहती है मैं शादी कर लूं. पर मुझे बच्चों को बड़ा करना और सिंगल रहना पसंद है.
31465 मेरा पति मेरी जिंदगी का प्यार है. पर कसम से मैं उसके चेहरे पर हमेशा मुझसे शादी करने और बच्चे करने का पछतावा देखती हूं. मैं मर जाती हूं.
31426 मैं रोज रोती हूं क्योंकि मैं खुद को इतना अकेला महसूस करती हूं. मेरे पति को नहीं पता.
30834 मुझे पता था कि तुम खुद को मार डालने वाले हो.. अच्छा होता तुम्हें रोकने के लिए मैंने कुछ और ज्यादा किया होता.. बजाय तुम्हें तुम्हारी जिद पर छोड़ देने के.
30427 मैंने अपने पति को बता दिया कि मैं लेसबियन हूं, ताकि वह मुझसे तलाक मांगना चाहे. कुछ सालों बाद वह हैरत में पड़ जाएगा, जब मैं दुबारा शादी करूंगी.
30409 जिस इंसान से आप दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, उससे बहस जीतना कितना तकलीफदेह और जीत कितनी खोखली होती है.
30268 मैं इस कदर इन दिनों डरा हुआ हूं कि मेरी कुतिया जल्द ही मरने वाली है और पूरी दुनिया वह इकलौती है, जो मुझसे प्यार करती है.
28629 मुझे लगता है कि मुझे अब मुहब्बत में कोई यकीन नहीं रहा. यह बहुत ही तकलीफदेह है.
28619 पिछले दो सालों में हमने एक बार भी बात नहीं कि पर हर दिन मुझे खुद को तुम्हें फोन करने से रोकना पड़ता है. मिस यू.
27554 मैंने अपनी डायरी में झूठ लिखे. मुझे पता था तुम पढ़ोगे जरूर और फिर उसके बारे में बात भी करोगे. बिना अदलबदल किये. अफसोस कि मेरा अंदेशा सही निकला.
27828 मेरे सबसे पक्के दोस्त ने बस अभी अभी कहा कि बजाय मेरे बॉय फ्रेंड के मैं उससे शादी कर लूं. मैं यह सुनने के लिए सात साल से इंतजार कर रही थी.
27977 आज रात मैं अपने पति से चीट करने वाली हूं. और जो अकेली बात मुझे परेशान कर रही है वह ये है कि मैं परेशान क्यों नहीं हूं इस बात को लेकर.
27456 मुझे फिक्र है कि वह मुझसे वफादार नही रहेगा. उसने अपनी बीवी को मेरे लिए छोड़ा था.
26216 दरअसल ये बच्चा उसका नहीं है.
32716 तुम्हारा एक बेटा है. वह खूबसूरत है.
32695 बीती रात अपने बॉयफ्रेंड से जिदकरके ट्विलाइट फिल्म देखने के बाद मैंने उसे एडवर्ड कहकर पुकारा. तब हम बिस्तर में थे.
32640 तुम्हारा दिये हुए डिजाइनर बॉक्स का इस्तेमाल बतौर एश ट्रे हो रहा है :D उम्मीद है तुमसे जल्दी मुलाकात हो ताकि तुम देख सको कि तुम्हारे बिना मैं कितनी खुश हूं.
32536 मैं पेट से थी, जब मैंने पति को एक औरत के साथ पकड़ा. मैंने गुस्से में अबार्शन करवाया और उससे कहा कि मेरा मिसकैरेज हुआ है.
32510 उसने कहा था कि वह मुझसे शादी करने वाला है. ऐसा बोले हुए भी पांच साल बीत गये.
32451 मेरी गर्लफ्रेंड इम्प्लांट लगवाना चाहती है. मुझे वह जैसी है, ठीक लगती है, पर वह मेरी नहीं सुनती. मुझे लग रहा है कि वह दूसरे मर्दों को इम्प्रेस करना चाहती है.
32222 मुझे हमेशा लगता था कि मेरा बॉयफ्रेंड बदसूरत है और मिसकैरेज होने पर मुझे राहत हुई क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरे बच्चे की शक्ल उसके जैसी हो.
32176 मुझे अपने परिवार को ये बताने में डर लग रहा है कि मैंने अपने बेरोजगार पूर्व पति को अपने घर में वापस आने दिया.
32146 मेरा बॉय फ्रेंड मेरी आदतें खराब करता है जो कुछ मुझे चाहिए वह सब खरीदकर. अब उसकी नौकरी नहीं रही, मैं उसे डम्प कर रही हूं. चीयर्स!
32109 अपने पीरियड्स आने की खुशी इतनी पहले कभी नहीं हुई, जैसे आज.
32091 पिछले 13 साल से मैं अपनी पत्नी के साथ हूं औऱ उसके प्यार में डूबा हुआ, पर अक्सर मैं दूसरों के बारे में फैंटेसाइज करता हूं, क्योंकि मैं कभी भी किसी और के साथ नहीं गया.
32020 मुझे जिससे प्यार है, वह एचआईवी पॉजिटिव है और मुझे नहीं पता क्या करना चाहिए.
33583 अगर अबार्शन के लिए न गई होती, तो मैं इन दिनों मां बनने वाली होती।

