Sunday, January 17, 2010

किताबें बचेंगी तो पढ़ना बचेगा, लिखना भी

कई समय से मन था कि कोई ऐसी जगह बने जहां हिंदी किताबों के बारे में नये सिरे से बात हो सके. अगर किताबें होंगी तो लिखना और पढ़ना भी बचा रहेगा. हमारी ये बातचीत ही हिंदी को बचा सकेगी. एक तरीका यह सोचा है कि हम अपनी अपनी पसंदीदा हिंदी किताबों की फेहरिस्त बनाएं और आपस में बांटे. मैं अपनी पसंदीदा किताबों की फेहरिस्त यहां दे रहा हूं. वे किसी क्रम में नहीं हैं, न ही अंतिम हैं. सिर्फ वे हैं जिन्होंने मुझे बचाये रखने और बनाने में मदद की. जो मुझे अभी याद हैं. बहुतेरी तो रायपुर में रामकृष्ण मिशन की लाइब्रेरी में पढ़ने को मिलीं, जब मैं शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय से बीएससी होने के असफल प्रयास कर रहा था. फिर बाद की भी हैं. हिंदी किताबें हमारे विमर्श से बाहर खिसकती जा रही हैं. भले ही हिंदी पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है. अब जब मैं हिंदी प्रदेशों से बाहर हूं तो उस तिकड़म के बारे में सोचता हूं, जहां से ये पता चल सके कि हिंदी में इधर क्या चल रहा है. जो जवाब मिलते हैं वे फुटकर होते हैं. ये ही कितना साफ है कि हम किताबों से ज्यादा हिंदी मठाधीशों की उठापटक में कितना रस लेते हैं. ये एक कोशिश उस विमर्श में वापस जाने की. यह जानने की कि जो कहीं रह- छूट गया हो, उसे वापस पाया जा सके. उपन्यास के नाम हैं, पर कहानी और कविता में कई जगह लेखक कवि के नाम से ही काम चलाया है.
उपन्यास
1. वे दिन - निर्मल वर्मा
2. कितने पाकिस्तान - कमलेश्वर
3. अपने अपने अजनबी- अज्ञेय
4. नौकर की कमीज – विनोद कुमार शुक्ल
5. दीवार में खिड़की रहती थी – विनोद कुमार शुक्ल
6. कलिकथा वाया बाइपास- अलका सरावगी
7. खिलेगा तो देखेंगे – विनोद कुमार शुक्ल
8. एक चीथड़ा सुख – निर्मल वर्मा
9. शेखर एक जीवनी – अज्ञेय
10. नाच्यो बहुत गोपाल – अमृतलाल नागर
11. खंजन नयन – अमृतलाल नागर
12. ययाति – विष्णु सखाराम खांडेकर (मूल मराठी)
13. मैला आंचल – फणीश्वर नाथ रेणु
14. आधा गांव – राही मासूम रजा
15. राग दरबारी – श्रीलाल शुक्ल
16. पहला गिरमिटिया – गिरिराज किशोर
17. 74 डाउन – रमेश बक्षी
18. कसप – मनोहर श्याम जोशी
19. आवारा मसीहा – विष्णु प्रभाकर
20. कुरू कुरू स्वाहा – मनोहर श्याम जोशी
21. कहां पाऊं उसे- समरेश बसु कालकूट (मूल बांग्ला)
22. अमृत कुंभ की खोज में – समरेश बसु कालकूट (मूल बांग्ला)
23. टोपी शुक्ला – राही मासूम रजा
24. कटरा बी आरजू – राही मासूम रजा
25. शहर में कर्फ्यू- विभूति नारायण राय
26. मित्रो मरजानी – कृष्णा सोबती
27. गुनाहों का देवता – धर्मवीर भारती
28.
कहानी
29. सहादत हसन मंटो
30. प्रेमचंद
31. मोहन राकेश
32. कमलेश्वर
33. राजेंद्र यादव
34. निर्मल वर्मा
35. श्रीकांत वर्मा
36. उदय प्रकाश
37. ज्ञानरंजन

