वह बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी औरत नहीं थी और सिर्फ पंजाबी में ही लिखती थी. दूसरी भाषाओँ का लिखा वह बमुश्किल पढ़ पाती थी और इसलिए लिखने में कोई बहुत तहजीब नहीं थी. वह बॉलीवुड पर मरी जाती थी. उसके लिए कामयाबी का असली मुक़ाम अपने उपन्यास या कहानियों की फिल्म बनते देखना था. पंजाबी से अंग्रेजी में तर्जुमा होने वाली उसकी पहली नॉवेल पिंजर (द स्केलेटन) थी. ये तर्जुमा मैंने सिर्फ मोहब्बत के नाते किया था. मैंने उस किताब की पूरी रॉयल्टी उसे दे दी इस शर्त पर कि वह अपनी लव लाइफ का पूरा चिट्ठा मुझे तफसील से बता दे. कई बैठकें हुयीं भी. जिस इकलौते इश्क़ का जिक्र उसने किया वह फ़िल्मी गीतकार साहिर लुधियानवी को लेकर था, जिससे वह कभी मिली नहीं थी. पर ख़त ओ खिताबत जरूर हुयी थी. मुझे यह सुनकर काफी निराशा हुयी. मैंने उससे कहा, ' इतनी सी बात तो एक रसीदी टिकट के पीछे लिखी जा सकती है.' बहरहाल जब उसने अपनी आत्मकथा लिखी तो उसका नाम उसने रखा - रसीदी टिकट (हालाँकि रसीदी टिकट में जिक्र है कि साहिर लाहौर में उससे मिला करते थे- एडिटर, आउटलुकइंडिया.कॉम)आखिरकार लुधियानवी से उसकी मुलाक़ात यहाँ दिल्ली में हुयी। उसको उड़ने से डर लगता था, सो वह बम्बई से ट्रेन लेकर पहुंचा. वे क्लारिजेस होटल में मिले, जहाँ उनकी महान प्रेम कहानी को अपने अंजाम तक पहुंचना था. कुछ नहीं हुआ. लुधियानवी बहुत ज्यादा शराब पीता था.
( लेखिका अमृता प्रीतम की मृत्यु पर उनके मित्र खुशवंत सिंह का लेख। इसे श्रद्धांजली कहने में अजगर को संकोच है)
Wednesday, September 23, 2009
LOVE STORY # 392: फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती
बहुत सारे अँधेरे खामोश में बीच एक शब्द जैसे एक झील में उछाला हुआ कंकर और डूबने से पहले फिर फिर उछलता हुआ. उस अँधेरे खामोश में आवाज़ का अपना अमूर्त था, अपना जादू, अपना यथार्थ. दूरी की खाई को लांघती हुयी, माइकलएंजेलो की पेंटिंग में बढ़ी हुयी उंगली की तरह. एक लम्बी रस्सी का सिरा पकड़ता हुआ, थमता हुआ, पूछता हुआ उस सन्नाटे की जगह का पता जहाँ उसे उतरना है, अदृश्य की सीढियों से.
वह उस अदृश्य का हिस्सा होती. अदृश्य की अपनी आज़ादी होती. अदृश्य का अपना विन्यास. जैसे जैसा चाहा, वैसा. अँधेरा मखमल बन जाता. खुश होने के लिए ऑंखें बंद हो जाती. आवाज़ अपने मायने उस आज़ाद अदृश्य में गढ़ती. आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती. आवाज़ उसके साथ प्यार करती. आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती. आवाज़ उसे सुला देती. आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड मड्ड कर देती. कभी यहाँ से बुलाती. कभी वहां से. आवाज़ कवितायेँ पढ़ती. आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे वाक्य को दुबारा कहती. आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती. आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती. आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती. आवाज़ उसे पेट से हंसा देती. और कई बार इतनी खामोशी से भर देती कि हाथ बढाकर कांच पर जामे कुहरे की तरह उसे साफ़ करना पड़ता. आवाज़ कई बार शरीर होती, कई बार आत्मा. अक्सर आवाज़ के मायने शब्द के मायनों से अलग होते.
वह हुंकारे भरती. पलट कर आवाज़ देती. नए विन्यास और व्याकरण को रचते. जो आसमान, खामोशी, रात के पहर, अँधेरा तय करता.
फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती. असल में बहुत सारा शोर होता. ठण्ड, गर्मी, उमस, पसीना, चाँद, बदल, बारिश, अख़बार, दुनिया. असल का एकांत बँटा हुआ होता. असल का ध्यान कई बार भटका हुआ.
वह अँधेरे खामोश में आवाज़ का इंतज़ार करती. खामोश अँधेरे एकांत में आवाज़ का अपना सच था. और असल का अपना. दोनों एक नहीं थे.
वह उस अदृश्य का हिस्सा होती. अदृश्य की अपनी आज़ादी होती. अदृश्य का अपना विन्यास. जैसे जैसा चाहा, वैसा. अँधेरा मखमल बन जाता. खुश होने के लिए ऑंखें बंद हो जाती. आवाज़ अपने मायने उस आज़ाद अदृश्य में गढ़ती. आवाज़ उसे जगाती, छेड़ती. आवाज़ उसके साथ प्यार करती. आवाज़ उसके बिस्तर की सलवटों को पढ़ती. आवाज़ उसे सुला देती. आवाज़ उसके सपनों और स्मृतियों को गड्ड मड्ड कर देती. कभी यहाँ से बुलाती. कभी वहां से. आवाज़ कवितायेँ पढ़ती. आवाज़ एक लम्बा वाक्य कहती. आवाज़ एक लम्बे वाक्य को दुबारा कहती. आवाज़ कई बार एक दूसरे वाक्य को अधूरा छोड़ देती. आवाज़ चुप्पी को ताड़ जाती, उसे समझा लेती, बुझा लेती. आवाज़ उस वाक्य को पूरा करती. आवाज़ उसे पेट से हंसा देती. और कई बार इतनी खामोशी से भर देती कि हाथ बढाकर कांच पर जामे कुहरे की तरह उसे साफ़ करना पड़ता. आवाज़ कई बार शरीर होती, कई बार आत्मा. अक्सर आवाज़ के मायने शब्द के मायनों से अलग होते.
वह हुंकारे भरती. पलट कर आवाज़ देती. नए विन्यास और व्याकरण को रचते. जो आसमान, खामोशी, रात के पहर, अँधेरा तय करता.
फ़ोन पर तैरती हुयी आवाज़ असल की आवाज़ से अलग होती. असल में बहुत सारा शोर होता. ठण्ड, गर्मी, उमस, पसीना, चाँद, बदल, बारिश, अख़बार, दुनिया. असल का एकांत बँटा हुआ होता. असल का ध्यान कई बार भटका हुआ.
वह अँधेरे खामोश में आवाज़ का इंतज़ार करती. खामोश अँधेरे एकांत में आवाज़ का अपना सच था. और असल का अपना. दोनों एक नहीं थे.
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