LOVE STORY # 461: नदियों के बीच दूरियां थी, बहाव के बीच नहीं

(उसी मित्र की एक और कहानी)
उनके छोटे से शहर से डेन्यूब नदी बहती थी. वे दोनों डेन्यूब के किनारे ही पले-बढ़े थे. इसी नदी के किनारे वे सपनों और सच से परिचित हुए थे. किसी भी प्रेमी जोड़े की तरह उन्हें नदी अच्छी लगती थी. उन्हें कोई भी नदी अच्छी लग सकती थी लेकिन उनके पास अच्छी लगने के लिए सिर्फ़ डेन्यूब ही थी. अब नदी बहुत प्रदूषित थी लेकिन उसका अच्छापन बरक़रार था. वे जवान हो चुके थे लेकिन नदी से उनका लगाव बना हुआ था. लड़की के माँ-बाप समय के साथ बूढ़े हो गए और फिर बेरोज़गार. हंगरी जैसे देश में जीवन कठिन होता जा रहा था. बहुत संघर्ष के बाद उसने अपना शहर छोड़ने का फ़ैसला किया. डेन्यूब ने कभी कहा नहीं कि मत जाओ. लेकिन उसके प्यार ने ज़रुर कहा कि मत जाओ. उसने डेन्यूब को साक्षी मानकर अपनी कौमार्यता पहले ही उसे सौंप दी थी. लेकिन लड़की के जीवन के लिए यह कौमार्यता और प्यार से थोड़ा बड़ा सवाल था. शायद डेन्यूब से भी बड़ा. इसलिए वह वहाँ से निकल पड़ी. उसने ख़ुद को समझाया. अपने प्यार को भी समझाया कि दूरी से प्यार ख़त्म कहाँ होता है. वह टेम्स के किनारे रहने लगी. बहुत दिनों तक कोशिश करती रही कि टेम्स में कभी अपने प्यार की परछाईं देख सके. कभी वह नदी के किनारे बैठे अपने सुनहरे पलों को याद कर सके. लेकिन उसे निराशा हुई. उसे लगा कि टेम्स को थोड़ा ज़्यादा ग़ुरुर है. ऐसा होता है कि हम अपने शहर-गाँव की नदियों में अपनों को देखते हैं और उसे अपनी जीवन यात्रा का साक्षी मानते रहते हैं. नदी कभी नहीं बताती कि वह क्या सोचती है. हम धीरे-धीरे सभी नदी को एक जैसा भी मानने लगते हैं. लेकिन उसे बाद में पता चला कि सभी नदियाँ एक जैसी नहीं होतीं. डेन्यूब और टेम्स दो अलग-अलग नदियाँ हैं. उधर अपनी प्रिया से बिछुड़ने के बाद लड़के को भी डेन्यूब बदली हुई नदी लगने लगी थी. अक्सर वह नदी के किनारे बैठा रहता लेकिन अब नदी उससे बात नहीं करती थी. बहुत दिनों बाद, एक दिन, लड़की ने टेम्स के किनारे बैठे-बैठे अपने प्यार को याद किया. उस दिन संयोग से लड़का भी डेन्यूब के किनारे बैठा उसे ही याद कर रहा था. अचानक उसने देखा कि टेम्स में उसे अपने प्यार की परछाईं दिखाई दे रही है. उसे यक़ीन नहीं हुआ. उधर उसके प्यार को भी डेन्यूब में अपनी प्रिया दिखाई पड़ रही थी. यक़ीन उसे भी नहीं हुआ. दोनों के लिए यह नई अनुभूति थी. दोनों ने तय किया कि इस अनुभूति को उसकी पूरी गहराई से महसूस करना चाहिए. दो दूर देशों में, एक ही दिन, कुछ मनचलों को दो अलग-अलग नदियों के किनारे दो मोबाइल फ़ोन मिले. उनके सिमकार्ड्स अभी भी डेन्यूब और टेम्स की तली में कहीं बह रहे होंगे. उनके बीच अब संपर्क नहीं होता.
दोनों नदियाँ अब भी भली हैं.

Thursday, April 23, 2009

LOVE STORY # 462: उसके अरमान थे, कुछ मजबूरियां भी थीं, फिर वह सपने देखने लगी, जिन्हें टूटना ही था