कविता
38. रामचरितमानस – तुलसी दास
39. कबीर
40. अमीर खुसरो
41. नज़ीर अकबराबादी
42. संसद से सड़क तक - धूमिल
43. साये में धूप - दुष्यंत कुमार
44. दुनिया रोज बदलती है- आलोक धन्वा
45. नारों के अंधे शहर में- शिशु रश्मि
46. शहर अब भी संभावना है- अशोक वाजपेयी
47. चांद का मुंह टेढ़ा है – मुक्तिबोध
48. सुदामा पांडे का प्रजातंत्र – धूमिल
49. मगध – श्रीकांत वर्मा
50. सदानीरा – अज्ञेय की सारी कविताएं
51. कहीं नहीं वहीं – अशोक वाजपेयी (सारी कविताएं)
52. सब कुछ होना बचा रहेगा- विनोद कुमार शुक्ल (सारी कविताएं)
व्यंग्य
53. शरद जोशी
54. हरिशंकर परसाई
काव्य नाटक
55. अंधा युग – धर्मवीर भारती
56. एक कंठ विषपायी – दुष्यंत कुमार

आपने हिंदी की कौन सी किताबें पढ़ी हैं जो आपको लगता है मुझे पढ़नी ही चाहिए.

25 comments:

Ghost Buster said...

मधुबाला, मधुकलश - बच्चन.
हरिया हरक्यूलिस की हैरानी - मनोहर श्याम जोशी.

Apoorv said...

बहुत सही काम किया आपने..जब मेज पर बहस किताबों से हट कर साहित्येतर बातों की ओर मुड़ती है तब बहुत जरूरी है किताबों का वापस मेज पर रखा जाना..एक बेहतरीन फ़ेहरिस्त किताबों मे आपकी रुचि और अच्छे साहित्य के प्रति आपके प्यार को दर्शाती है..आपकी इस बात से सहमत हूँ कि हिंदी प्रदेशों से बाहर जाने पर अ्च्छी किताबों की खोज और शिद्दत से बाहर आती है..और उनके प्रति अनुरक्ति भी..
कुछ पढ़ी हुई किताबों के साथ कई अन्य पुस्तकों के नाम देख कर उनको पढ़ने की रुचि जागृत हुई..सो खोजनी पड़ेगी एक-एक कर.
फ़ेहरिस्त मे अपनी पसंदीदा किताबों के जिक्र की आपकी बात पर मुझे जो कुछ शानदार किताबें याद आती हैं
आपका बंटी-मन्नू भंडारी(बाल-मनोविज्ञान), महाभोज-मन्नू भंडारी (सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य), सूखा बरगद-मंजूर ऐतशाम(वर्तमान मुस्लिम समाज के मानसिक संघर्ष), सूरज का सातवाँ घोड़ा-धर्मवीर भारती(नव-औपन्यासिक-प्रयोग), बारामासी-ज्ञान चतुर्वेदी (एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की कथा के बहाने भारतीय समाज की विडम्बनाओं का राग दर्बारी जैसा कटु-व्यंग्यात्मक चित्रण), झीनी झीनी बीनी चदरिया-अब्दुल बिस्मिल्लाह (बनारस के जुलाहों पर केंद्रित), झूठा सच-यशपाल (विभाजन की सबसे समग्र व त्रासद दास्ताँ)
कुछ और जो पढ़े याद आते हैं उनमे किस्सा लोकतंत्र(विभूति नारायण राय), नीम का पेड़ (राही मासुम रजा), सूत्रधार (संजीव), हमारा शहर उस बरस (गीतांजलि श्री) आखिरी कलाम (दूधनाथ सिंह), चित्रलेखा(भगवती चरण वर्मा) महत्वपूर्ण हैं.
कहानियों मे कृपया शिवमूर्ति, संजीव व अखिलेश को अवश्य पढ़ें जिनकी कहानियाँ हमारे समय का दस्तावेज हैं, साथ ही हेमंत व अवधेश प्रीत को अपनी पसंद के आधार पर रिकमंड करूँगा..
..काफ़ी चीजें याद दिला दीं..शुक्रिया :-)

neera said...

अरे वाह! नेकी और पूछ -पूछ.. किताबों के शीर्षक देखकर ... दिल्ली नगर पालिका का बड़ा सा कमरा , उसमें सात अलमारी जिल्द फटी किताबों से भरी और कुर्सी मेज लिए बैठा एक उबाऊ सा चेहरा याद आ गया .. कुछ शीर्षकों के पन्ने भी पलटे हुए हैं जानकर अनपढ़ होने का अहसास कम हुआ है... हाँ! फुर्सत से भेजूंगी अपनी फेहरिस्त..

poemsnpuja said...