(उसी मित्र की भेजी गई एक और कहानी)
वह बहुत ख़ूबसूरत नहीं थी. दोहरा बदन था पर आकर्षक होने के सारे तत्व मौजूद थे. उसे शहर में बहुत से लोग जानते थे. क्यों जानते थे यह बहुत रहस्य की बात नहीं थी. ठीक उसी तरह जिस तरह वासवदत्ता और वसंतसेना की ख्याति रहस्य की बात नहीं थी. ये और बात है कि लोग कहते हैं कि वासवदत्ता और वसंतसेना बला की ख़ूबसूरत थीं. लेकिन ख़ूबसूरती जैसी दुनियावी चीज़ अक्सर दिल और जिस्म के मामलों में बेईमान हो जाती है.
वह जो करती थी वैसा करने के लिए उसके पास अपने तर्क थे. बेरोज़गार, बुज़ुर्ग और विधुर पिता, दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई और वह अकेली कमाने वाली आदि-आदि. उसके पास नौकरी भी थी लेकिन इसी नौकरी ने उसे दूसरा रास्ता भी दिखाया था. उसे इस रास्ते में डालने वाला शहर का एक बड़ा सेठ था.
जो धंधा करते हैं वो जानते हैं कि धंधे में दिल का मामला ख़तरनाक होता है. टाटा, बिड़ला से लेकर मित्तलों और अंबानियों तक यह बात सबको याद रहती है. वासवदत्ता, वसंतसेना से लेकर सुंदरीबाई, मुन्नीबाई और इस लड़की तक को यह बात ठीक से पता थी. लेकिन इतिहास गवाह है कि वसंतसेना ने भी ग़लती की थी और मैं गवाह हूँ कि इस लड़की से भी ग़लती हुई.
वह अब तक पैसों पर सोती आई थी. लेकिन इस बार उसे किसी ने सपनों के बिछौने पर सुला दिया था. पैसा जागने पर बचा रहता था लेकिन सपना, जैसा कि हर सपने के साथ होता है, जागने पर टूट चुका था.
अब कई बरस बीत गए पर उसके सपनों के टूटने की कंपन अभी भी अक्सर महसूस होती है. ख़ासकर उस लड़के के दिल में जो न तब रो सका था और न अब रो सकता है. लड़की पता नहीं अब कहाँ है.

Sunday, April 19, 2009

LOVE STORY # 463: उसने समंदर में बड़े यकीन से वह बोतल फेंकी जिसमे एक ख़त था

वह उस अजनबी को वैसे ही जानती थी, जैसे उसके भीतर एक हिस्से को वह नहीं जानती थी.
उस बोतल में एक ख़त था. वह किनारे पर थी. जब उसने उसे देखा. वह ख़त किसी के लिए भी हो सकता था. पर उसे लगा कि वह उस ख़त का इंतज़ार कर रही थी. उसे लगा जिसने ख़त लिखकर उसे बोतल में भर समुद्र में बहाया है, वह उसे जानती है. हम अजनबियों के एक हिस्से को ठीक वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने भीतर के एक हिस्से को नहीं जानते. वह उस खत को अकेले में पढ़ने बैठती है, क्योंकि सिर्फ उसी को पता है कि वह खत उसी के लिए लिखा गया है. नहीं तो क्या जरूरत थी उस बोतल को, कि वह बिना टूटे पानी में डूबती उतराती ठीक उसीके रास्ते आकर पड़ती. उस ख़त में लिखने वाले ने अपने अकेलेपन, अधूरेपन के बारे तफसील से लिखा था और ख़त को पढ़ने वाले को दुआएं दी थी. उसे बार बार लगा कि वह जानती है उसे उसकी बातों से, उसके शब्दों से, दुआओं से, उसके अक्षरों के घुमाव और भूले गये हिज्जों से. वह जानती है उसे उस ख़त में शब्दों के बीच खाली रह गई जगह से. वह जानती है उसे जैसे हम जानते हैं अपने भीतर के किसी को. जिसका हम इंतजार नहीं करते, जिसके लिए हम कोशिश भी नहीं करते, पर जिसके लिए हम हमेशा अपने दरवाजे खुले रखते हैं. ताकि जब वह आये तो न आहट की आवाज़ हो और न दस्तक की दरकार.
बहरहाल उसने उस ख़त को कई बार कई तरह से अकेला होकर पढ़ा. हर बार उसके मन में एक नयी शक्ल का जंगल उग आता, नये तरह के बादल, नये तरह की हवाएं, नये तरह का आकाश.
अपनी दुनिया से छुपकर उसने उस ख़त का जवाब लिखा. कई दिन लगे. जिस अजनबी को वह जानती थी, जो उसका ही हिस्सा था, उसी को अपने मन की बात समझाने की उलझी हुई कोशिश. बहुत संभालकर रखा उस कागज को. बहुत तौलकर लिखा एक एक हर्फ. फिर एक दिन उसे बोतल में भरा, उसकी डाट लगाई और पानी में बहा दिया.
ये काफी हिम्मत का काम था. कोई देख लेता तो. कोई जान लेता तो. कोई पकड़ लेता तो. उस भरोसे का क्या होता, जो उसपर दुनिया ने किया. उसने यह सब पाप की तरह किया, छिपकर. पर जो किया, वह उसके अपने लिए जरूरी था.
समंदर के इस तरफ रेत में कई सारे किले थे. दुनिया थी. पति, बच्चे, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ौसी, जानने वाले सब थे. वह लौट आई सोचकर कि जिसने उसे ख़त लिखा है, उसे उसका जवाब मिल जाएगा. उसे लगा कि इस बहाने वह अपने भीतर के अजनबी से दोस्ती बढ़ा लेगी, उसे लगा बोतल को वापस पानी में फेंक वह अपनी जमीन पर वापस लौट आएगी.
ये तय कर पाना मुश्किल था कि बोतल में भेजा गया संदेश उसके सपने में था, कल्पना में, सच में, सोच में कहां.. ये तय कर पाना मुश्किल नहीं था कि उसने जिया था उस पूरे वाकये को, पल पल बित्ता बित्ता. किसी को पता नहीं था. सिवा उसके. पर वह जहां लौट रही थी, जिस रेत, दुनिया, दिनचर्या, पड़ोस में वहां सब कुछ सामान्य था.
वह असहज तौर पर सामान्य होने, दिखने की कोशिश कर रही थी. हालांकि इससे भी किसको फर्क पड़ता था.

Saturday, April 18, 2009

LOVE STORY # 464: वह जो लाल रंग फैल रहा था, क्रांति का नहीं था

(इस श्रृंखला की यह सौवीं कहानी है. इसके बाद 463 कहानियां और इस सरदर्द से निज़ात पाने के लिए. लंदन से एक मित्र ने अपने बहुत अकेले दिनों को बिताते हुए इसे लिखा है. लिखना हम सबके अकेले होने की निशानी है. और अच्छा लिखना बहुत अकेले होने की. अकेले होने के लिए लंदन एक शानदार शहर है. क्योंकि वह बहुत खूबसूरत और गहरे, ज्ञानी और संवेदनशील, सवालों से जूझते अकेले लोगों का शहर है. वक़्त को जब भी सांस लेने, एक गिलास बियर पीने, सिगरेट का सुट्टा और गप मारने के लिए अगर रुकना हो तो लंदन से मुफीद कोई जगह शायद ही हो. चाहे कोई भी वक़्त हो. कहीं का भी. जैसे यहां है मॉस्को और छत्तीसगढ़ का एक फ्रेम में और फिर उससे बाहर आते हुए.)

टेट मॉर्डन गैलरी में वे वह सोवियत संघ के पुराने पोस्टरों का संग्रह देख रहा था. एक बड़े हॉल में चारों ओर पोस्टर ही पोस्टर थे. स्टालिन से लेकर लेनिन तक. हँसिया, हथौड़ा और तनी हुई मुट्ठियाँ और झंडे. भाषा समझ में नहीं आ रही थी. लेकिन समय के क़दमों के निशान को पहचानना कठिन नहीं था. लगा कि घूमते-घूमते थक गया सो उस बड़े से हॉल के बीचों-बीच लगी बेंच पर बैठ गया. पूरे कमरे में लाल रंग भर गया था.
विवरण में लिखा था कि सोवियत संघ की क्रांति में महिलाओं का बड़ा योगदान था. पोस्टरों में छपी उनकी तस्वीरों से उनकी भूमिका स्पष्ट दिखती थी. मक्सिम गोर्की का उपन्यास ‘माँ’ याद आ गया. फिर कॉलेज के दिनों के दिन याद आ गए. एसएफ़आई के लिए रात-रात पोस्टर लिखना फिर वॉल राइटिंग के लिए निकल जाना और आधी रात को घर लौटते हुए कॉमरेडों से सुबह मिलने के वादे याद आए. कॉमरेड शैली का भरोसा याद आया कि सर्वहारा वर्ग में चेतना जाग रही है और क्रांति अब बहुत दूर नहीं है.
विचारों की श्रृंखला और पोस्टरों का अवलोकन साथ-साथ चल रहे थे. बेंच और पोस्टरों के बीच से लोग गुज़रते जा रहे थे. लेकिन उसे लगा जैसे वे सब पारदर्शी से हैं. अचानक बेंच और पोस्टरों के बीच एक लड़की आ खड़ी हुई. इस बार आर-पार दिखना बंद हो गया. सालों पुराने अतीत और कुछ क्षणों पुराने अतीत से टूटकर वह एकदम वर्तमान में आ गया.
लड़की सिर से पैर तक इतनी सुडौल थी मानों नकली हो. वह कमर पर हाथ धरे पोस्टरों को निहार रही थी. उसके हाथ और कमर के बीच बने तिकोने से उसे कुछ पोस्टर अभी भी दिख सकते थे. लेकिन नज़रें इसी तिकोने जाल में फँस गई थीं. लाल रंग अब और सुर्ख़ हो गया था. लेकिन अब वह पोस्टर से निकलकर लड़की के कपड़ों में आ गया था. जो उसकी नाज़ुक गोरी देह पर कम ही जगह पर था.
अचानक लड़की को मानों मेरे पीछे बैठे होने का अहसास हुआ. अचानक पीछे मुड़ी तो उसने देखा कि लाल रंग मेरे चेहरे पर भी फैल गया था. वह मुस्कुराई और फिर पोस्टर देखने लगी.
क्रांति का इंतज़ार ख़त्म हो गया था. कॉमरेड शैली को आत्महत्या किए भी अब कई बरस बीत गए.

photos: www.tate.org

Monday, April 6, 2009

LOVE STORY # 465: तानाशाह ने वर्ल्डस्पेस रेडियो में लेटिन गानों का स्टेशन लगाया और अपनी कामवाली से पूछा- नाचोगी मेरे साथ