आपकी लिस्ट में कुछ तो पढ़ी हुयी हैं, और कुछ अभी हाल फिलहाल में खरीद कर लायी हूँ जल्द ही पढ़ जाउंगी. स्कूल या कॉलेज की लायब्ररी में कभी हिंदी की किताबें न देखी न पढ़ी, अधिकतर तो घर पर ही पढने का मौका आया. दोस्त भी कुछ ऐसे बने की किसी को पढ़ने का शौक़ नहीं तो किसी से उधार मांग के पढने का संयोग भी नहीं बना. नेट से डाउनलोड करके कुछ किताबें पढ़ी, पर स्क्रीन पर पढ़ने में वो बात ही नहीं आ पाती है जो पन्ने पलटने में आती है. लाइब्ररी जाने वाले लोग, इसे चलाने वाले...सब शायद किसी विलुप्त होती प्रजाति में गिने जा सकते हैं. मुझे आंकड़े नहीं मालूम, पर किताब पढ़ने वाले लोग मुझे कम होते ही दीखते हैं उसपर हिंदी पढ़ने वाले तो और भी कम. हाल में कोई ऐसी हिंदी की किताब आई भी कहाँ है जो सबको पसंद आ जाए...न कोई ऐसा लेखक गिन सकते हैं...मुझे उम्मीद कम दिखती है हिंदी के लिए.

indscribe said...

आप ने खूब लिस्ट बनायी. पोस्ट में रायपुर का ज़िक्र कर के आपने मुझे अज़-हद इमोशनल कर दिया. अरसा-ए-दराज़ हुआ मगर वोह भोला भोला शहर याद आता है...और राम कृष्ण लाइब्रेरी जिसका मेम्बर में भी था....रायपुर शहर की वोह गुज़िश्ता मासूमियत और लोगों का अपनापन....न जाने क्या क्या याद आता है....कम-अज़-कम नौ बरस हुए जब आखरी बार रिख्त-ए-सफ़र बाँध कर चला था....नम आँखों से...

सागर said...

outlook ने १० किताबें सुझाये हैं इस महीने के एडिशन में वो जरूर पढ़िए.. कुछ का नाम तो वैसे लिस्ट में देख रहा हूँ.

KESHVENDRA said...

बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है, समय मिलने पर अपनी विस्तृत सूची प्रस्तुत करूँगा. इस स्तुत्य प्रयास के लिए बधाई.

ओम आर्य said...

आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व 'हंस' पत्रिका में ऐसी हीं एक सूची निकली थी, जिसमें कुछ को छोड़ कर बाकी सारी किताबें उसमें भी दर्ज थीं. संयोग से वह सूची मुझे प्राप्त हो गयी थी और मुझे लगा था कि कोई खजाना हाथ लग गया हो. मैं उस वक्त दिल्ली में पढाई के सिलसिले में गया था पर किसी तरह से सर पे साहित्य पढने का धुन सवार था सो मैंने अपने मकान मालिक के राशन कार्ड पे दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का कार्ड बनबाया और उस सूची की सारी किताबें पढ़ डाली थी. निश्चय हीं उस सूची में कई और किताबें थीं जिनमें से कुछ का जिक्र 'अपूर्व' ने कर दिया है. मैंने वो सूची नोट करके रखी थी कि जब खुद कमाऊंगा तो खरीद कर रखूँगा और बार-बार पढूंगा. पर वो सूची किसी तरह लापता हो गयी और मैंने याद्याश्त के आधार पे कई किताबें खरीदी पर कई सारी छुट भी गयी. आज आपके इस प्रयास से मुझे फिर वो सूची मिल गयी लग रही है. मुझे लगता है और भी लोग जब अपनी पसंद जोड़ेंगे तो यह सूची काफी विस्तृत हो जायेगी और बहुत सारे नए लोगों का मार्गदर्शन करेगी.
उसी हंस में, अगर मुझे सही याद है, तो दो किताबों का राजेंद्र यादव जी ने खास तौर पे जिक्र किया था और सबसे बेहतर बताया था. एक तो मुझे मिल गयी थी और मैंने कई बार पढ़ी है और जितने भी लोग मेरे करीब आते हैं मैं अपनी प्रति देकर उनसे पढने का आग्रह करता हूँ. वो है अजीत कौर की आत्मकथा ' खानाबदोश' और दूसरी मुझे आज तक नहीं मिल पायी वो है, दिलीप कौर टिवाना की 'नंगे पाँव का सफ़र'. अगर कोई मुझे ये किताब किसी तरह भेज/पढवा सके तो मैं बहुत आभारी रहूँगा.
जिन भाइयों तक मेरा ये कमेन्ट पहुँचता है...मैं सबसे आग्रह करता हूँ कि इन दोनों को पढने का मौका मिले तो छोड़े नहीं. एक के बारे में तो मैं कह सकता हूँ कि ये अमूल्य किताब है..