तानाशाह ने सिर्फ बरमूडा पहन रखा था जब उसकी नींद खुली. तानाशाह फर्श पर सो रहा था. गर्मी थी. पंखा चल रहा था. तानाशाह घर में अकेला था. तानाशाह ने रात में शराब पी थी, जिसकी बोतल पर ओल्ड मॉंक लिखा हुआ था और जिसके करीब नमकीन की प्लेट और मुर्गे की हड्डियां पड़ी हुई थी. पास में एक डायरी थी जिसमें तानाशाह की दर्द भरी शायरी थी. तानाशाह का अपने दिल को लेकर भयानक मुलायम और दुनिया को लेकर काफी सख्त रवैया था. तानाशाह मोटा, बेढब और क्रांतिकारियों की तरह की मूंछो वाला था. तानाशाह तानाशाहों की किताबें पढ़ता था और अपनी तानाशाही और उनकी तानाशाही से तुलना करते हुए खुद को हमेशा तैयार रखता था कि पता नहीं कब तानाशाह को इतिहास आवाज दे कि दरबार लग गया है, महराज. तानाशाह का बचपन बाकी तानाशाहों की तरह ही तकलीफ वाला था, और बाकी तानाशाहों की तरह ही वह उस तकलीफ को बांट नहीं सका था. तानाशाह शीशे के सामने या बाथरूम में खुद को एक भयानक गौरवशाली मुद्रा में एक आलीशान तानाशाह की तरह खड़ा होने की प्रैक्टिस करता था. तानाशाह को उन कौवों और कबूतरों से सख्त नफरत थी, जो बाकी तानाशाहों के बुतों का इस्तेमाल सुलभ शौचालय की तरह करते थे. वह तानाशाहों की सीक्रेट कौवा कबूतर भगाओ कमेटी का मानद सदस्य था. तानाशाह ने बाहर जाकर अखबार उठाये, सिगरेट जलाई, कॉफी का घूंट लिया और पहले पन्ने की खबरों को तानाशाही सरसरी के साथ देखा जबकि उसके मुंह में सिगरेट और कॉफी की कड़ुवाहट घूम रही थी. जब उसे पता चला कि उसे प्यार हो गया है और उसके प्यार ने जिस औरत को चुना है, वह शादीशुदा और बाल बच्चेदार है, तब से तानाशाह और ज्यादा अकेला और ज्यादा क्रूर और ज्यादा ओल्ड मॉंक, और ज्यादा कड़ुवी कॉफी, और ज्यादा सिगरेटें पीने लगा था. न सिर्फ टूटे हुए दिल को संभालने के लिए, बल्कि एक अच्छे तानाशाह होने के लिए भी ये जरूरी था. तानाशाह के चेहरे पर तबाही का वह मंजर देखा जा सकता था, जिसका अंदाजा मरी हुई बिल्ली की तरह ढुलमुल तकिये में सोखी गई आंसू और पसीने की नमी से लगाया जा सकता था. तानाशाह को डरावने सपने आते थे. और वह कई बार खुद को सपने में एसेसिनेट होता हुआ देख चुका था. एक बार उसके अपने कुत्ते उसे नोंच कर खा गये थे, ऐसा एक सपने में आया था मार्क्वेज के लिखे एक किस्से की तरह. उस शादीशुदा और बाल बच्चेदार औरत को नहीं पता था कि तानाशाह के तंगदिल होने में उसकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है. तानाशाह की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि उसकी तकलीफ समझने वाला कोई नहीं था. थे भी तो उसकी तानाशाही ही उसमें आड़े आ गई.
तभी तानाशाह की काम वाली आ गई. तानाशाह ने वर्ल्ड स्पेस सैटेलाइट रेडियो में लेटिन म्यूजिक का चैनल लगाया और कामवाली से कहा- मेरे साथ नाचो.
मुंह बिचका कर कामवाली ने उसका एक और गिलास तोड़ दिया.
तानाशाह इतिहास की अगली पुकार का इंतजार करने लगा. तब तक उसका गणतंत्र उसका बाथरूम ही था.

Saturday, April 4, 2009

देश को आडवाणी के योगदान और हमारी जिंदगियों के निजी मामले..


(रविवार.काम पर 4 अप्रैल 2009 को प्रकाशित)
उसके बच्चे थे और वह इतिहास की मरम्मत के लिए नहीं, बल्कि हादसों के टालने का तरफदार था. वह चाहता था कि उसके बच्चे एक अच्छे हिंदू की बजाय एक अच्छा मनुष्य बनने में यकीन रखें. जैसे उसके मुसलमान दोस्त थे और उनका परिवार उसके परिवार की तरह था. नफरत उन्हें हिंदू या मुसलमान बना सकती थी. नफरत जिस असुरक्षा से आती थी, वह उस असुरक्षा का शिकार नहीं था और न ही चाहता था कि उसके बच्चे एक ऐसे देश और एक ऐसी पृथ्वी पर बड़े हों, जहां नफरत और असुरक्षा सियासी करंसियों की तरह न हों. जब हम बच्चों के लिए छोड़े जाने वाली दुनिया की बात करते हैं, तब वह हमेशा खूबसूरत और मानवीय होती है. कोई है जो ऐसा नहीं करने देना चाहता. वह इतिहास को सुधारने की जिद में जो कुछ लिखना चाह रहा है, उसकी सियाही खून है और उसकी इबारत नफरत भरी और उसके इरादे खौफनाक.
पिछले दशहरे को उसने बहुत से दोस्तों को एसएमएस पर दशहरे की रामराम लिख कर भेजा, जो कि उसके बचपन में उसके गांव के लोग कहते थे. तब बाबरी मस्जिद थी और राम राम एक शिष्ट, विनम्र अभिवादन था. उसके नाना की हवेली में जो बढ़ई मुसलमान आता था, उसे मामा कहना उसके लिए जरूरी था. एक दिन नहीं कहा तो नानी ने गर्मी की दोपहर उनके घर भेजा माफी मांगने के लिए. उन बढ़ई मामा की चाय का कप शायद अलग था, पर चाय थी, वे आते थे और उसके बचपन में धुलाई की थपकी की तरह जो क्रिकेट का बल्ला था, वह उन्होंने ही बना कर दिया था ये कहते हुए कि किरकेट से हॉकी ज्यादा बड़ा खेल है.
इस एसएमएस के दो तरह के जवाब आये. एक तो इस तरह का कि – सेम टू यू. दूसरा जय श्रीराम. राम को बख्तरबंद नारे में बदलने का सीधा योगदान दो लोगों का है- एक तो दूरदर्शन पर रामायण सीरियल दिखाने वाले रामानंद सागर का. दूसरा लालकृष्ण आडवाणी का. रामानंद सागर अब पता नहीं कहां हैं. आडवाणी फॉर पीएम का इश्तेहार वर्ल्ड वाइड वेब पर इस वक्त हर कहीं है.
पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स में लालकृष्ण आडवाणी को वोट देने के विज्ञापन नहीं आते होंगे (क्योंकि वे मैंने देखे नहीं), पर बाकी हर कहीं आते हैं. पाकिस्तान से लेकर अरब, यूरोप से लेकर अमेरिकी साइट्स तक (गूगल एडसेंस के साभार). क्या वर्चुअल रियलिटी में उनका फोटोशॉप किया गया चेहरा वह बदल सकता है, जो मेरी और तुम्हारी हकीकत में है.
83 साल के इस बुजुर्गवार के पास यह शायद आखिरी मौका है प्रधानमंत्री बन पाने का और इसलिए इस बार कोई भी लुकाछिपी या संकोच नहीं. लालकृष्ण आडवाणी की शिक्षा भले ही संदिग्ध हो (यहां लिखा है कि वे न तो ग्रेजुएट हैं, न एलएलबी, जैसा कि बताया जाता है) , पर दीक्षा को लेकर कोई संदेह नहीं है. जब इतिहास को ठीक करने वालों का इतिहास लिखा जाएगा, तो पता नहीं उनके कौन से योगदानों को स्वर्णाक्षर नसीब होंगे. आडवाणी का इस देश के लिए क्या योगदान है. मनमोहन सिंह कहते हैं कि बाबरी मस्जिद तुड़वाना उनका इकलौता योगदान है. मनमोहन सिंह थोड़े विनम्र हैं. स्वराज माज्दा नाम के ट्रक को रथ कहलवाने और राम के नाम पर कितने हजार लोगों को मरवाने में श्री आडवाणी जी का सीधा योगदान है. गुजरात दंगों के दौरान देश के गृहमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहना, कुछ न करना भी बड़ी बात है. (फोन किया तो था, उनकी बायोग्राफी बताती है. ये भी कि नरेन्द्र मोदी ने कहा सब कंट्रोल में है). और ये आडवाणी के ही बूते है कि वे एक हाथ से नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहे, और नरेन्द्र मोदी की सरकार खुले आम लोगों को चुन चुन कर मारती रही और दूसरे हाथ से आडवाणी जी अपनी आंख से छलकते आंसू पोंछते रहे, जो उनके लिए खास तौर पर स्क्रीन किये गये –तारे जमीं पर- शो के दौरान निकल रहे थे. आमिर खान जिनकी फ़ना गुजरात में बैन कर दी गई थी, आडवाणी की इस भावविह्वलता से हतप्रभ रह गये थे. अपनी खबरनवीसी के जमाने में आडवाणी जी फिल्म रिव्यू लिखा करते थे. यथार्थ और फिल्मों का रिव्यू एक जैसा कैसे हो सकता था.