Kishore Choudhary said...

"हम किताबों से ज्यादा हिंदी मठाधीशों की उठापटक में कितना रस लेते हैं." सच कहा. मैं मानता हूँ कि लिखना और पढ़ना संस्कारवान होना है और इस तरह की उठापटक में भाग लेना अपने संस्कार पूर्ण हो जाने का परिचायक है. आपकी पुस्तकों की सूची से अधिक मेरे मन में ये जिज्ञासा घर कर गयी है कि क्या वाकई हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी कि पुस्तकें सहज उपलब्ध हैं ?
छोटे पुस्तकालयों का हाल इन दस सालों में इतना बदतर हुआ है कि बस चारों तरफ कमीशन ही पसरा दिखाई देता है. अब अतिरिक्त श्रम इस बात लगता है कि संख्या बढ़ गयी है साहित्य वहीं खड़ा है कैसे खोजें सही किताब तो आपकी पहल सार्थक लगती है. नए पाठकों के लिए तो नाम ही काफी हैं जिनसे वे खोज सकें.

Sanjeet Tripathi said...

25 फरवरी 2008 को विनोद कुमार शुक्ल जी पर लिखी मेरी पोस्ट में आपने कहा था कि एक लंबे समय से आप फेहरिस्त बनाना चाह रहे हैं लेकिन बना नहीं पा रहे हैं।

और इधर आज देख रहा हूं तो
आपने सूची बना ली है।

क्या बात है। आपकी इस लिस्ट में से बहुत सी नहीं पढ़ी है। दिक्कत यह है कि विवेकानंद आश्रम की लाइब्रेरी में नई किताबें जल्द आती नहीं, देशबन्धु अखबार की लाइब्रेरी में कुछ तो आ ही जाती है। देखते हैं वहां भी मिलती है या नहीं।
अब इसके अलावा एक ही लाइब्रेरी और बच जाती है रायपुर में। शहीद स्मारक वाली सरकारी लाइब्रेरी, वहां का भी सदस्य बन जाता हूं।

palash surjan said...

ram nagarkar ki `bus ka ticket'is good for light reading.even kids will enjoy it.

navin rangiyal said...

albert kamu ki ajnabi (the stranger) patan (the fall) padhiye... shayad aapne padhi ho ... fir... ek baar yaad dila dun...

लवली कुमारी said...

चित्रलेखा

Vidhu said...

नरेश मेहता के तकरीबन सभी उपन्यास और कविता संग्रह...मसलन ,दो एकांत,डूबते मस्तूल ,वह्पथ बंधु ,था,प्रथम फाल्गुन ,धूमकेतु एक श्रुति एवं ...नदी यशश्वी है ... इस लिए भी कि एम् ए प्रीवियस के अपने लघु शोध प्रबंध में मैंने उन्हें चुना था, इनके बारे में दावे से ये कहा जा सकता है कि ..इन उपन्यासों में सामजिक यथार्थ का चित्रण और जनचेतना की सजगता के साथ मानवतावाद दर्शन भी बखूबी गुंथा गया है जिसमे प्रत्येक घटना ,परिस्थिति .और उनके पात्रों की सर्जना के पीछे एक वैचारिक गरिमा है ////साथ ही यदि आप कुवर नारायण ,विनोद कुमार शुक्ल को पसंद करतें हेँ तो निश्चित ही आपको मेहता जी की उपन्यास कला भी अभिभूत करेगी ...ये लिस्ट बहुत बड़ी है ....फिर कभी

Fakeer said...

कोई नयी पोस्ट नहीं ...??

अपूर्व said...

इंतजार कुछ ज्यादा बल्कि बहुत ज्यादा ही लम्बा नही हो गया इस बार???
उम्मीद है कि सब खैरियत होगी...