आडवाणी का ये योगदान काफी संजीदगी से फिलहाल नहीं देखा गया है, पर बाद में भाषाविद, स्क्रीनप्ले लेखक और राजनीतिशास्त्र के माहिर लोग देखेंगे कि किस तरह से उन्होंने भाषाई तुक्कड़बाजी, अनुप्रास अलंकारों और बातों की बाजीगरी को एक टुच्ची आर्ट में बदल दिया.
• बाबरी मस्जिद के गिरने पर यह कहकर कि – हम दुखी है, पर शर्मिंदा नहीं हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस उनकी जिंदगी का सबसे दुःखद दिन था, उनकी आत्मकथा बताती है.
• हिंदू की कई परिभाषा है. जब भाई बंदी की बात होती है तो देश में रह रहा मुसलमान भी हिंदू है. जब भाई बंदी की बात नहीं होती तो पड़ोस में नगर निगम की नौकरी कर रहा है मुसलमान भी तालिबान है. फिर जिस हिंदू का खून न खौले, खून नहीं वह पानी है- ये नारा भी दीवारों पर तभी आया, जब आडवाणी का स्वराज माज्दा सड़क पर नफरत फैला रहा था.
• जैसे अब वे कह रहे हैं कि पिंक चड्ढी फेम मुतलिक का उनकी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. जैसे उनका कोई भी सीधा रिश्ता साध्वी प्रज्ञा, डॉ प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, मोहम्मद अली जिन्ना, दारा सिंह, बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाले कारसेवकों से नहीं रहा. कहानी पूर्णतः काल्पनिक रही और चरित्र- घटनाओं का वास्तविकता से मेल पूरी तरह से संयोगवश रहा.
• एक समय उन्हें जिन्ना में वह दिखलाई दिया, जो एक विभाजनकारी ही देख सकता है. ये अलग बात है कि ये बात उल्टे उन्हीं के गले पड़ी. न संघ को मजा आया, न गांधी का कद कम हुआ.
• चचचच अनुप्रास- चालचलनचोगाचरित्र.. इस तरह के कई अनुप्रास उनके नारों, नीतियों में जबरने ठेले और पेले गये.
• जब उड़ीसा में ईसाइयों को मारा और एक नन का बलात्कार किया जा रहा था, आडवाणी जी उत्तर पूर्व में अफसोस जाहिर कर रहे थे, जैसे हमलावर किसी और विचारधारा के हों. जब मालेगांव धमाकों में साध्वी प्रज्ञा का नाम फंस रहा था, तो वे प्रधानमंत्री से उसे तंग न करने की मानवीय हिंदू अपील करने दौड़े गये और उस एसआईटी की शिकायत लगाई, जिसके बहादुर अफसर 26-11 के हमलों में मारे गये. हिंदू ताकतों द्वारा सामुहिक बलात्कार की शिकार बिलकीस बानो के बारे में आडवाणी मुंह में दही जमाए बैठे रहे, जो उनके प्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की सरकार, हिंदुत्व और विचारधारा की सबसे घिनौनी मिसाल है.
• आडवाणी जी की एक और खास बात यह भी है कि वे तथ्यों को लेकर बहुत सीरियस नहीं है, जब तक उनका उद्देश्य हल हो रहा हो. उनकी किताब में इमरजेंसी की तारीख भी गलत लिखी है, जब वे खुद जेल में थे. और यह अकेली गलती नहीं. वे कहते हैं इमरजेंसी भारत के इतिहास का सबसे स्याह हिस्सा थी.
आडवाणी जी का सबसे बड़ा योगदान यह भी है कि दुनिया में और कहीं भी- सिवा हिटलर के जर्मनी के- बहुसंख्य वर्ग को असुरक्षित नहीं महसूस करवाया जा सका. जहां से भी सीखा है, वे इतिहास के गलत को ठीक करने के लिए उन लोगों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जो उसके लिए जिम्मेदार नहीं थे. वे अतीत के काल्पनिक दोषों को ठीक करने के लिए वर्तमान को सबक सिखाना चाह रहे हैं. जब अहमदाबाद में मेरी मुसलमान दोस्त को किराये का मकान नहीं मिल पाता है, तो ये योगदान लालकृष्ण आडवाणी का ही है, भले ही वे इसकी जिम्मेदारी न लें. जब लखनऊ में मेरे मुसलमान दोस्त की बेटी स्कूल जाती है, तो मैं चाहता हूं कि उसकी बेटी और मेरी बेटी के सपनों में कोई कतरब्योंत न हो. मैं चाहता हूं वे भी हमारी तरह दोस्त रहें (मैं मिला हूं अहमदाबाद की एक ही गली में रहने वाले लोगों से जिन्होंने कहा- हम साथ में क्रिकेट खेलते थे. हमारे बच्चे नहीं खेलते. ये योगदान किसका है..) जब मैं और मेरा दोस्त न रहें तब भी. और मैं यह जानता हूं कि श्री लालकृष्ण आडवाणी ऐसा नहीं चाहते.
भले ही तोड़मरोड़ कर पेश किये गये उनके सच का बहुत मंहगा मीडिया प्लान हो.
नाना अब नहीं है. बढ़ई मामा का पता नहीं. हवेली दरक रही है. भारतीय जनता पार्टी के मैनिफेस्टो में फिर राम मंदिर है. जो एनडीए के मैनिफेस्टो में नहीं होगा.