Rahul Singh said...

रायपुर के रामकृष्ण मिशन पुस्‍तकालय की आपने चर्चा की है, इस पुस्‍तकालय, स्‍वामी आत्‍मानंद जी और श्री हरि द्विवेदी जी से मैं भी लाभान्वित रहा हूं. मेरे छात्रावास का कमरा ही लाइब्रेरी के बगल में था. आपकी सूची देखकर आनंद आया. निबंध पढ़ना पसंद करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय और विद्यानिवास मिश्र को जरूर देखें.

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Bandhu,jo koi bhi ho par ho bahut khoob,kitabo ki purani ,ek alag see khushboo wali duniya mey le aaye aap,mera aabhar .
aap ko Himanshu joshi ka upanyas
Tumharey Liye ,aur Anil Barve ka
Thank You Mr.Glad jaroor padhna chahiye.Kitabey to itni hai aur maine padhi bhi hai ki batani mushkil par wada raha dheerey dheerey likhoonga aapko .
Mera cell no hai 9425898136 hai aapsy baat karna chahoonga .Karengey kya?
Likhtey rahiye,kabhi merey blog Jeevansandarbh.blogspot.com per aiye meri kavitayen dekh kar bataiye kuch.
shesh fir
sasneh
dr.bhoopendra

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Bahut purani yadey taaja kar di aapney ,sapney jaga deejiye/
Aapko merey matanusar Himanshu Joshi ki Tumharey Liye ,AnilBarve ki Thank you Mr.glad padhni chahiye .Kitabon ki duniya mey to rahta hi hoon par kai logo ko aaney jaga diya ,hardik aabhar.
sasneh
dr.bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com

devendra said...

एवान ए ग़ज़ल - जीलानी बनो
आग का दरिया- कुर्तल एन हैदर
मगध- श्रीकांत वर्मा

pallav said...

काशी का अस्सी-काशीनाथ सिंह और ईंधन-स्वयं प्रकाश भी पढ़ ही लीजिये.

दर्पण साह said...

अपूर्व और आपकी लिस्ट के बाद कम ही 'हिंदी' किताबें बची हैं जो मेरी निजी पसंद हैं और इस लिस्ट में छूट गयी हैं. कारण ये भी है कि हिंदी साहित्य बहुत कम पढ़ा है. :

उपन्यास: सारा आकाश, मेरे सत्य के साथ प्रयोग की कहानी, बारामासी, हरिया हरक्युलिस की हैरानी.
कहानियाँ: शैलेश मटियानी, शिवानी एवं गुलज़ार की कहानियाँ
कवितायें: दुश्चक्र में सृष्टा, त्रिलोचन,गुलज़ार, गोरख पाण्डेय, की कवितायेँ
नाटक एवं एकांकी: जिन लाहोर नि वेख्या ओ जमिया नई, मोहन राकेश (हाईली रिक्मनडेड : आषाढ़ का एक दिन ), विजय तेंदुलकर एवं गुलज़ार के नाटक.
कॉमिक्स : चाचा चौधरी, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा.

PS:१४० अक्षरों की सारी कहानियां मर्मस्पर्शी थीं खास कर कैंसर के रोगी की शावर में रोने वाली.

Rahul Singh said...

रायपुर का जो जिक्र पोस्‍ट में है, कम से कम 5 साल तो मैं भी इसी इर्द गिर्द मंडराता रहा हूं. पुस्‍तकालयों के साथ ठाकुर साहब की पुस्‍तक प्रतिष्‍ठान, दुबे जी की रायपुर बुक डिपो और हरीश-मुकुल भाई की रामचन्‍द्र बुक र्स्‍टाल, कभी-कभार कोटक भी हमारा अड्डा होता था. हरीश भाई की दुकान का उपयोग तो रीडिंग रूम जैसा भी कर लिया करते थे. किताबों की सूची अच्‍छी है, सभी अवश्‍य पढ़ने योग्‍य. रेणु की परती परिकथा अधिक जरूरी नाम है और भगवती चरण वर्मा की चित्रलेखा...

Rahul Singh said...

वैसे इन दिनों मैंने कुछ पोस्‍ट रायपुर और आसपास पर लगाई है, ताजी है रायपुर में रजनीश

shailendra said...

shudhipatra-neelakshi singh,pili chatri wali ladaki-uday prakash,antim aranya-nirmal verma