Friday, April 3, 2009

LOVE STORY # 466: आईने में जितना दिख रहा है, हक़ीकत उससे ज्यादा करीब है


तुम उसे नहीं जानते थे. पर एक लाल बत्ती पर तुम्हारी कार रुकी तो तुमने अपने रियर व्यू मिरर में पीछे वाली कार को चला रहे आदमी को देखा. तुम्हारी तरह वह भी दफ्तर जा रहा है. उसकी कमीज़ बुर्राक सफ़ेद है और टाई गुलाबी. वह बिल्कुल सजा धजा और तरोताज़ा लग रहा था. तुमने अपनी कार में रेडियो की आवाज़ तेज कर दी और रेडियो जॉकी निइइशा को इस बात की इजाज़त दी कि वह तुम्हारा ध्यान बंटा सके. बाहर भी शोर था, पर कार के बंद शीशों ने उन्हें रोक रखा था. बाहर ट्रैफिक है रेंगता हुआ एक लाल बत्ती पर कई बार रुकता हुआ. अख़बार, फिर गजरा, फिर कार साफ करने का कपड़ा बेचने वाले भिखारीनुमा लोग एक के बाद एक तुम्हारे कांच पर हाथ रख कर जा चुके हैं. तुम्हें लग रहा है कि तुम्हें देर हो रही है. तुम फिर उसे देखते हो उस गुलाबी टाई वाले आदमी को. और चौंक जाते हो. पर तभी बत्ती हरी हो जाती है. तुम सामने देखने लगते हो. गाड़ी आगे बढ़ती है. तुम देखते हो धीरे से गुलाबी टाई वाला आदमी अपनी कार को तुम्हारे पीछे लगा लेता है. अगला चौराहे पर फिर लाल बत्ती है. तुम गुलाबी टाई वाले आदमी की तरफ देखना नहीं चाहते. कम से कम इस तरह से नहीं कि उसे लगे कि तुम उसे देख रहे हो. तुम घड़ी देखते हो और खुद से कहते हो कि आज फिर देर से दफ्तर पंहुचोगे. अगले मोड़ पर गुलाबी टाई वाले की कार बांये घूम जाती है और तुम सीधे अपने दफ्तर के रास्ते. काम, फोन, ईमेल, लंच, गपशप और घर लौटना. बीच में निइइशा.
गुलाबी टाई वाला तुम्हारी ज़िंदगी से जा चुका है. अपनी दुनिया में होगा कहीं.
अगले दिन जब उसी चौराहे पर लाल बत्ती, रेंगता रुकता ट्रैफिक, एक के बाद एक सामान बेचते भिखारी.. तब तुम्हें यकायक गुलाबी टाई वाले आदमी की याद आती है.
तुम बिना उसकी तरफ देखे, बिना उससे पूछे, बिना ये जताये कि तुम कितने ज्यादा उत्सुक हो ये जानना चाहते हो कि गुलाबी टाई पहने हुए वह आदमी इतनी बेसाख्ता रो क्यों रहा था. तुम उसे नहीं जानते थे, पर उसकी कार, उसकी कमीज़, उसके तरोताज़ा चेहरे, उसके संभावित आफ्टर शेव को तुम ठीक वैसे ही जानते थे, जैसे खुद को. क्या कोई बीमार था? कोई नहीं रहा जिंदगी या दुनिया में? क्या कोई धोखा हो गया? पैसा? बेदखली? और क्या वजह रही होगी, तुम सोचते हो अख़बारों, टीवी सीरियल्स की सुर्खियों के बीच दिमाग का गूगल करते हुए.
कई बार रोने के लिए कोई भी जगह काफी नहीं होती, चौराहों की लाल बत्ती भी नहीं. क्या दुख से ज्यादा भयानक तकलीफ यह है कि रोने की कोई सही जगह का न होना. तुम्हें उस खबरनवीस की याद आती है, जिसने खुदकुशी से पहले अपने तमाम दोस्तों को फोन किया, और कहा सब ठीक है बॉस.
रेडियो जॉकी निइइशा भयानक बकर करती रहती है. घर से दफ्तर तक का एक घंटा निइइशा उसकी हमसफर है. वह इतनी बकवास के बाद भी इतने सारे लवसांग्स सुनाती है, कि एक दिन तुम निइइशा से बेपनाह मुहब्बत करने लगोगे बीवी बच्चों का मोह छोड़ कर. निइइशा की समदृष्टि कुछ इस तरह की है कि हिमेश रेशमिया (जो मुंह से नहीं गाता) से लेकर ब्रायन एडम्स (जो फटे बांस से गले से गज़ब का गाता है) के प्रति समान श्रद्धा रखती है. निइइशा तुम्हारी कार में चल रहे प्राइवेट मुजरे का आइटम है.
तुम सोचते हो निइइशा की शक्ल कैसी होगी.
तुम सोचते हो पिछली बार तुमने गुलाबी टाई कब पहनी थी. तुम कब रोए थे पिछली बार. तुम्हें जो दुःख सालते हैं कई बार बरसों बाद भी, तुम्हारे जहन में तैरते हैं.
तुम रियर व्यू मिरर में झांकते हो. वहां तुम्हारी शक्ल है. तुम अपना चेहरा साफ करते हो.
photo: deansouglass/ flickr